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वरिष्ठ लेखिका मृणाल पाण्डे की कहानी- 'नकाबपोश नकटापंथ की उत्थान-पतन कथा'

वरिष्ठ लेखिका मृणाल पाण्डे की कहानी- 'नकाबपोश नकटापंथ की उत्थान-पतन कथा'

मृणाल पाण्डे की किताब ‘माया ने घुमायो’ उन कहानियों की समसामयिक प्रस्तुति है जो हमें वाचिक परंपरा से मिली हैं.

मृणाल पाण्डे की किताब ‘माया ने घुमायो’ उन कहानियों की समसामयिक प्रस्तुति है जो हमें वाचिक परंपरा से मिली हैं.

दुनिया की सबसे पुरानी कहानियां औरतों ने ही अपने-अपने कबीले की अलगी पीढ़ी तक अपना इतिहास पहुंचाने के लिए ही गढ़ी होंगी. हर पीढ़ी अपनी बारी आने पर उन कथाओं को अपने समय से जोड़ती हुई एक नई फिरकनी देती रहती है.

    Hindi Sahitya News: हाल ही में राधाकृष्ण प्रकाशन (Radhakrishna Prakashan) से हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका और वरिष्ठ पत्रकार मृणाल पाण्डे (Mrinal Pande ) का कहानी संग्रह ‘माया ने घुमायो‘ (Maya Ne Ghumayo) प्रकाशित हुआ है. इन संग्रह के कवर पर लिखा- ‘बच्चों को न सुनाने लायक बाल कथाएं’ बरबस ही पाठक का ध्यान खींचता है. ‘बच्चों को न सुनाने लायक बाल कथाएं’ का मतलब खोजने पर पुस्तक की प्रस्तावना में मिला.

    यहां लेखिका लिखती हैं- अपनी पीढ़ी के लगभग हर बच्चे की तरह मैंने भी वाचिक परंपरा के बीच ही होश संभाला. जिस दुनिया में मेरा जन्म हुआ, वहां तरह-तरह की किंवदंतियों से उपजी कथाओं के बीजक बिन्दु और आयाम सब परिवारों में कही-सुनी जानेवाली बोधकथाओं और लोककथाओं के पौधघर में बना करते थे. पीढ़ी दर पीढ़ी कई-कई वाचकों से सुनीं बालकथाओं-लोककथाओं का एक अक्षय कोश मुझको मातृकुल से विरासत में मिला.

    यहां मृणाल पाण्डे लिखती हैं- दुनिया की सबसे पुरानी कहानियां औरतों ने ही अपने-अपने कबीले की अलगी पीढ़ी तक अपना इतिहास पहुंचाने के लिए ही गढ़ी होंगी. हर पीढ़ी अपनी बारी आने पर उन कथाओं को अपने समय से जोड़ती हुई एक नई फिरकनी देती रहती है. हर देश की लोककथाएं सुन लीजिए कुछ बातें सनातन मिलेंगी- महामारियों, अकाल, बाढ़ की विभीषिका से जुझना, जर-जोरू या जमीन पर लड़ मरने को बार-बार जूझते लोग और बच्चों की सार संभाल को दाना-पानी लिये सुख सेज या युद्ध के मैदान से मुंह फेरकर वापिस आने की यादें भी.

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    अच्छे कथाकार अपने समय का ताना-बाना उनकी बुनावट में नई तरह से डालकर समय-काल का फासला निरर्थक बना देते हैं.

    सामान्य बुद्धि का कोई बच्चा जब इन तमाम ब्योरों से ठसाठस भरी लोककथाओं को सुनता है तो वे उसे बड़ों की जटिल दुनिया में प्रवेश के लिए बहुत सहज-सरल तरीके से तैयार करती हैं.

    लेखिका कहती हैं- इस संकलन में मैंने यही किया है कि अपनी तरह से बड़ों और बच्चों की दुनिया के बीच हमेशा लापरवाही से उढ़काकर रखा गया दरवाजा तनिक चौड़ा कर दिया है. अब इससे ये कहानियां बच्चों को न सुनाने योग्य बन जाती हैं क्या?

