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Book Review: प्रतिपक्ष का असामान्य प्रकटन 'जिसका अंत नहीं'

'जिसका अन्त नहीं' राजेन्द्र दानी का नवीनतम उपन्यास है जो मध्यवर्गीय समाज और व्यवस्था के भीतरी तन्त्र की गहन पड़ताल करता है.

'जिसका अन्त नहीं' राजेन्द्र दानी का नवीनतम उपन्यास है जो मध्यवर्गीय समाज और व्यवस्था के भीतरी तन्त्र की गहन पड़ताल करता है.

राजेन्द्र दानी की कथा-यात्रा सुदीर्घ और व्यापक है और एक लम्बे कालखण्ड के परिवर्तन का दस्तावेज़ भी है. वे प्रगतिशील चेतना और मानवीय मूल्यों से आधुनिकता, सामाजिक और आन्तरिक बदलाव को संवेदना, कौशल और सरलता से अपनी लेखनी में दर्ज करने वाले कथाकार हैं.

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-श्रद्धा श्रीवास्तव

अक्सर सुनाया जाने वाला प्रसंग है. पंडित नेहरु और रामधारी सिंह दिनकर एक मंच पर थे. मंच से जाते हुए पंडित नेहरु का पाँव लड़खडाया तो दिनकर मुस्कुराते और उन्हें सँभालते हुए हंसकर बोले, “राजनीति जब भी लड़खडाएगी उसे साहित्य ही संभालेगा. आज मैंने इसे साबित कर दिया है.” उन्होंने इसे माइक पर कहा और सबने इसे सुना भी.

कथा सम्राट प्रेमचंद का प्रसिद्ध वाक्य है, “साहित्य, राजनीति के पीछे नहीं, उसके आगे-आगे मशाल लेकर चलती हुई सच्चाई है.”

राजेंद्र दानी का नया उपन्यास “जिसका अंत नहीं” समकालीन राजनीति की पृष्ठभूमि पर लिखा एक ऐसा उपन्यास है, जहाँ यथार्थ अपने बोरडम के साथ नहीं बल्कि कलात्मक अंदाज में आता है. जहाँ जीवन की जटिलता के रेशे खुलते हैं, क्योंकि वहाँ यथार्थ का आग्रह अपना हस्तक्षेप नहीं कर पाता. राजेंद्र दानी के पास जीवन को देखने की एक दृष्टि है, और सधा शिल्प भी, इसलिए वो ‘नए व्यक्ति’ के अंतरतम को उघाड़ पाए हैं.

नया व्यक्ति हमारे आज के दौर का है. भौतिकता के भूचाल के दौर का, गला काट हत्यारी प्रतियोगिता के दौर का, आडम्बर के आवरण के महिमा मंडन के दौर का, उस दौर का जिसमें अखबार में छपी लोकायुक्त छापे की खबर को एक चाय की चुस्की के साथ पढ़कर नज़रंदाज कर दिया जाता है.

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इसी गिरावटी दौर में बुरी राजनीति का शिकार है उपन्यास का नायक विपतलाल स्वर्णकार. स्वर्णकार बिजली विभाग में उच्च अधिकारी है. लेखक ने बिजली कंपनी को चुना और वे एक जगह लिखते भी हैं, “हमारी सामाजिकता में बिजली का इतना अहम रोल था कि छोटा बच्चा भी समझता था.”

विपतलाल पचास साल का है. विनम्र और उदार मुस्कान वाला है, सांवला चौड़ी नाक वाला, घनी मूंछों वाला, खड़े कान वाला है. उसने अपनी विनम्रता, सदायशता, संवेदनशीलता, ईमानदारी से एक आदर्श अधिकारी की छवि बनायी. बाद में लिप्सा, लालच, महत्वाकांक्षा के कारण बदल जाता है, लोगों के डरे चेहरे देख कर उसे बेइन्तहाँ ख़ुशी मिलती और अंत में तो तबाह ही हो जाता है, इतना अकेला हो जाता है कि परिवार भी साथ नहीं देता.

