Book Review: अपनी आत्मा के बारे में सोचने को मजबूर करता निकोलोई गोगोल का उपन्यास 'मृतात्माएं'

मृतात्माएं (डेड सोल्स) निकोलोई गोगोल (Nikolay Gogol) का एक कालजयी उपन्यास है.

Dead Souls उस दौर का उपन्यास है जब रूस में जार शासन का अंत नहीं हुआ था. जारकालीन रूस में सामाजिक समानता का पूर्णता अभाव था. समाज कुलीन वर्ग, उच्च मध्यमवर्ग और श्रमिक वर्ग में बंटा था.

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    डॉ. श्रद्धा श्रीवास्तव

    दोस्तोव्स्की ने लिखा है, 'हम सब गोगोल के ओवरकोट की जेब में से निकले हैं.' यानी पहली बार गोगोल ने अपनी 'ओवरकोट' कहानी में चली आ रही कथा परंपरा से हटकर क्लर्क को नायक बनाया. पुश्किन ने गोगोल के बारे में लिखा कि गोगोल मन से कुछ नहीं गढ़ता, वह कोरी सच्चाई का वर्णन करता है.

    Dead Souls ने निकोलोई गोगोल को अमर कर दिया. व्यंग्य के पुट के बावजूद इस गंभीर उपन्यास में गोगोल ने समग्रता में रूस का जीवन चित्रित किया तथा तत्कालीन युग की समस्त बुराइयों का व्यापक-गंभीर चित्रण किया. तत्कालीन युग के रूसी जीवन का नग्न चित्र प्रस्तुत करने के कारण गेरन्सन ने Dead Souls को त्रास और शर्म की चीख कहा तथा बेलिंस्की ने उसे उस युग का सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक कृति माना. सन 1841 में इसका प्रकाशन हुआ था. मृतात्माएं (डेड सोल्स) निकोलोई गोगोल (Nikolay Gogol) का एक कालजयी उपन्यास है.

    Dead Souls का हिंदी में अनुवाद मृतात्माएं के नाम से हुआ है. वल्लभ सिद्धार्थ ने इसका अनुवाद किया है और संवाद प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है.

    यह उपन्यास वास्तव में मनुष्य और समाज में व्याप्त असंगतियों को बखूबी व्यक्त करता है. यह उस दौर का उपन्यास है जब रूस में जार शासन का अंत नहीं हुआ था. जारकालीन रूस में सामाजिक समानता का पूर्णता अभाव था. समाज कुलीन वर्ग, उच्च मध्यमवर्ग और श्रमिक वर्ग में बंटा था.

    'अमीर अदालतों के मार्फ़त घर भर रहे थे और गरीब-दलितों को पिस्सू की तरह चूस रहे थे.' जमींदारों को अपनी ज़मीन पर खेती करने के लिए सर्फ़ों के मालिक होने का अधिकार था. सर्फ़ को ज़मींदार की संपत्ति माना जाता था, जिन्हें वो खरीद, बेच या गिरवी रख सकते थे. सर्फ़ (और सामान्य रूप से लोगों) की गिनती करने के लिए, माप शब्द "आत्मा" का उपयोग किया जाता था. यानी गुलामों को सोल्स या आत्माएं कहा जाता था.

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    इस उपन्यास का नायक पावेल इवानोविच चिचिकोव एक महत्वाकांक्षी पात्र है, सौदेबाज़ है, एक बर्खास्त सिविल सेवक है जो शानदार ड्रास्टी में जमींदारों से मृत सर्फ़ों को खरीदने के लिए 'एन' नगर के लिए निकल पड़ता है. वह एक जमींदार से दूसरे ज़मींदार के पास जाता है, उनकी मृत आत्माओं को खरीदने की पेशकश करता है. वह आत्माओं को खरीद रहा है क्योंकि वह प्रत्येक "सेरफ़" पर ऋण ले सकता है, पैसे बना सकता है, और फिर कानून को धोखा दे कर बच सकता है. एक तरह से यह जल्दी अमीर बनने की योजना है.

    उसका हुलिया अजीबोगरीब है जैसे वह सफ़ेद पतलून और फैशन के अनुरूप पूंछदार कोट पहनता है, जो मोटा है न पतला. वह ऊंट की तरह लम्बा है. अपने बारे में अधिक बताने से बचता था फिर भी यह बताता है कि वह धरा का अधमतम कीट है. अपनी अफसरी के दौरान उसने अपने सदाचार के कारण अकथ असह्य कष्ट उठाए.

    अब वह शांतिपूर्वक रहना व लोगों को सेवा करना चाहता है. अपनी अफ़सरी के दौरान जमींदारों को मृत सर्फ़ों पर करों का भुगतान करना होता था जब तक कि एक नई जनगणना ने उन्हें कर सूची से हटा नहीं दिया जाता था.

    चिचिकोव मृत सर्फ़ों को खरीदने के भिन्न-भिन्न प्रकार के विचित्र जमीदारों से मिलता है. सबके सामने सबकी हैसियत के हिसाब से अलग-अलग अजीब प्रस्ताव रखता है, लेकिन वह उन्हें अपनी योजना के पीछे का असली उद्देश्य बताने से बचता है.

