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पुस्तक अंश: पूर्वोत्तर से जुड़ी यात्राओं का दस्तावेज है उमेश पंत का 'दूर दुर्गम दुरुस्त'

पुस्तक अंश: पूर्वोत्तर से जुड़ी यात्राओं का दस्तावेज है उमेश पंत का 'दूर दुर्गम दुरुस्त'

Door Durgam Durust किताब में मेघालय, असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मणिपुर के कुछ हिस्सों में की गई यात्राओं के वृत्तान्त हैं.

Door Durgam Durust किताब में मेघालय, असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मणिपुर के कुछ हिस्सों में की गई यात्राओं के वृत्तान्त हैं.

उमेश पंत (Umesh Pant) को अमेरिका के प्रतिष्ठित 'अंतरराष्ट्रीय कथा सम्मान' दिए जाने की घोषणा की गई है. यह सम्मान ढींगरा फैमिली फाउंडेशन अमेरिका, शिवना प्रकाशन की ओर से हर वर्ष भारतीय और प्रवासी हिंदी साहित्यकारों को उनकी श्रेष्ठ कृतियों के लिए दिया जाता है. उमेश पंत को यह पुरस्कार पूर्वोत्तर पर आधारित उनके यात्रा वृत्तांत ‘दूर दुर्गम दुरुस्त’ के लिए दिए जाने की घोषणा हुई है.

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    Hindi Sahitya News: उमेश पंत स्‍वतंत्र पत्रकार और लेखक हैं. फोटोग्राफी और फिल्‍म मेकिंग के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं. हिंदी साहित्‍य की कविता, कहानी, संस्‍मरण, यात्रा संस्‍मरण और लालित्‍य लेखन जैसी कई विधाओं में उनकी कलम सृजन रचती रही है.

    उमेश पंत (Umesh Pant) को अमेरिका के प्रतिष्ठित ‘अंतरराष्ट्रीय कथा सम्मान’ दिए जाने की घोषणा की गई है. यह सम्मान ढींगरा फैमिली फाउंडेशन अमेरिका, शिवना प्रकाशन की ओर से हर वर्ष भारतीय और प्रवासी हिंदी साहित्यकारों को उनकी श्रेष्ठ कृतियों के लिए दिया जाता है. उमेश पंत को यह पुरस्कार पूर्वोत्तर पर आधारित उनके यात्रा वृत्तांत ‘दूर दुर्गम दुरुस्त’ के लिए दिए जाने की घोषणा हुई है. यह पुस्तक ‘राजकमल प्रकाशन’ (Rajkamal Prakashan) के ‘सार्थक’ (Sarthak) उपक्रम से 2020 में प्रकाशित हुई थी. प्रस्तुत है पुस्तक अंश-

    दूर दुर्गम दुरुस्त (Door Durgam Durust)
    सुबह दस बजे तैयार होकर हम फिर से हॉर्नबिल फेस्टिवल के वेन्यू पर थे. वेन्यू के एकदम करीब हमारी मुलाकात सेबेस्टीन से हुई. आर्मी में अफसर सेबेस्टीन की फेस्टिवल के लिए खास ड्यूटी लगी थी. छोटे कद के खुशमिज़ाज सेबेस्टीन ने बताया कि वो भी दिल्ली से ही हैं और उनके पिताजी सेना में एक बड़े अफ़सर थे. हम इस वक़्त नाश्ते की तलाश में थे. सेबेस्टीन ने हमें नाश्ते के कुछ ठिकाने भी बता दिए.

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    “बट यू शुड ट्राई इन फ़ेस्टिवल वेन्यू. ट्राई समथिंग लोकल.”

    सेबेस्टीन की इस रायशुमारी को तवज्जो देते हुए हम वेन्यू की तरफ बढ़ गए. मुख्य सड़क से खड़ी चढ़ाई किसामा गांव की तरफ जा रही थी. यहां एक बड़ा सा गेट बना था जिस पर सेना के जवान गश्त दे रहे थे. गेट के ऊपर एकदम तीखी चढ़ाई थी. दो बच्चे उस चढ़ाई में पानी के ज़रकीन उठाकर ले जा रहे थे. वेंकटेश भागकर उनके पास गया और उसने ज़रकीन अपने हाथों में उठा लिए. बच्चे ख़ुशी-ख़ुशी उसके पीछे भागने लगे. कुछ ही देर में उनका ठिकाना आ गया और वो एक ढलान की तरफ बढ़ गए.

    एकदम खिली हुई धूप में अनामिका, मैं, स्वाती और वेंकटेश एकदम खड़ी चढ़ाई चढ़ रहे थे. रास्ते में फ़ेस्टिवल का बड़ा सा बैनर लगा था. उस बैनर के सामने हम चारों तसवीर खिंचाना चाहते थे. सामने से आते एक मजदूर को हमने डीएसएलआर कैमरा पकड़ा दिया. वेंकटेश उसे बताने लगा कि कैसे तसवीर खींचनी है. झिझकते हुए मजदूर ने कैमरा अपने हाथों में लिया और एक तसवीर खींच ली. उसका साथी उसे फ़ोटो खींचता देख ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा. माने दिन की हंसती-मुस्कुराती शुरुआत तो हो चुकी थी.

