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Book Review: गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल- जब महादेवी वर्मा विद्यार्थियों के समर्थन में उतर आईं


हिंदी पट्टी के बौद्धिक वर्ग के चरित्र का कोलाज है पत्रकार उर्मिलेश की किताब 'गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल'

हिंदी पट्टी के बौद्धिक वर्ग के चरित्र का कोलाज है पत्रकार उर्मिलेश की किताब 'गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल'

‘गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल’ नाम रखे जाने पर लेखक ने विस्तार से बताया भी है. यह बहुत ही पठनीय अध्याय है खासकर ज्ञान व सूचना को लेकर. महादेवी वर्मा का एक भाषण किताब का सार है. पत्रकारिता के सभी विद्यार्थियों को यह किताब निश्चित रूप से पढ़नी चाहिए.

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– जितेन्द्र कुमार

हिंदी के जाने-माने पत्रकार उर्मिलेश ने ‘गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल’ के नाम से एक संस्मरण लिखा है जो 12 अध्याय में विभाजित है. इसमें उर्मिलेश ने विद्यार्थी जीवन से लेकर व्यवसायिक जीवन में आए शख्स व घटनाओं का वर्णन किया है. संस्मरण के बहाने लेखक ने मौजूदा हालात व परिस्थितियों का बेहतर ढ़ंग से विश्लेषण करने की कोशिश की है.

पुस्तक के शुरू में ‘आरंभ से पहले’ में लेखक कहते हैं, ‘यह मेरे कुछ संस्मरणों का संकलन है. इसमें साहित्य-संस्कृति और मीडिया से संबंध लोगों, प्रसंगों व घटनाओं की यादें हैं. कुछ यादें बहुद सुखद और प्रेरित करने वाली हैं तो कुछ दुखदायी और निराश करनेवाली. इनमें से जिन कुछ प्रमुख लोगों का जिक्र आता है, उनमें कुछ के साथ मैंने काम किया और कुछ के साथ मेरा लंबा जुड़ाव रहा. कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें आस-पास से देखने-समझने का मौका मिला.’

‘गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल’ नाम रखे जाने पर लेखक ने विस्तार से बताया भी है. यह बहुत ही पठनीय अध्याय है खासकर ज्ञान व सूचना को लेकर. लेकिन जिन संस्मरण को पढ़कर मन भींग जाता है, वह है- क्रांतिकारी कवि व दार्शनिक गोरख पांडेय पर लिखा गया, ‘प्रेम, करुणा और तकलीफ का उमड़ता समंदर’, राजेन्द्र यादव पर लिखा गया ‘हिंदी का अनोखा डेमोक्रेट’, प्रोफेसर तुलसी राम पर लिखा गया संस्मरण ‘सृजनशीलता और प्रतिबद्धता का खामोश चेहरा’ और डी. प्रेमपति पर लिखा ‘वामपंथी विचारक की बहुजन-बेचैनी’.

बात क्रिस्टोफर कॉडवेल की
क्रिस्टोफर कॉडवेल शीर्षक के बारे में लेखक लिखते हैं- क्रिस्टोफर कॉडवेल को, जो दुनिया के जाने-माने मार्क्सवादी, आलोचक और सौंदर्यशास्त्र के एक बड़े विशेषज्ञ थे. जब दुनिया के बहुत सारे लेखक और बुद्धिजीवी स्पैनिश गृह युद्ध में मनुष्यता और लोकतंत्र के पक्ष में खड़े होने गए थे, उसी समय कॉडवेल ने भी उसमें भागीदारी की और मारे गए. वे बहुत ही कम उम्र में शहीद हो गए थे. जहां तक मुझे याद है उस समय तक उनकी एक भी किताब छपी नहीं थी. लेकिन लकड़ी या लोहे की संदूक में उनके लिखे हुए तमाम पर्चे और रजिस्टर थे जिससे उनकी ‘इल्यूजन एंड रियलिटी’ और ‘स्टडीज इन डाइंग कल्चर’ जैसी किताबें उभरीं. ये किताबें उनकी शहादत के बाद छपीं.

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लेकिन अपने देश में गाज़ीपुर जो इलाका है, जहां संयोग से मैं भी पैदा हुआ हूं, वह वामपंथी आंदोलन का एक गढ़ रहा है और उसी वामपंथी चेतना का परिणाम था कि एक अध्यापक ने, भारत में और मुझे तो लगता है एशियाई देशों में यह पहला उदाहरण होगा कि क्रिस्टोफर कॉडवेल पर गाज़ीपुर के अध्यापक ने पीएचडी की. मैंने गाज़ीपुर की उस सोच और चेतना को क्रिस्टोफर कॉडवेल को कनेक्ट किया है.

मैंने इसे गाज़ीपुर में कॉडवेल के एक स्मारक के रूप में पेश किया है. इस किताब में ‘गाज़ीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल की आवाजें’ शीर्षक से एक अध्याय है और उसी पर इस किताब का नाम पड़ा है.

