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डॉ. मनमोहन सिंह से एक अर्थशास्त्री ने कहा- 'तुम मूर्खता कर रहे हो', पढ़ें और भी रोचक किस्से

पत्रकार रशीद किदवई ने अपनी किताब 'भारत के प्रधानमंत्री : देश, दशा और दिशा' में मनमोहन सिंह के कार्यकाल से जुड़ी कई रोचक घटनाओं को उजागर किया है.

पत्रकार रशीद किदवई ने अपनी किताब 'भारत के प्रधानमंत्री : देश, दशा और दिशा' में मनमोहन सिंह के कार्यकाल से जुड़ी कई रोचक घटनाओं को उजागर किया है.

परमाणु करार मामले में वामपन्थी पार्टियों के साथ मनमोहन का एक अलग रूप देखने को मिला. इसमें कांग्रेस ने गठबन्धन धर्म नहीं निभाया. इस करार को लेकर वामपन्थी दलों के साथ उसका व्यवहार ठीक नहीं था.

  • News18Hindi
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    Manmohan Singh Birthday: डॉ. मनमोहन सिंह ना तो कभी लोकसभा का चुनाव जीते और ना ही किसी राजनीतिक घराने से उनका नाता था. बेहद साधारण घर में पले-बढ़े मनमोहन सिंह भारत के 13वें प्रधानमंत्री बने और वह भी लगातार दो बार. मनमोहन सिंह ने लगातार 10 साल भारत पर राज किया. इसलिए डॉ. मनमोहन सिंह को ‘एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ (The accidental prime minister) भी कहा जाता है.

    लोकसभा चुनाव 2009 में मिली जीत के बाद वे जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) के बाद भारत के पहले ऐसे प्रधानमन्त्री बने, जिनको पांच वर्षों का कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला था. राजनीतिक जीवन की शुरूआत 1991 से हुई. जब पीवी नरसिंह राव (P. V. Narasimha Rao) के प्रधानमंत्रित्व काल में वे देश के वित्त मंत्री (Finance Minister) बने. मनमोहन सिंह देश के पहले सिख प्रधानमंत्री थे.

    डॉ. मनमोहन सिंह (Dr Manmohan Singh) का आज जन्मदिन है. एक सफल अर्थशास्त्री के तौर पर उनका कार्यकाल हमेशा याद किया जाता है, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें उतनी शोहरत नहीं मिली.

    पत्रकार रशीद किदवई (Rasheed Kidwai) ने अपनी किताब ‘भारत के प्रधानमंत्री : देश, दशा और दिशा’ (Bharat Ke Pradhanmantri) में मनमोहन सिंह के कार्यकाल से जुड़ी कई रोचक घटनाओं को उजागर किया है. आप भी पढ़ें डॉ. मनमोहन सिंह के जीवन से जुड़े कुछ रोचक किस्से-

    भारत के प्रधानमंत्री : देश, दशा और दिशा (Bharat Ke Pradhanmantri)
    अलबत्ता यह जरूर है कि इस मिली-जुली सरकार को भीतर व बाहर अनेक चुनौतियों से जूझना पड़ा तथा इसने एक राजनीतिक शासन-तंत्र के बजाय अफसरशाही सरकार के रूप में अधिक काम किया. इसके महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों के कामकाज लचर थे. मंत्रियों के आपसी मतभेद बार-बार सामने आते रहे. दबंग मंत्री अपने कनिष्ठों को नजरअन्दाज करते थे और लोकतंत्र के लिए अनिवार्य जवाबदेही का नितान्त अभाव नजर आने लगा था.

    वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी व पी. चिदंबरम जैसे वरिष्ठ नेताओं पर प्रधानमंत्री का किसी भी तरह का नियंत्रण दिखाई नहीं पड़ता था. सो उन जैसे नेताओं की आपसी खींचतान ने संप्रग को बड़ा नुकसान पहुँचाया. यह बात बहुत सही लगती है कि अपने 10 वर्षीय कार्यकाल में मनमोहन ‘लम्बी दूरी तक दौड़ने वाले मैराथन धावक जरूर रहे, लेकिन अकेले रहे.’