    तो पाठक खुद ही फैसला कर लें कि कहानी किस लायक हैं. प्रस्तुत है माया ने घुमायो कहानी संग्रह की एक कहानी- ‘नकाबपोश नकटापंथ की उत्थान-पतन कथा

    बहुत दिन हुए एक शहर में एक धूर्त ठग रहता था. भेस बदलकर सीधे-सादे लोगों को मीठी बातों से फुसलाकर उनसे माल-मत्ता ऐंठने में उसका जोड़ न था. एक बार गलती से उसने उपवन में घूमने आई एक युवती को सोने का कीमती हार पहने देखा और एक साधु बनकर उसके पीछे लग गया. कुछ देर बाद उसने एक झाड़ी से अचानक निकलकर युवती से कहा कि वह एक ऐसी तांत्रिक तरकीब जानता है जिससे वह उसके हार का वजन और चमक दुगुनी कर देगा. भोली कन्या ने खुशी-खुशी हार उसे पकड़ा दिया.
    ठग को पता न था कि कन्या दरअसल राज्य के कोतवाल की बेटी थी, और जब कभी वह बाहर जाती तो कोतवाली के दो लोग सादा कपड़ों में हमेशा उसके साथ रहते थे. इसलिए ठग जब अकेले में मन्तर पढ़ने के बहाने उसका हार लेकर जब चम्पत होने की फिराक में था, तो उसे कोतवाल के आदमियों ने धर दबोचा. कोतवाली ले जाकर जब उसकी तलाशी ली गई तो उसके पास से चोरी का और भी बहुत सारा माल बरामद हुआ और यह राज खुला कि वह तो शहर का मशहूर इनामी बदमाश था. तुरत उस पर अदालत में मुकदमा चला. जब उसका सारा कच्चा चिट्ठा खुला तो प्रधान न्यायाधीश ने यह सजा सुनाई कि ऐसे ठग की नाक काटकर उसे जिला बदर कर दिया जाए.

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    नाक कटने के बाद ठग का धन्धा तो चौपट हुआ ही, राह चलते लोग उसे आते-जाते नक्कू कहकर चिढ़ाने भी लगे. तंग आकर आधे मुंह पर मास्क पहने हुए वह दूर के शहर में जा बसा.

    नए शहर में आकर उसने पाया कि उस शहर के लोग बड़े धार्मिक किसम के थे और मन्दिर या धार्मिक स्थल ही नहीं, राजकाज से लेकर समाज तक में साधु-सन्तों की ही यहां चलती थी. ठग की नाक भले कट गई हो, दिमाग तो तब भी शातिर था. उसने लम्बी दाढ़ी उगा ली, फिर अपना एक साधु का बाना निकाला और कमंडल में पानी भर के शहर की सबसे चलती सड़क पर साधु बनकर कुछ अंड-बंड किसम का जाप करने लगा.

    आसपास से गुजरते लोग कुछ समय इस नए साधु को अनदेखा कर गुजरते रहे, फिर किसी ने पूछ लिया, “बाबाजी आपको पहले तो नहीं देखा?”

    नकटे बाबा ने बिना अपना मास्क हटाए कहा, “हंम तौं बेंटाँ, रमतें फकींर ठंहरें. दींन-दुनिंयाँ से हमकों कौंनो वांस्तां नहीं. बंस इस नंगरीं का मांहौंल भा गयाँ सों इहैं टिक गएँ. तुमकूँ भंलां आंदमीं जानां सों बतांय दिया, हंम तौं मनुंखन से नाँय, सींधें देंवतांओं सें हीं बतिंयाँते हैं.”

    फिर अचानक ठग ने ऊपर की ओर देखकर हाथ जोड़े जैसे कई पुराने दोस्तों के दर्शन कर रहा हो. देखनहार भौचक कि किससे बात करता है बाबा? पर बाबा चालू रहे :

    “अंरे एँक सांथ त्रिंदेंव? महाज्ञानी ब्रह्मा बिरंचि, विंष्णु लला औंर शिंव शंभों भीं? अहोंभांग्य मेंरें! बंडें दिन बांद याँद किंया, पधारों म्हारें देंस! क्याँ कहाँ? विचरण पंर निंकलें हों, समंयं कंम हैं?