चार महामानव
इन संस्मरणों को पढ़ते समय चार महामानव आपकी आंखों के सामने बार-बार उभरकर सामने आते हैं. अगर इनमें से किसी के साथ आपके निजी रिश्ते नहीं भी रहे हों तब भी आपको एहसास नहीं होगा कि आप उनसे मिले नहीं हैं. लेकिन जब उर्मिलेश गोरख पांडेय के बारे में लिखते हैं तब निजी व राजनीतिक दोनों, रिश्तों को पिरोकर गोरख पांडेय की निहायत ही खूबसूरत तस्वीर सामने आती है. गोरख पांडेय की आत्महत्या के बाद जामिया में समाजशास्त्र के प्रोफेसर निशात कैसर ने, जो न सिर्फ गोरख जी के जेएनयू में समकालीन थे बल्कि उन दिनों भाकपा लिबरेशन के सांस्कृतिक संगठन ‘जन संस्कृति मंच-जसम’ के उत्तरी क्षेत्र के संयोजक भी थे, ने शोकसभा में महत्वपूर्ण बात कही थी, ‘हमें जरूर यह सोचना चाहिए कि एकसमान वैचारिकता के बावजूद हम लोगों के बीच सामुदायिकता क्यों नहीं विकसित हो सकी है? इस तरह की सामुदायिकता होती तो क्या गोरख का अकेलापन इस कदर बढ़ा होता? बीते एक-देढ़ साल से वह लगातार अकेलेपन और भयानक त्रासदी की तरफ बढ़ते गए. ऐसे में यह सवाल बना रहेगा कि हमारी वैचारिकता आखिर सामुदायिकता की तरफ क्यों नहीं बढ़ती? ’

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और याद कीजिए कि यह घटना आज से तकरीबन 32-33 साल पहले की है. गोरख पांडेय ने 1989 में आत्महत्या कर ली थी. उदारीकरण देश में आया नहीं था और बाजार भी इतना मजबूत नहीं हुआ था, समाज में एकाकीपन बढ़ रहा था. अगर उसी बात की कल्पना आज करें तो हम पाएंगे कि इस समस्या को आज तो रेखांकित करनेवाला भी नहीं बचा है, जबकि बाजारवादी दौर में अकेलापन गरीबी की तरह और विकराल रुप लेता जा रहा है.

‘सृजनशीलता और प्रतिबद्धता का खामोश चेहरा’ में गोबरपट्टी के एक बड़े बौद्धिक तुलसीराम के व्यक्तित्व का चित्रण है. तुलसी राम से उनकी मुलाकात सन 1978 में जेएनयू के गोदावरी ढ़ाबा पर होती है और आगे चलकर गाढ़ी मित्रता में तब्दील हो जाती है. वैसे लेखक का तुलसीराम के साथ विश्वविद्यालय में सिर्फ पांच वर्षों का साथ रहा फिर भी वे उनके खुलेपन और आलोचना सुनने से काफी प्रभावित रहे. प्रोफेसर तुलसीराम ने ‘मुर्दहिया’ व ‘मणिकर्मिका’ नाम से अपनी आत्मकथा भी लिखी है जो हर संवेदनशील इंसान को पढ़ना चाहिए. किताब में उनका जीवन संघर्ष और समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था का बहुत ही बारिकी से वर्णन किया गया है.

कुल 12 लेख वाली यह किताब भले ही ग्यारह व्यक्ति विशेष पर केन्द्रित हो, लेकिन उसमें समय, समाज और उस समय व्यक्ति या संस्थानों के अगल-बगल की गतिविधियों पर विस्तार से चर्चा है. किताब के पहले लेख में उर्मिलेश अपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दिनों को याद करते हुए महादेवी वर्मा के व्यक्तित्व पर रोशनी डालते हैं. वह बताते हैं कि किस तरह आंदोलनकारी छात्रों को छात्रावास में घुसकर पीटा गया और सालाना जलसा में अध्यक्षता कर रहे उर्मिलेश की बातों को सुनकर महादेवी वर्मा विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ छात्रों के पक्ष में खड़ी हो गयीं और छात्रों ने महादेवी वर्मा के पक्ष में जिन्दाबाद के नारे लगाए.

लेखक अपने संस्मरण में लिखते हैं हमारे यहां लंबे समय तक इतिहास लिखने की परपंरा नहीं रही है, दूसरों का लिखा इतिहास हम पढ़त रहे हैं. हम सिर्फ मिथकों, आख्यानों, मंत्रों, ऋृचाओं, काव्यात्क कथाओं या गल्पों में मगन रहने वाले समाज हैं. पता नहीं, महादेवी जी की वे लाइनें इलाहाबाद विश्वाविद्यालय के छात्र आंदोलन पर काम करनेवाले किसी शोधार्थी ने कहीं दर्ज की हैं या नहीं. …..लेकिन उनकी अविस्मरणीय पंक्तियों को यहां दर्ज कर रहा हूं… “आज तुम लोगों ने मेरे सामने जो कुछ किया, उसका मैं नैतिक समर्थन करती हूं. निर्दोष बच्चों पर बर्बर लाठीचार्ज कराने का किसी को अधिकार नहीं है. यह सिर्फ अनैतिक ही नहीं है, बर्बर कृत्य है, जो विश्वविद्यालय प्रशासन और पुलिस ने मिलकर किया-कराया……शांति और अहिंसक ढ़ंग से विरोध प्रदर्शित करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. हम लोकतंत्र हैं.”

महादेवी वर्मा का वह भाषण किताब का सार है. पत्रकारिता के सभी विद्यार्थियों को यह किताब निश्चित रूप से पढ़नी चाहिए.

पुस्तक- गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल
प्रकाशक- नवारूण प्रकाशन, वसुंधरा- गाजियाबाद
कीमत- 300 रुपए

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