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गांधी को पहचाने बिना गांधी के बारे में बताना मुश्किल है, पुस्तक अंश 'गांधी मेरे भीतर'

गांधी ने कम वर्षों में बहुत लंबा जीवन जिया और जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें उन्होंने सत्य के प्रयोग नहीं किए.

गांधी ने कम वर्षों में बहुत लंबा जीवन जिया और जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें उन्होंने सत्य के प्रयोग नहीं किए.

आज की पीढ़ी को गांधी के बारे में ठीक से बताया नहीं गया है. बताने में ख़तरा है, क्योंकि जो भी असली गांधी की चर्चा करेगा, वह स्वयं उनकी कसौटी पर थोड़ा भी खरा नहीं उतरेगा. गांधी को पहचाने बिना गांधी के बारे में बताना मुश्किल है.

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    विशिष्ट पत्रकार राजकिशोर (RajKishore) शुरू में गांधीजी से अप्रभावित रहे. बल्कि वे अकसर गांधी की आलोचना भी करते थे. लेकिन अयोध्या विवाद और दलित राजनीति के उभार के दिनों में राजकिशोर गांधीजी की ओर बड़ी तेजी से आकर्षित हुए. महात्मा के साथ उनका द्वंद्वात्मक रिश्ता अभी भी बना हुआ है. इस रिश्ते की गहन छानबीन का ही रचनात्मक नतीजा है गांधी पर लिखे गए लेखों का यह संग्रह- ‘गांधी मेरे भीतर’. इन लेखों से गांधी को समझने की एक नई दृष्टि मिलती है. साथ ही, हमारे समय से द्वंद्वों के भीतर पैठने की एक नई चाहत और साहस भी.

    राजकिशोर के गांधीजी पर लेखों का संग्रह वाणी प्रकाशन (Vani Prakashan) ने गांधी मेरे भीतर (Gandhi Mere Bheetar) शीर्षक से प्रकाशित किया है. प्रस्तुत है इस पुस्तक का एक अंश- ‘आज गांधी कहां हैं

    आज गांधी कहां हैं? इस प्रश्न का सबसे सीधा उत्तर है : हमारी स्मृतियों में. गांधी युग के बहुत थोड़े-से लोग हमारे बीच हैं. जो हैं, उन्हें देख कर गांधी की खूबियों की याद नहीं आती. कोई खादी का काम करता है, कोई ग्राम निर्माण में लगा है, कोई स्वतंत्रता सेनानी का पेंशन लेता है, तो कोई देश-विदेश में गांधीवाद का प्रचार करता है. बेशक इनमें से कई काम गांधीजी भी करते थे, लेकिन वे संघर्ष और सत्याग्रह भी करते थे और लोगों के बीच जाते रहते थे. जरूरत पड़ने पर उपवास भी करते थे, जिसे आजकल अनशन कहा जाता है. सत्ता से दूर रहते थे और अपनी जीवन शैली में भारत के दरिद्रतम लोगों का प्रतिनिधित्व करते थे. ऐसा एक भी व्यक्ति आज हमारे बीच नहीं है.

    फिर गांधी हमारी स्मृतियों में क्यों हैं? क्योंकि उनके जैसा महापुरुष मानव इतिहास में पैदा नहीं हुआ. क्योंकि वे उन चुनिन्दा लोगों में हैं, जिन पर हम गर्व करते हैं और हमारी आनेवाली पीढ़ियां भी गर्व करती रहेंगी.

    आज की पीढ़ी को गांधी के बारे में ठीक से बताया नहीं गया है. बताने में ख़तरा है, क्योंकि जो भी असली गांधी की चर्चा करेगा, वह स्वयं उनकी कसौटी पर थोड़ा भी खरा नहीं उतरेगा. गांधी को पहचाने बिना गांधी के बारे में बताना मुश्किल है.

    आज कितने लोग यह दावा कर सकते हैं कि वे गांधी को पहचानते हैं? इसलिए हमारी स्मृति में गांधी वैसे ही हैं, जैसे भगवान बुद्ध हैं, ईसा मसीह हैं अथवा राम और कृष्ण हैं. गांधी की एक धुंधली-सी छवि हमारी आंखों में बसी हुई है, जिसमें वे लगभग नंगे बदन हैं, लाठी का सहारा ले कर चलते हैं और बहुत बड़े महात्मा हैं. यह छवि एक तरह से धार्मिक छवि है या ऐसी ऊंचाई पर पहुंचे हुए आदमी की, जिसके प्रति श्रद्धा तो पैदा होती है, पर हम यह मानते हैं कि उसका हमारे व्यावहारिक जीवन में कोई उपयोग नहीं है. वे एक बुत हैं, एक आइकन हैं, एक प्रतीक हैं – किसी ऐसे बीते हुए स्वर्ण युग की यादगार हैं, जो जरूर महान रहा होगा, पर आज हमारे महान बनने में जिसका कोई योगदान नहीं हो सकता.