    “न-न कुँछ न सुनूंगां मैं! इतनीं पुरानीं ठहरीं हमाईं-तुम्हाईं मिताईं, अअंपजूँ लोगन कों हमारीं दोस्तीं का वास्तां, बस कुछ देंर कों तौं पगधूंलिं दें दों.”

    फिर फुर्ती से उठकर नकटा ठग ऐसे हाव-भाव दिखाने लगा जैसे कि तीनों देवताओं के लिए आसपास की जमीन साफ-सूफ करके आसनादि बिछा रहा हो. उसने हाथ जोड़कर अदृश्य महानुभावों को बिठाने का अनुभव किया, आचमन को थोड़ा जल भी अपने कमंडल से तीन ठौर बहा दिया.

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    नाटक जमने लगा तो शहर के फुर्सती और लोग भी आन जुटे. मन्दिर को निकलीं कुछ माताएं-बहनें भी निहारने को टीले पर चढ़ गईं. कानी आंख से चहुंओर ऐसा मजमा लगते देखकर नकटा ठग खुश हुआ और अदृश्य देवताओं से कभी हंसता, कभी चिन्ता या अचम्भा जताते हुए उनका कुशल-मंगल लेने का अभिनय करने लगा जैसे सचमुच बड़ा पुराना पारिवारिक दोस्त हो.

    “हहो बिरंचि बांबां ये सारीं लींलां आंपैं की रचीं हैं. वाह-वाह कैंसीं सुरम्यं आपकीं लींलां. कैंसा आपका ज्ञान-ध्यान! और वाहन हँस, उधर पुष्कर क्षेत्र में ब्रह्माणी जीं ठींक-ठांक?

    “और विष्णु लला, आंपकें क्षींर सांगर में संब कुंशल मंगल तों हैं? क्याँ बतांऊँ इंधर आ हीं न पाँयाँ। वैंसे लक्ष्मीं जी, ऐरावत जू, शेषनांग महाराज आदि सभीं स्वस्थ-प्रंसन्न होंगे?

    “और हर-हर मंहादेंव, शिंव शंभो आंपकें कैलास क्षेत्र में भीं हंमारीं माँ पांरबतीं, गनेस ललां, उनका नंटखंट चूंहा, नन्दी, सर्पराज आदि सब भलें होंगे? कुँवर कांर्तिकेय का पाला मयूँर संदा कीं भाँति अंपनें सुन्दर नांच सें आंपकां मनोरंजन करतां होंगां? ओहो जटा में बिरांजिंत गंगां माँ! आपकों भीं मैं शत-शत नमन करतां हूँ!

    “अहा आंप सब इंस अंकिंचनं के पांस स्वयं पंधांरें तो बस जीं जुंड़ा गयाँ. अब सेंवक कां स्वांगतोंपचांर सम्पन्न हुँआँ, अब आंप सभी प्रसन्नतांपूंर्वक स्वंस्थानं कों प्रस्थानं करें!”

    अगले दिन फिर नकटे ठग ने वही शो रिपीट किया. इस बार राधा-कृष्ण, महाकाल-महाकाली और सीता-राम की जोड़ियों को देखने का नाटक करते हुए तरह-तरह से उनका स्वागत करके अदृश्य सामग्री से उनका षोडशोपचार पूजन किया. हल्के-फुल्के मजाक भी किए जिसने महिलावृन्द का भरपूर मनोरंजन किया!

    धीमे-धीमे राज्य में खबर फैल गई कि कोई मास्कधारी नाक से बोलनेवाला बाबा आया है. हर रोज वह सीधे तमाम देवी-देवताओं का आह्वान करके उनसे बतियाता है. हो न हो कोई पहुंचा हुआ जोगी है. अरे राजा, जोगी, अगिन, जल, इनकी रीत कोई समझ पाया है भला?

    कुछ भले लोगों ने वहां अच्छी सी एक कुटिया छवा दी, मृगछाला और कंदमूल फल-फूल वगैरा भी उधर पहुंचाने लगे कि बाबा से मिलने को आनेवाले देवगण शहर पर कृपा बनाए रखें. होते-होते नकटा ठग शहर का सबसे बड़ा बाबा बन बैठा और कुटिया पक्की करवा के उसने उसे एक भव्य मठ के रूप में बदल डाला. अब उसको चेले बनाने की सूझी. कुछ हिम्मती लोगों ने बाबा से पूछते भी रहते थे कि बाबा, क्या बात है कि जो देवता आपसे मिलने को आते हैं, उनको हम लोग नहीं देख पाते?

