Home /News /literature /

पुस्तक अंश: अनामिका का उपन्यास 'बिल्लू शेक्सपियर : पोस्ट-बस्तर'

पुस्तक अंश: अनामिका का उपन्यास 'बिल्लू शेक्सपियर : पोस्ट-बस्तर'

अनामिका हिन्दी भाषा की प्रमुख कहानीकार और उपन्यासकार हैं. समकालीन हिन्दी कविता की सर्वाधिक चर्चित कवयित्रियों में वे शामिल की जाती हैं.

अनामिका हिन्दी भाषा की प्रमुख कहानीकार और उपन्यासकार हैं. समकालीन हिन्दी कविता की सर्वाधिक चर्चित कवयित्रियों में वे शामिल की जाती हैं.

हिंदी साहित्य में अनामिका एक स्थापित हस्ताक्षर हैं. उन्हें हिंदी कविता में अपने विशिष्ट योगदान के कारण राजभाषा परिषद् पुरस्कार, साहित्य अकादमी सम्मान, भारतभूषण अग्रवाल एवं केदार सम्मान पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है.

    उपन्यास ‘बिल्लू शेक्सपियर पोस्ट बस्तर’ में आपको अनामिका की लेखनी का एक नया तेवर देखने को मिलेगा. आदिवासी क्षेत्रों में आधुनिक शिक्षा तंत्र के ताने-बानों पर रचा यह उपन्यास एक विवाहित महिला मान्यता टंडन और उसके मित्र आशिष मुखर्जी के इर्द-गिर्द घूमता हुआ आपको समूचे सिस्टम से रूबरू कराता है.

    उपन्यास के केंद्र में आदिवासी युवक विलियम किंडो उर्फ बिल्लू किंडो, दिवंगत कामरेड शशिशेखर, प्रोफेसर आशिष मुखर्जी, मान्यता मैडम, उनके पति डॉ टंडन, शेफालिका और ललिता हैं. मान्यता आत्महत्या कर लेती है. अनामिका ने इस कृति में शिक्षा प्रबंधन, राजनीति, षडयंत्र और संघर्ष को बड़े ही सजीव ढंग से प्रस्तुत किया है.

    प्रस्तुत है वाणी प्रकाशन से आए उपन्यास ‘बिल्लू शेक्सपियर : पोस्ट-बस्तर‘ का एक अंश-

    अटकन-चटकन दही चटाकन

    सारांश यह कि छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय के पत्राचार-कार्यक्रम के लिए मान्यता मैडम और आशिष सर कई तरह का संवादी पाठ्यक्रम तैयार कर रहे थे जहां शेक्सपियर के कानों में कालिदास कुछ कह रहे हों, जॉन डन के कानों में कबीर, डिकेन्स और चेखव के कानों में प्रेमचन्द और यशपाल, शास्त्रीय कविता के कन्धे पर आदिवासी लोकगाथाओं के हाथ हों. जिन दिनों पाठ्यक्रम तैयार हो रहा था, आशिष सर फ्रेम के बाहर थे, यानी सोआस में, और कुलपति की चिर-तृषित पुरुष-दृष्टि मान्यता मैडम से जुड़े प्रवादों के रास्ते उनके अन्तरंग वृत्तों तक पहुंचकर उनका शिकार खेल जाने के सपने संजो रही थी!

    ओजपूर्ण ढंग से बोलती हुई सुन्दर स्त्री एक ‘मज़ेदार और दिलचस्प तमाशा’ तो होती ही है-‘कोई कपि वन जाये सहज सम्भाव्य है!’ कपि यानी बन्दर बनकर हज़ार उछल-कूद मचा लेने के बावजूद यदि किसी और हाथ में पड़ा ठोंगा हाथ न आया तो जगता है अन्दर का भेड़िया जो एकदम से शिकार पर टूट पड़ता है.

    बाल साहित्य: डॉक्टर अजय गोयल की कहानी ‘नन्हीं उंगलियों का विद्रोह’

    कुलपति से अन्तरंग ‘मैत्री’ का आमन्त्रण साम-दाम-दंड-भेद से मान्यता मैडम ने नकारा और फिर आशिष सर भी ‘फ्रेम’ में चले आये. तब तक पाठ्यक्रम तो पास हो चुका था, पर पाठ-संस्तुति की प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं हुई थी. भाषा-विभाग के डीन कुलपति की मुट्ठी में थे.

