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डॉ. आंबेडकर की जाति के लोगों को गले में घड़ा लटकाकर चलना पड़ता था, वजह जानकर रह जाएंगे दंग

डॉ. भीमराव आंबेडकर का निधन 6 दिसंबर, 1956 को दिल्ली स्थित उनके आवास पर हुआ था. उनकी पुण्यतिथि को महापरिनिर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है.

डॉ. भीमराव आंबेडकर का निधन 6 दिसंबर, 1956 को दिल्ली स्थित उनके आवास पर हुआ था. उनकी पुण्यतिथि को महापरिनिर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है.

पूरे परिवार द्वारा किए जाने वाले इस दैनिक श्रम के भुगतान के लिए पूरे परिवार को भाखरी के लिए भीख मांगनी होती थी. परिवार ...अधिक पढ़ें

हाइलाइट्स

महार जाति के साथ मरे हुए मवेशियों का मांस खाने की महार परम्परा भी जुड़ी हुई थी.
गले में घड़ा लटकाकर चलना पड़ता था ताकि उनका थूक उस जमीन को दूषित न कर दे.
पांवों के निशान मिटाने के लिए पीछे की जमीन को भी बुहारते हुए चलना पड़ता था.
ब्राह्मणों से अच्छा-खासा फासला तो रखना पड़ता था ताकि परछाईं से भी वे दूषित न हो जाएं.

संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर का भारतीय राजनीति में अलग ही स्थान है. दलितों के महानायक बाबा साहेब अपने समय में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों में शुमार थे. बताते हैं कि उनके निजी पुस्तकालय में 35,000 से अधिक पुस्तकें थीं. विदेश लेखक क्रिस्तोफ जाफ्रलो ने डॉ. आंबेडकर की जीवनी लिखी है. यह जीवनी हिंदी में ‘भीमराव आंबेडकर : एक जीवनी’ नाम से राजकमल प्रकाशन से छपकर आई है. इसका हिंदी में अनुवाद किया है योगेंद्र दत्त ने. यह पुस्तक डॉ. आंबेडकर को नजदीक से जानने और समझने का एक अच्छा प्रयास है. प्रस्तुत है इस पुस्तक का एक अंश-

आंबेडकर जिस महार जाति में पैदा हुए वह मांग (रस्सी बनाने वालों) और चांभार (चमड़े का काम करने वालों) के बीच पड़ने वाली एक अछूत जाति थी. इस जाति को जो काम करने को दिए जाते थे उनके कारण उन्हें छिटपुट व्यावसायिक कामों की छूट भी मिल जाती थी. खैर, इन सब बातों का फायदा उठाते हुए महार अस्पृश्यों का नेतृत्व धीरे-धीरे अपने हाथों में लेते गए. इसके पीछे आंशिक रूप से उनकी संख्या का भी हाथ था.

1931 में बॉम्बे प्रेजिडेंसी में अस्पृश्यों की कुल आबादी में से 68.9 प्रतिशत महार ही थे जबकि चांभारों की आबादी 16.2 प्रतिशत और मांगों की आबादी 14.9 प्रतिशत थी. पूरी आबादी में उनकी संख्या मराठों (20.2 प्रतिशत) से कम मगर ब्राह्मणों (4.4 प्रतिशत) से बहुत ज्यादा थी.

बलूतेदारी व्यवस्था में प्रचलित श्रम विभाजन के तहत उनकी भूमिका खालिस घाटे की भी नहीं थी: महार ऐसे काम भी करते थे जिनकी वजह से उन्हें ऊंची जातियों के सम्पर्क में आने और इस तरह कुछ अलग तरह की जिम्मेदारियां निभाने का मौका मिल जाता था. इससे भी अहम बात ये रही कि पेशवा की सेना में अपनी पुरानी मौजूदगी का फायदा उठाते हुए महार ब्रिटिश सेना में भी बड़ी संख्या में भर्ती हुए. फलस्वरूप, बहुत सारे महारों के लिए छावनियों में रहना भी सामाजिक गतिशीलता का एक बढ़िया साधन साबित हुआ. किसी खास पेशे में दक्षता या विशेषज्ञता न होने के चलते महार गांव छोड़ने वालों में भी सबसे आगे रहे. फलस्वरूप, शहरों में और आधुनिकता के सम्पर्क में भी सबसे पहले वही आए.