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    अब नकटे ठग ने प्रवचन देने शुरू किए कि देवदर्शन पाने की इच्छा हो तो मनुखों को उनकी तरह सर्वस्व त्यागी फकीर बनना होता है. स्थूल काया के नेत्रों से भगवान के दर्शन असम्भव हैं. इसलिए उनका चेला बनकर देवदर्शन विद्या सीखनी हो तो पहले अपने अहंकार से छुट्टी पानी होती है.

    इतना कहकर बाबा फिर आंखें बन्द कर अपने दैवी मित्रों से बतियाने लगते. “अहो सरस्वती माई, आज बड़े दिन में दर्शन हुए. क्या कहा? कुछ नई संगीत रचना कर रही हैं? सुनाएं तो! अहाहाहा, आपने तो कानों में रस घोल दिया!”

    फिर किसी दिन बाबा पीर-फकीरों-जोगियों से बतियाते मिलते. “अरे गुरु मछिंदर जी, गोरखनाथ बाबा, आप दोनों के आने की धमक से ही जान गया कि पंजाब के फरीदा पीर भी आते होंगे. क्या कहा आप लोग जल्दी में हैं, दिल्ली के निजामुद्दीन पीर से मिलने जाते हैं? जाइए महाराज, हमारा भी सलाम कहिएगा उनसे और उनके मुर्शिद खुसरो से भी. ‘पीर निजामी बीन बजाए खुसरो सब मिल गाओ.”

    यह सब देखते हुए रोजाना बाबा की कुटिया पर आनेवाले कुछ भक्तों के मन में बाबा का चेला बनकर दिव्य दृष्टि पाने का खयाल मचलने लगा. एक दिन बड़ी हिम्मत जुटाकर उन्होंने इच्छा जाहिर कर दी.

    “मित्रो,” बाबा बोले, “इस रंग-बिरंगी दुनिया के तमाम ऐशोआराम छोड़कर साधना की राह अपनाना बड़ा ही कठिन है. मैंने जब इस डगर पर पैर रखा तो मन में विचार आया कि इनसान को सबसे प्यारी चीज क्या है?”

    “उसकी इज्जत! और इनसान की इज्जत कहां बसती है? उसकी नाक में. तब मैंने ये साली अपनी नाक ही काटकर फेंक दी! बस मन से अहंभाव ऐसे उड़ गया जैसे कपूर. मन का आईना स्वच्छ हो उठा तो बस मुझे सभी भगवान साक्षात् दिखने लगे.”

    इतना कहकर बाबा ने एक झटके से मास्क उतारा और बोले, “यें नांक देंखतें हों? अब जो मेरे भक्त बनने का सचमुच इच्छुक है, वह नाक काटकर आए जभी मैं उसे नकटापंथ की दीक्षा दूंगा.”

    बाबा से बहुत प्रभावित उन भक्तों ने जब देखा कि सचमुच बाबा की नाक कटी हुई थी तो वे उत्तेजित होकर नारे लगाने लगे, “नकटा बाबा की जय हो!”

    अगले दिन एक बन्दा सुबह-सुबह नाक पर पट्टी बांधे हुए मठ में आन पहुंचा. उसने उस्तरे से सचमुच अपनी नाक काट ली थी. “बांबां दींक्षां दों.” वह बोला.

    बाबा उसे कुटिया के भीतर खींच ले गए और बोले, “देख बे, तूने मेरी बातों में आकर अपनी भी काट ली. अब तेरी नाक तो वापिस उगेगी नहीं. इस कुटिया में अब हम दोनों ही नकटे हैं इसलिए बेहतर हो तू हल्ला न कर. धीरज से सुन. असल बात ये है कि इस जमाने में नकटापंथी में भरपूर कमाई है. जैसे हर कोढ़ी चाहता है कि दुनिया को कोढ़ हो जाए ताकि उसे कोई कोढ़ी कहकर उसका तिरस्कार न करे. उसी तरह हम नकटापंथी भी चाहेंगे कि दुनिया नकटी बन जाए ताकि नाकवाले न बचें, कुछ बचें भी, तो अल्पसंख्यक होने की वजह से हमसे डरकर रहें.

