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मशीन को मनुष्य बनाने का प्रयास है जसिंता केरकेट्टा का कविता संग्रह 'ईश्वर और बाजार'

जसिंता केरकेट्टा आदिवासी संवेदना और सरोकारों की नई पीढ़ी की कवयित्री हैं.

जसिंता केरकेट्टा आदिवासी संवेदना और सरोकारों की नई पीढ़ी की कवयित्री हैं.

जसिंता चांद-तारों की कविताएं नहीं लिखतीं, उनकी कविताओं में आदिवासियों का जीवन उतरता है. बेशक काव्यात्मक न लगे लेकिन वे वैचारिक हैं और हमें बहुत कुछ सोचने के लिए बाध्य करती हैं.

-सुधांशु गुप्त

जसिंता केरकेट्टा की कविताएं पढ़ते हुए बार-बार यह अहसास हुआ कि कहीं कुछ ग़लत हो रहा है, कुछ ऐसा है जो जल, जंगल और आदिवासियों के जीवन को चोट पहुंचा रहा है, विकास के नाम पर आदिवासियों के जीवन से जो खिलवाड़ किया जा रहा है, वह नहीं होना चाहिए. किसी भी तरह की तनाशाही अंततः मनुष्य को ही नुक्सान पहुंचाती है.

उनके संग्रह ‘ईश्वर और बाजार’ को पढ़कर और भी बहुत से सवाल मन में आते हैं. ईश्वर का बाज़ार से क्या रिश्ता है, किस तरह ईश्वर आपकी आदत में शामिल हो जाता है, लोग मरते रहते हैं, ईश्वर क्यों बचा रहता है, क्या स्त्रियों का ईश्वर अलग होता है, प्रार्थनाओं का क्या अर्थ है, आख़िर क्यों आदमी भगवान ढूँढ़ने लगता है, सवाल और भी बहुत हैं.

जसिंता चांद-तारों की कविताएं नहीं लिखतीं, उनकी कविताओं में आदिवासियों का जीवन उतरता है. बेशक काव्यात्मक न लगे लेकिन वे वैचारिक हैं और हमें बहुत कुछ सोचने के लिए बाध्य करती हैं. जसिंता आदिवासी जन-जीवन पर मंडराते सभ्यता प्रेषित खतरों को पहचानती हैं और सीधे सरल शब्दों में उन्हें लिखती हैं. उनकी कविताओं में आग दिखाई देती है, वह विकास की आक्रामक मुद्राओं के खिलाफ कविता को हथियार बनाती हैं, वह ये भी मानती हैं कविताएं ही आदमी को मशीन से मनुष्य बनाती हैं. मनुष्य बनाने की इस प्रक्रिया में वह हर तरह के शोषण के खिलाफ़ खड़ी दिखाई देती हैं. यहां तक कि ईश्वर की अवधारणा और असहाय जनमानस में उसके भय की भूमिका को पहचानती हैं. भीतर और बाहर की जकड़नों में धर्म, ईश्वर और आस्था ने जिस तरह मनुष्य विरोधी ताकतों के रूप में काम किया है, वह बृहत भारतीय समाज की विडम्बना है. लेकिन आदिवासियों के जीवन पर इसका प्रभाव घातक है.

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जसिंता अपनी कविताओं में इसे पूरी आक्रामकता से साथ दिखाती हैं. इस संग्रह में ईश्वर पर लिखी उनकी कई कविताएं हैं. वह ईश्वर से भी सवाल करती हैं. एक कविता की अंतिम पंक्तियां हैं-आदमी के लिए, ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता, बाज़ार से होकर क्यों जाता है?

एक अन्य कविता में धरती को उजाड़ने का हिसाब मांगती हैं- हम जीवन भर लड़ेंगे, तुम्हारी इसी संस्कृति के खिलाफ़, बस इतना बता दो, इस धरती को उजाड़ने का हिसाब कौन देगा साब?

जसिंत ईश्वर से सवाल करते हुए भी आदिवासियों के जीवन को नहीं भूलतीं. एक कविता में वह कहती हैं- पिता और भाई की हिंसा से, बचने के लिए मैंने बचपन में ही, मां के ईश्वर को कसकर पकड़ लिया, अब कभी किसी बात को लेकर, भाई का उठा हाथ रुक जाता, तो वह सबसे बड़ा चमत्कार होता.

इसी कविता में वह आगे लिखती हैं- मैं ईश्वर के सहारे जीती रही, और मां ईश्वर के भरोसे मार खाती रही.

इसी श्रेणी की एक अन्य महत्वपूर्ण कविता हैः
मां सुनती रही
वह जो दिखता नहीं
पर साथ चलता है
सब कहते हैं वही तो ईश्वर है
बार-बार पलटकर पीछे देखती रही
और हर बार अपनी ही परछाई को पाती रही
एक दिन उसे यक़ीन होने लगा
उसका ईश्वर ज़रूर बदल गया है
उसकी ही परछाई में
और इस तरह वह उसके साथ है.