महार भक्ति आन्दोलन के ऐतिहासिक महत्त्व से भी बहुत गहरे तौर पर प्रभावित थे. महाराष्ट्र में यह आन्दोलन महान कवि तुकाराम के नेतृत्व में सत्रहवीं शताब्दी में अपने शिखर पर पहुंच गया था. भक्ति परम्परा ने न केवल ब्राह्मणों द्वारा तय किए गए अनुष्ठानों बल्कि स्वयं ब्राह्मणों से भी दूर रहते हुए केवल ईश्वर भक्ति के माध्यम से मोक्ष का सन्देश दिया. भक्ति परम्परा के अनुयायी ईश्वर के समक्ष मनुष्यों की समानता का सन्देश देते रहे हैं. वे जातिगत ऊंच-नीच को चुनौती देते हैं, भक्ति सम्प्रदायों और फलस्वरूप, समतापरक मूल्यों को अपनाने वाले पन्थों व सम्प्रदायों के विकास को बढ़ावा देते हैं.

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महाराष्ट्र में बहुत सारे महार तेरहवीं शताब्दी में शुरू हुए महानुभव पन्थ से भी जुड़े रहे हैं. हिन्दू धर्म के कर्ताधर्ताओं ने इस पन्थ का बहिष्कार कर दिया था क्योंकि यह पन्थ जातिगत भेदों को नहीं मानता था. इस पन्थ से जुड़ाव की बदौलत कुछ महार अपने अलग अनुष्ठान और विश्वास कायम करने में कामयाब हुए. मगर, भक्ति आन्दोलन महारों को जाति व्यवस्था के खिलाफ बगावत के लिए प्रेरित करने की बजाय उन्हें अस्तित्व की सामाजिक परिस्थितियों को समाप्त करके जाति व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता था. ब्राह्मण उत्पीडन की इतनी हाय-तौबा ही क्यों जबकि अस्तित्व का मुख्य उद्देश्य ही है इस जगत के परे मिलने वाले जीवन में मोक्ष प्राप्त करना.

महार जाति में जन्मे कवि चोखामेला भी तेरहवीं शताब्दी के एक मुख्य व्यक्ति थे जिन्होंने अपने शानदार दोहों में इस तर्क के बेहतरीन उदाहरण दिए हैं. आंबेडकर को न केवल यह समृद्ध विरासत मिली थी बल्कि वह अपना मुक्तिकामी सन्देश रचने में भी कामयाब रहे.

महार, अन्तिमों में पहला
महाराष्ट्र के समाज में महारों की एक खास, बिलकुल अनूठी हैसियत रही है. जैसा कि ऊपर जिक्र किया गया था, उनके पास बलूत का जिम्मा होता था, और वे गांव के सबसे महत्त्वपूर्ण बलूतेदारों में भी गिने जाते थे. यह बात उन्हें मिलने वाले भुगतानों से समझी जा सकती है. फसलों की कटाई के समय प्रत्येक काश्तकार बलूतेदारों को भुगतान के लिए अपने खलिहान में पेंढी/अनाज की पूलियां कतार में रख देता था. पेंढियों को तीन कतारों में रखा जाता था. हैसियत के हिसाब से प्रत्येक कतार एक बलूतेदार के लिए होती थी. महारों को हमेशा पहली कतार में से पेंढी उठाने का मौका मिलता था. न केवल महारों को कटाई में एक अहम हिस्सा मिलता था बल्कि उनके वतन (बिना राजस्व वाली ज़मीन का टुकड़ा) अधिकार को भी पाटिलों और कुलकर्णियों की तरह मान्यता मिली थी. यह सुविधा बाकी बलूतेदारों के लिए नहीं थी.
जैसा कि त्राउदे पिल्लई-वेट्शरा ने बताया है, ‘महार वतन या हडोला प्राय: बढिय़ा गुणवत्ता का होता था’ मगर पेशवाओं ने व्यवस्था दी थी कि इस जमीन को न तो बेचा जा सकता है और न ही यह वतनदार से छीनी जा सकती है.

