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book review by anurag anveshi china ke din written by rashmi jha nodaa

Book Review : संस्कृति और सरोकारों की मिठास से भरे 'चीन के दिन'

रश्मि झा की यह किताब याद दिलाती है कि मानवीय संवेदना दुनिया के हर कोने में लगभग एक से हैं.

रश्मि झा की यह किताब याद दिलाती है कि मानवीय संवेदना दुनिया के हर कोने में लगभग एक से हैं.

China Ke Din : रश्मि झा अपनी किताब 'चीन के दिन' में बार-बार उस रेशे को पकड़ने की कोशिश करती हैं, जो दोनों देशों की बुनावट में कॉमन है. रश्मि झा हमें वह डोर दिखलाती हैं जिससे दोनों देशों के लोग रचे गए हैं. लोगों की यह सांस्कृतिक और धार्मिक बुनावट बार-बार याद दिलाती है कि जो देश (भारत या चीन) शासकों का होता है, वह वहां की जनता का नहीं होता.

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चीन का चेहरा सिर्फ वही नहीं है जो हम खबरों से जानते हैं. वैसे तो भारत और चीन पड़ोसी मुल्क हैं, दोनों उभरती हुई शक्ति भी हैं. दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों का अपना इतिहास है. दलाई लामा को भारत में पनाह देने के बाद चीन के साथ युद्ध (1962) की बुरी यादें हैं. इस युद्ध के बाद भारत-पाक युद्ध (1965) में चीन की संदिग्ध चालों का काला अध्याय भी है. हाल के वर्षों में गलवान घाटी में दोनों देशों के बीच हुई मुठभेड़ के ताजा जख्म भी हैं. इन सबके बीच भारतीय बाजारों में चीन के दबदबे की भी कहानी है. भारत में चीनी माल के बहिष्कार की अपील का शोर भी है. यानी हमारे पास दोनों देशों के बनते-बिगड़ते रिश्तों की कई-कई कहानियां हैं. इन कहानियों को याद करते हुए हम अक्सर एक बात भूल जाते हैं कि युद्ध, दरअसल शासकों की महत्वाकांक्षाओं की परिणति होता है. अक्सर युद्ध देश हित के नाम पर लड़े जाते हैं, लेकिन शासकों का देश होता है, नागरिकों का नहीं.

हालांकि भारत और चीन के संबंधों को लेकर कई किताबें लिखी जा चुकी हैं. दोनों देशों के बीच टकराव की स्थिति की वजहों की तलाश भी हुई है और उनपर विचार करते हुए दोनों के पक्षों का पोस्टमॉर्टम भी हुआ है. काफी पहले गिरधर राठी की किताब ‘नए चीन में दस दिन’ की भी खूब चर्चा रही. दिनेश कुमार माली ने ‘चीन में सात दिन’ रचते हुए समय की पाबंदी को लेकर चीन के वर्क कल्चर को रेखांकित किया है. लेकिन इन सबसे अलग खड़ी दिखती है रश्मि झा की किताब ‘चीन के दिन’. सामयिक प्रकाशन से छपकर आई यह किताब दरअसल डायरी और पत्र लेखन का मिलाजुला रूप है. इसमें भारत और चीन के राजनीतिक/राजनयिक संबंधों पर बात जरा भी नहीं है, बल्कि बार-बार उस चीन को याद किया गया है जिसकी कई बातें भारत की याद दिलाती हैं. चीन के उन सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों की चर्चा है, जिन्हें देखते हुए अचानक रश्मि जी के जेहन में भारत कौंध जाता है. उन्हें लगता है कि यही बातें भारत में भी तो है.

