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कच्चे तेल की उठापटक वाली दुनियां से रूबरू कराता नीलाक्षी सिंह का उपन्यास "खेला"

कच्चे तेल की उठापटक वाली दुनियां से रूबरू कराता नीलाक्षी सिंह का उपन्यास "खेला"

‘खेला’ को आख्यान की सिद्ध वर्णन कला और विरल सृजनात्मक भाषा के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए.

‘खेला’ को आख्यान की सिद्ध वर्णन कला और विरल सृजनात्मक भाषा के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए.

हिंदी साहित्य की दुनियां में मन्नू भंडारी के 'महाभोज' उपन्यास को स्त्री लेखिका द्वारा लिखा पहला राजनीतिक उपन्यास माना जाता है. वैश्विक परिदृश्य में कच्चे तेल की राजनीति पर लिखा गया 'खेला' नीलाक्षी का पहला उपन्यास है.

    – अमिता मिश्र

    Book Review: नीलाक्षी सिंह हिंदी कथाकारों में पहचाना हुआ नाम है. हिंदी कथा संसार में उनका अभ्युदय एक घटना सरीखा है. उनके लिखे हुए को पढ़ना हिंदी भाषा भाषियों के लिए संबल रहा है. उसी संबल की अगली कड़ी उनका उपन्यास ‘खेला’ है.

    “खेला” उपन्यास साहित्य की दुनिया में एक दमदार उपस्थिति देता है. उपन्यास का विषय विश्व की कच्चे तेल की राजनीति है. कहानी की नायिका वरा कुलकर्णी के इर्दगिर्द उपन्यास की पूरी कहानी बुनी गई है. वरा कुलकर्णी का मुंबई में एक तिकोना ऑफिस है जहां तेल की खरीद-फरोख्त के नियम निर्धारित होते हैं. वरा कुलकर्णी विश्व बाजार में कच्चे तेल की उठापटक वाली दुनियां से रोज दोचार होती है.

    उपन्यास के सभी पात्र आज के हैं जो वैश्विक अर्थव्यवस्था से आक्रांत हैं. ये सब शेयर बाजार के एक ऑफिस में काम करते हैं. सभी उपभोक्तावादी दौर के चंगुल में फंसे हुए नौजवान हैं, जहां एक अज्ञात दौड़ सबका पीछा कर रही है और मानवीय संवेदनाओं को रोज खरोंचे लगती हैं. पात्रों की मनःस्थितियां बिखरी-बिखरी सी हैं. विडम्बनाएं उनके साथ परछाई सी लगी हैं. उन्हीं के बीच उन्हें चलते चले जाना है रुकना नहीं है.

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    साथ ही चलती रहती हैं मध्यवर्गीय जीवन की भांति-भांति की उलझनें… पर वरा कहीं हताश नहीं होती वह पूरी चौकन्नी मध्यवर्गीय लड़की है. हर बात का कोई न कोई तोड़ निकाल लेती है. और न ही वह लड़की होने की कमजोरी से आहत है.

    वरा कुलकर्णी जहां दफ्तर में काम करती है वहां शेयर बाजार की सूचनाएं हैं. साथ में छः तिलों वाली दिलशाद काम करती है और एक लड़का अफरोज़ भी. अमिय रस्तोगी और दीप्ति सकलानी भी काम करते हैं जिनसे दोस्ती और प्यार की हल्की आंच की गर्माहट मध्यमवर्गीय परिवेश में सजती संभलती दिखाई देती है.

    वरा कुलकर्णी का अफ़रोज़ के प्रति अनकहा प्रेम है जो भूल-भुलैया में गुम होता रहता है. दिलशाद शादीशुदा है. दिलशाद ने प्रेम विवाह किया है पर प्रेम की परछाइयां उसके वैवाहिक जीवन से उतर रही हैं. वह कहीं कुछ और तलाश कर रही है. क्या….शायद उसे पता नहीं. इसी कुछ को पाने के क्रम में वरा कुलकर्णी के बुडापेस्ट जाने के बाद वह अफ़रोज के और करीब हो जाती है.

    वरा इस उपन्यास की नायिका है जो चुहलबाज और बड़े-बड़े कामों को चुटकियों में अंजाम देने वाली है. वह छोटे से संयुक्त परिवार के बीच से निकल कर मुंबई के आफिस में पहुंच जाती है और फिर वहां से वैश्विक बाजार के कच्चे तेल के पेशेवर लोगों में पहुंचकर ऊपर-नीचे होती हुई स्वयं को बार-बार चोट पहुंचाती है पर हारती कहीं नहीं है.

