• Home
  • »
  • News
  • »
  • literature
  • »
  • गांधीजी पर लिखी वे रचनाएं जिन्होंने उड़ा दिए अंग्रेजी हुकूमत के होश, करना पड़ा बैन

गांधीजी पर लिखी वे रचनाएं जिन्होंने उड़ा दिए अंग्रेजी हुकूमत के होश, करना पड़ा बैन

'प्रतिबंधित साहित्य में गांधी' उन रचनाओं का संग्रह है जो आज़ादी की लड़ाई में गांधीजी के सहयोग के लिए लिखी गई थीं.

'प्रतिबंधित साहित्य में गांधी' उन रचनाओं का संग्रह है जो आज़ादी की लड़ाई में गांधीजी के सहयोग के लिए लिखी गई थीं.

'ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबंधित साहित्य' पुस्तक में प्रकाशित रचनाएं देश के उन अनेक अज्ञात रचनाकारों ने लिखी हैं, जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में महात्मा गांधी को ना देखा था और ना ही सामने से सुना था.

  • News18Hindi
  • Last Updated :
  • Share this:

    लेखक डॉ. राकेश पांडेय (Writer Rakesh Pandey) की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबंधित साहित्य‘ (Pratibandhit Sahitya Mein Gandhi) में गांधी उन रचनाओं का संग्रह है जो आज़ादी की लड़ाई में गांधीजी के सहयोग के लिए लिखी गई थीं. विभिन्न भाषाओं में तमाम लोगों द्वारा लिखी इन रचनाओं में अंग्रेजी शासन को सीधे-सीधे चुनौती दी गई थी.

    देश के कोने से कोने गांधीजी के आह्वान पर तमाम लोग कंधे से कंधा मिलाने के लिए उनके साथ सड़कों पर उतर आए. लेकिन बहुत से लोग ऐसे थे जो अपनी लेखनी से लोगों में आज़ादी की लड़ाई के लिए ऊर्जा का संचार कर रहे थे.

    इन रचनाओं का असर यह था कि अंग्रेजी हुकूमत इनसे घबरा उठी और इन पर प्रतिबंध लगा दिए. राष्ट्रीय अभिलेखागार में बंद पड़ी तीन हजार से अधिक रचनाओं को राकेश पांडेय ने एकत्र करने का काम किया. लगातार चार साल के अध्ययन के बाद उनमें से कुछ चुनिंदा रचनाओं को एक पुस्तक का रूप दिया है.

    लेखकों ने अपनी रचनाओं में गांधीजी के जीवन सूत्र जैसे- हिंसा, सत्याग्रह, स्वराज, नमक सत्याग्रह, असहयोग आन्दोलन, खादी, चरखा आदि को आजादी की लड़ाई में जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया.

    इस पुस्तक में संकलित कुछ रचनाओं को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है-

    मादरे हिन्द की आंख का तारा गांधी।
    चर्ख पर कौम के पुर नूर सितारा गांधी।।
    जेलखाने में भी जाकर के उठाना कूड़ा।
    मुल्क के वास्ते करते हैं गवारा गांधी।।
    (स्वराज संग्राम का बिगुल, प्रतिबंधित दिनांक: 25 अगस्त, 1930)

    आज़ादी की लड़ाई में गांधीजी और चरखा एकदूसरे का पर्याय बन गए थे. चरखे को हो स्वराज की लड़ाई में एक प्रमुख हथियार के रूप में देखा गया है. इसकी बानगी इस कविता में देखी जा सकती है-

    चर्खा से स्वराज

    हमें ये स्वराज्य दिलाएगा चर्खा
    खिलाफत का झगड़ा मिटाएगा चर्खा
    हमको घूँ घूँ की धुर्पद सुनाएगा चर्खा
    मेरे हौसले सब बढ़ाएगा चर्खा
    (गांधी जी का चर्खा, प्रतिबंधित दिनांक: 30 मार्च , 1930)

    किसी भी लड़ाई को अंहिसा और शांति से जीतने का विचार गांधीजी के साथ आरम्भ हुआ. इसका उदाहरण इस कविता में देखा जा सकता है-

    वन्देमातरम् गांधी गौरव

    राम बलराम कृष्ण पारथ परशु भीम,
    जावत बदि ‘बली’ बेदहूँ पुरान में।
    औरो शस्त्रधारी बड़े होत रहे किन्तु ,
    गांधी प्रगटे ते शान्तिधारी भे जहान में
    (वन्देमातरम गांधी गौरव, प्रतिबंधित दिनांक: 9 दिसम्बर, 1931)

    गांधीजी का ब्रिटिश शासन से संघर्ष जन-जन में व्याप्त हो गया. अंग्रेजी हुकूमत पर इस दबाव को लिखी पंक्तियां इस तरह प्रकट करती हैं-

