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ऊंचे शिखरों की दास्तान है जेपी पांडेय का यात्रा वृतांत 'पगडंडी में पहाड़'

लेखक जय प्रकाश पांडेय 2003 बैच के आईआरपीएस (Indian Railway Personnel Service) सेवा के अधिकारी हैं.

लेखक जय प्रकाश पांडेय 2003 बैच के आईआरपीएस (Indian Railway Personnel Service) सेवा के अधिकारी हैं.

उत्तराखंड के सुरम्य पर्वतीय अंचल, खूबसूरत झरने, उछलते-कूदते नदी-नाले, ग्लेशियर और वहां के लोग सदा-सदा से मानव मन को सम् ...अधिक पढ़ें

(संजीव जायसवाल ‘संजय’/ Sanjeev Jaiswal ‘Sanjay’)

Book Review: यात्रा कथाएं हमेशा से रोमांचकारी रही हैं और यदि उसमें खोजी कथाएं भी शामिल हो जाएं तो आनंद कई गुना बढ़ जाता है. नेशनल बुक ट्रस्ट यानी राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी) से प्रकाशित विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी की पुस्तक ‘पीछे छूटा पहाड़’ काफी लोकप्रिय हुई है. यात्रा कथाओं की इस श्रृंखला में एनबीटी से एक और पुस्तक प्रकाशित हुई है- ‘पगडंडी में पहाड़’. पगडंडी में पहाड़ के लेखक हैं जयप्रकाश पांडे.

‘पगडंडी में पहाड़’ पुस्तक 18 खण्डों में विभाजित है. इसका प्रत्येक खंड शिवालिक पर्वत श्रृंखला के किसी न किसी लोकप्रिय स्थान की समूची जानकारी समेटे हुए है.

पुस्तक के पहले खंड में लेखक ‘पहाड़ों की रानी’ मसूरी पहुंचता है और यही इस खंड का शीर्षक भी है. इस खंड की शुरूआत से ही मसूरी के अनुपम सौंदर्य का वर्णन प्रारंभ हो जाता है. पाठक मसूरी कै सौन्दर्य के साथ-साथ वहां की सांस्कृति विरासत को महसूस करते हुए प्राचीन शिव मंदिर, मसूरी झील में वोटिंग का आनंद लेते हुए प्रसिद्ध लाइब्रेरी चौक पहुंचते हैं. जब आप मसूरी की इन सड़कों की सैर करेंगे तो आपको पता चलेगा एक छोटे से गांव का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के रूप में विकसित होने की गौरव गाथा. पहली सड़क कौन-सी बनी, पहला होटल कौन-सा बना, किस होटल में कौन-कौन विभूतियां कब-कब रुकीं, इन तमाम छोटी से छोटी जानकारियां इतने करीने से संजोई गई हैं कि पाठक बिना मसूरी जाए ही वहां की खूशबू को महसूस कर सकता है.

पुस्तक के पन्ने पलटते हुए पता चलता है कि लेखक मसूरी में पर्यटक के रूप में नहीं आया बल्कि उसकी मसूरी के प्रसिद्ध ओकग्रोव स्कूल के प्रिंसिपल के रूप में तैनाती हुई है. इस विद्यालय की स्थापना 1888 में अंग्रेज अधिकारियों के बच्चों को शिक्षा देने के उद्देश्य से किया था. बाद में यह विद्यालय रेलवे अधिकारियों और कर्मचारियों के बच्चों के शिक्षा केंद्र के रूप में विकसित हुआ. गवर्नमेंट सेक्टर में यह देश का सबसे बड़ा आवासीय स्कूल है.

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यहीं पर पता लगता है कि लेखक इंडियन रेलवे पर्सनल सर्विस (आईआरपीएस) के अधिकारी हैं. इसी सेवा के अधिकारियों की तैनाती इस स्कूल के प्रिंसिपल के रूप में की जाती है.

जय प्रकाश पांडेय बताते हैं कि 19वीं शताब्दी में अंग्रेजों द्वारा लगभग हर काम मुख्य रूप से लाभ कमाने के उद्देश्य से संचालित किया जाता था. पहली बार ईस्ट इंडिया कंपनी ने 2,00,000 रुपये की निधि से इस शैक्षिक संस्थान की स्थापना की थी.

मसूरी का एक दृश्य पुस्तक में इस प्रकार वर्णिक है – “कुलरी बाजार से लाइब्रेरी चौक तक का रोड कैमल बैक रोड के नाम से जाना जाता है यहां पर अंग्रेजों के समय के अनेक ग्रेवयार्ड स्थित है. यहां से सूर्यास्त का नजारा देखने लायक होता है. जाड़ों की शाम के समय क्षितिज पर लाल रंग की गहरी रेखा पूरे आसमान पर फैल जाती है, जिसे विंटर लाइन के नाम से जानते हैं. कहा जाता है कि विश्व में स्विट्ज़रलैंड के बाद मसूरी में ही विंटर लाइन का मनमोहक नजारा देखा जा सकता है. पूरा आसमान आग के एक बड़े गोले की परिधि से घिर जाता है. जिसके चटख लाल रंगों के साथ नीले बैकग्राउंड पर सफेद तैरते बादलों की छटा देखते ही बनती है.”