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    वरा कुलकर्णी की खूबी यह है कि उस पर मध्यवर्गीय जीवन बेमौसम भी अपने छींटे मारता रहता है. उसे सब कुछ याद है. लोढ़ी-सिलबट्टे में पीसे गए मसाले की खुशबू. संयुक्त परिवार में बोरे की झिर्रियों से दूसरे परिवार को उचक कर देखा जाना. एड़ियों का तिरछापन सब तेल बाजार के साथ-साथ चलता है.

    लेखिका अपने साथ संजोये चल रहे चरित्रों का सूक्ष्मता से चित्रण करती हैं. जैसे- अमिय रस्तोगी बहुत शरारती था. उसने पेंसिल से एक कार्टून बनाया जिसमें खाड़ी देशों से बहता तेल उस चित्र तक आ रहा था और एक लड़की उसके बढ़ते स्तर से बेखबर आकंठ तेल में डूबी थी. कई एक देशों की लड़ाई में इस कच्चे तेल दूसरा नाम काला सोना पड़ा.

    सऊदी अरब सस्ता तेल बेंचकर ईरान पर दबाव बनाता है कि वह पश्चिमी देशों और अमेरिका के सामने घुटने टेके और परमाणु सन्धि पर हस्ताक्षर करे. उधर अमेरिका भी खुश कि उसका प्रिय चेला सऊदी अरब अपने सस्ते तेल वाली नीति से रूस और वेनेजुएला पर भी दबाव बना रहा है. तेल की विश्व राजनीति को उपन्यास बारीकी से रेशा-रेशा उधेड़ता चलता है बहुत सारी गुफ्तगू और दिलचस्पियों के साथ.

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    अपने कामों के प्रति समर्पित वरा कुलकर्णी बुडापेस्ट पहुंच जाती है तेल के ऑफिस में काम करने. इस आवाजाही में अफरोज छूट जाता है. उसका छूटना बिलकुल स्वाभाविक है जैसे वह मिला ही वरा को इसलिए हो कि उसे वरा से एक दिन दूर हो जाना है. वरा के ध्यान में अफ़रोज देर तक नहीं रह पाता. वह मिली हुई स्थितियों को स्वीकार कर आगे बढ़ जाती है.

    बुडापेस्ट में वरा के ऑफिस में मिसेज गोम्स काम करती हैं. जिनकी अब तक चार शादियां हो चुकी हैं. उनका एकमात्र बेटा उनसे दूर जा चुका है. जिसे वे कम ही याद करती हैं. लेखिका के शब्दों में ‘बगैर रियाज बहुत सी चीजें धार खो देती हैं’ यही मिसेज गोम्स के साथ भी हुआ. उनका बेटा उनकी यादों में कितना है यह जान पाना मुश्किल है.

    मिसेज गोम्स और वरा कुलकर्णी यद्यपि उम्र की संगति में मेल नहीं खातीं फिर भी उनमें गहरा दोस्ताना है. एकदूसरे के साथ वे बहुत सारा वक्त बिताती हैं. बहुत तरह के मशविरे हैं यहां. स्त्री की उस स्थिति का आकलन भी किया गया है जहां वह देश और राष्ट्र की सीमा से आगे मात्र स्त्री है. मिसेज गोम्स के साथ सोवियत सेना के रूसी सैनिक ने दैहिक हिंसा की थी जिससे उनका गर्भ रह जाता है. इस यौन हिंसा के लिए मिसेज गोम्स को पास पड़ोस के लोगों द्वारा उन्हें ही दोषी ठहराया जाता है. परिणाम 19 साल की उम्र में आनन-फानन उनका विवाह कर पति के घर भेज दिया जाता है. जहां वे अपने बच्चे को जन्म देती हैं और बड़ा करती हैं. लोगों को यही पता है कि यह उनके पति की संतान है.

    उपन्यास का एक मुख्य किरदार यही मिसेज गोम्स का बेटा है. जिस पर मिसेज गोम्स कम से कम बात करती हैं. पर होशियार वरा की निगाह में उनका बेटा जो सीरिया में किसी तेल कंपनी में काम करता है और अब आतंकवादी बन चुका है ओझल नहीं हो पाता.

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    इन्हीं सब के बीच वरा कुलकर्णी टिम नाम के एक व्यक्ति से मिलती हैं और कई सारे उतार-चढ़ावों से गुजरती हैं. टिम से मिलते ही उन्हें पता है कि वे अफ़रोज़ से नहीं टिम से ही प्रेम करती थीं. पर यह प्रेम भी कोई खास जगह बना नहीं पाता. आकर अनायास ही गायब हो जाता है. वरा कुलकर्णी को प्रेम से अधिक और बहुत सारी चीजों ने जकड़ रखा है. इसलिए प्रेम उनसे छिटक कर दूर चला जाता है. इसी प्रेम के चलते वे बलात्कार भी झेलती हैं और शरणार्थियों के साथ कैम्प में रहती भी हैं.