चीन के लोगों का मानवीय चेहरा, वहां की उदारता, वहां के सहयोगी लोग अक्सर भारत की याद दिला जाते हैं. रश्मि झा बार-बार उस रेशे को पकड़ने की कोशिश करती हैं, जो दोनों देशों की बुनावट में कॉमन है. रश्मि झा हमें वह डोर दिखलाती हैं जिससे दोनों देशों के लोग रचे गए हैं. लोगों की यह सांस्कृतिक और धार्मिक बुनावट बार-बार याद दिलाती है कि जो देश (भारत या चीन) शासकों का होता है, वह वहां की जनता का नहीं होता. जनता के जरिए जो देश पहचाना जाता है वह शासकों के देश के मुकाबले ज्यादा मानवीय होता है.

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इस किताब के लिए ‘स्वगत’ लिखते हुए रश्मि झा लिखती हैं ‘समझ में नहीं आता कि जो कुछ मैंने लिखा उसे क्या कहूं। यह यात्रा वृतांत है और नहीं भी। यह अनुभवों की डायरी है और नहीं भी। यह अनुभूतियों का आख्यान है और नहीं भी। यह पर्यटन का स्प्रेक्ट्रम है और नहीं भी। इसमें स्वजनों को लिखे पत्रांश भी हैं और गैर चीनियों का सांस्कृतिक संवाद भी। मेरा साबका चीनियों के अलावा उन ताम देशों के छात्र-छात्राओं से भी पड़ा जो वहां कोर्स करने आए थे। इसिए यह कहना सरासर गलत होगा कि मेरे अनुभव चीन पर केंद्रित हैं। हां, यह सच है कि मैंने चीन की भूमि पर भारतीय संस्कृति के प्रकाश वृत्त में खड़े होकर शेष विश्व को देखा है।…’ तो जाहिर है रचनाकार के भीतर भी यह द्वंद्व रहा कि इस किताब को शैली के रूप में ‘संस्मरण’ कहा जाए या ‘डायरी’. मुझे बार-बार लगता है कि हाल के वर्षों में लेखन शैली में बड़े बदलाव आए हैं. इतने कि किसी लेखन को बंधे-बंधाए किसी खांचे में डालने के बजाए, नए नाम गढ़े जाने की जरूरत है. अब के दौर में कई कहानियां पद्य शैली में लिखी गईं, पूरा-पूरा नाटक कविता शैली में रचा गया और कविताएं भी गद्य शैली के करीब आती गईं, तो ऐसे में रश्मि झा के ‘चीन के दिन’ को डायरी, संस्मरण और पत्र का कोलाज कहना ज्यादा तर्क पूर्ण लगता है.

रश्मि झा अपनी चीन यात्रा के संदर्भ में कहती हैं ‘…दरअसल मेरा चीन जाना कृतज्ञता से भरा हुआ था। भोपाल की भीषण गैस त्रासदी के दौरान, मैं खुद जहरीली गैस का शिकार हुई थी। मैं चिकित्सक थी, मेरे तमाम मित्र एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में विशेषज्ञ स्तर के थे परंतु ‘मिथाइल आइसो सायनाइड’ का न तो कोई एंटीडोज किसी के पास था, न ही उपचार। सब असहाय थे। मैं भी अपनी पारी का इंतजार करने लगी थी। तभी डॉ. एस.के. जैन से संपर्क हुआ। उन्होंने एक्यूपंक्चर पद्धति से मेरा इलाज शुरू किया। मैं बच गई। मेरी रक्षा चीनी चिकित्सा पद्धति ने की। मुझे चीन का आभारी होना चाहिए था, और मैं थी भी। मैंने इस अपेक्षाकृत कठिन पद्धति को सीखने का संकल्प लिया।…’

रश्मि झा बताती हैं कि वह क्वांगचौ के चुंग्यओताश्वे यूनिवर्सिटी में पढ़ने गई थीं. जिस दिन नए सत्र की शुरुआत हुई, वहां के लिंगताओ (वाइस चांसलर-कुलपति) ने अपने उद्बोधन में कहा ‘जिस जगतगुरु भारत देश से हमने ये विद्याएं सीखीं, जिसके आदि स्रोत अथर्व वेद को लेकर बौद्ध भिक्षु यहां आए, उसी भारत से एक विद्यार्थी रश्मि झा यहां पढ़ने और उन विद्याओं को सीखने आई हैं। यह मेरे लिए, संस्था के लिए और हमारी चिकित्सा पद्धति के लिए रोमांचित होने का दिन है।’ रश्मि झा बताती हैं कि इस वक्तव्य को सुनने के बाद रोम-रोम सिहर उठा, कान की लवें उतप्त हो गईं, आंखों की कोरें भीग गईं. इससे पहले ‘रोमांचित होना’ किताबी मुहावरा भर था, लेकिन उस रोज पहली बार रश्मि जी के शरीर ने रोमांच का अनुभव किया.

