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Book Review : कोरोना से करुणा तक का सफर कराती है कैलाश सत्यार्थी की नई किताब

Book Review : कोरोना से करुणा तक का सफर कराती है कैलाश सत्यार्थी की नई किताब

कोरोना की वजह से सभ्यता पर छाए संकट से निबटने का उपाय सुझाती है कैलाश सत्यार्थी की यह किताब.

कोरोना की वजह से सभ्यता पर छाए संकट से निबटने का उपाय सुझाती है कैलाश सत्यार्थी की यह किताब.

धर्म और पाखंड के मिट रहे अंतर, रोशनी के नाम पर फैलाए जा रहे अंधकार, इन्सानीयत के पैमाने पर हैवानीयत की ओर बढ़ते समाज और प्रेम को विस्थापित करती घृणा के इस दौर में कैलाश सत्यार्थी की किताब 'कोविड-19: सभ्यता का संकट और समाधान' पढ़ते हुए संदेश मिलता है कि चलो, इन्सानीयत की जड़ों की ओर लौटें. किताब के इस दूसरे हिस्से में कैलाश सत्यार्थी ने कई प्रसंगों, शोधों और प्रयोगों की चर्चा करते हुए सभ्यता के पुनर्निमाण में करुणा, कृतज्ञता, उत्तरदायित्व और सहिष्णुता की जरूरत को बार-बार रेखांकित किया है. इन मानवीय गुणों को नए सिरे से परिभाषित किया है, इन्हें पुनः अपनाए जाने पर बल दिया है. कहा जाना चाहिए कि इस खौफजदा दौर में कैलाश सत्यार्थी एक सुचिंतित विचार के साथ सभ्यता के पुनर्निमाण की आस्था का जरूरी दीया लेकर आए हैं.

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Book Review: दुर्गापूजा के बाद दिल्ली-एनसीआर समेत देश के तमाम हिस्सों में कोरोना संक्रमण के जितने मामले सामने आ रहे हैं, उससे तीसरी लहर की आशंका गहरा रही है. अभी दीपावली, कालीपूजा और छठ जैसे सामूहिक आयोजन वाले पर्वों का आना बाकी ही है. जाहिर है कि हम अपनी लापरवाहियों के खिलाफ सजग नहीं हुए तो इस सदी की यह सबसे खतरनाक महामारी जाने कौन-सा रूप ले ले.

नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ने कोरोना की पहली लहर के शुरू होने के बाद और दूसरी लहर की संभावित आशंकाओं के बीच इसके खतरों को लेकर हमें आगाह किया था. उन्होंने कहा था कोविड-19 का संकट महज स्वास्थ्य का संकट नहीं है, बल्कि यह संकट ‘सभ्यता का संकट’ है.

कैलाश सत्यार्थी की यह बात उनकी नई किताब ‘कोविड-19 : सभ्यता का संकट और समाधान‘ में दर्ज है. सत्यार्थी की यह किताब दो खंडों में है. पहले खंड में उन्होंने कोविड-19 की वजह से सभ्यता पर छाए संभावित संकटों को रेखांकित किया है और दूसरे खंड में उन्होंने इसके समाधान सुझाए हैं.

पहले खंड में कैलाश सत्यार्थी लिखते हैं ‘हम आशा और अपेक्षा कर रहे थे कि इतिहास की सबसे बड़ी साझा त्रासदी से सबक लेकर पूरे विश्व समुदाय में साझेपन की सोच जन्म लेगी, लेकिन इस बात के संकेत अभी तक नजर नहीं आ रहे. असलियत तो यह है कि दुनिया में पहले से चली आ रही दरारें, भेदभाव, विषमताएं और बिखराव उजागर होने के साथ-साथ और ज्यादा बढ़ रहे हैं. महामारी खत्म होने और आर्थिक संकट से उबर जाने के बाद भी दुनिया पहले की तरह नहीं रहेगी. मैं कई कारणों से इस त्रासदी को सिर्फ स्वास्थ्य और आर्थिक संकट न मानकर सभ्यता के संकट की तरह देख रहा हूं.’