    सरकार की जान के लाले हैं

    ऐ मादरे हिन्द न हो गमगीन दिन अच्छे आनेवाले हैं।
    आजादी का पैगाम तुझे हम जल्द सुनाने वाले हैं।।
    मां तुझ को जिन जल्लादों ने दी है तकलीफ जईफी में।
    मायूस न हो मगरूरों को अब मजा चखाने वाले हैं।।
    (स्वराज संग्राम का बिगुल, प्रतिबंधित। दिनांक: 25 अगस्त, 1930)

    राधेश्याम की रामायण के ढंग पर

    चलने दो हाथ निहत्थों पर,
    जत्थों पर जत्थे आवेंगे।
    गांधी के एक इशारे पर,
    लाखों मत्थे चढ़ जावेंगे।।
    (महात्मा जी की पुकार, प्रतिबंधित दिनाक: 30 मार्च, 1931)

    गांधी भारतीय लोकमानस में किसी देव समान हो चुके थे. उन पर अनेक प्रार्थनाएं भी रची जाने लगीं.

    प्रार्थना

    गांधी हौं न तेरे गुनगान के सुयोग्य ‘बली’
    कविता की राखौं हौं न नेकहूँ शकति है।
    प्राप्त सतसंगहूँ न काहू देश-भक्तहूँ को,
    नहीं राजनीतिहूँ में मेरी कछु गति है।।
    (गांधी गौरव, प्रतिबंधित दिनाक: 9 दिसम्बर, 1931)

    गुलामी के खिलाफ लड़ाई लड़ने के साथ-साथ गांधीजी रचनात्मकता और समाज सुधार से भी जुड़े थे. उन्होंने अपने अनेक सूत्र वाक्यों में शराबबंदी बात भी की है. और उसका असर जनमानस पर हुआ भी. अंग्रेजों द्वारा प्रतिबंधित साहित्य में शराब के ऊपर भी बहुत ही रोचक पंक्तियां मिलती हैं-

    शराब का बाई काट

    खाना खराब कर दिया बिलकुल शराब ने।
    जो कुछ कि न देखा था दिखाया शराब ने।।
    बुलबुल की तरह बाग में लेते थे बुए गुल।
    सन्डास नालियों में गिराया शराब ने।
    (महात्मा गांधी की आंधी, प्रतिबंधित दिनांक: 10 दिसम्बर, 1930)

    आज़ादी की लड़ाई में घरों के भीतर रहने वाली महिलाएं भी अपना योगदान दे रही थीं. गांधीजी के आह्वान पर स्त्रियां ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया और स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग को वरीयता दी. इसका उल्लेख एक कविता में देखा जा सकता है-

    महिला का स्वदेशी व्रत

    साड़ी ना पहनब विदेशी हो पिया देशी मंगा दे।
    देशी चुनरिया, देशी ओढ़नियां, देशी लहंगवा सिला दे हो।।
    पिया देशी मंगा दे ।। साड़ी—।।
    देशी चोली, देशी गोली देशी ही रंग में रंगा दे हो।
    पिया देशी मंगा दे ।। साड़ी—।।
    (स्वराज गीतांजलि, प्रतिबंधित दिनांक: 21 दिसम्बर, 1931)

    स्त्रियों का पति से कहना

    (दोहा)
    भारत की बहिने कहें, निज पिय से समझाय।
    ऐ मेरे पति देवता, चर्खा देव मंगाय।।
    (चौपाई)
    चर्खा देव मंगाय तभी मन म्हारे चैन परैगो।
    बिन इसके बालम सुन लीजै दिल खुश नाहिं रहैगो।
    सारे भरत भर में प्यारे चर्खा धूम करैगो।
    खद्दर के आगे सुन ली सब कपड़ा रोय मरैगो।
    स्वदेशी और विदेशी कपड़ा में रण धूम मचैगो।
    (स्वराज गीतांजलि, प्रतिबंधित दिनांक: 21 दिसम्बर, 1931)

    यह गांधीजी की ही देन थी कि विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने के लिए घर-घर में वातावरण बन गया था. इन कविताओं में विदेशी वस्तुओं के खिलाफ भी गूंज सुनने को मिलती है-

    विदेशी चीजों का बहिष्कार

    टाई जापां की न इटली का रूमाल अच्छा है।
    जो बने अपने वतन में वह माल अच्छा हैं।।
    मुझे मतलूब नहीं चीन का जर्री सागिर।
    मेरे भारत का मुझे जामे सिफाल अच्छा है।।
    (स्वराज गीतांजलि, प्रतिबंधित दिनांक: 21 दिसम्बर, 1931)

    देश की आजादी के मतवालों की पोशाक में गांधी टोपी मुख्य अंग थी. इस पर यह कविता देखें-