उसकी पत्नी का जो चरित्र है प्रायः वही चरित्र एक अधिकारी की पत्नी का होता है. अर्चना (स्वर्णकार की पत्नी ) के बारे में वो लिखते हैं – “पत्नी रोजमर्रा के कामों में सहज हो कर लग गयी थी वैसे भी पति की नौकरी से सम्बंधित बातों में दिलचस्पी नहीं के बराबर थी.”

पत्नियों की तटस्थता और वास्तविकता को नज़रंदाज़ करने की प्रवृति कम दोषपूर्ण नहीं है. अपने इस चरित्र को जिस सहानुभूति के साथ दानी ने गढ़ा है वह अभूतपूर्व है. इस चरित्र के माध्यम से जीवन की अकथनीय वेदना को नितांत मौलिक रूप प्रकट किया है. वे आरम्भ में ही पाठक से स्पष्ट रूप में कह देते हैं “गिरावटी दौर में ही स्वर्णकार के रसायन में भी परिवर्तन हो रहा है जो कि उसे खुद ही नहीं पता था. उसको को भी नहीं मालूम वह किस रास्ते जा रहा है?

हम समझ नहीं पाते साधारण आदमी कैसे असाधारण अपराध कर जाता है. वह लेबर और वर्क पर उलझ गया है. हेनाअरेंट जिसे दुष्टता का साधारणीकरण कहते हैं, पद, प्रतिष्ठा और पावर इसी के पीछे लोग भाग रहे है. ऐसा समय शासक के लिए बहुत मुफ़ीद समय होता है. जब आप पब्लिक स्पेस को छोड़ देते हो अपनी जॉब अपने प्रमोशन के बारे में सोचते हैं. अपने कार्यों के प्रभाव के बारे में नहीं सोचते कि इससे समाज में क्या असर पड़ेगा.

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प्रान्त का मुखिया, चितरंजन को वास्तव में सब मालूम है. वह असली विलेन है जो सबको भिड़ा कर शीर्ष पर बैठा है, जहाँ से उसकी पैनी नज़र धन उगाही के साधन तलाशती है. समता, विकास और सामाजिक एकीकरण का मज़ाक उडाता हुआ.

गांधीजी के समय तक जिस लक्ष्य की उच्चता और साधन की शुचिता को राजनीति में रेखांकित किया है, उसके विपरीत कायदे की राजनीति की जगह फायदे की राजनीति ने ले ली है. राजनीति से तटस्थ नहीं रहा जा सकता. यह उपन्यास कहता है राजनीति क्यों जरूरी है?

राजनीति वास्तव में समाज की समस्याओं के समाधान की कुंजी है. अरस्तू ने इसे हर समाज के लिए अपरिहार्य बताया किन्तु इस अपरिहार्यता का निजीकरण हो चुका है. सी. एम. चितरंजन सिंह को राज्य का चुनाव फेस करना है और पैसे की उगाही के लिए बिजली कंपनी के उच्चाधिकारी को शिकार बनाता है.

राजेंद्र दानी कहते हैं -‘गिद्ध बहुत तेजी से अपने शिकार के लिए उतर रहा था.” समकालीन राजनीति में जाति का मुद्दा आज भी मिटा नहीं है बल्कि जाति और अधिक दिखने वाली हो गई है जातिगत विभाजन को लेकर पूर्वाग्रह ज्यों का त्यों है जैसे – बिजली कंपनी के उच्चाधिकारी का नाम विपतलाल स्वर्णकार है?

“चितरंजन कहता है स्वर्णकार यानी सुनार न? ये सुनार-बुनार कब से इतने बड़े पद पर पहुँचने लगे. वही स्वर्णकार अपने जूनियर के बारे में आशंका प्रकट करता है- “कोटे का आदमी है इसलिए संभव है कि वह आगे बढ़ जाए.”

हमारे यहाँ कुछ लोग ईमानदारी से खूब अच्छा काम करते है जिन्हें “पॉकेट ऑफ़ एक्सीलेंस” कहते हैं पर सरकार इन लोगों को कोई बढ़ावा नहीं देती. सरकार सत्ता अपने फायदे के लिए जोड़-तोड़ करने की कोशिश करती है. चुनाव आता है ट्रांसफर कर दिया जाता है. मंत्री चाहते हैं हमारे इलाके में अमुक जिलाधिकारी होना चाहिए. ठीक यही माहौल इस उपन्यास में वर्णित है.