इसके बाद के पुस्तक के शेष खंड इस पर्वतीय क्षेत्र के प्रमुख स्थलों के नाम पर रखे गए हैं जैसे झरीपानी फाल, संगम फाल, परी टिब्बा, विनोग टॉप, जबरखेत नेचर रिज़र्व, सुरकंडा एवं धनोल्टी, सहस्त्रधारा, कुमाऊं दर्शन, चारधाम यात्रा इत्यादि.

पाठकों को इन स्थानों के इतिहास और वहां के सौंदर्य से परिचित करवाने के लिये लेखक ने अद्भुत शैली का सहारा लिया है. प्रत्येक खंड में वह अपने स्कूल के बच्चों और कर्मचारियों के साथ किसी एक स्पॉट की यात्रा पर निकलते हैं और किसी कमेंटेटर की तरह उस स्थल की स्थापना, उसके विकास, उसके इतिहास एवं वहां के भवनों, निवासियों आदि की विस्तृत जानकारी देते चलते हैं.

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यदि किसी व्यक्ति को इन स्थलों का भ्रमण करना हो तो उसे विकिपीडिया या किसी अन्य स्रोत से जानकारी जुटाने की आवश्यकता नहीं है. इस पुस्तक में इन स्थलों की जितनी गहन और अधिकृत जानकारी मिल जाएगी वह अन्यत्र दुर्लभ है.

इस पुस्तक के एक अध्याय ‘जबरखेत नेचर रिज़र्व’ का मैं विशेष रूप से उल्लेख करना चाहूंगा. यह मसूरी का एक संरक्षित निजी वन क्षेत्र है. यहां प्रवेश के लिए पूर्व अनुमति लेनी पड़ती है और टिकट भी. लेखक अपने छात्रों के साथ बिना पूर्व अनुमति के वहां पहुंच जाते हैं और सुरक्षाकर्मी उन्हें प्रवेश देने से मना कर देते हैं. किंतु जब प्रबंधक को पता लगता है कि बच्चे प्रसिद्ध ‘ओकग्रोव’ स्कूल से आए हैं तो वह न केवल अनुमति दे देते हैं, बल्कि एक गाइड भी उपलब्ध करा देते हैं. यहां लेखक बताते हैं कि इस क्षेत्र के लंढौर कैंटोनमेंट में पूर्व सैनिकों के लिए एक ‘फर्लो होम’ है जिसमें जो अंग्रेज सैनिक वापस यूरोप नहीं जा पाते थे, वे छुट्टियों में आते थे.

सन 1826 में कैप्टन यंग द्वारा निर्मित ‘मलिंगर हाउस’ मसूरी की पहली स्थायी बिल्डिंग है, जो उनके परिवार के लिए ग्रीष्म कालीन आवास था. बाद के दिनों में इसे सेना ने अपने नियंत्रण में ले लिया और 20वीं सदी के प्रारंभ में होटल का रूप दे दिया गया. द्वितीय विश्व युद्ध के समय इस होटल का प्रयोग सैनिकों के लिए किया गया था. ऐसी ऐतिहासिक एवं रोचक जानकारियों की पूरी पुस्तक में भरमार है जो पाठकों का मनोरंजन करने के साथ-साथ ज्ञानवर्धन भी करती चलती है. पुस्तक की भाषा सरल, सुगम तथा शैली प्रवाहमय है तथा विभिन्न स्थलों की जानकारी अत्यंत रोमांचक शैली में दी गई है, जिसके कारण पाठक एक खंड के बाद दूसरा खंड पढ़ता चला जाता है.

प्रमुख पर्यटन स्थलों के साथ-साथ पुस्तक के अंतिम खंडों में प्रसिद्ध ‘चारधाम यात्रा’, ‘हेमकुंड साहब’ और ‘फूलों की घाटी’ की भी मनमोहक जानकारी दी गई है. पुस्तक में गंगोत्री का वर्णन इस प्रकार किया हैं – “गंगोत्री का नजारा अविस्मरणीय था. गंगोत्री ग्लेशियर से उतरती पावनी मां गंगा, जिनके दर्शन मात्र से समस्त पाप धुल जाते हैं. मै उनके उद्गम स्थल पर खड़ा अत्यंत रोमांचित था. मां गंगा की उफनती लहरें, उछलती जलधारा की मचलती बूंदे, दूसरी तरफ ऊंचे-ऊंचे चीड़ से लदी पर्वत श्रंखला, दूर शांत स्निग्ध सूर्य की किरणों से चमकती बर्फ से ढकी मेखला, सेब के पेड़, दिव्य मंदिर और फैले हुए घाट इस पवित्रतम स्थल की रमणीयता में चार चांद लगा रहे थे. लगभग ढाई हजार किलोमीटर की यात्रा करती मां गंगा लाखों किलोमीटर के क्षेत्र को उर्वरा शक्ति प्रदान करती है. करोड़ों लोंगों की जीवनधारा मां गंगे को नमन कर मै घंटों, घाट के किनारे पड़ी एक बेंच पर एकांत में बैठकर प्राकृतिक दृश्य के रूप में परमपिता से एकाकार होता रहा.”