अपनी वतनदारी हैसियत के बावजूद महार कई तरह की दूसरी भूमिकाएं भी निभाते थे. उनमें से कुछ काम खासतौर से दूषित श्रेणी के होते थे. पिल्लई-वेट्शरा ने महारों द्वारा किए जाने वाले कामों की एक सूची दी है जो सबसे बढ़कर अपनी विविधता के लिहाज से महत्त्वपूर्ण दिखाई पड़ती है. इस सूची के अनुसार, महार न केवल चौकीदार और पहरेदार हुआ करते थे बल्कि चोरी-चकारी होने पर पुलिस के सहायक की भूमिका निभाते थे. कुली का काम करते थे. एक गांव से दूसरे गांव तक लोगों को ले जाने वाले गाइड होते थे. गांव की सीमा तय करने वाले रेफरी होते थे. लगान वसूलते थे और भूस्वामियों को लगान का सम्मन भेजते थे. सरकारी खजाने के साथ पहरे पर चलते थे. सड़कों को साफ करते थे. मौत की खबर पहुंचाते थे. दूसरे गांवों में खबर पहुंचाते थे. श्मशान में लकड़ी लाने और मरे हुए मवेशियों को उठाने के काम करते थे.

इन सारे कामों में से अन्तिम काम स्वाभाविक रूप से सबसे दूषित दिखाई पड़ता है. खासतौर से इसलिए भी क्योंकि इसके साथ मरे हुए मवेशियों का मांस खाने की महार परम्परा भी जुड़ी हुई थी. महार जाति के लोग अस्पृश्यता के जिस कलंक से जूझ रहे थे उसकी सघनता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई जगह तो उन्हें अपने गले में घड़ा लटकाकर भी चलना पड़ता था ताकि उनका थूक उस जमीन को दूषित न कर दे जिस पर ब्राह्मणों के पैर पड़े हैं. अपने पांवों के निशानों को मिटाने के लिए उन्हें अपने पीछे की जमीन को भी बुहारते हुए चलना पड़ता था. कम से कम उन्हें ब्राह्मणों से अच्छा-खासा फासला तो रखना ही पड़ता था ताकि अपनी परछाईं से भी वे उनको दूषित न कर दें.

पिल्लई-वेट्शरा के मुताबिक, महारों पर इस तरह की पाबन्दियां पेशवाओं के जमाने में थोपी गई थीं. महार गांव के बाहर, महारवाड़े में रहते थे. यह एक अलग मोहल्ला होता था. अगर महारों को वतन (जमीन के टुकड़े पर मिलने वाला पैतृक अधिकार) और बलूत (गांव की सेवा के बदले वस्तु के रूप में मिलने वाला भुगतान) की सुविधा मिली हुई थी तो उन्हें अपनी मजदूरी के लिए भीख भी मागनी पड़ती थी.

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बेबी कांबले ने अपने संस्मरणों में घर-घर जाकर भाखरी (जूठन) इकट्ठा करने के अनुभवों को भी दर्ज किया है- “पूरे परिवार द्वारा किए जाने वाले इस दैनिक श्रम के भुगतान के लिए पूरे परिवार को भाखरी के लिए भीख मांगनी होती थी. परिवार के महार मुखिया के पास छड़ी पर लटकी छोटी-छोटी गोल घंटियां होती थीं जिनको सुनकर गांव के लोग दूर हट जाते थे. जो महार भीख मांगने निकलता था वह महारवाड़े से निकलते समय अपनी छाती फुलाता था. मूछों को ताव देता था और एक मर्द की तरह अपना गला खंखारते हुए इतरा कर चलता था. वह अपनी छड़ी और उस पर बंधी छोटी-छोटी घंटियों की तरफ ऐसे देखता था मानो किसी सम्राट का राजदंड हो! वकील के लबादे की तरह कन्धे पर काला ऊनी कम्बल डालकर चलता था. मगर, जैसे ही वह गांव में दाखिल होता, उसकी कद-काठी सिकुड़ जाती. वह कुबड़े की तरह झुक जाता और घोंघे की तरह घिसटकर चलने लगता. किसी के दरवाजे पर पहुंच कर वह अपना मुंह खोले बिना बस तीन बार अपनी घंटियों को टनटनाता था. तब सड़े-बुसे खाने के कुछ टुकड़े उसके कम्बल में फेंक दिए जाते थे. गांव का चक्कर पूरा होते-होते उसके कम्बल की झोली आधी से ज़्यादा भर जाती थी. महार अपने कन्धे पर भाखरी लादे खुशी-खुशी घर लौट आता था. फिर पूरा परिवार पेट भर कर यही भाखरी खाता था.”