    Rasheed Kidwai

    परमाणु करार मामले में वामपन्थी पार्टियों के साथ मनमोहन का एक अलग रूप देखने को मिला. इसमें कांग्रेस ने गठबन्धन धर्म नहीं निभाया. इस करार को लेकर वामपन्थी दलों के साथ उसका व्यवहार ठीक नहीं था.

    अगस्त, 2007 से जुलाई, 2008 तक मनमोहन व सोनिया ने मिलकर अपने विरोधियों को शान्त करने के लिए योजनाबद्ध ढंग से भद्दा व निर्मम व्यवहार किया. परमाणु करार को लेकर मनमोहन ने प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार ‘द टेलिग्राफ’ को इंटरव्यू देते हुए कहा, “मैंने उनसे (वामपन्थी पार्टियों से) कह दिया कि इस करार पर पुनर्विचार करना सम्भव नहीं है. यह एक सम्मानजनक करार है, कैबिनेट ने इसे अनुमोदित किया है, हम इस पर पीछे नहीं हट सकते. मैंने उनसे कहा कि जो कुछ उन्हें करना है, वे कर लें. अगर वे चाहें तो समर्थन वापस ले सकते हैं, बात तो यही है…”

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    मनमोहन बाहरी जगत के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के सम्मुख गौण व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत होते रहे, लेकिन वास्तव में सोनिया उनका बहुत आदर करती हैं. उन्होंने सदैव मनमोहन की बुद्धिमत्ता व अनुभव को मान दिया तथा कभी-कभार ही उनके प्रशासनिक कामकाज में दखल दिया. परमाणु करार पर उन्होंने मनमोहन का पूरी तरह साथ दिया. इस बाबत विश्वसनीय मित्र यानी वामपन्थी पार्टियों के तर्कों व मांगों को उन्होंने पूरी तरह दरकिनार किया और मनमोहन के निर्णय का दृढ़ता से समर्थन किया. इन दोनों हस्तियों के ऐसे आपसी विश्वास व तालमेल से ही संप्रग सरकार 2004 से 2014 तक चल पाई. मनमोहन भी सोनिया के मुख्य एजेंडा—साझा प्रयासों से खुली अर्थव्यवस्था—को पूरा करने में तन्मयता से लगे रहते थे. इसके लिए कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को खुली छूट भी दे रखी थी.

    बहरहाल मनमोहन के दूसरे प्रधानमंत्रित्व काल में महंगाई में बढ़ोत्तरी एक अहम मसला बन गई. इसके बावजूद पता नहीं किन कारणों से मनमोहन ने इस पर ज्यादा बात करना पसन्द नहीं किया. अपने कुल 1379 भाषणों में से मात्र 88 भाषणों में उन्होंने महंगाई पर बात की. यह कुल भाषणों का बहुत कम यानी मात्र 6.3 प्रतिशत बनता है. सीमा पार से आतंकवाद तथा राष्ट्र की सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों को भी उन्होंने मानो नजरअन्दाज किया. आतंकवाद का सामना करने की बातें उन्होंने अपने 307 भाषणों में कीं.

    मनमोहन काम करते रहे, लेकिन मौन रहकर, इससे वे आमजन में आत्मविश्वास का भाव पैदा नहीं कर सके. राष्ट्र की सुरक्षा जैसे मामले में उनकी उदासीनता इससे भी जाहिर होती है कि सीमा नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान द्वारा एक भारतीय सैनिक का सिर काट लेने जैसी लोमहर्षक घटना पर भी वे चार दिन बाद बोले.

    सितम्बर, 1932 में गेह (अब पाकिस्तान में) नामक छोटे-से कस्बे में जन्मे मनमोहन सिंह को देश की आजादी के साथ ही हुए बंटवारे के चलते 1947 में भारत आना पड़ा था. अपने जीवन के प्रारम्भिक 12 साल उन्होंने एक ऐसे गांव में गुजारे जहां न बिजली थी, न नल, न स्कूल, न अस्पताल. गांव से दूर स्थित एक उर्दू मीडियम स्कूल में उन्होंने पढ़ाई की, जिसके लिए उन्हें रोजाना मीलों पैदल चलना पड़ता था. रात को कैरोसिन लैंप की रौशनी में वे पढ़ाई करते.

