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वे सोलह दिन: संविधान लागू होने के 1 साल के भीतर आखिर क्यों करना पड़ा संशोधन?

वे सोलह दिन: संविधान लागू होने के 1 साल के भीतर आखिर क्यों करना पड़ा संशोधन?

यह पुस्तक संविधान के पहले संशोधन की दिलचस्प कहानी है.

यह पुस्तक संविधान के पहले संशोधन की दिलचस्प कहानी है.

आखिर भारत सरकार और कांग्रेस पार्टी को उन असाधारण कदमों को उठाकर संविधान में ऐसे क्रांतिकारी बदलाव की क्या ज़रूरत महसूस हुई थी जिसे उन्होंने खुद ही सन् 1950 में मान्यता दी थी?

Literature News: ‘वे सोलह दिन; नेहरू, मुखर्जी और संविधान का पहला संशोधन’ भारतीय संविधान के प्रथम संशोधन की दिलचस्प कहानी है. प्रचंड संसदीय बहसों और विरोध के बीच जून, 1951 में पहला संविधान संशोधन किया गया. इस संशोधन ने कुछ नागरिक स्वतंत्रताओं और संपत्ति के अधिकारों को सीमित कर दिया और कानूनों की एक विशेष अनुसूची तैयार की, जो न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर थी.

यह संशोधन देश के पहले आम चुनाव से ठीक पहले हुआ. कांग्रेस घोषणापत्र में जिन सामाजिक-आर्थिक योजनाओं का उल्लेख था, उन्हें उदार संविधान और स्वतंत्र प्रेस से चुनौतियां मिल रही थीं. इसका सामना करने के लिए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कार्यपालिका की सर्वोच्चता को फिर से स्थापित करते हुए संविधानिक नियंत्रण और दवाब का एक ढांचा खड़ा कर दिया.

आखिर संविधान लागू होने के महज़ एक ही साल बाद ऐसी कौन-सी चुनौती देश के सामने आ खड़ी हुई थी? संसदीय बहसों, न्यायिक दस्तावेज़ों और विद्वानों की राय के आधार पर यह पुस्तक नेहरू, आम्बेडकर, पटेल, राजेंद्र प्रसाद और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे दिग्गजों के बारे में हमारी पारंपरिक समझ को एक चुनौती देती है. साथ ही यह पुस्तक, भारतीय संविधान के उदारवादी स्वरूप और उसकी पहली सरकार के अधिनायकवादी आवेगों के बीच की खाई को भी सामने लाती है.

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26 जनवरी, 1950 के संविधान सभा के सदस्यों ने नए संविधान पर अपने हस्ताक्षर किए और भारत एक गणराज्य बन गया. ठीक उसके बारह महीनों के बाद, संविधान के उन्हीं निर्माताओं ने, जो स्वतंत्रता के बड़े पैरोकार थे, जिन्होंने उस संविधान पर सहमति दी थी, उन्होंने ही अपनी कृति में ये कहकर संशोधन कर दिया कि इसमें अत्यधिक स्वतंत्रता है.

आखिर अपनी ही कृति के निर्माण के ठीक पंद्रह महीनों के बाद संविधान निर्माताओं को ऐसी कौन सी मजबूरी का सामना करना पड़ा था, आखिर भारत सरकार और कांग्रेस पार्टी को उन असाधारण कदमों को उठाकर संविधान में ऐसे क्रांतिकारी बदलाव की क्या ज़रूरत महसूस हुई थी जिसे उन्होंने खुद ही सन् 1950 में मान्यता दी थी? जून 1951 में हुए संविधान के पहले संशोधन पर हुए उस घनघोर बहस का क्या नतीजा निकला जिसका संसद के अंदर और बाहर भारी विरोध हुआ था?

‘वे सोलह दिन; नेहरू, मुखर्जी और संविधान का पहला संशोधन’ में लेखक ने विस्तार से बताया है. त्रिपुरदमन सिंह की इस पुस्तक के बारे में तमाम प्रतिक्रियाएं भी मिली हैं.

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वरिष्ठ अधिवक्ता फली एस नरीमन पुस्तक के बारे में लिखते हैं- ‘गहन शोध के बाद लिखी इस पुस्तक को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि यह भारत के संवैधानिक इतिहास को लेकर मौजूद गौरवान्वित और अतिशयोक्तिपूर्ण अवधारणाओं को बदल कर रख देगी. इसके पन्नों को पलटते हुए हमें केंद्र में अत्यधिक बहुसंख्यकवादी सरकारों के फायदों को (और उसके कुछ ख़तरों को भी) बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है.’

राज्यसभा सांसद स्वपन दासगुप्ता कहते हैं- ‘स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों के मनोहर चित्रण और राजनीति के असहज यथार्थ के बीच की खाई को त्रिपुरदमन सिंह ने इस किताब में बहुत अच्छी तरह व्यक्त किया है. यह संशोधनवादी इतिहास नहीं है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों एवं राजनीतिक प्राथमिकताओं के बीच के पहले तनावों की स्पष्ट छवि है. इस किताब में नेहरू एक खलनायक की तरह नहीं, बल्कि एक मँझे हुए राजनेता की तरह उभरकर सामने आते हैं. इसे अवश्य पढ़ा जाना चाहिए’

भारतीय मूल के अर्थशास्त्री मेघनाद देसाई लिखते हैं- ‘यह किताब धमाकेदार है. यह उन लोगों को बड़ा झटका देगी, जो संविधान और उसके द्वारा नागरिकों को दी गई स्वतंत्रताओं को बड़े सुहाने ढंग से देखते हैं. . . अब तक अनकही रही इस कहानी से इतिहास और संविधान की विषयवस्तु के गंभीर पुनर्निरीक्षण की शुरुआत होनी चाहिए. इसे एक ऐसे आंदोलन को प्रेरित करना चाहिए, जो मूल संविधान की ओर ले जाए और उसमें बाद में लाई गई विकृतियों का तिरस्कार कर दे.’

लेखक के बारे में
त्रिपुरदमन सिंह इंस्टिट्यूट ऑफ कॉमनवेल्थ स्टडीज़, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में ब्रिटिश अकेडेमी पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो हैं. उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में जन्मे त्रिपुरदमन ने यूनिवर्सिटी ऑफ वॉरविक में राजनीति एवं अंतरराष्ट्रीय अध्ययन की पढ़ाई की और यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज से मॉर्डन साउथ एशियन स्टडीज़ में एमफिल तथा इतिहास में पीएचडी की डिग्री हासिल की. वह नीदरलैंड्स के यूनिवर्सिटी ऑफ लाइडेन में विजिटिंग फेलो और और इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च फेलो रहे हैं. त्रिपुरदमन रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के फेलो भी हैं. इससे पहले उनकी इम्पेरियल सोवर्निटी, लोकल पॉलिटिक्स और नेहरू नाम की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.

Tags: Books, Hindi Literature, Literature

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