रश्मि झा की यादों के इस खजाने में रोमांच के ऐसे कई पल पढ़ने को मिलेंगे. चीन के लोगों का वह मानवीय चेहरा दिखेगा जिसे भारत में देखने के हम अभ्यस्त रहे हैं. रश्मि झा को वहां का नृत्य देखकर मणिपुर की नृत्य शैली याद आ जाती है. शियांग शान में घूमते हुए उन्होंने बुद्ध प्रतिमाएं देखीं. रश्मि झा की टीचर ने उन्हें बताया कि यहां डेढ़ मीटर ऊंची-ऊंची बुद्ध की तकरीबन 500 प्रतिमाएं हैं. अपनी उम्र के नंबर वाली प्रतिमा के चेहरे से खुद का चेहरा मिलाने पर वह प्रतिमा अपनी लगने लगती है. रश्मि झा ने भी एक्सपेरिमेंट करके देखा और 42 नंबर की प्रतिमा का चेहरा बिल्कुल उन्हें अपने चेहरे जैसा लगा.

अपनी यात्रा में रश्मि झा को चीन की प्रकृति अपने देश की प्रकृति जैसी लगी. उन्होंने ताथोंग में विष्णु, शंकर आदि की प्रतिमाएं देखीं, पाली भाषा में शिलालेख देखे. यहीं डोंगरगढ़ (छत्तीसगढ़) की बमलेश्वरी जैसी चढ़ाई चढ़ने पर टाइल्स वाला पैगोडा मिला. वह बताती हैं कि हरिद्वार की मनसादेवी जैसा बल्किस उससे दुगनी ऊंचाई पर एक भव्य पैगौडा है. वहां से पेइचिंग शबर बहुत सुंदर दिखाई देता है, ठीक वैसा ही जैसे भारत में मसूरी से देखने पर देहरादून. एक रोज वे ‘म्यूजियम ऑफ वार’ भी घूमने गईं. यह जापान के खिलाफ चीनी प्रतिरोध का स्मारक है. वह बताती हैं कि दिल्ली, बंबई और हैदराबाद के प्लेनीटोरियम में जैसा दिखाया जाता है, ठीक वैसा ही यहां चीन में भी यह स्मारक बना है.

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अपने चीन प्रवास के दौरान रश्मि झा ने खूब रिश्ते कमाए हैं. भाई दूज के दिन चीन में स्टीव जैसा प्यारा भाई पाया है. मानवीय रिश्तों की चीनी गर्माहट बताने के लिए लियो लावश्री की क्लास को याद करना मुनासिब होगा. रश्मि बताती हैं कि बिल्कुल शुरू में लावश्री की क्लास में अपने भाषाज्ञान के अभाव में वह कुछ समझ नहीं पा रही थीं. वे इतनी हताश हो गईं कि भारत लौटने का मन बना लिया और सुबकते हुए उसी समय क्लास से बाहर आ गईं. स्टीव और विथालिस की समझ में यह बात आ गई और वे दौड़ते-फिसलते तुरंत रश्मि के पास पहुंचे. उन्हें समझाने लगे कि उनका यह फैसला सही नहीं. तभी वहां लियो लावश्री भी पहुंच गईं. उन्होंने पूरी आत्मीयता से कहा ‘यदि तुम वापस गई तो समझूंगी मैं हार गई। कहने लगीं, हिंदी इतनी कठिन भाषा है। मेरे पति तीन साल भारत के दूतावास में थे, तब मैंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी सीखी है, क, ख, ग, घ और बारह खड़ी। उससे तो चीनी भाषा सरल है। जब मैं इस उम्र में सीख सकती हूं तो तुम क्यों नहीं सीख सकती.’ सहपाठी और टीचर की इस आत्मीयता ने रश्मि जी के भारत लौटने के फैसले को पलट दिया.