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    आंखों की रौशनी कम होने के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया था कि लैंप के मद्धिम प्रकाश में पढ़ने से उनकी आंखें कमजोर हो गईं. उर्दू उनकी पहली जुबान है. जब भी उन्हें हिन्दी में भाषण देना होता है तो वह उर्दू के ही बड़े अक्षरों में लिखा होता है.

    मनमोहन अपनी शिक्षा पूरी कर प्रख्यात अर्थशास्त्री रॉल प्रेबिश के अधीन संयुक्त राष्ट्र संघ में काम कर रहे थे कि उन्हें दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में लेक्चररशिप का ऑफर मिला. सिंह ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तथा 1969 में भारत लौट आए. इस पर डॉ. प्रेबिश को स्वाभाविक रूप से आश्चर्य हुआ कि मनमोहन जैसा विद्वान अर्थशास्त्री संयुक्त राष्ट्र की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर आखिर भारत क्यों लौट रहा है. “तुम मूर्खता कर रहे हो,” उन्होंने मनमोहन से कहा, मगर साथ ही यह भी जोड़ा कि “मूर्खता करना भी कभी-कभी बुद्धिमानी होती है!”

    मनमोहन में किसी भी प्रकार से भ्रष्ट न होने की विलक्षण क्षमता है, मगर दबाव के आगे वे झुक जरूर जाते हैं.

    पूर्व आई.ए.एस. व एशियन डेवलपमेंट बैंक (ए.डी.बी.) के डाइरेक्टर प्रतीप के. लाहिरी की आत्मकथा ‘ए टाइड इन द अफेयर्स ऑफ मेन : ए पब्लिक सर्वेंट रिमेंबर्स’ में मनमोहन से जुड़ी कई बातों का जिक्र मिलता है. लाहिरी के मुताबिक भारतीय इतिहास में मनमोहन सिंह उन कार्यों के लिए अधिक याद किए जाएंगे जो उन्होंने प्रधानमंत्री (2004-2014) के बजाय वित्तमंत्री (1991-96) के रूप में किए. अपनी पुस्तक में लाहिरी ने ऐसी कई घटनाओं का उल्लेख किया है, जब मनमोहन ने दबाव के आगे घुटने टेक दिए.

    इस उच्च स्तरीय नौकरशाह को मनमोहन सिंह के साथ पहली बार बतौर राजस्व सचिव काम करने का मौका मिला. फिर लाहिरी ए.डी.बी. के निदेशक बन गए, जबकि मनमोहन ए.डी.बी. में बोर्ड ऑफ द गवर्नर्स के गवर्नर थे. लाहिरी के मुताबिक मनमोहन अत्यन्त सादगीपसन्द हैं.

    “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बतौर प्रधानमंत्री उन्हें ऐसे आरोपों का सामना करना पड़ा कि वे ऐसी सरकार के प्रधान हैं जो घोटालों से घिरी है. सम्भवतः यह इस वजह से था कि अत्यन्त शरीफ व्यक्ति होने के कारण मनमोहन में उस दृढ़ता का अभाव था जो उनकी सरकार में शामिल चन्द उद्दंड व पथभ्रष्ट मंत्रियों को काबू में करने के लिए जरूरी थी.”

    लाहिरी के मुताबिक मनमोहन एक बहुत अच्छे वित्तमंत्री तो साबित हुए लेकिन अपेक्षाकृत एक अच्छे प्रधानमंत्री वे नहीं बन पाए.

    “कहीं न कहीं यह आश्चर्यजनक ही है कि अर्थशास्त्र में मनमोहन सिंह को विशेषज्ञता हासिल थी, तथापि संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल के पतन का कारण देश की बिगड़ी अर्थव्यवस्था बनी. कहा गया था कि मनमोहन, पी. चिदंबरम व मोंटेक सिंह अहलूवालिया की त्रयी के रूप में सामने आई ड्रीम टीम भारत को खुशहाली की तरफ ले जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हो सका. सन् 2014 में संप्रग की हार के कारणों में एक महत्त्वपूर्ण कारण सरकार की आर्थिक मोर्चे पर नाकामी रही, जिससे वृद्धि दर बहुत गिर गई थी.”

    पुस्तक – भारत के प्रधानमंत्री: देश, दशा, दिशा
    लेखक – रशीद किदवई
    प्रकाशक – सार्थक, राजकमल प्रकाशन उपक्रम
    भाषा ‏- हिंदी
    मूल्य – 212 रुपये

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