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Book Review : समाज की जकड़नों से मुक्तिसंदेश लेकर आई है 'आँगन की गौरैया'

Book Review : समाज की जकड़नों से मुक्तिसंदेश लेकर आई है 'आँगन की गौरैया'

मुक्ति शाहदेव का कविता संग्रह 'आँगन की गौरैया'

मुक्ति शाहदेव का कविता संग्रह 'आँगन की गौरैया'

मुक्ति शाहदेव ने संग्रह की शुरुआती कई कविताओं में अपने मां-बाबा को शिद्दत से याद किया है. बचपन के घर-आंगन के खूब मनोहारी रूप मुक्ति की कविताओं में झलकते हैं, जहां गौरैये सी फुदकती दिखती हैं मुक्ति. इस संग्रह की पहली कविता 'उड़ान' के पाठ से बारहवीं कविता 'उम्मीदों का दीया' तक पहुंचते-पहुंचते एक ऐसी छत बन जाती है, जहां बाबा का स्नेह तो पसरा ही है, चिड़िया जैसी मां भी हैं और इन मां-बाबा की तमाम नसीहतों की घुट्टी पीकर संस्कारों में लिपटी एक गौरया भी है, जिसके भीतर कई चीजों के लिए मुक्तिकामना भी है.

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अगर सिर्फ पढ़ना हो तो 117 कविताएं बहुत ज्यादा नहीं होतीं, लेकिन अगर कविताओं का रसास्वादन करना हो तो उन्हें चुभलाते हुए पढ़ने के लिए 10 दिन भी कम पड़ेंगे. और तब तो निश्चित ही, जब कविताओं के कई रंग हों, कई तेवर हों और भावनाओं के साथ विचारों का ज्वार-भाटा उन्हें रच रहा हो. ये बातें मुक्ति शाहदेव के कविता संग्रह ‘आँगन की गौरैया’ से गुजरते हुए महसूस की जा सकती हैं.

इस संग्रह से गुजरने के पहले कॉमन मित्रों के बीच होनेवाली चर्चा के दौरान मैंने कहा है कि हां, मुक्ति से कई मुलाकातें हैं मेरी. उन्हें जानता हूं. एमए में वह मेरी सीनियर थीं. पर इस संग्रह से गुजरते हुए मैं लगातार नई-नई कई मुक्ति से मिला. मुक्ति शाहदेव से मेरे पुराने परिचय में कई और पहचान नए सिरे से जुड़े. किसी व्यक्ति को जानना उसके रचनाकार को समझने के मुकाबले हमेशा अधूरा होता है – यह बात इस संग्रह से गुजरते हुए बहुत स्पष्ट होती हैं. मुक्ति अपनी कविताओं में जितनी मुखर हैं, जीवन में उतनी ही शांत. जीवन में जितनी संतुष्ट दिखती हैं, उनकी कविताओं में असंतोष, अविश्वास के स्वर उतने ही तीखे हैं. हां, उनके जीवन की कोमलता और व्यक्तित्व की सौम्यता उनकी कविताओं में उसी रूप में बहती हुई मिलती हैं.

इस संग्रह में मुक्ति परत-दर-परत खुद को खोलती जाती हैं. मां के आंगन में फुदकती गौरैया की उड़ान संग्रह के मध्य में दिखने लगती है. गौरैये का संघर्ष तो साथ चलता ही रहता है और संग्रह के अंत तक पहुंचते-पहुंचते यह गौरैया इन्सानों के जंगल से गुजरकर इतनी परिपक्व हो चुकी है कि उसे साफ-साफ दिखने लग जाते हैं संबंधों के समीकरण, रिश्तों की साजिशें. संग्रह की अंतिम कविता ‘रिश्ते’ की कुछ पंक्तियों पर गौर फरमाएं :

जब तुमने कहा था प्यार
सच, मैंने उसे
प्यार ही समझा था
जब कहा था विश्वास
तब भी उसे
मैंने विश्वास ही समझा था
जब बढ़ाया था
संग-संग कदम तुमने
सच, नहीं पहचान पाई थी
मैं फरेब की चाल को
हाथों को थामकर
या कि आँखों में झाँककर
जब मुसकराती थी तुम
मैं नहीं देख पाई
उसके पीछे की बिसात को।
समझ आने लगा है
छलछलाती आँखों
और भर्राए गले से
निकली हर आवाज
एकदम से सच नहीं होती
कि मासूम मुसकराहटें ही
करती हैं कत्ल बड़ी बेरहमी से
हर रिश्ते का…