    आज से हम दोनों मिलकर नाटक जारी रखेंगे. मठ के पास भरपूर पैसा है. इससे हम कई दूसरों को भी नकटा बनने को फुसला सकते हैं. नकटा सम्प्रदाय की ताकत बढ़ेगी तो होते-होते नकटों को इस देश में बहुमत मिल जाएगा. तब हम अल्पसंख्यक बन गए नाकवालों का उपहास करते हुए उनको दुरदुराकर नकटों का राज्य स्थापित कर देवताओं जैसा सुख भोगेंगे. क्या कहता है?”

    शिष्य को पहले तो लगा हाय री मेरी मूर्खता! पर फिर उसने सोचा कि नकटा तो अब हो ही गया हूं. गुरु का ही मारग क्यों न पकड़ूं? कुछ नहीं तो मठ के भीतर का बन्दा बनकर ऐश करूंगा. वह राजी हो गया.

    अगले दिन से गुरु ने कुटिया से और शिष्य ने मास्क लगाकर अड़ोस-पड़ोस में नकटापंथ का बाकायदा प्रचार करना शुरू कर दिया. नकटा गुरुजी के प्रवचनों का सार यही रहता कि नाकवाला होना अहंकारी, वंशवादी और आमजनविरोधी होने का लक्षण है. देश के सारे पतन की जड़ अहंकार और अहंकार की जड़ खानदानी नाक है. इसी नाक की इज्जत बनाए रखने के चक्कर में कितनी लड़ाइयां लड़ी गईं, कितने राजवंश और खानदान तबाह हो गए.

    इस नाक को काटे बिना मन मैला रहता है. और मन मैला हो तो इनसान को हरि दर्शन नहीं हो सकते.

    पुस्तक अंश: पूर्वोत्तर से जुड़ी यात्राओं का दस्तावेज है उमेश पंत का ‘दूर दुर्गम दुरुस्त’

    धीरे-धीरे शहर में नकटे बढ़ने लगे. मठ ने उनका न्यूनतम समर्थन भाव भी तय कर दिया था सो मुफत की खा-खाकर वे नकटापंथ के दबंग प्रचारक बन गए. किसी ने नक्कू कहा तो तुरत उसको पकड़कर पीट देते. हलवाई की दुकान पर कोई चाशनी में तैरती जलेबियों की गंध नाक में भरता या बागान में खुशबूदार फूल सूंघता दिखता, तो उस पर नाक का अभिमान करने की तोहमत लगाकर कुटम्मस कर देते.

    नकटापंथियों से सब नाकवाले डरने लगे तो उनको यह भरोसा हो चला कि उन पर नकटा गुरुजी की दैवी कृपा है जिसकी वजह से उनको कोई छू नहीं सकता. मठ में उड़ते गुलछर्रे देखकर घर बैठे मां-बाप की फटकार और अधपेट भोजन से उकता चुके कई बेरोजगार युवक भी नाक कटवाकर नकटापंथी बन गए. शहर अराजक उग्र बन गया. पर नकटों को नकटा कहे कौन?

    नकटापंथियों ने अब किसानों की खेती काटकर जमीन हथियाने का धन्धा भी पकड़ लिया. किसानों से वे कहते हमारी तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य लेकर या तो नकटापंथी बनो या तुम्हारी जमीन पर हम औषधीय खेती करेंगे. कई डरे किसान नकटे बन गए कई शहर छोड़कर भाग गए. खेती की आमदनी से मठ का खजाना और बढ़ गया.

    मठ में चेले बढ़े तो उनके बीच झगड़े भी बढ़ने लगे. कहते हैं न ज्यादा जोगी, तो मठ उजाड़. वही हुआ. अपनी ताकत और कमाई पर उछलते और मठ के कोष में भर रहे पैसे और सोने-चांदी पर झगड़ते भक्तों और उनके शातिर नकटा गुरु को पता न चल पाया कि नगर के कोतवाल के घर नकटे ठग के पुराने नगर के उसी कोतवाल की लड़की पुत्रवधू बनकर आ गई है जिसका हार चुराते हुए वह कभी पकड़ा गया था.