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    थोड़ी और चढ़ाई चढ़कर हमने देखा कि फेस्टिवल का मेन गेट सामने था. इस गेट के ठीक बाद एक जगह ने हमारा ध्यान खींचा. एक टेंट के बाहर कई तरह सब्ज़ियों और फलों की प्रदर्शनी लगी हुई थी. इस टेंट की ओर क़दम बढ़ाए तो देखा एक ख़ास तरह की प्रतियोगिता के नतीजे यहां लगे हुए थे. अलग-अलग सब्ज़ियों और फलों पर टैग लगे हुए थे. किसी को पहला पुरस्कार मिला था, किसी को दूसरा. पूर्वोत्तर के किसानों का श्रम यहां कहीं रंगों में पसरा हुआ था. हमने वहां मौजूद लीची खाई तो लगा इस मेहनत का फल तो वाक़ई मीठा है. किसी स्टॉल पर अनन्नास मिल रहा था तो किसी पर नारंगियां. कहीं चावल का बना केक मिल रहा था तो कहीं मशरूम की नुमाइश हो रही थी. तरह-तरह के फूलों की प्रदर्शनी भी थी और उनकी ख़ुशबू भी. टैंट के भीतर सुबह की धूप छनकर आ रही थी और इससे इन फलों और फूलों के रंग और निखर रहे थे.

    दूर से आती वाद्य-यंत्रों की आवाज़ अब हमें अपनी ओर खींच रही थी. हम मुख्य मैदान की तरफ़ बढ़ रहे थे जहां देशभर की जनजातियों के सांस्कृतिक कार्यक्रम इस उत्सव में हर रोज़ पेश किए जाते हैं. लेकिन हम उस मैदान तक पहुंचते, इससे पहले ही रास्ते में द्वितीय विश्व युद्ध की यादें हमारा इन्तज़ार कर रही थीं. दूसरे विश्व युद्ध में कोहिमा की भूमिका बहुत अहम मानी जाती है. सेना द्वारा लगाई गई इस प्रदर्शनी में दूसरे विश्व युद्ध में इस्तेमाल की गई बन्दूकों की नुमाइश थी जिन्हें हाथ में लेकर लोग तसवीर खिंचा रहे थे. भारतीय जवानों के शौर्य की गाथाओं में शामिल रही बन्दूकें, युवा पीढ़ी की तसवीरों में शामिल हो रही थीं.

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    दूसरे विश्व युद्ध की यादों की इस नुमाइश का पूरा जायज़ा ले लेने के बाद मैं एक फ़ोटो एग्जिबिशन की ओर बढ़ गया. इस प्रदर्शनी में देश-विदेश के फ़ोटोग्राफरों की तसवीरें लगी हुई थीं. पूर्वोत्तर के भूगोल और संस्कृति की झलकियां पेश करती इन तसवीरों के बीच मेरा ध्यान कुछ रेखाचित्रों ने खींचा. इनमें कुछ यंत्र दिख रहे थे जो यहां के आदिवासी समाज की उपज थे. एक यंत्र था जिसके बारे में लिखा गया था कि यह सामने वाले के दिमाग में जो विचार आ रहे हैं उन्हें पहले से समझने में मदद करता है.

    कुछ आगे एक और प्रदर्शनी लगी थी. यहां छोटी-छोटी झोंपड़ियां बनी हुई थीं जिनमें कुछ नागा महिलाएं बांस की खपच्चियों से टोकरियां बना रही थीं. कुछ जातर पर धागों को कसते हुए, बुनकारी की कला प्रदर्शन कर रही थीं. कुछ रुई कात रही थीं. हम उनकी तसवीर खींचते तो वो कुछ शर्माती सी मुस्कुराने लगतीं. आपस में अपनी भाषा में कुछ बात करतीं और हमें देखकर ठहाके लगाने लगतीं. नागा जनजातियों में इस्तेमाल होने वाले लकड़ी के बने कई टोटम भी एक अलग झोंपड़ी में लगे हुए थे. कोशिश थी कि नागालैंड के अलग-अलग गांवों की हस्तकलाओं का आगंतुक अपनी आंखों के सामने मुआयना कर सके.

    प्रदर्शनी से बाहर निकला ही था कि एक साठ साल के शख़्स, जो हाथों में कैमरा लिए थे, दूर से इशारे से मुझे बुलाते हुए बोले—
    “लिसन. आर यू अ फ़ोटोग्राफ़र?”
    मेरे हाथ में कैमरा देखकर यह मान लेना स्वाभाविक था.
    “यस जस्ट इमेच्योर फ़ोटोग्राफ़र.”
    मैंने कहा.
    “एक हेल्प कर दो मेरा.”
    बुज़ुर्ग ने बंगाली लहजे में कहा.
    “आई एम ऑलसो फ़ोटोग्राफर. एग्निबिशन में मेरे कुछ फ़ोटो भी लगे हैं. लेकिन एक बात समझ नहीं आ रहा. मैं जो आर्टिस्ट परफ़ॉर्म कर रहे हैं, उनका फ़ोटो खींच रहा था और मैं चाहता था कि किसी एक पर फ़ोकस हो और बाक़ी थोड़ा ब्लर हो जाएं. लेकिन यह हो नहीं रहा.”
    अपनी बात समझाने के लिए उन्होंने मुझे कैमरे के डिसप्ले पे कुछ तसवीरें भी दिखाईं और फिर वो अपनी झुंझलाहट को रोक नहीं सके.
    “माथा खराब होई जाबे. आई एम नॉट एबल टू अचीव व्हाट आई वांट.”

