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Book Review: आत्मीयता से लबरेज प्रेम कहानी है 'मेरी जिंदगी में चेखव'

यह पुस्तक 78 वर्ष की आयु में लीडिया की मृत्यु के कई वर्षों बाद प्रकाशित हुई.

यह पुस्तक 78 वर्ष की आयु में लीडिया की मृत्यु के कई वर्षों बाद प्रकाशित हुई.

अन्तोन पाव्लाविच चेख़व रूसी कथाकार, उपन्यासकार और नाटककार थे. उनकी कहानियां विश्व के समीक्षकों और आलोचकों में बहुत सम्मान के साथ सराही जाती हैं. अपने छोटे से साहित्यिक जीवन में उन्होंने रूसी भाषा को चार कालजयी नाटक दिए.

-सुधांशु गुप्त

Book Review: अगर माना जाए तो यह प्रेम कहानी है- एक दुखद प्रेम कहानी. तटस्थ आत्मीयता से लबरेज प्रेम कहानी. एक दुखद प्रेम कहानी. हिंदी या अन्य भाषाओं में भी ऐसा देखने को नहीं मिलता कि किसी प्रेमिका ने अपने प्रिय लेखक को लेकर इतनी आत्मीयता से लिखा हो. इस प्रेम कहानी के नायक हैं रूस (विश्व) के महानतम लेखक चेखव और नायिका हैं मास्को में पैदा हुईं लीडिया एविलोव.

लीडिया चेखव से चार वर्ष छोटी थीं. जब चेखव से वह पहली बार मिलीं तो उनकी उम्र महज 25वर्ष थी. उनका नौ माह का एक बेटा भी था. 1889 से लेकर 1899 के बीच लीडिया की चेखव से केवल आठ मुलाकातें हुईं. यह भी मुमकिन है कि दोनों के बीच और मुलाकातें भी हुई हों. लेकिन प्रेम में मुलाकातों की अधिकता कोई मायने नहीं रखती.

चेखव स्वयं कहते हैं, ‘जानती हो कि अगर मैंने शादी की होती तो मैं अपनी पत्नी से अलग रहने के लिए कहता…ताकि ज्यादा समय साथ बिताने से आपसी व्यवहार में जो असावधानी या अशिष्टता का पुट आ जाता है, वह हमारे बीच न आ पाए.’

लीडिया ने दस वर्षों में चेखव से हुई आठ मुलाकातों का जिक्र ‘चेखव इन माई लाइफ’ शीर्षक से लिखी पुस्तक में किया. लेकिन यह पुस्तक 78 वर्ष की आयु में लीडिया की मृत्यु के कई वर्षों बाद प्रकाशित हुई. इसके भी काफी सालों बाद यह किताब हिन्दी में ‘मेरी ज़िन्दगी में चेखव’ शीर्षक से प्रकाशित हुई.

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डेविड मैगार्शक के अंग्रेजी अनुवाद से इसकी पुनर्पस्तुति की है रंजना श्रीवास्तव से. संपादकत्व की जिम्मेदारी संभाली राजेन्द्र यादव ने. इस पुस्तक में चेखव के जीवन के भी बहुत से पहलुओं को देखा जा सकता है. लीडिया से मुलाकात के बाद चेखव अपने लेखन के प्रति गंभीर हुए. लीडिया की चेखव से मुलाकात, उनकी बड़ी बहन के पति (जो एक बड़े अखबार से सम्पादक-प्रकाशक थे) के सौजन्य से हुई. एक दिन लीडिया को नाद्या का यह संदेश मिला-चेखव से मिलना है तो तुरंत चली आओ. लीडिया दौड़ी-दौड़ी चेखव से मिलने चली गईं. इसके बाद दोनों आध्यात्मिक और आत्मिक रूप से एक दूसरे से जुड़ गए. जीवनभर जुड़े रहे.

लीडिया चेखव से अपने प्रेम को बाकायदा स्वीकारती हैं. एक पत्र में उन्होंने लिखा, ‘आप बखूबी जानते हैं कि मैं (लीडिया) आपके लिए क्या महसूस करती हूं और यह लिखने में मुझे किंचित भी लज्जा नहीं. मैं यह भी जानती हूं कि आपके मन में मेरे प्रति सौहार्द और विरक्ति के सिवा कुछ नहीं. मेरी हार्दिक इच्छा है कि इस विकट स्थिति से खुद को उबारूं, पर अपने आप इसे कर पाना मेरे लिए बड़ा कठिन है. आपसे विनती है कि मेरी सहायता करें. कृपया मुझसे न कहें कि मैं आपसे मिलूं और न ही मुझसे मिलने का प्रयास करें.’