मुक्ति शाहदेव ने संग्रह की शुरुआती कई कविताओं में अपने मां-बाबा को शिद्दत से याद किया है. बचपन के घर-आंगन के खूब मनोहारी रूप मुक्ति की कविताओं में झलकते हैं, जहां गौरैये सी फुदकती दिखती हैं मुक्ति. इस संग्रह की पहली कविता ‘उड़ान’ के पाठ से बारहवीं कविता ‘उम्मीदों का दीया’ तक पहुंचते-पहुंचते एक ऐसी छत बन जाती है, जहां बाबा का स्नेह तो पसरा ही है, चिड़िया जैसी मां भी हैं और इन मां-बाबा की तमाम नसीहतों की घुट्टी पीकर संस्कारों में लिपटी एक गौरया भी है, जिसके भीतर कई चीजों के लिए मुक्तिकामना भी है. यह मुक्तिकामना संग्रह की पहली कविता में भी उभरी है :

अब रोको न उसको
देहरी से निकले हैं पाँव उसके
जो दी है आजादी तो
यूँ काटो न पंख उसके
उड़ने दो एक बार जी भर के
उसके हिस्से का
छीनो न आकाश उससे।

लेकिन मुक्ति की यह छटपटाहट, यह विनम्र याचना क्या कवयित्री ने सिर्फ खुद के लिए किया है. यह छटपटाहट तो महिला लेखन में सदियों से दिखती रही है. कभी शिकायत के तौर पर, कभी विद्रोह के तौर पर, तो कभी याचना के तौर पर. झारखंड की स्त्रीलेखन परंपरा में मुक्ति की कविताओं की इन शाखों की जड़ें दिवंगत कवयित्री शैलप्रिया की कविताओं में दिख जाती हैं. ‘सवाल’ शीर्षक कविता में शैलप्रिया ने लिखा था – पिताश्री/तुमने क्यों/आकाशबेल की तरह/चढ़ा दिया था/शाल वृक्ष के कंधों पर? मुझे सख्त जमीन चाहिए थी…

शैलप्रिया के बाद की पीढ़ी के रचनाकारों में हैं मुक्ति शाहदेव. जाहिर है शैलप्रिया के दौर के जो सवाल थे, उसके जवाब तलाश में आज मुक्ति शाहदेव की पीढ़ी निकल पड़ी है. झारखंड जैसे परिवेश में मध्यवर्ग में पल रहे इस दौर के रचनाकारों को भी ‘देहरी से बाहर’ निकलने की इजाजत सशर्त दी गई है, इसीलिए अपने-अपने तरीके से उनमें विद्रोह के स्वर मुखरित होते हैं. मुक्ति के दौर की रचनाकारों में हैं संगीता कुजारा टाक. मुक्ति की कविताओं में मुक्तिकामना के जो स्वर दिखते हैं, उसकी छटपटाहट कुजारा की कविताओं में भी देखी जा सकती है. लेकिन कुजारा मर्दवादी समाज को कठघरे में खड़ा कर देने तक को उद्धत दिखती हैं – काश! साइंस इतनी तरक्की कर ले/और साफ-साफ बता सके/कि मेरे दिल के/जिस हिस्से में/दर्द की गांठें/जमा हो गई हैं/वो तुम्हारी दी हुई हैं!