    विधना का विधान देखो, पान की दुकान देखो, गोरी का मकान देखो. कब जाने क्या हो जाए?

    एक दिन नगर कोतवाल की बीबी अपनी नई-नवेली बहू को शहर के प्रसिद्ध बाबा नकटा गुरु का सन्तानवती होने का आशीर्वाद दिलाने नकटापंथी मठ पर लाई. घूंघट के कारण नकटा ठग तो बहू को न देख सका. अलबत्ता चतुर बहू ने चरण छूते हुए उस ठग को पहचान लिया. पर समझदार थी, तिस पर कोतवाल की बेटी. मठ के भीतर कोने में चेहरा ढके हुए वह चुपचाप नकटा गुरु को अदृश्य षष्ठी माता से बोलता देखती रही.

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    “हे मैया ये सेठ घराने की बहू है. क्या कहा? मुझे थैली भर सोने की मोहरें चढ़ा दे तो इसकी कोख से साल भर में सोने जैसा कुलदीपक जनमेगा? अरे सोने की थैली-वैली से मैं फकीर आदमी क्या करूंगा? चलो नकटापंथी कोष के लिए ही सही. उससे अगली पूर्णिमा को हम षोडश मातृकाओं और चौंसठ जोगिनियों की विधिवत् पूजा के लिए सामग्री मंगवा लेंगें.

    “और तुम सब षोडश बहिनें मजा माँ? हाँ-हाँ नकटा बाबा भी खूब मस्त!”

    बाबा चढ़ावे के नारियलों की ढेरी से एक नारियल सास को थमाकर बोले, “जा बेटी, तेरा काम हो जाएगा.”

    घर जाकर जब सास बहू को नारियल का टुकड़ा देने लगी, तो उसने अपनी सास को बताया कि मांजी ये नारियल नाली में फेंक दो. ये नकटा गुरु तो बाबा- शाबा कुछ नहीं, मेरे मायके से शहर बदर किया गया बहुत जाना-माना ठग है. इसने जब मेरा हार उड़ाने की कोशिश की थी तब मेरे पिताजी के सिपाहियों ने इसे पकड़ा और उसी ठगी के दंड में इसकी नाक काट ली गई.

    सास ने ससुर से कही, ससुर ने नगर थानाध्यक्ष से उन्ने गणराज्य के नेता से. सब नकटापंथियों से तंग बैठे ही थे. पर उन पर दबिश देने का साक्षी न मिलता था. बहू ने खुद जाकर महाराज से कहा कि वह इस ठग की ठगी की चश्मदीद गवाह है और उसके बाप के पास तमाम पुराने केसों के कागजात रखे हैं.

    आदेश हो गया. रात के समय हथियारबन्द सैनिकों ने कुटिया पर दबे पैरों धावा बोला. और जैसी उम्मीद थी, नकटा गुरुजी नकटे भक्तों के साथ सेठानी के दिए पैसे से मंगवाई मदिरा और व्यंजनों का भोग लगाकर झूमते हुए गणिकाओं का नाच देखते पकड़े गए. बस फिर क्या था, राजा और नगर कोतवाल ने सारे शहर में मुनादी पिटवाकर नकटे की नकटई की असलियत का भरपूर प्रचार किया. खूब बड़ी थू-थू होने लगी.

    उधर थाने में नकटापंथियों को चार रैपट पड़े तो सारी पोल खुल गई. पर कुछ सैनिकों को चकमा देकर खुद नकटा ठग तो दोबारा भाग गया, पकड़े गए नकटापंथी चेले. जभी कहावत बनी कि,

    नकटों का काम तो बस खा-पी कर सटकें,
    नाकवालों को नसीहत, कि नकटे से ना अटकें!
    तो इस तरह नकटापंथी मठ का खात्मा हुआ,
    कहानी समझो तो भली, न समझो तो नानी सोने चली।

    पुस्तक – माया ने घुमायो
    लेखक – मृणाल पाण्डे
    प्रकाशक – राधाकृष्ण प्रकाशन
    मूल्य – 225 रुपये

    Tags: Books, Hindi Literature, Literature

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