    ‘बिनु काज दाहिने-बायें’ करने वाले सिर्फ़ दुष्ट ही नहीं होते, चाटुकार भी होते हैं! जिस धीरज से गली का कुत्ता कसाई के पारे के आसपास मंडराता रहता है कि कभी तो कोई ‘टुकड़ा’, कोई ‘हड्डी’ छिटककर पास आयेगी, बिन मांगे मोती मिलेगा, वे प्रभुत्व सम्पन्न लोगों के दरवाज़े बैठे रहते हैं- वहां की मिट्टी सूंघते हुए, बीच-बीच में एकाध लात लग जाये तो उसे भी ईश्वरीय प्रसाद मानकर ग्रहण करते हुए.

    कामदग्ध व्यक्ति तो क्रोधदग्ध व्यक्ति से भी ज़्यादा फुर्तीला हो जाता है-चाहे पांव क़ब्र में ही क्यों न पड़े हों! जिस फुर्ती से उन्होंने मान्यता मैडम के आस-पास जाल बुनने शुरू किये थे, उसी फुर्ती के साथ उनके ‘आचरण’ और उनकी ‘कूबत’ के ख़िलाफ़ वक्तव्य देने शुरू किये, पहले तो चापलूसों की दारू-पार्टियों में, फिर स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में. एक बार तो उन्होंने सब स्त्री कार्यकर्ताओं को ‘मादक विषकन्याएं’ कह दिया.

    बाल साहित्य: डॉक्टर अजय गोयल की कहानी ‘नन्हीं उंगलियों का विद्रोह’

    “भाइयों और पतियों की प्रतिक्रिया अक्सर ऐसे मौक़ों पर उस परितप्त स्त्री के विरुद्ध ही जाती है जिसे लोक-प्रवाद में घसीट लिया गया हो. “कहा था न औरत, औरत की तरह रहो, घर की देहली न लांघो, लांघो तो हमारे संरक्षण में” जैसा कुछ व्यक्त-अव्यक्त हुंकार में गूंजता है! गैंग-रेप की शिकार कामकाजी लड़की हो या कुटिल टिप्पणियों की शिकार वयस्क कार्यकर्ता-‘जले पर नमक’ वाले मुहावरे का मर्म ख़ूब समझती है. जिसे आज तक कुर्सी-टेबल समझा गया, उसकी यह मजाल कि वह अपनी लय में बढ़ना चाहे! जिस कुर्सी पर मैं ही अभी बैठा हूं, यदि मुझे गुदगुदाकर कहे-‘अब उठो, मुझे जाना है बाहर’ तो खुन्दक चढ़ेगी ही! “जब तक कोई अगले को संवेदनहीन, प्राणहीन, उपयोगी ‘वस्तु’ समझता रहेगा-सामरस्य होगा ही कैसे, कैसे होगा तादात्म्य, जो कि इगैलिटेरियन समाज का आधारभूत प्रमेय है!”-आशिष सर हमें अक्सर समझाते!

    विषकन्या-प्रकरण पर बहुतेरे स्त्री-संगठनों ने अपने-अपने ढंग से प्रतिवाद व्यक्त किये, पत्राचार-महाविद्यालय के हम छात्रों ने दौड़-धूपकर कुछ विरोध-प्रदर्शन भी आयोजित किये और इसका जवाब यह कि हम सब को मनगढ़न्त आरोपों पर रेस्टिकेड कर दिया गया!

    मैंने जिस लड़की को देखा भी न था, सिर्फ़ फेस-बुक पर जिससे दो-एक बार की बातचीत थी-उसने अचानक मेरे ख़िलाफ़ एफ.आई.आर. दर्ज कर दिया कि मैंने उसे अभद्र प्रस्ताव भेजे हैं.