दरअसल, महसूसने, सीखने और साधने की प्रक्रिया पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है. स्त्री के प्रति समाज का असहिष्णु नजरिया उसे ऐसे गहरे जख्म देता है, जो उसके दिलो-दिमाग पर ताउम्र रह जाता है. ऐसे जख्म स्त्री रचनाकारों ने पीढ़ियों से देखे और महसूसे हैं. मुक्ति शाहदेव की कविता ‘चिड़िया जैसी माँ’ में भी यह दर्द छलकने लगता है, जब वह अपनी मां को याद करती हैं :

तुम चिड़िया जैसी माँ
क्यों नहीं बन जाती
पंख निकलते ही
उड़ जाने दो खुली हवा में
पंख पसार लेने दो आसमान में
और अब मत करो मेरी फिक्र
सच माँ,
तुम चिड़िया जैसी माँ
क्यों नहीं बन जाती?
प्रश्न अनुत्तरित ही रह गया है
सदियों से
और ताकती रहती है माँ
टुकुर-टुकुर
अपने बड़े हो गए बेटों को
कहती कुछ नहीं
बस, अपने चेहरे की
झुर्रियों का हिसाब करती
थक जाती है
अपने अनुभवों का पुलिंदा
खोलने की हिम्मत
नहीं कर पाती
सोच-सोचकर
घुटती रहती है
क्यों नहीं बन पाती वह
चिड़िया जैसी माँ?
तोड़ नहीं पाती बंधन मोह का
तिनका-तिनका जोड़े घर को
देख नहीं पाती
तिनका-तिनका बि खरता
देखती रहती है निःशब्द
बड़े हो गए बेटों की
निष्कंटक उड़ान।

मां के भूलने या कहीं गुम हो जाने की जड़ें इसी मर्दवादी समाज की देन हैं. स्त्री इस समाज से लगातार संघर्ष कर रही है. इस संघर्ष की अनुगूंज प्रायः हर महिला रचनाकार में सुनाई देती है. इसीलिए यह संघर्ष महिला रचनाकारों का प्रतिनिधि स्वर लगने लगता है.

संबंधों की सूक्ष्म पड़ताल करता महेन्द्र भल्ला का उपन्यास ‘एक पति के नोट्स’

मुक्ति की समकालीन कवयित्री रश्मि शर्मा लिखती हैं – स्वेटर बुनती/मेजपोश काढ़ती/कभी-कभी कहीं गुम हो जाती मां/जब पढ़ती कहानियों की किताब/कुछ देर के लिए हमें भूल सी जाती मां… मां का यह हाल अक्सर थाती की तरह हस्तांतरित हो जाता है अगली पीढ़ी में.

रश्मि शर्मा की ही एक दूसरी कविता है ‘वो नहीं भूलती’. वह लिखती हैं – अपनी अंगूठी/कहीं रखकर भूल गई,/भूल जाती है अक्सर/वो इन दिनों/दराज की चाबी कहीं,/कभी गैस पर कड़ाही चढ़ाकर/कई बार तो/ गाड़ी चलाते वक्त/चौराहे पर रुक कर सोचने लगती है,/कि उसे जाना कहां था/वो भूलती है,/बारिश में अलगनी से कपड़े उतारना/चाय में चीनी डालना,/और अखबार पढ़ना भी/आश्चर्य है,/इन दिनों वह भूल गई है/बरसात में भीगना,/तितलियों के पीछे भागना/काले मेघों से बतियाना और/पंछियों की मीठी बोली/दुहराना भी.

दरअसल, घुट्टी की तरह पिलाई गई कई नसीहतों से बना होता है स्त्री का संस्कार. वैसे, अब के दौर में कई गैरजरूरी नसीहतों और संस्कारों का बिखरना सुखद है, पर नैतिकता की एक सीमा रेखा अब भी घेरे रहती है स्त्री को. इस घिरे होने को समझने के बावजूद उसे वहन करने की मजबूरी स्त्री लेखन को एक नया रंग देती है. मुक्ति शाहदेव की कविता ‘नसीहतें’ इस संदर्भ में काबिलेगौर है :

उस दिन तुम्हारा आँचल
छोड़ आई थी
और अपने आँचल में
बाँध कर लाई थी
तुम्हारी नसीहतें
जिसे विदा करते समय
बाँध दिया था तुमने
मेरे रेशमी आँचल की छोर से।
उस दिन भरे मन से
तुम्हारा आँगन भी
छोड़ आई थी
जिसे अब तक अपना
कहती आई थी।
एहसास हुआ था कि
‘पराई’ शब्द ऐसे क्यों
गुंथा हुआ है हमारे साथ
आँचल छूटा, आँगन भी छूटा
पर रह गई हैं
तुम्हारी नसीहतें
बड़ी पुख्ता गाँठ है यह
जो खोले नहीं खुलती है
जाने-अनजाने
और-और बँधती जाती है
तार-तार होता है मन
बार-बार सजल होते हैं नयन
पर गाँठें हैं कि खुलती नहीं
यहाँ भी है
एक अपना-सा आँगन
जिसमें आती है गौरैया
बरसता है मेघ
और चहकता है मन
उठ-उठ जाते हैं पाँव
मन कहता है
चल पड़ूँ तुम्हारे ठाँव
पर रोक लेती हैं मुझे
तुम्हारी नसीहतें।