ऐसे ढेर सारे प्रसंग, ढेर सारी मानवीय दृष्टि से मुलाकात होती है रश्मि झा के ‘चीन के दिन’ में. उन्होंने शिद्दत से उन तमाम लोगों को याद किया है, उनके प्रसंगों को याद किया है जिन्होंने उनका चीन प्रवास एकबारगी ऐसा बना दिया कि रश्मि जी को चीन कभी-कभी अपना दूसरा घर लगने लगता है. इस किताब की एक दूसरी खासियत यह भी है कि दस साल में चीन में आए बदलाव को यह रेखांकित करती है. दरअसल, यह किताब दो पार्ट में है. पहला पार्ट पहली यात्रा का है और दूसरे पार्ट में वह यात्रा है जो पहली यात्रा के दस साल बाद की गई. इस दूसरी यात्रा संस्मरण में रश्मि झा बतलाती हैं कि 10 वर्षों में चीन कितना बदल गया. विकास की बयार वहां कितनी तेज बही. चीन के तमाम नजारे लगभग बदल गए. लेकिन 10 वर्षों बाद भी चीन के लोगों का मिजाज नहीं बदला, उनका व्यवहार नहीं बदला. वे आधुनिक शहर में परंपरागत तरीके से जीते हैं. अपने नैतिक मूल्यों के साथ जीते हैं और अपने सरोकार निभाना जानते हैं.

चलते-चलते एक रोचक प्रसंग. जब फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ देखी थी, मुझे ‘त्रासद्वितिया’ (फिर मिलेंगे), ‘दा-दा’ (हां-हां), ‘नियत-नियत’ (ना-ना) जैसे कई रशियन शब्द याद हो गए थे. जब ‘लव इन टोक्यो’ का गीत ‘सायोनारा-सायोनारा’ सुना, तो इस जापानी शब्द का हिंदी अर्थ ‘अलविदा’ जाना और रश्मि झा के ‘चीन के दिन’ से गुजरते हुए चीनी शब्द/वाक्य ‘थियन आन मन’ (आकाश, शांति, द्वार), ‘शान’ (पहाड़ी, ‘लिंगताओ’ (वाइस चांसलर-कुलपति), ‘ता चेचे’ (बड़ी दीदी), ‘नी याओ मां’ (तुमको चाहिए?), ‘पू याओ’ (नहीं चाहिए) समझ में आने लगे. मुमकिन है आपकी भी रुचि होगी तो आपको ये शब्द याद रहेंगे. साथ ही चीन में मयूर विहार जैसा पक्षी विहार भी देखने को मिलेगा, वहां की मूर्तिकला में आपको अजंता-एलोरा के भी दर्शन होंगे. कुल मिलाकर देखा जाए तो यह किताब चीन से ज्यादा वहां के लोगों के संस्कार और सरोकारों को याद करती है और याद दिलाती है कि चीन के लोग भी भारतीय लोगों की तरह संवेदनशील और सहनशील हैं. वह ध्यान दिलाना चाहती हैं कि चिकित्साशास्त्र से इतर कई रोगों का इलाज सिर्फ आत्मीय स्पर्श हो सकता है और प्रेम जैसी दवा का कोई विकल्प नहीं हो सकता. इसीलिए कहना चाहिए कि यह किताब चीन के कारोबार की नहीं, बल्कि वहां के सरोकारों से हमें रू-ब-रू कराती है.

डायरी : चीन के दिन
रचनाकार : रश्मि झा
प्रकाशक : सामयिक बुक्स, नई दिल्ली
कीमत : 300 रुपए

Tags: Books, Hindi Literature, India china, Literature, Review

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