    पूरे उपन्यास में हिंसा आद्योपांत चलती है. इस हिंसा का होना पूरे विश्व का हिंसा के खेल में शरीक होना है. लेखिका का इस उपन्यास में एक बेहद सार्थक प्रश्न है कि यदि सारे हिन्दू हो जाएं तो क्या ये हिंसा, नफरत ठीक हो जायेगी या फिर सारे मुसलमान होने से सारी समस्या सुलट सकती है.

    वरा कुलकर्णी बचपन से ही होशियार है कुछ इस तरह की इम्तहान में कम से कम पढ़कर अधिक से अधिक अंक बटोर लाने में वह माहिर थी.

    “खेला” राजनीति और आंतकवादी थिगलियों की कठिन चढ़ाई वाला उपन्यास है जिसमें लड़की वरा कुलकर्णी लगातार साहस के साथ अपनी नौका खींचती नजर आती है. साथ चलने के लिए उसके पास कोई नहीं है सिवाय बचपन के किस्से-कहानियां, लोरियों की तरह हर मुश्किल और बेहतर समय में उसके पास गुनगुनाते रहते हैं. बचपन में देखी गई सांप की केंचुल, बालों में लगाई गई मेहंदी के दृश्य हैं. किसी की मृत्यु हो जाने पर बाल सुलभ मन का यह सोचना कि आज इम्तहान से मोहलत मिल जायेगी…!

    उपन्यास के अंत में वरा कुलकर्णी शरणार्थियों के कैंप में होती है जहां कई तरह की औरतें और बच्चे हैं. शरणार्थी कैंप माकूल अर्थ में किसी शरणार्थी को पनाह नहीं दे पाता. सब के सब परिस्थियों के मारे हुए हैं. उपन्यास में नवसाम्राज्यवादी नीतियां हैं जो वर्तमान समय में स्त्री और पुरुष, दोनों के लिए घातक हैं.

    भाषा नीलाक्षी की लेखनी में तितली है जो उड़ती-फिरती है. सारी बातें, सारे मशविरे जो सीरियस भी हैं वे भी भाषा के साथ उछाल खाते रहते हैं. यहां पर व्योमेश शुक्ल का यह कथन प्रासंगिक होगा- ‘नीलाक्षी का मिजाज शतरंज के घोड़े जैसा है वे ढाई घर चलती हैं ये उनके आजमाये हुए शिल्प हैं.’

    रवीन्द्र कालिया का गरूर तोड़ना चाहती थी, इसलिए कहानी लिखना शुरू किया- ममता कालिया

    उपन्यास की भाषा बहुत चमकदार और जादुई है जो पहेलियां बुझाती जाती है. साथ ही इन राजनीतिक सांठगांठ के साथ कस्बाई जीवन की छोटी-बड़ी बातें मरहम की तरह आ आकर अपनी परछाई डालती रहती हैं. कथानक में जहां व्यक्ति की मानवीय प्रवृत्तियों पर भी गहरी नजर डाली गई है कौन, क्या जीवन से चाहता है.

    उपन्यास की शैली सूत्रात्मक है जो उलझे धागों को लगातार सुलझाती चलती है. पूरा उपन्यास छोटे-छोटे शीर्षकों में बांटा गया है. वे भी बिलकुल अपने आसपास गांव घर के लगते हैं-आंख-मिचौली, लड़का-लड़की शहर सिनेमा, चोर-सिपाही, छिपम-छिपाई, पटना से चिठ्ठी आयी रास्ते में खो गई, ये शीर्षक बचपन की याद दिला देंते हैं और उस अनूठेपन की भी जो शहरों की खोज में हमारी मुट्ठियों से खिसका है.

    उपन्यास में कलात्मकता के साथ प्रबुद्ध तेवर भी है जिसे चौकन्ने होकर पढ़े जाने की आवश्यकता है. कवि पंकज चतुर्वेदी का कहना है कि ‘नीलाक्षी के गद्य में कृष्णा सोबती सा बांकपन है.’ यह बांकपन हर जगह है वरा के सामने परिस्थितियां कितनी ही मुश्किल क्यों न हो उसका बांकपन बना रहता है.

    Amita Mishra

    Tags: Books, Hindi Literature, Literature

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