    इन गांधी टोपीवालों ने

    इक लहर मचा दी भारत में इन गांधी टोपीवालों ने।
    ‘स्वाधीन बनो’ यह सिखा दिया इन गांधी टोपीवालों ने।।
    सदियों की गुलामी में फंसकर, अपने को भी जो भूले थे।
    कर दिया सचेत उन्हें अब तो, इन गांधी टोपीवालों ने।।
    (सत्याग्रह की आवाज, प्रतिबंधित दिनांक: 10 दिसम्बर, 1930)

    वीर रस के रचनाकारों ने भी अपनी कलम से गांधीजी के अहिंसात्मक संघर्ष को भी वीर रस काव्य शैली प्रस्तुत किया.

    सत्याग्रह आल्हा

    गाँधी जी ने लिखा मित्र वर बृटिश हुकूमत भारी पाप।
    दलिद्र इसने बनाया भारत दुख से जनता करै विलाप।।
    नाश हाथ की भई कताई स्वास्थ हरन अबकारी कीन।
    भारी बोझ नमक के कर का दबी है जासे जनता दीन।।
    (सत्याग्रह आल्हा, प्रतिबंधित सन 1930)

    होली की रचनाओं में भी अनेक प्रकार से गांधीजी का जिक्र देखने को मिलता है-

    ठनेगी सत्याग्रह की ठान।
    गोरी शाही से ना मिलहै तुमको एक छदाम।
    हमने तुमको बतला दीन्हा सच्चा यह अनुमान ।।
    कौरव पांडव दोऊ दल में मालवि बिदुर समान।
    दुर्योधन सम गवर्नमेन्ट से अविश होय अपमान ।।
    (महात्मा गांधी की स्वदेशी होली, प्रतिबंधित दिनांक: अज्ञात)

    गांधीजी के समर्थन में हिंदी ही नहीं तमाम भाषाओं में रचनाएं लिखी जा रही थीं. देवनागरी लिपि में एक पंजाबी रचना भी मिली जोकि चरखे पर केन्द्रित है-

    ये ना समझो चरखा मेरा कहन्दा घूं घूं घूं।
    ये तो याद करेगा हेगा गांधी तूं तूं तूं।।
    एक दिन सुपना मैनू आया।
    सुपने दे बिच यह फरमाया।।
    मोमिन बिच चरखे दे तार में अल्ला हूं हूं हूं।।
    (गांधी संग्राम, प्रतिबंधित दिनांक: 9 दिसम्बर, 1941)

    ये रचनाकार तत्कालीन अंग्रेजों की मानसिक स्थिति का भी आंकलन करते रहते थे. उनको लगा कि ब्रिटिश सरकार के लोग गांधीजी से परेशान हैं-

    लन्दन की पुकार

    सारा लन्दन नगर बस यही कहा रहा गांधी बाबा कहां से ये पैदा हुआ।
    दिया कालों को दुश्मन हमारा बना हाथ खद्दर प्रचारक यह पैदा हुआ।
    भारी भारी मशीनें हैं खाली पड़ीं। क्योंकि भारत तो चर्खे पे शैदा हुआ।
    देखने में तो गांधी है सीधा बड़ा पर यह जालिम हमारा है पैदा हुआ।
    (राष्ट्रीय तरंग, प्रतिबंधित दिनांक: 30 मार्च, 1931)

    सबके मध्य एक ही संदेश था कि गांधीजी से अंग्रेजी हुकूमत डरती है. इस पर रोचक ढ़ंग से कविताएं लिखी गई हैं-

    विजय-दुन्दुभी

    देखो गांधी जी के मारे थर थर कांप रही सरकार।
    धरे रहे वाके तोप-तमंचा धरी रही तरवार।।
    (विजय-दुदुम्भी, प्रतिबंधित: 10 दिसम्बर, 1930)

    चूंकि गांधीजी एक वकील थे. इसलिए रचनाकारों ने देश की आज़ादी में सहयोग के लिए वकील समुदाय से आवाहन किया है-

    वकीलों तुम्हें भी अब आना पड़ेगा।
    वकालत को अब तो हटाना पड़ेगा।। वकीलों-
    गये जेल में सब नेता हमारे।
    जगह पे तुम्हें उनके आना पड़ेगा।। वकीलों-
    छिड़ा जो अहिंसात्मक युद्द  भारि।
    तुम्हें नेता बनकर जिताना पड़ेगा।। वकीलों-
    (राष्ट्रीय तरंग, प्रातबंधित: 30 मार्च, 1931)

    Writer Rakesh Pandey

    पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

    हमें FacebookTwitter, Instagram और Telegram पर फॉलो करें.

    विज्ञापन
    विज्ञापन

    विज्ञापन

    टॉप स्टोरीज