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    उसके ऊपर उपन्यास की यह पंक्ति फिट बैठती है, 'हम रूसियों की यह खूबी है कि अवसर और औकात देखकर गुर्राते या दुम हिलातें हैं.'

    पहला तकल्लुफपसंद जमींदार मैनीलोव है जिससे वह उसके मुफ्त में मृत गुलाम खरीदता है. अपने करारनामे को वो राष्ट्र-हित के लिए जरूरी बताता है. उसका दूसरा सौदा जमीदारनी नातासिया पेत्रोनोवा से होता है, जिसके जीर्ण-शीर्ण कमरे से पता चलता है कि उसकी हालत बदहाल है. वो मरे हुए गुलामों के टैक्स भरे जाने की अपनी लाचारी को बताती है. बहुत मगजमारी के बाद वो राज़ी नहीं हो रही होती तो वो उससे कहता है, 'तुम खलिहान की रखवाली करने वाले मूर्ख कुत्ते की तरह हो जो न खुद फसल खाता है न दूसरों को खाने देता है.'

    हम पाते हैं कि चिचीकोव लालची है पर हर जमींदार उससे भी लालची है. सबका अपने दासों के प्रति व्यवहार अमानवीय रहा था. अगला जमींदार नोजदोरोव है जो जुआरी है, जो जान रहा है चिचीकोव नम्बरी ठग है. वह बकलख़ोर जमींदार सोवोकेविच से सौदा करता है जो उसे गन्दा जानवर सा लगता है. वो महाकंजूस जमींदार प्लुशिकिन के पास जाया करता है.

    इस प्रकार वह जमींदारों को कर (Tax) के बोझ से मुक्त करता है और अपनी संपत्ति बनाने के लिए धन प्राप्त करने के लिए उन्हें गिरवी रखता है. यहां तक कि वह मृत आत्माओं को गिरवी रखने के लिए आवश्यक भूमि संपत्ति हासिल करने के लिए एक वसीयत भी बनाता है. लेकिन वह पकड़ा जाता है.

    गोगोल ने ज़मींदारों के विचित्र चरित्र को सूझबूझ के साथ बड़ी चित्रात्मक व व्यंगात्मक शैली में वर्णन किया है. वे सब आलसी हैं, कामचोर हैं, किसी की रूचि अपनी भूमि को बचाने में नहीं है. गोगोल उनकी अक्षमता और उनकी विचित्रताओं का मजाक उड़ाता है.

    गोगोल अपने इस उपन्यास में अभिजात वर्ग और उनके व्यवहार की आलोचना करते हैं, पश्चिमी यूरोप की ओर देखने की उनकी अपनी प्रवृत्ति और उनके रूसी होने पर गर्व करने के बजाय लंदन या पेरिस के जीवन के तरीकों की नकल करते हैं. रेखांकित करना चाहूंगी अपने हर मेजबान के साथ भोजन करता है जिसका विस्तार से वर्णन हर अध्याय में किया है.

    दूसरे भाग में, चिचिकोव अंत में एक ऐसे जमींदार से मिलता है, जो उसे प्रेरित करता है और उसे खुद को बेहतर बनाना चाहता है. वह ऐसे व्यक्ति से भी मिलता है जो उसे आध्यात्मिक रूप से प्रेरित करता है.

    पहला भाग का कॉमेडी प्रधान है तो दूसरे भाग में आदर्श को स्थापित किया है. पहले भाग में गोगोल छोटे शहर के जीवन के कामकाज, संस्थानों के भ्रष्टाचार और शासक वर्ग के बीच मिलीभगत को दर्शाते हैं. हर पात्र एक दूसरे की पोल पट्टी खोलते हैं. हर पात्र ठीक-ठीक जानते हैं कि किसने दुर्व्यवहार किया, किसने किसको बिगाड़ा. इस प्रकार वो इस उपन्यास को लिखकर रूस की बेहतरी चाहते थे.

    'डेड सोल्स' को निकोलाई गोगोल ने अपनी परिभाषा में 'an epic poem written in prose' कहा है.
    अनुदित उपन्यास उनके कथा-शिल्प की अंतर्वस्तु को उस खूबसूरती के साथ पकड़ नहीं पाता है. पाठक कथानक से परिचित हो सकते हैं, आस्वाद से वंचित रहेंगे. मूल-भावार्थ तक पहुंच सकते हैं पर भाषा के आस्वाद से वंचित रहेंगे.

    गोगोल हमें एक पाठक के रूप में चुनौती देता है. वह कहता है कि हम अपने को देखे तो पाएंगे चिचीकोव जैसे ही हैं जो झटपट अमीर बनना चाहते हैं. बजाय मेहनत के मुफ्त में धन प्राप्त करना पसंद करते हैं. हम भी (चाहे हम इसे महसूस करें या नहीं) अलग-अलग लोगों साथ अपने व्यवहार को बदलते हैं.

    इस उपन्यास का दर्शन है - मृत आत्माओं (मृत गुलामों ) का ख्याल छोड़ो और अपनी आत्मा के बारे में सोचो. जीवन की राह बदलने का समय आ चुका है.

    उपन्यास- मृतात्माएं
    लेखक- निकोलाई गोगोल
    अनुवाद- वल्लभ सिद्धार्थ
    प्रकाशन- संवाद प्रकाशन
    मूल्य -350 रुपए

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