    दरअसल वह कुलपति साहब के पी.ए. की बेटी थी और मैं उसकी स्थिति समझ सकता था! मेरे मित्र को यह कहकर जेल भेज दिया गया कि उसने एक पोस्टर फाड़ा जिस पर अम्बेडकर की तस्वीर थी! वह बेचारा, मिथिला का सहमा-सा, पढ़ाकू लड़का, पढ़ाई की मेज से उठता ही तब जब बाथरूम जाना होता या क्लास, कभी भरमुंह किसी से बोलता भी नहीं, लगातार इसी चिन्ता में घुला करता कि घर का क़र्ज़ कैसे सधेगा, बहनों की शादी कैसे होगी, समाज वर्ण-वर्ग-लिंग-नस्ल आदि की घेरेबन्दियों से ऊपर कैसे उठेगा (इसी वरीयता क्रम में उसकी चिन्ताएं घुमड़ती थीं, पहले पर्सनल, फिर पोलिटिकल, पर घुमड़ती थीं एक साथ) उसे जीवन में कोई शॉर्टकट नहीं चाहिए था! गणित में बी.ए. करने के बाद वह साहित्य में एम. ए. करने आया था कि नौकरी न भी मिली तो गणित के ट्यूशन पढ़ाकर और महत्त्वपूर्ण पुस्तकों के अनुवाद करता हुआ वह कामचलाऊ पैसे तो उगाह ले!

    उसे जब परीक्षा देने से ‘डिबार’ कर दिया गया तो उसका चेहरा नीला पड़ गया! हम तो कुछ हल्बाबाज़ थे भी, वह बेचारा सचमुच ही जौ के साथ पिसा हुआ घुन था! फ़रियाद लेकर वह कुलपति के पास गया तो कुलपति ने माफ़ीनामे की बात कही. यह कहा कि उनके ख़िलाफ़ जितने एफ.आई.आर. उसके साथियों ने किये हैं और जितने वक्तव्य इधर-उधर देते फिरे हैं-वे सब वापस लें तो उन्हें विश्वविद्यालय वापस लिया जायेगा. आशिष सर के समझाने-बुझाने पर हम समझौता-वार्ता के लिए राज़ी हो गये, पर कुलपति-निवास पर तो और ही तरह की खिचड़ी पक रही थी.

    हमारी यह शर्त तो मान ली गयी कि मान्यता मैडम और उन सब स्त्रियों से कुलपति साहब माफ़ी मांग लें जिनके ख़िलाफ़ उन्होंने अभद्र टिप्पणी की है, पर बदले में हमसे भी बहुतेरे काग़ज़ातों पर दस्तख़त लिए गये और कुछ इतनी अफरा-तफरी में, यह कहते हुए कि एक विदेशी शिष्ट-मंडल आने वाला है, कि हम ठीक से सारे काग़ज़ पढ़ भी न पाये…उन्हीं काग़ज़ों में कुछ ऐसे काग़ज़ भी थे जिनसे बाद में हमारी नकेल कुलपति के हाथ में आ गयी. उन काग़ज़ों के अनुसार हमारा विश्वविद्यालय छोड़ना अनिवार्य हो गया, वे यह सिद्ध करते थे कि हमने जाली काग़ज़ों के आधार पर जेएनयू में एम. फिल. के लिए आवेदन किया था.

    इस तरह के कई दलदल काटने के फिराक में जुलुमिया पुलिसिया से लगातार लुकाछिपी खेलते, दाने-दाने को मोहताज, हम जंगलों में भटकते और सपने देखते, गाने गाते, मन गिरने लगता तो नाटक भी खेलते, कभी कोई खाना दे देता तो हंसकर खा लेते!

    मान्यमा मैडम की हत्या के आरोप में आशिष सर का जेल जाना आन्दोलन के आर्थिक अवलम्बों पर एक अप्रत्याशित कुठाराघात था. हमारी और कोई फंडिंग एजेन्सी तो थी नहीं- शेक्सपियर, ब्रेष्ट, कालिदास, भिखारी ठाकुर और उन लोकवृत्तों के सिवा जिनका अक्षय कोष हमें कभी विपन्न होने ही नहीं देता था.

    एक बार कुलपति ने राजीव को बुलाकर चुटकी ली-
    “अब तो बच्चू, तुम गये! जेएनयू, में पढ़ने का ख़्वाब तो गया चूल्हेभाड़ में। …एक-एक को अलग छिटका दूंगा. अकेला चना कभी भाड़ नहीं फोड़ता.”
    “लेकिन उड़कर वह भड़भूजे की आंख ज़रूर फोड़ सकता है”, राजीव आहिस्ते से बोला और इस तरह उठकर खड़ा हुआ कि कुलपति कचकचाकर रह गये.

    Tags: Hindi Literature

    विज्ञापन

    विज्ञापन

    टॉप स्टोरीज

    अधिक पढ़ें

    अगली ख़बर