ईश्वर से जसिंता का संवाद सतत चलता रहता है. एक कविता में वह पूछती हैं- आखिर क्यों आदमी, भगवान ढ़ूंढ़ने जाता है? कौन सा डर है, जो उसे इतना डराता है?

वास्तव में जसिंता का डर जल, जंगल और जमीन का लगातार नष्ट होते जाना है. जमीन से अपने रिश्ते को एक कविता में वह इस तरह प्रकट करती हैं-

मेरे नंगे पैर देख उन्हें बहुत तरस आया
वे जो जूते पहनने के अभ्यस्त हैं
एक स्वर में बोले
ओह! कितने अभागे! कितने असभ्य!
पर मुझे उन पर तरस आया
क्योंकि जूते पहनने के अभ्यस्त लोग
यह कभी नहीं जान सकते
कि उनके पैरों तले की जमीन कैसी है
क्या वह सांस ले रही है?
ठीक से जी रही या दम तोड़ रही है?
कहीं उसे बुखार तो नहीं?
या क्यों वह ठंडी पड़ी रहती है?
क्या वह उदास है?
क्या उसे ज्वर है?

जल, जंगल और आदिवासी जीवन से बाहर भी जसिंता दुनिया को देखती-समझती हैं. लेकिन उनकी दुनिया को देखने का तरीका अलग है. संग्रह में जेंडर इश्यू पर भी कुछ कविताएं हैं. एक कविता में वह लिखती हैं- मैं पुरुष पैदा नहीं होता, यह समाज मुझे पुरुष बनाता है, मेरे भीतर के स्त्रीत्व को बचपन से, धीरे-धीरे मारा जाता है, इस तरह कोई पुरुष तराशा जाता है.

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यह सिमोन दि बोउआर की उस बात का जवाब लगता है जिसमें उन्होंने कहा था, औरत पैदा नहीं होती बनाई जाती है. लेकिन सच यह भी है कि पुरुष भी औरत की तरह ही बनाए जाते हैं. राष्ट्रवाद पर जसिंता कहती हैं- जब मेरा पड़ोसी, मेरे ख़ून का प्यासा हो गया, मैं समझ गया, राष्ट्रवाद आ गया.

जसिंता आदिवासियों को मुख्यधार में शामिल किए जाने पर लिखती हैं- वे हमारे सभ्य होने के इंतजार में हैं, और हम उनके मनुष्य होने के.

जसिंता की अधिकांश कविताएं संवाद और सवाल की मुद्रा में है. एक कविता में वह कहती हैं-
पहाड़ पर लोग पहाड़ का पनी पीते हैं
सरकार का पानी वहां तक नहीं पहुंचता
मातृभाषा में कोई स्कूल नहीं पहुंचता
अस्पताल में कोई डॉक्टर नहीं पहुंचता
बिजली नहीं पहुंचती इंटरनेट नहीं पहुंचता
वहां कुछ नहीं पहुंचता
साब! जहां कुछ भी नहीं पहुंचता
वहां धर्म और गाय के नाम पर
आदमी की हत्या के लिए
इतना ज़हर कैसे पहुंचता है?

जसिंता केवल शब्दों को जोड़कर कविताएं नहीं लिखतीं, वह शब्दों के बाकायदा अर्थ जानती हैं. जब वह ज़मीन कहती हैं तो उन्हें मालूम होता है, ज़मीन क्या होती है, जब वह पहाड़ लिखती हैं तो पहाड़ और उसके निहितार्थ वह जानती हैं. वह गंगा के प्रदूषण पर बात करती हैं और जब प्रेम पर भी लिखती हैं तो उन्हें धरती दिखाई देती है.

एक कविता में वह कहती हैं- प्रेम में तुम्हारे ही चारों ओर घूमता हुआ, मैं पृथ्वी हो जाता हूं, थोड़ा-थोड़ा स्त्री हो जाता हूं.

जसिंता की कविताओं में आदिवासियों का जीवन दिखाई देता है और सुनाई पड़ते हैं सत्ता की तानाशाही के विरुद्ध स्वर. वह विकास को भी कठघरे में खड़ा करती हैं और ईश्वर से भी सवाल पूछती हैं. मशीन को मनुष्य बनाने का प्रयास हैं ये कविताएं.

पुस्तकः ईश्वर और बाज़ार
लेखकः जसिंता केरकेट्टा
प्रकाशकः राजकमल पेपरबैक्स
मूल्यः 200 रुपये

Sudhanshu Gupt

Tags: Books, Hindi Literature, Literature

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