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कविता, हाइकू, दोहे, गीत और गज़लों का खूबसूरत गुलदस्ता है ममता किरण का नया संग्रह

कविता की वाचिक परंपरा की एक हस्ताक्षर हैं ममता किरण. उनकी देश-विदेश के मंचों पर सशक्त उपस्थिति रही है.

कविता की वाचिक परंपरा की एक हस्ताक्षर हैं ममता किरण. उनकी देश-विदेश के मंचों पर सशक्त उपस्थिति रही है.

ममता किरण की कविताओं का विषय वस्तु बहुत विस्तृत है. घर-परिवार, रिश्ते, समाज, देश, दुनिया, सामाजिक व मानवीय सरोकार हर पहलू पर इनकी संवेदनशील पारखी नज़र पड़ी है.

  • News18Hindi
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    – मधु मधुमन
    समकालीन महिला कवियों में ममता किरण एक चर्चित नाम है. कविता की वाचिक परंपरा की एक हस्ताक्षर हैं ममता किरण. उनकी देश-विदेश के मंचों पर सशक्त उपस्थिति रही है. हाल ही में उनका एक काव्य संग्रह ‘समकालीन कवयित्रियाँ लोकप्रिय कविताएँ’ प्रकाशित हुआ है. पंद्रह वर्षों तक राष्ट्रीय समाचार पत्रों व दूरदर्शन से संबद्ध रहने के पश्चात ममता जी वर्तमान में स्वतंत्र पत्रकारिता व लेखन कर रही हैं ।

    इससे पहले उनका एक काव्य संग्रह ‘वृक्ष था हरा भरा’ और एक गजल संग्रह ‘आँगन का शजर’ प्रकाशित हो चुका है. बहुआयामी व्यक्तित्व की स्वामिनी ममता के व्यक्तित्व की छाप उनकी रचनाओं में साफ झलकती है. बहुत ही सरल, सहज भाषा में प्रवाहपूर्ण ढंग में बहती हुई रचनाओं के बहाव में पाठक स्वत: ही बहते चले जाते हैं. उनकी कविताएं कभी स्वयं से तो कभी पाठक से संवाद करती हुई प्रतीत होती हैं.

    ममता किरण का यह संग्रह कुछ कविताओं, कुछ मुक्तक, हाइकू, दोहे, गीत व ग़ज़लों का एक बहुत ख़ूबसूरत गुलदस्ता है.

    कविताओं का विषय वस्तु बहुत विस्तृत है. घर-परिवार, रिश्ते, समाज, देश, दुनिया, सामाजिक व मानवीय सरोकार हर पहलू पर इनकी संवेदनशील पारखी नज़र पड़ी है.

    ‘स्त्री और नदी’ कविता की ये पंक्तियां देखिए:-

    स्त्री मांगती है नदी से
    अनवरत चलने का गुण
    पार करना चाहती है
    तमाम बाधाओं को
    पहुंचना चाहती है
    अपने गंतव्य तक।

    पूरी कविता में नदी के सारे गुण अपने में समा लेने की बात करते कविता की अंतिम पंक्तियां देखें :-

    स्त्री बसा लेना चाहती है
    समूचा का समूचा संसार नदी का
    अपने गहरे भीतर
    जलाती है दीप आस्था के
    नदी में प्रवाहित कर
    करती है मंगल कामना
    सबके लिए
    और…
    अपने लिए मांगती है
    सिर्फ़ नदी होना.

    समाज की कुरीतियों पर चोट करती कविता में कम शब्दों में बड़ी बात कहती हुई कविता ‘थाप’-

    नहीं बजती
    ढोलक की थाप
    लड़कियों के
    पैदा होने पर

    बजती है
    ढोलक की थाप
    लड़कियों के
    घर से विदा होने पर.

    ‘हसरत’ कविता में गांव के मकान की भंडरिया में पड़े बर्तनों के वार्तालाप के ज़रिए वो नए दौर के आडंबर पूर्ण विवाह के प्रचलन पर इतने सहज और सुंदर ढंग से कटाक्ष करती हैं-

    ‘कड़ाही ने कलछुल से,
    कलछुल ने परात से,
    परात ने चमचे से ……. कहा’

    किताब के पन्ने पलटते-पलटते आगे चल कर हाइकू, मुक्तक, दोहों से भी परिचय होता है-

    बच्चों को ‘पर’ क्या मिले ,छोड़ गए वो साथ
    दीवारें ही बच गयीं ,जिनसे कर लो बात।

    बच्चे परदेशी हुए, सूने घर संसार
    इंटरनेट पर ही मनें, अब सारे त्योहार।

    नवीनीकरण के फलस्वरूप हुए नकारात्मक बदलाव पर कितनी सादगी और मासूमियत के साथ कहे गए एक गज़ल के ये अशआर देखिए :-

    कच्चा मकाँ तो ऊँची इमारत में ढल गया
    आँगन में वो जो रहती थी चिड़िया किधर गयी

    भूमण्डलीकरण ने बनाए बहुत अमीर
    लेकिन ग़रीब लोगों की दुनिया बिखर गयी

    नारी मन की संवेदना कैसे मुखर हुई है देखें इस शे’र में :-

    एक निर्णय भी नहीं हाथ में मेरे बेटी
    कोख मेरी है मगर कैसे बचा लूँ तुमको

    सियासत पर भी कटाक्ष करने से इनकी कलम नहीं चूकती:-

    बशर के बीच पहले भेद करते हैं सियासतदाँ
    ज़रूरत फिर जताते हैं किसी क़ौमी तराने की

    और ये कितना प्यारा उलाहना देता हुआ शे’र देखिए :-

    कहा तुमसे अगर कुछ तो उसे तुम मान लोगे क्या
    शिकायत फिर तुम्हें मुझसे है क्यों कुछ मत बताने की

    ये अशआर ममता की स्वावलंबी और आडंबर रहित शख़्सियत को उजागर करते हैं :-

    सहारा तिनके का भी अब न चाहा जाए है मुझसे
    कि अपने दम से ही उस पार उतरा जाए है मुझसे

    यक़ीनन हूँ भी मैं वैसी ही जैसी सबको दिखती हूँ
    कि चेहरे पर कोई चेहरा न रखा जाए है मुझसे

    एक और शे’र देखें-

    भले आये नहीं तुमको किसी अंजाम की ख़ुशबू
    फ़िज़ा में ख़ुद ही फैलेगी तुम्हारे काम की ख़ुशबू

    पुस्तक- समकालीन कवयित्रियाँ लोकप्रिय कविताएँ
    लेखक- ममता किरण
    प्रकाशक- कल्पना प्रकाशन

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