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महारों द्वारा किए जाने वाले कुछ परम्परागत कामों को सम्मानजनक भी माना जाता था क्योंकि उनकी वजह से वे ऊंची जातियों के सम्पर्क में आते थे. गांव के पहरेदार की हैसियत से उन्हें मेहमानों की पहचान दर्ज करनी होती थी और उनके आने का कारण दर्ज करना होता था. मगर, उन्हें सबसे ज़्यादा प्रतिष्ठा जिस काम से मिलती थी उसका ब्योरा रॉबर्टसन ने बहुत सटीक ढंग से दिया है. बीसवीं शताब्दी के पहले तीन दशकों के दौरान महाराष्ट्र में मिशनरी के तौर पर काम करने वाले रॉबर्टसन बताते हैं- “महार के लिए सबसे ज्यादा फख्र का काम है सरकारी हरकारे (सन्देशवाहक) का काम करना. इस काम में अकसर उसे बहुत सारा धन भी जिला कोषागार तक पहुंचाना होता है. ऐसी जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए उसे अपने पुरखों से वफादारी की एक रिवायत मिली है. जब हुकूमत के अफसरों को गांवों की सीमाओं के बारे में सटीक जानकारियों की जरूरत होती है तो महार से ही वह जानकारी मिलती है. बड़ी संजीदगी से खेत की सीमा पर चलते हुए वह सीमा तय करता है. बंटाई और बकाया लगान की वसूली के लिए आए राजस्व अधिकारी के सामने हाजिरी के लिए किसानों को बुलाने का जिम्मा भी महारों को ही सौंपा जाता है.”

इससे पता चलता है कि कुछ कामों को करते हुए महार होने में एक गर्व का भाव महसूस किया जा सकता था. इस बात की बहुत सारे लोगों ने तस्दीक की है. पिल्लई-वेट्शरा का कहना है कि ‘अपनी निम्न जाति के बावजूद महार एक बहुत सम्मानजनक हैसियत रखते थे.’ जबकि जयश्री गोखले ने बताया है कि ‘गांव की सीमाओं को निर्धारित करने और गांवों के बीच सीमाओं से सम्बन्धित विवादों के समाधान में महारों की भूमिका से उनको ‘एक ऐसा कद मिल जाता था जो और किसी जाति के पास नहीं था.’

कुछ महारों में एक निश्चित किस्म का आत्मविश्वास भी दिखाई पड़ता था. दया पवार बताते हैं कि वह जिन महारों को जानते थे, ‘उनको देखकर ऐसा नहीं लगता था कि वे भीख मांगते हैं. अपने भुगतान (बलूत) को वे एक अधिकार की तरह देखते थे. पीढ़ियों से उनको ये मालूम था कि उनके पुरखों को 52 अधिकारों की फेरिस्त दी गई थी (प्रत्येक महार इस परम्परा में गौरव महसूस करता था).’ महार अन्तिमों में सबसे पहले जो प्रतीत होते थे, यह तथ्य काश्तकारों के रूप में उनकी भूमिका का नतीजा थी. और यह भूमिका वतनदार की उनकी हैसियत का परिणाम थी जिससे उन्हें जमीन रखने और उसको जोतने का अधिकार मिल जाता था.

Tags: Books, Dr. Bhim Rao Ambedkar, Hindi Literature, Literature

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