1892 में लीडिया और चेखव की दूसरी मुलाकात हुई. तब लीडिया के पति को अपनी पत्नी के विषय में कई जानकारियां मिल चुकी थीं. इसके बाद चेखव अत्यंत सावधान हो गए कि लीडिया को ऐसी किसी बात से बचाएँ, जिससे उसे बदनामी की हवा भी लग सके. चेखव को इस बात का भी पूर्वाभास हो गया था कि एक दुखदायी प्रेम प्रसंग से गुजरना उनकी नियति है. उन्होंने लीडिया से पहली मुलाकात के बाद उन्हें एक पत्र में जीवन की अनेक परेशानियों के बाद लिखा था, बस अब मुझे एक दुखद प्रेम प्रसंग की जरूरत है. लीडिया ने मन बना लिया था कि वह पति को छोड़कर चेखव के साथ जीवन शुरू करेंगी.

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लीडिया एक जौहरी की दुकान पर गईं और घड़ी की चेन में पहनने के लिए पुस्तक की आकृति का पेंडेंट बनवाने का आदेश दिया. पुस्तक के एक और लिखवाया-‘चेखव की लघुकथाएँ’ और दूसरी ओर ‘पृष्ठ 267, पंक्ति 6 और 7’. इन पंक्तियों में लिखा था, अगर कभी मेरे प्राणों की जरूरत हो तो आना और निस्संकोच ले लेना. लीडिया ने सीधे-सीधे कोई संदेश इसलिए नहीं भेजा ताकि चेखव के मन में संदेह बना रहे और जरूरत पड़ने पर मेरे लिए पीछे हटने की गुंजाइश भी बची रहे.

लीडिया लिखती हैं, अपनी पूरी जिंदगी उन्हें कैसे दे सकती थी? यह केवल मेरा नहीं मेरे तीन बच्चों के जीवन का भी प्रश्न था. क्या मिखाइल (लीडिया के पति) मुझे अपने बच्चों को ले जाने की अनुमति देते? और क्या चेखव ही उन्हें स्वीकार कर पाते?

पेंडेंट चोखव तक पहुंच गया था. इधर लीडिया ने कई दिन दुश्चिन्ता और व्याकुलता में बिताए. वह लगातार चेखव के ख़त का इंतज़ार करती रहीं. न चेखव आए न उनका ख़त. कुछ भी नहीं हुआ. कुछ भी तो नहीं हुआ.

लीडिया पुस्तक में यह स्वीकार करती हैं कि मुझे चेखव से प्रेम था. केवल उनकी प्रतिभा से नहीं, स्वयं उनसे, उनकी कही हर बात से, हर बात हर नज़रिये से. लीडिया स्यवं भी कहानियां लिखती थीं और साहित्य की दुनिया में अपना स्थान बनाना चाहती थीं. एक बार चेखव ने लीडिया से कहा था- तुम्हारे भीतर एक सहज नैतिक बोध है. बहुत बड़ी बात है यह.

चेखव ने पेंडेंट वाली घटना का इस्तेमाल अपने नाटक ‘द सी गल’ में किया. चेखव लीडिया से एक ऐसे नृत्य में मिले, जहां सभी दर्शकों ने नकाब पहना हुआ था. चेखव और लीडिया की भी यहीं मुलाकात हुई. चेखव ने लीडिया से कहा कि वह उसके संदेश का जवाब नाटक के माध्यम से देगा. ऐसा लगता है कि चेखव का वास्तिवक संदेश नाटक के किरदार नीना के दुखान्त प्रेम प्रसंग में छिपा है. यह संदेश कहता है कि जब नीना जैसी युवा लड़की के प्रेम की परिणति इतनी दुखद हुई तो लीडिया तीन बच्चों की मां होकर भी कैसे आशा कर सकती है कि उसका प्रेम सफल होगा. यह चेखव का अपना तरीका था लीडिया के बलिदान को अस्वीकार करने का क्योंकि अपनी गहरी नज़र से उन्होंने जान लिया होगा कि उनके प्रेम का सफल होना कठिन है.

या यह भी संभव है कि वह जानते थे कि इस तरह ही उनका प्रेम अमर हो सकता है. ठीक वैसे ही जैसे वह अपनी एक कहानी-एक छोटी सी चुहुल में दिखाते हैं. ‘मेरी ज़िन्दगी में चेखव’ में लीडिया एविलोव न केवल अपनी और चेखव की आत्मीयता को दर्शाती हैं बल्कि चेखव के जीवन के अनेक पहलुओं को भी उजागर करती हैं. इस पुस्तक को पढ़ना चेखव और प्रेम के व्यापक-गहन रूप को देखना है.

पुस्तकः मेरी ज़िन्दगी में चेखव
लेखकः लीडिया एविलोव, डेविड मैगार्शक के अंग्रेजी अनुवाद से पुनर्पस्तुतिः रंजना श्रीवास्तव
सम्पादकः राजेन्द्र यादव
प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन
मूल्यः 175 रुपए

Sudhanshu Gupt

Tags: Books, Hindi Literature, Literature

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