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'गुनाहों का देवता' पढ़कर खूब रोई थीं सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज ज्ञान सुधा मिश्र

'साहित्यकारों की पत्नियां' पुस्तक में देश के शीर्ष साहित्यकारों की पत्नियों के व्यक्तित्व, उनके त्याग और समर्पण की गाथा है.

'साहित्यकारों की पत्नियां' पुस्तक में देश के शीर्ष साहित्यकारों की पत्नियों के व्यक्तित्व, उनके त्याग और समर्पण की गाथा है.

‘साहित्यकारों की पत्नियां’ भारतीय साहित्य में अपने-आप में पहली और अनूठी पुस्तक है. इसमें साहित्यकारों की पत्नियों का उल ...अधिक पढ़ें

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज ज्ञान सुधा मिश्रा ने समाज में साहित्य के प्रति घटते अनुराग पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि आज की पीढ़ी किताबें कम पढ़ती हैं बल्कि टीवी सीरियल अधिक देखा करती है जिसके कारण उनके भीतर वे संस्कार नहीं आते जो साहित्य हमें देते हैं.

शाम हिंदी नवजागरण के अग्रदूत शिवपूजन सहाय की साठवीं पुण्यतिथि के मौके पर आयोजित समारोह में ज्ञान सुधा मिश्रा ने यह बात कही.

स्त्री दर्पण और रजा फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस समारोह में हिंदी के वरिष्ठ कवि और पत्रकार विमल कुमार द्वारा संपादित पुस्तक “साहित्यकारों की पत्नियां” और युवा कथाकार शिल्पी झा के कहांनी संग्रह “सुख के बीज” तथा स्त्री लेखा पत्रिका के मृदुला गर्ग अंक का लोकार्पण किया गया.

झारखंड हाईकोर्ट की पहली महिला चीफ जस्टिस रह चुकीं ज्ञान सुधा मिश्रा ने इस अवसर पर कहा कि हम लोग अपने जमाने में लेखकों का ऑटोग्राफ लेते थे. उन्होंने बताया कि जब वह 16-17 साल की थीं तो उनके घर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर आए. उन्होंने देखकर वह रोमांचित हो उठीं और उनका ऑटोग्राफ लेने के लिए दौड़ पड़ीं.

ज्ञान सुधा मिश्रा ने कहा कि उनके पिता भी साहित्य अनुरागी थे और घर में दिनकर, जनार्दन प्रसाद झा, फणीश्वरनाथ रेणु जैसे लेखकों की बैठकी लगती थी. वहीं से उनके भीतर साहित्य के प्रति अनुराग विकसित किया. उन्होंने बताया कि जब वह थोड़ी और बड़ी हुईं तो यशपाल, अज्ञेय और धर्मवीर भारती को पढ़ा. धर्मवीर भारती के ‘गुनाहों का देवता’ उपन्यास पढ़कर तो वह कई बार रोईं.

अब ना रावण की कृपा का भार ढोना चाहता हूं, आ भी जाओ राम मैं मारीच होना चाहता हूं

उन्होंने कहा कि साहित्यकारों की पत्नियों ने बड़ा त्याग और संघर्ष किया. जब स्त्रियां कामकाजी हो गईं तो उनका संघर्ष बड़ा हो गया. क्योंकि, उन्हें घर और नौकरी, दोनों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी.

अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध विद्वान हरीश त्रिवेदी ने हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी के लेखकों की पत्नियों के बारे में अनेक रोचक प्रसंग सुनाए. उन्होंने कहा कि अंग्रेजी की कई लेखिकाएं अपने पतियों से अधिक मशहूर हुईं तो कई लेखिकाओं ने शादी ही नहीं की.

प्रेमचंद की जीवनी “कलम के सिपाही” का अंग्रेजी में अनुवाद करने वाले हरीश त्रिवेदी ने इलाहाबाद में प्रेमचंद परिवार से अपने निकट संबंधों की चर्चा करते हुए कहा कि शिवरानी देवी बड़ी दबंग महिला थीं और उनके व्यक्तित्व का प्रभाव प्रेमचंद पर भी पड़ा था. विवाह के बाद शिवरानी देवी के कारण धीरे-धीरे प्रेमचंद भी सहृदय और मुलायम व्यक्ति बन गए थे.

कवयित्री सविता सिंह ने ‘स्त्री दर्पण’ प्लेटफॉर्म के बारे में बताया और कहा कि इस डिजिटल प्लेटफार्म ने साहित्यकारों की पत्नियां जैसी लोकप्रिय शृंखला चलाई, जिसे काफी पसंद किया गया है.

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प्रसिद्ध साहित्यकार शिवपूजन सहाय के नाती राकेश रंजन ने अपने नाना पर संस्मरण सुनाए. उन्होंने कहा कि उनके नाना जी दूसरों के लिए जीनेवाले लेखक थे और उनका व्यक्तित्व उनके कृतित्व से भी बड़ा था.

शास्त्रीय गायिका मीनाक्षी प्रसाद ने शिवपूजन सहाय की पत्नी बच्चन देवी के बारे में लोगों को जानकारी दी. उन्होंने बताया कि बच्चन देवी की स्मृति में पटना में होने वाली गोष्ठियों में देश के सभी बड़े लेखक भाग लेते रहे हैं.

समारोह में विनोद भारद्वाज, रेखा अवस्थी, ओम प्रकाश मिश्र, सुधांशु रंजन, सुरेश नौटियाल, कुसुम पालीवाल, श्याम सुशील, मनोज मोहन, वाजदा खान. मीना झा, सविता पाठक और बलकीर्ति समेत कई लेखक और पत्रकार मौजूद थे. समारोह का संचालन युवा कथाकार पत्रकार शिल्पी झा ने किया.

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