कोरोना महामारी को सभ्यता पर संकट की तरह देखते हुए कैलाश सत्यार्थी याद करते हैं मानवीय रिश्ते और सामाजिक दायित्वों के क्षरण से उपजे उन दृश्यों को, जिनकी वजह से असंगठित क्षेत्र के मजदूर भुखमरी की हालत में अपने-अपने गांव लौट रहे थे.

महाराष्ट्र के औरंगाबाद के पास रेल पटरियों पर रोटियों के साथ मजदूरों की लाशों की तस्वीर उनके जेहन से नहीं उतरती.

वे याद करते हैं चीन के 16 साल के विकलांग शख्स चैंग को, जो हुवेई शहर के अपने घर में व्हीलचेहर पर भूख-प्यास से मृत पड़े मिले थे. चैंग की देखभाल करने वाले पिता जब बीमार पड़े तो उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया गया था. तब घर में चैंग की देखभाल करनेवाला कोई नहीं रह गया. पड़ोसियों ने भी चैंग की कोई सुध नहीं ली और वह व्हीलचेयर पर बैठ-बैठे मर गए. सत्यार्थी मानते हैं कि चैंग को किसी बीमारी ने नहीं मारा, बल्कि समाज की संवेदनहीनता, एहसान-फरामोशी और मतलबपरस्ती ने उनकी हत्या की.

सत्यार्थी याद करते हैं दक्षिण अफ्रीका के उन सैकड़ों बाल मजदूरों को जो सोने की एक खदान में फंसे पड़े थे, जिनके मालिक उन्हें उनके हाल पर छोड़कर भाग गए थे. वे याद करते हैं थाईलैंड की उस खबर को जिसके मुताबिक, तीन लाख से ज्यादा सेक्स वर्कर लॉकडाउन के दौरान दाने-दाने की मोहताज हो गई थीं और दस्तावेज न होने के कारण वे मजदूरों को मिल सकनेवाली सरकारी सहायता से भी वंचित थीं.

इन तमाम दुखद दृश्यों को याद करते-करते कैलाश सत्यार्थी अपनी इस किताब में लॉकडाउन के दौरान घरों में बंद लोगों की स्थितियों की चर्चा करते हैं. वे बताते हैं कि लोगों में मानसिक तनाव, अवसाद, निराशा, एकाकीपन, घरेलू हिंसा और तलाक के मामले बढ़े हैं. दोस्तों, शिक्षकों, रिश्तेदारों, खेल के मैदानों से दूर हुए बच्चों में झुंझलाहट, गुस्सा और जिद बढ़े हैं और एकाग्रता में कमी आई है.

वे उस एक साल के बच्चे का उदाहरण देते हैं, जिसके माता-पिता कोरोनाकाल में घर से ही काम कर रहे थे और बच्चे को भी घर में ही रख रहे थे. इस दौरान बच्चे को टीका लगवाने के लिए बस दो बार वे अस्पताल गए. फिर जब बच्चे ने थोड़ा-थोड़ा बोलना शुरू किया तो उसने बाहर निकलने से इनकार कर दिया यह कहते हुए कि बाहर लोग उसे सुई चुभो देते हैं.

इन स्थितियों की चर्चा करते हुए सत्यार्थी बताते हैं कि ये स्थितियां सभ्यता के संकट के लक्षण हैं. किसी भी सभ्यता की बुनियाद सामूहिकता होती है. सामूहिक अनुभव, सामूहिक मान्यता-परंपरा, सामूहिक विचार, व्यवहार और परस्पर समर्पण से ही सभ्यता का निर्माण होता है. लेकिन लॉकडाउन के दौरान समाज में इन चीजों की कमी साफ तौर पर दिखी, बल्कि वीभत्स रूप में ये कमियां और बढ़ीं.