    Gandhi Mere Bheetar

    Image Credit- Vani Prakashan

    अब तो इस पर भी बहस होने लगी है कि क्या उन्हीं के कारण हमें स्वतंत्रता मिली? ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है, जो मानते हैं कि हमारे स्वतंत्रता संघर्ष में गांधी का योगदान बहुत ज़्यादा नहीं था. स्वयं गांधी ने यह दावा कभी नहीं किया कि वे आज़ादी दिला रहे हैं. उनका कहना यह था कि जब लोग स्वदेशी को अपना लेंगे और हिंदु-मुसलमान एक-दूसरे के नज़दीक आ जाएंगे. तो आज़ादी अपने आप मिल जाएगी. वे कहते थे कि मैं आज़ादी के लिए प्रतीक्षा कर सकता हूं, पर स्वदेशी और सांप्रदायिक एकता के लिए नहीं – इन्हें तो आज ही और अभी हासिल करना हैं. कुछ आधुनिकतावादियों में गांधी के प्रति आकर्षण दिखाई देता है, पर सिर्फ सिद्धांत और विचार के स्तर पर, व्यावहारिक जीवन में वे दूसरों की तरह ही ‘आधुनिक’ हैं.

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    धर्मनिरपेक्षता के समर्थकों को इसलिए गांधी याद आते हैं, क्योंकि उनका इस्तेमाल सांप्रदायिकता से लड़ने के लिए किया जा सकता है. इस सेकुलर बिरादरी को गांधी की अन्य शिक्षाओं से कोई मतलब नहीं है. गांधी को दलित भी याद करते हैं, लेकिन उनका विरोध करने के लिए, उन्हें ब्राह्मणवादी बताने के लिए, उन्हें जूते मारने के लिए. जबकि गांधी के जीवनकाल में उनका सबसे उग्र विरोध सनातनधर्मियों ने ही किया था, क्योंकि वे अस्पृश्यता को हिंदू समाज का सबसे बड़ा कलंक मानते थे और अस्पृश्यता निवारण के लिए आंबेडकर के समानांतर अपने ढंग से कठिन संघर्ष कर रहे थे.

    सरकारी तंत्र को गांधी इतने-भर के लिए याद आते हैं कि ख़ास-ख़ास अवसरों पर राजघाट जा कर फूल चढ़ा आया जाए और सौ-पाच सौ-हजार रुपए के नोटों पर उनकी हंसती हुई दंतहीन तस्वीर छाप दी जाए.

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    कभी-कभी सरकारी भाषणों में गांधी को पंचायती राज या इस बात के लिए याद कर लिया जाता है कि उन्होंने आखिरी आदमी के कल्याण को सभी कामों की कसौटी माना था.

    ऐसा लगता है कि गांधी के मरने के बाद गांधी का सबसे ज़्यादा रचनात्मक उपयोग कुछ विदेशियों ने ही किया. इस संदर्भ में मार्टिन लूथर किंग की याद आती है, जिन्होंने अहिंसक तरीकों से अमेरिका में अश्वेत लोगों के मानव अधिकारों के लिए संघर्ष किया और ख़ुद भी गांधी की तरह गोलियों के शिकार हो कर मारे गए.

    अफ्रीका में डेसमंड टूटू हैं, जिनका जीवन गांधी के काफ़ी नज़दीक है. और भी अनेक व्यक्ति और समुदाय हैं, जो गांधी के रास्ते पर चलते हुए जीवन जीते हैं और जरूरत पड़ने पर गांधीवादी तरीके से संघर्ष करते हैं. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में जर्मनी के शमाकर सादगी भरी जिंदगी के बहुत बड़े प्रयोगकर्ता थे. वे गांधीवादी मॉडल की उत्पादन पद्धति की खोज में लगे रहे.

    पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया की जनता ने गांधी के तरीके से ही रूसी आधिपत्य का विरोध किया और सफलता पाई. गांधी पर शोध करनेवाले विदेशी विद्वानों की कमी नहीं है, हालांकि उनकी खोज का दायरा मात्र बौद्धिक है.