    ‘माथा खराब होई जाबे’ ये वाक्य उस बुज़ुर्ग शख़्स ने जिस हताशा में आकर कहा था वो एक कलाकार की हताशा थी. अपनी कला को निखारने की ये ललक और अपनी असफलता को स्वीकार करने की ये समझ हर कलाकार में नहीं होती. कम से कम इस उम्र में तो नहीं. उस शख़्स की आंखों में बच्चों वाली जिज्ञासा मैं साफ पढ़ सकता था. उन बुज़ुर्ग के साथ मैं उस मैदान की तरफ़ बढ़ रहा था जहां आदिवासी समाज के लोग अपनी वेशभूषा में अपनी संस्कृति को दुनिया तक पहुंचाने के लिए तैयार थे.

    “आप सब्जेक्ट के जितने पास जा सकें उतने पास जाइए. फोकल लेंथ कम रखिए. अपर्चर ज़्यादा खोलिए. यानी शेलो डेप्थ ऑफ़ फ़ील्ड रखिए. तब आपकी तसवीर में आपका सब्जेक्ट एकदम फ़ोकस में होगा और उसके पीछे सब आउट ऑफ़ फ़ोकस.”

    मैंने कैमरे की तकनीकी भाषा में उन्हें समझाया तो उन्हें बात कुछ-कुछ समझ आ गई.
    “थैंक यू. आई थिंक यू आर राइट. थैंक यू सो मच यंग बॉय.” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा.

    हम मैदान में पहुंच चुके थे और वो शख़्स उस भीड़ में कहीं गुम हो गया, जो मैदान में पारम्परिक पोशाक पहने और अपनी लोकधुनों पर नाच रहे आदिवासियों के साथ तसवीरें खिंचाने में मशगूल थी.

    “हा हा हैया…हा हा हैया…” इन शब्दों को एक धुन में दोहराते, हाथ में भाले लिए आदिवासी बीच-बीच में गले से एक अलग स्वर निकालते. पीछे से ढोल की आवाज़ और माहौल बनाने का काम कर रही थी. आगंतुकों के साथ नाचते, तसवीरें खिंचाते, छोटे-छोटे कपड़े पहने ये लोग बिना ठंड की परवाह किए मुस्कुरा रहे थे. ऐसा लग रहा था जैसे ये दुनिया ज़िन्दगी को उत्सव की तरह जीने वालों की दुनिया हो.

    थोड़ी देर में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी शुरू हो गए. पूरे भारत के आदिवासी इलाक़ों से आए रंगकर्मी अपने-अपने इलाक़ों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. एक नागा लड़की बांस की तीन डंडियों को एक साथ अपने हाथों पर लहराती संतुलन बनाने का करतब दिखा रही थी. रास लीला को दिखाता नाच में अद्भुत मुस्कुराहट वाला एक लड़का बार-बार पिरामिड पर चढ़ने की कोशिश में असफल हो रहा था. बुमरो-बुमरो पर नाचती एक ख़ूबसूरत कश्मीरी बाला अपने पैरों तले ज़मीन पर बिछी धूल से परेशान ज़बरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी. दर्शक दीर्घा में बैठे आदिवासी महिला-पुरुषों के उन तमाम चेहरों के एक चेहरे पर पसरी मुस्कुराहट ने बरबस मेरा ध्यान खींच लिया. मैं उस मासूम मुस्कुराहट को अपने कैमरे में उकेरने से नहीं रोक पाया.

    अंधेरा घिरने लगा था. हम खाने की तलाश में निकल आए. फूड कोर्ट में खाना खाते हुए वेंकटेश ने दिल्ली की दो अभी-अभी मिली लड़कियों को टेबल पर ले आया था. उनमें से एक लड़की का नाम कृपी था जिसे क्रीपी बना दिया गया था. एक महिला जिसके बोलने के अन्दाज में एक ख़ास क़िस्म की नकारात्मकता थी, हमसे जूको वैली के बारे में यह कह चुकी थी कि वो जगह उतनी अच्छी नहीं है. वेंकटेश अपने व्यवहार के बूते किसी तरह वो लेमिंटन केक दुकान वाले से मुफ़्त में ला चुका था जिसका स्वाद हम सबको ही बेहद पसन्द आया था.

    पुस्तक : दूर दुर्गम दुरुस्त
    लेखक : उमेश पन्त
    प्रकाशक ‏: राजकमल प्रकाशन (सार्थक)
    मूल्य : 210 रुपये

    Tags: Hindi Literature

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