इस किताब में सत्यार्थी ध्यान दिलाते हैं कि जो प्रवासी मजदूर खौफजदा, लाचार, हताश, बेबस और बेसब्र होकर अफरातफरी की स्थिति में अपने गांवों की तरफ भागे, वह सिर्फ करोना वायरस का डर नहीं था, बल्कि वह उनका उस शहरी समाज से पूरी तरह मोहभंग हो जाना था, जिसमें राजकीय तंत्र और उनके रोजगार दाता तक शामिल थे. उन खौफजदा मजदूरों ने देखा कि शहरी सभ्य समाज ने उनके साथ भरोसे के रिश्ते रखे ही नहीं थे. कैलाश सत्यार्थी मानते हैं कि लोगों का एक-दूसरे पर भरोसे का इस कदर टूटना, मोहभंग की पीड़ा से गुजरना ही सभ्यता पर असल संकट है, जिसे दूर किए जाने की बेहद आवश्यकता है. इस किताब के दूसरे हिस्से में कैलाश सत्यार्थी ने वे सुझाव दिए हैं, जिनसे सभ्यता पर आए इस संकट से हम निकल सकते हैं, सभ्यता का पुनर्निमाण कर सकते हैं.

सभ्यता के पुनर्निमाण के अपने सुझाव को कैलाश सत्यार्थी ‘चौमुखी पहल’ का नाम देते हैं और बताते हैं कि करुणा, कृतज्ञता, उत्तरदायित्व और सहिष्णुता ही अब नई सभ्यता रच सकते हैं. हालांकि इस सुझाव को देते हुए सत्यार्थी यह भी स्वीकारते हैं कि वे कोई नई बात नहीं कह रहे. सभ्यता की जड़ों में ये चारों चीजें कहीं-न-कहीं पहले से मौजूद हैं. दुनिया के हर हिस्से में बहुत से लोग इन्हें अपने जीवन में जीते हैं, लेकिन ज्यादातर मामले में ये बातें खोखला उपदेश बनकर रह गई हैं.

करुणा, कृतज्ञता, उत्तरदायित्व और सहिष्णुता सही मायने में मनुष्यता की ऊंचाइयां हैं. अब के आपाधापी वाले दौर में इन ऊंचाइयों की इस समाज को सबसे ज्यादा जरूरत है. कोरोना महामारी के आक्रमण से पहले ही समाज और हमारी सभ्यता का क्षरण होने लगा था. मौकापरस्ती, संवेदनहीनता, एहसान-फरामोशी और मतलबपरस्ती जैसी तमाम चीजें घुसपैठ बनाने लगी थीं. इन्सान रहन-सहन के स्तर पर जितना धनी होता गया, इन्सानीयत उसकी बौनी पड़ती गई. ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हमने आसमान में तारे टांक दिए हों भले, पर हमारी संवेदनाएं धूल चाटती नजर आईं. और ऐसे समय में जब कोरोना महामारी हमारे बीच से हर रोज लोगों को उठा-उठाकर मौत के जबड़े में डाल रही थी, तो हमारी तमाम बुराइयों का सबसे विकृत रूप हमें दिखा. अपने-अपने राज्यों की ओर बदहवास भाग रहे मजदूरों का इस समाज में इन्सानीयत के बिखराव की कहानियों को रेखांकित कर रहे थे. कोरोनाकाल से पहले ही इस समाज को करुणा, कृतज्ञता, उत्तरदायित्व और सहिष्णुता के बल पर फिर से गढ़ने की जरूरत थी, पर संक्रमण के आक्रमण के बाद तो इसकी जरूरत पूरे तीखेपन के साथ महसूस होने लगी.

कैलाश सत्यार्थी लिखते हैं ‘किसी पर रहम करना, सहानुभूति दिखाना, संवेदना प्रकट करना अथवा दूसरे के दुख में दुखी हो जाना अच्छे मानवीय गुण हैं, परंतु करुणा नहीं. दूसरे के दुख को महसूस करना सहानुभूति होती है. किसी के दुख में खुद भी दुखी हो जाना संवेदना है, जबकि किसी के भी दुख और कष्ट को अपने दुख की तरह महसूस करते हुए उसी प्रकार से उस दुख को दूर करने की कोशिश का भाव करुणा होता है. करुणा वह अकेला भाव है, जो अलगाव को खत्म करके खुद की तरह दूसरे से जोड़ता है और उसकी परेशानी का समाधान करने की प्रेरणा, साहस और ऊर्जा पैदा करके मनुष्य को क्रियाशील बनाता है.’