शोषण का एक “लैडर” बना हुआ है. उपन्यास का हर पात्र व्यवस्था में अपने को बचाए रखना चाहता है. इसे अद्भुत बताते है राजेंद्र दानी- कि भ्रष्टाचार की चैन नीचे से होकर ऊपर तक सम्बद्ध रहती थी और शायद इसीलिए सारे लोग सुरक्षित रह पाते थे. सी. एम. चितरंजन सिंह, उसका व्यक्तिगत सचिव बक्शी, स्वर्णकार बिजली कंपनी का अधिकारी, चीफ इंजीनियर्स जिनकी पर्चेसिंग कैपेसिटी स्वर्णकार बढ़ा देता है.

उइके जो स्वर्णकार की पैसा कमाने की गति से परेशान है कि कैसे सेक्रेटरी की कमाई करोड़ों तक पहुँच गयी? सीतारमण का कहना है “अरे उइके साहब इसमें कौन सी बड़ी बात है, हर सेक्रेटरी अपने कार्यकाल में कमाता है.” वह अपने फायदे के लिए सीतारमण को अपने साथ करता है. सीतारमण भी एक मौकापरस्त यूनियन का नेता है जिसका कंपनी में अच्छा- खासा दबदबा है. उपस्थिति रजिस्टर में हस्ताक्षर करना और ऑफिस का काम करने की बजाय अपनी नेतागिरी चमकाता फिरता है. यूनियन वास्तव में श्रमिक के हक़ के लिए होती है पर यहाँ यूनियन के नेता का चरित्र भी विश्वसनीय नहीं रहा. सीतारमण बिजली कंपनी के यूनियन नेता से विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रत्याशी बनने का आकांक्षी है. दोनों बाबू मांगीलाल घसिया और भीकम कोरी उइके के हथियार थे. दोनों बाबू मरता क्या न करता की तर्ज़ पर उइके से शोषित होते रहते थे. मांगीलाल दुनिया के तमाम गंद-फंद जानने वाला व्यक्ति है. वकील विक्रम सिंह भ्रष्ट है. लोकायुक्त भी किसी के इशारे पर चलता है. अर्दली हो, ड्राइवर हो, सब के अंदर लालसा का ज्वार उबाल ले रहा है. हर व्यक्ति अभिनय कर रहा है ईमानदारी का और मज़ेदार बात, हर को पता है वह कितना बेईमान है.

यह कृति ध्यान केन्द्रित करने की अपेक्षा रखती है जहाँ मनुष्य देह में असामान्य का प्रकटन होता है और वह पूँछ की शक्ल में नायक को स्थितियों के अतिक्रमण की ओर जाने को ललचाती है. मसलन “उसके पीछे निकल आई पूँछ को प्रान्त के मुखिया के द्वारा देख लेने की दिलचस्प कहानी है.” पूँछ एक ऐसा रूपक है जो बहुत सारे अकथनीय को एक साधारणीकरण के प्रतिपक्ष में रचनात्मक सत्याग्रह बनाता है. आत्ममुग्धता, आत्मकेंद्रित महत्वाकांक्षा जतलाने के लिए हर शीशे में अपना प्रतिबिम्ब देखना और दिखना घातक है तो पीछे की तकलीफदेह गडन भी. स्वर्णकार की तरह उइके को भी अपनी कार में विंडस्क्रीन, रियर व्यूह मिरर अपना ही चेहरा दिखने लगा था. इस प्रकार का रूपक और फंतासी का प्रयोग नियति और विवशता के सम्मुख प्रतिकार का मानवीय रूप है. मनुष्य की हताशा या पराजय या थकान के पलों में उपन्यास अपने को इस तरह आग्रह मुक्त कर देता है कि प्रत्याशित की जकड टूटने लगती है. राजेंद्र दानी अपने इस उपन्यास में जस का तस ब्यौरा इन्द्राज नहीं करते बल्कि अपनी ओर से उपन्यास को अपना रूप चुनने देते हैं.

पुस्तकः जिसका अंत नहीं (उपन्यास ).
लेखकः राजेन्द्र दानी.
प्रकाशकः वाणी प्रकाशन.
मूल्यः 299 रुपए.

Tags: Books, Hindi Literature, Literature

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