ऐसी ही नसीहतों से बने संस्कारों की ओर सत्या शर्मा ‘कीर्ति’ की एक कविता भी इशारा करती है – हाँ, अक्सर औरतें नहीं करतीं आत्महत्या/क्योंकि बचपन से ही उन्हें पता होता है कि/उनके कुल की मर्यादा बंधी है/उसके गले में उसी जगह,/जहां लगानी होती है/रस्सी की मजबूत गाँठ…

मां-बाबा, घर-आंगन, नसीहतों और संस्कारों की बात के साथ-साथ मुक्ति की कविताओं में कई रंग और तेवर दिखते हैं. विश्वास और धूप-छांह जैसी उनकी कविताएं बताती हैं कि जीवन में जब परिवक्वता आने लगती है तो जिंदगी को देखने का, रिश्तों को महसूसने का और उन्हें जीने का ढंग बदल जाता है. याचना के स्वर धीरे-धीरे सवाल में तब्दील होते हैं और फिर विद्रोह में. लेकिन इतने के बाद भी जीवन की सकारात्मकता नष्ट नहीं होती. अपनी कविता ‘अर्घ्य अश्रु का’ में मुक्ति सवाल करती हैं

…हर पल देखा तुमने मेरा
चंचल, मुखरा रूप निराला
पढ़ सके हो क्या कभी तुम
मेरे उर की क्रंदन गाथा…

‘उदास है शाम’ जैसी कविताएं अगर अपनी उदासी में हमें घेर लेती हैं तो अगले ही पल ‘क्यों है उदासी’ जैसी कविता उदासी की वजहें तलाशने को प्रेरित करती है. सिर्फ तलाशने के लिए प्रेरित ही नहीं करती बल्कि उदासी दूर करने को उद्धत भी करती हैं. प्रतियोगी दौर है, गलाकाट प्रतिस्पर्धा है. जाहिर है कई बार हमपेशा लोग भी शातिराना चालाकी दिखलाते हैं. ऐसी छुद्रताएं कुछ देर के लिए तो परेशान करती हैं, पर हालात इन छुद्रताओं से निबटना भी सिखाते हैं. धीरज के साथ खिलाफ हवाओं से जूझने का मंत्र सुझाती है मुक्ति की कविता ‘साजिशें’ :

साजिशें करते हैं
मुझे तोड़ देने की लोग
इस कोशिश में जिद नई ठानना
सिखाते हैं लोग
कभी जो हमसाया-सा फिरा करते थे
उतारकर मेरे सीने में खंजर
मुसकराते हैं लोग
क्या हुआ जो हो गई हैं राहें अब जुदा
सरे आम इनसानियत को शर्मसार
क्यों करते हैं लोग
हौसला जीत जाने का
अब होगा न कभी कम
जीत को मेरी जाने क्यों अपनी हार
समझ बैठे हैं लोग
चैन न लेने देंगे मुझे
ये कसम खाए बैठे हैं
इस जिद में चैन अपनी ही
गँवा बैठे हैं लोग।

कामकाजी स्त्री जब वक्त की कमी की वजह से खुद को मातृत्व के दायित्वों के मोर्चे पर थोड़ा कमजोर पाती है और अपनी संतान की आंखों में असंतोष की लकीरें दिखती हैं, तो वह भीतर से बेहद आहत होती है. वह मां खुद की मजबूती तो दिखाती है बच्चे के सामने पर उसका अपराधबोध उसे भीतर से तोड़ता रहता है. मुक्ति की कविता ‘गुनहगार’ एक ऐसे ही वात्सल्य पीड़ा की अनुभूति है.