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    हर साल गांधी पर कोई न कोई नई किताब छप कर बाज़ार में आ जाती है. जबकि गांधी का कहना था कि मैं विद्वान नहीं हूं, मैं तो सत्य का संधान इसलिए कर रहा हूं कि अहिंसा के रास्ते पर चल सकूं; ऐसी विद्वत्ता का मेरे लिए कोई मोल नहीं है, जिससे मुझे जीने का कोई सूत्र न मिल सके.

    इनके बावजूद गांधी की एक बड़ी विरासत है, जो उनकी जीवनियों में बिखरी पड़ी है, जो सौ से ज्यादा खंडों में संकलित उनके लेखन में फैली हुई है, जो उनके बारे में लिखित सैकड़ों व्यक्तियों के संस्मरणों में सिमटी हई है और जिसकी कुछ झांकी हम वर्धा के उनके सेवाग्राम आश्रम और दिल्ली के गांधी म्यूज़ियम या एटनबरो की फ़िल्म में देख सकते हैं.

    गांधी ने कम वर्षों में बहुत लंबा जीवन जिया और जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें उन्होंने सत्य के प्रयोग नहीं किए.

    आज गांधी की विरासत के कई हिस्सों को हम बड़ी आसानी से छोड़ सकते हैं. ब्रह्मचर्य की महत्ता पर उन्होंने जैसा बल दिया, वह निरर्थक है. यह भी ज़रूरी नहीं है कि हर आदमी रोज़ दो घंटे तकली चलाए. इस तरह के बहुत-से गांधीवादी प्रतीक अपना अर्थ खो चुके हैं. लेकिन कौन कह सकता है कि गांधी की अहिंसा के बिना अच्छा जीवन जिया जा सकता है? गांधी के लिए अहिंसा का अर्थ सिर्फ हिंसा का निषेध नहीं था. यह तो उनके लिए प्राणी मात्र से प्रेम का पर्याय था.

    आज हमारे मन में दूसरों के प्रति कोई प्रेम नहीं है, क्या इसीलिए सारी समस्याएं पैदा नहीं हो रही हैं? जहां प्रेम होगा, वहां किसी भी प्रकार की हिंसा कैसे रह सकती है? और जब हिंसा नहीं होगी, तो ऐसी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था कैसे बनाई जा सकती है, जो झूठ, मक्कारी, शोषण और बर्बादी पर टिकी हुई है? कोई भी ऐसी व्यवस्था कैसे चल सकती है, जो विषमता पर आधारित हो और जिसमें विषमता बढ़ती जाती हो?

    पर्यावरण के प्रति हिंसा तभी होगी, जब मानव संबंधों में हिंसा होगी, उत्पादन की पद्धति हिंसा पर आधारित होगी. जो अंतरराष्ट्रीय संबंध स्वार्थ, विषमता, हथियारी ताकत और मानवाधिकारों के उल्लंघन पर टिके हुए हैं, उनमें सत्य और अहिंसा कौन खोज सकता है? जो चीजें जीवन के लिए जरूरी हैं, वे सबको मिलनी चाहिए, इस विचार को मानने के बाद उपभोक्तावाद के लिए गुंजाइश कहां रह जाती है, क्योंकि जैसा कि गांधी जी ने बहुत सुंदर और साफ तरीके से कहा, धरती सबकी जरूरतों को पूरा कर सकती है, पर किसी भी आदमी के लालच को पूरा करने में असमर्थ है. गांधी को मानने के बाद भारत में दलित समस्या और विदेश में अश्वेत समस्या कैसे बनी रह सकती है?

    यह सच है कि गांधी की शिक्षाओं को टुकड़े-टुकड़े में नहीं देखा जा सकता. वह एक पूरी जीवन पद्धति है, जिसे समझने की शुरुआत तभी हो सकती है, जब हम उसके अनुसार जीने का प्रयास करते हैं. तभी यह निर्णय किया जा सकता है कि गांधी को कितना छोड़ देना चाहिए और कितना ग्रहण करना चाहिए. यकीन मानिए कि जब दूसरी जीवन पद्धतियों की पोल खुल चुकी होगी, उनका खोखलापन उजागर हो चुका होगा और मानवता में सच्चे व खरे जीवन के लिए आकुलता पैदा होगी, तब जो महापुरुष याद आएंगे, उनमें गांधी का नंबर सबसे ऊपर होगा.

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