त्तराखंड मुख्यतः दो भागों में विभाजित हैं. पुस्तक में यहां के इतिहास का विस्तृत ब्योरा दिया गया है जिससे पाठक इस क्षेत्र का सम्पूर्ण परिचय प्राप्त कर सकेंगे. कुमायूं का एक वर्णन पुस्तक में इस प्रकार है– “सातवीं सदी से ग्यारहवीं सदी तक यहां कत्पुरी शासकों का शासन रहा. वासुदेव कत्पूरी ने इस वंश की स्थापना की एवं कार्तिकेयपूरा (अब बैजनाथ) इस वंश की राजधानी थी. अपने वैभव के चरम पर इस वंश का शासन नेपाल से लेकर अफगानिस्तान तक था. नेपाल के कंचनपुर जिले में ब्रह्मदेव मंडी की स्थापना ब्रह्मदेव नामक कत्पूरी शासक ने ही की थी. 12वीं सदी में इस वंश का विघटन हो गया और चांद शासकों ने इस क्षेत्र पर शासन किया. 1581 में रूपचन्द्र नामक राजा ने पुनः सम्पूर्ण कुमायूं क्षेत्र पर शासन स्थापित किया. 13वीं –14वीं सदी में इस क्षेत्र पर आठ अलग-अलग राजवंशों ने शासन किया. चांद राजाओं ने चम्पावत को अपनी राजधानी बनाया और बाजबहादुर इस वंश का सबसे प्रभावी राजा बना.”

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पगडंडियां मन के कोमल तंतुओं को छूती हैं, गुदगुदाती हैं और एक रहस्यमयी आनंद का आस्वाद कराती हैं जिससे शब्द स्वतः ही जुड़ने लगते हैं और स्वर्गिक साहित्य का निर्माण करते हैं. पुस्तक में लेखक ने उत्तराखंड की साहित्यिक विरासत का भी विस्तृत वर्णन किया हैं. एक बानगी प्रस्तुत है- “प्रातः काल का कौसानी अपने वैभव के चरम पर होता है. अलसाई वृक्ष लताओं को जगाने वाली मंद-मंद बहती हवा दिनकर की सर्वदा सुखाय रश्मियों के स्पर्श और नजदीक और स्पष्ट दिखते हिमशिखर का दर्शन करते व्यक्ति अपनी सुध-बुध ही खो देता है. यहां से नाग पर्वत की चोटियां स्पष्ट दिखाई देती हैं. इसके बाद हम तैयार होकर पंत म्युजियम देखने निकले. प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत के जन्म स्थली का दर्शन मेरे लिए किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं था. यहां पंत जी के अनेकों हस्तलिखित पत्र, तश्वीरें और पांडुलिपियां सुरक्षित हैं. हरिवंशराय बच्चन के साथ उनकी कई तश्वीरें आकर्षण का केन्द्र हैं. कौसानी, अल्मोड़ा और प्रकृति की सुकुमारता का जो चित्रण सुमित्रानंदन पंत ने किया है वह अन्यंत्र दुर्लभ है. मेरा मन पंत जी की एक रचना अनायास ही गुनगुनाने लगा –
छोड़ द्रुमों की मृदु छाया
तोड़ प्रकृति से भी माया
बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?
भूल अभी से इस जग को!

मैदानी इलाके में रहने वाले व्यक्ति को पहाड़ों के बारे में इतनी गहन और विस्तृत जानकारी होना चमत्कृत तो करता ही है साथ ही लेखक की प्रतिभा व परिश्रम का परिचायक भी है. इस पुस्तक में यात्रा वर्तांत, खोजी पत्रकारिता और कथारस की त्रिवेणी दिखाई पड़ती है जिसकी गहराई में पाठक डूबता चला जाता है. अपनी विशिष्टता के कारण इस पुस्तक की विषय-वस्तु पर्यटकों के लिए तो उपयोगी है ही, छात्रों विशेषकर शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी. अपनी विशिष्टता, उत्कृष्टता व उपयोगिता के कारण पुस्तक न केवल पठनीय है बल्कि संग्रहणीय भी.

पुस्तक- पगडंडी में पहाड़
लेखक- जय प्रकाश पांडेय           
प्रकाशक- राष्ट्रीय पुस्तक न्यास

Sanjiv Jaiswal 'Sanjay', Hindi Writer, Sahitya News, Literature News

Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature

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