हाँ, मैं गुनहगार हूँ तुम्हारी
कई बार मैंने
बेरहमी से छीना है
बचपन तुम्हारा
मेरी जरूरतों ने
तुम्हारी मासूम-सी जरूरतों का
गला घोंटा है कई बार।
जीवन के कठिनतम मोड़ों पर
खो जाने या कि
अगणित संघर्षों से
हार जाने के भय ने
छलनी-छलनी विश्वा स ने
मुझे जीने नहीं दिया सुकून से
उनींदी रातों और
दौड़ते-भागते दिनों, महीनों और
वर्षों ने मुझे कई बार
तोड़ा और जोड़ा भी
ईश्वर ने जब दिया मुझे
जीवन का सबसे
अनमोल उपहार
कठिनतम, क्रूरतम सच्चाइयों ने
कितना किया उस पर प्रहार
कह भी न पाई तुमसे
अधूरी-सी जिंदगी की
पूरी करने को दास्तान
मैंने छीना है
कई बार तुम्हारे
मासूम-से बचपन को
हाँ, मैं गुनहगार हूँ तुम्हारी।

जीवन की ऐसी तमाम घनीभूत पीड़ाओं के होने बाद भी यह संग्रह अगर ऊर्जा और सुकून के पल देता है तो उसकी वजह है संग्रह के बीच-बीच में राहत बनकर आती ‘उम्मीद’, ‘रोशनी सुबह की’, ‘संहार और सृजन’, ‘जी लें इन पलों को’ या ‘मुट्ठी भर उजास’ जैसी कविताएं. ‘मुट्ठी भर उजास’ की सकारात्मकता पाठकों के भीतर जीवन को नए सिरे से पहचाने का आग्रह जैसी लगती है. पढ़ें :

कितनी यादें, कितने जख्म
कितने अंगार हैं दहकते से
कितने तूफान हैं मझधार में
कितने रोड़े हैं राह में, नहीं पता
पर इनसे गुजरते हुए
आदत भी तो
हो जाती है इनकी
चलो न, चलकर फेंक आएँ
इस घुटन को
दूर, बहुत दूर
चलो न, ढूँढ़कर लाएँ
मुट्ठी भर उजास
और बिखेर लें उसे
अपने आस-पास।

हाल के वर्षों में प्रूफ रीडिंग के प्रति प्रकाशक बेहद लापरवाह हुए हैं. पर ‘आँगन की गौरैया’ के प्रति प्रकाशक ने बहुत सतर्कता बरती है. छपाई साफ सुथरी है और हिज्जे को लेकर बरती गई सावधानी सुख देने वाली. संग्रह का कवर आकर्षक है, लेकिन छप्पर या टेक्स्ट के ऊपर बैठी गौरैया बाकी चीजों के मुकाबले अतिरिक्त बड़ी है, इसलिए फोटोग्राफी या ग्राफिक के नजरिए से वह चुभती है.

मुक्ति शाहदेव ने अपनी कविताओं में विराम चिह्नों का इस्तेमाल करने में पर्याप्त कंजूसी बरती है. कई जगहों पर यह कंजूसी खटकती है. दरअसल, जब आप कोई खूबसूरत बागीचा तैयार करते हैं और उसे दर्शकों के लिए खोल देते हैं, तो यह ध्यान रखना पड़ता है कि दर्शकों के चलने के लिए रास्ता भी आप मुहैया कराएं. वर्ना दर्शक फूलों के बीच मनचाहा रास्ता बनाकर लेते हैं और कई बार भटक भी जाते हैं. तो दर्शक भटके नहीं, घूमें – इसका ध्यान भी माली को रखना होगा. फिलहाल, मुक्ति शाहदेव अपने पहले कविता संग्रह से पाठकों में अपनी यह साख बनाती दिखती हैं कि वे मुक्ति के अगले संग्रह का इंतजार करें. बधाई.

संग्रह का नाम : आँगन की गौरैया
कवयित्री : मुक्ति शाहदेव
प्रकाशक : विद्या विकास एकेडेमी, दरियागंज, नई दिल्ली
कीमत : 400 रुपये

Tags: Hindi Literature, New books, Review

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