जीवन, समाज और सभ्यता के लिए करुणा की अहमियत बताते हुए कैलास सत्यार्थी बुद्ध, ईसा मसीह, हजरत मोहम्मद, महावीर स्वामी, पैगंबर अब्राहिम, गुरुनानक देव सरीखे देवदूतों के जीवन प्रसंग की ओर ले जाते हैं और स्थापित करते हैं कि इन सबने समाज के लिए जो कुछ भी रचा, जिस भी पंथ की राह दिखाई, उसकी बुनियाद करुणा थी.

यह सच है कि अब के दौर में भी धर्म के अनुयायियों की कमी नहीं, बल्कि अब के पंथ और संप्रदाय के अनुयायियों ने धर्म की मूल आत्मा करुणा को भुला दिया है. बाहरी आडंबरों में उलझ कर धर्म का प्रचार-प्रसार बेहद आक्रमक तरीके से हो रहा है. ठीक वैसे ही जैसे अब के कई नेता कौमी एकता बरकरार रखने के लिए शांति की अपील करते हैं अपनी पूरी गुर्राहट के साथ.

इस तरह हम देखते हैं कि करुणा की जगह अपने पंथ की पहचान और ताकत बढ़ाने के लिए दूसरे पंथों की पहचान और अस्तित्व को नष्ट करने की कवायद को धर्मयुद्ध मान लिया गया है. ऐसी स्थिति महसूस कर कैलाश सत्यार्थी लिखते हैं ‘मेरे विचार से मतों और पंथों की बाहरी पहचानों के प्रति आसक्ति, आग्रह और अहंकार सारे फसाद की जड़ हैं. पहचानें हमें अलग-अलग करती हैं, जबकि करुणा जोड़ने का काम करती है. इसलिए करुणा ही मानवता का धर्म है.’

सचमुच, धर्म और पाखंड के मिट रहे अंतर, रोशनी के नाम पर फैलाए जा रहे अंधकार, इन्सानीयत के पैमाने पर हैवानीयत की ओर बढ़ते समाज और प्रेम को विस्थापित करती घृणा के इस दौर में कैलाश सत्यार्थी की किताब ‘कोविड-19: सभ्यता का संकट और समाधान’ पढ़ते हुए संदेश मिलता है कि चलो, इन्सानीयत की जड़ों की ओर लौटें.

किताब के इस दूसरे हिस्से में कैलाश सत्यार्थी ने कई प्रसंगों, शोधों और प्रयोगों की चर्चा करते हुए सभ्यता के पुनर्निमाण में करुणा, कृतज्ञता, उत्तरदायित्व और सहिष्णुता की जरूरत को बार-बार रेखांकित किया है. इन मानवीय गुणों को नए सिरे से परिभाषित किया है, इन्हें पुनः अपनाए जाने पर बल दिया है. कहा जाना चाहिए कि इस खौफजदा दौर में कैलाश सत्यार्थी एक सुचिंतित विचार के साथ सभ्यता के पुनर्निमाण की आस्था का जरूरी दीया लेकर आए हैं.

इस पठनीय किताब में प्रकाशक ने कई जगहों पर रेखाचित्रों का इस्तेमाल किया है. ये रेखाचित्र संदीप राशिनकर ने बनाए हैं. विषय के अनुकूल माहौल रचने के लिए राशिनकर की तारीफ की जानी चाहिए. हालांकि यह किताब महज 128 पन्ने की है, जो एक बैठकी में ही पढ़ी जा सकती है. लेकिन अगर आपके पास इतना भी वक्त नहीं तो प्रकाशक ने इस किताब के हर पन्ने पर लेख के जरूरी हिस्से बड़े फोंट साइज में कोट किए गए हैं – आप अगर कोट किए गए इन हिस्सों को भी पढ़ लें, तो आपको समाज की दशा को दिशा देने वाली कैलाश सत्यार्थी की दृष्टि की एक झलक जरूर मिल जाएगी.

पुस्तक : कोविड-19: सभ्यता का संकट और समाधान
लेखक : कैलाश सत्यार्थी
प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन
कीमत : 250 रुपये

Tags: Hindi Literature, Kailash Satyarthi, New books, Nobel Prize, Review

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