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‘वैशाली की नगरवधू’ को अपनी एकमात्र रचना घोषित करता हूं- आचार्य चतुरसेन शास्त्री

'वैशाली की नगरवधू' आचार्य चतुरसेन का एक ऐसा कालजयी हिन्दी उपन्यास है जिसकी गणना हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में की जाती है.

'वैशाली की नगरवधू' आचार्य चतुरसेन का एक ऐसा कालजयी हिन्दी उपन्यास है जिसकी गणना हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में की जाती है.

आचार्य चतुरसेन ने आयुर्वेद सम्बन्धी लगभग एक दर्जन ग्रंथ लिखे. उन्होंने आरोग्य शास्त्र, स्त्रियों की चिकित्सा, आहार और जीवन, मातृकला और अविवाहित युवक-युवतियों के लिए भी उपयोगी पुस्तके लिखीं.

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Acharya Chatursen Shastri: हिन्दी साहित्य की दुनिया में जब भी ऐतिहासिक चरित्र या घटनाओं का जिक्र होता है तो ‘सोमनाथ (Somnath)’, ‘वयं रक्षामः’ और ‘वैशाली की नगरवधू’ नाम सबसे पहले उभर कर आता है. और फिर शुरू हो जाता है आचार्य चतुरसेन शास्त्री और उनकी लिखी कृतियों का.

उपन्यास, कहानी, चिकित्सा शास्त्र, शिक्षा से लेकर धर्म, संस्कृति, नैतिक शिक्षा तक शायद ही ऐसी कोई विधा हो जो चतुरसेन शास्त्री से अछूती रही हो. शास्त्रीजी हिन्दी के उन साहित्यकारों में हैं जिनका लेखन-क्रम साहित्य की किसी एक विशिष्ट विधा में सीमित नहीं किया जा सकता.

‘वैशाली की नगरवधू’ (Vaishali Ki Nagarvadhu) आचार्य चतुरसेन का एक ऐसा कालजयी हिन्दी उपन्यास है जिसकी गणना हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में की जाती है. इस उपन्यास के सम्बन्ध में खुद चतुरसेन शास्त्री ने कहा था, ‘मैं अब तक की सारी रचनाओं को रद्द करता हूं और ‘वैशाली की नगरवधू’ को अपनी एकमात्र रचना घोषित करता हूं.’

आचार्य चतुरसेन का जीवन परिचय (Chatursen Shastri jeevan parichay)
26 अगस्त, 1891 को उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर (Bulandshahr) जिले के चांदोख गांव में जन्में चतुरसेन शास्त्री का अधिकतर लेखन ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है.

चतुरसेन शास्त्री (Chatursen Shastri) के बचपन का नाम चतुर्भुज था. उनकी प्राथमिक शिक्षा उनके गांव के ही नजदीक सिकन्दराबाद कस्बे में हुई थी. सिकंदराबाद के बाद उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने राजस्थान का रुख किया और जयपुर के संस्कृत कॉलेज में दाखिला लिया. यहां से उन्होंने 1915 में आयुर्वेद में आयुर्वेदाचार्य तथा संस्कृत में शास्त्री की उपाधि प्राप्त की.

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शिक्षा पूरी करने के बाद चतुरसेन शास्त्री बतौर आयुर्वेदिक चिकित्सक (Ayurveda) कार्य करने के लिए दिल्ली आ गए. बताया जाता है कि दिल्ली में उन्होंने अपनी एक आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी खोली. डिस्पेंसरी घाटे का सौदा साबिद हुई और इसे बन्द करना पड़ा. डिस्पेंसरी के चलते उनकी आर्थिक स्थिति इतनी बिगड़ी गई कि उन्हें अपनी पत्नी के जेवर तक बेचने पड़े. उन्हें 25 रुपये प्रति माह के वेतन पर एक धर्मार्थ औषधालय में नौकरी करनी पड़ी.

यहां कुछ समय कार्य करने के बाद आचार्य चतुरसेन शास्त्री सन 1917 में लाहौर (Lahore) के डीएवी कॉलेज में आयुर्वेद के वरिष्ठ प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए. लेकिन कॉलेज प्रबन्धन के साथ उनका ताल-मेल नहीं बैठा और यहां से भी उन्होंने इस्तीफा दे दिया. अब वे अपने ससुर के कल्याण औषधालय में मदद करने के लिए अजमेर आ गए.

अजमेर में रहते हुए चतुरसेन शास्त्री की आर्थिक स्थिति में सुधार आया. यहां उन्होंने लेखन कार्य भी शुरू कर दिया और जल्द ही एक आयुर्वेद चिकित्सक के साथ-साथ कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में भी प्रसिद्ध होने लगे.

चतुरसेन शास्त्री का रचना संसार (Acharya Chatursen Shastri Sahitya)
आचार्य चतुरसेन ने आयुर्वेद सम्बन्धी लगभग एक दर्जन ग्रंथ लिखे. उन्होंने आरोग्य शास्त्र, स्त्रियों की चिकित्सा, आहार और जीवन, मातृकला और अविवाहित युवक-युवतियों के लिए भी उपयोगी पुस्तके लिखीं. इनके अलावा आचार्यजी ने प्रौढ़ शिक्षा, स्वास्थ्य, धर्म, इतिहास, संस्कृति और नैतिक शिक्षा पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं.

उन्होंने अपनी किशोरावस्था से ही हिन्दी में कहानी और गीतिकाव्य लिखना आरम्भ कर दिया था. बाद में वे उपन्यास, नाटक, जीवनी, संस्मरण, इतिहास तथा धार्मिक विषयों पर लिखने लगे. उन्होंने लगभग साढ़े चार सौ कहानियां लिखीं. वे अपनी शैली के अनोखे लेखक थे, जो अपने कथा-साहित्य में भी इतिहास, राजनीति, धर्मशास्त्र, समाजशास्त्र और युगबोध से सम्पृक्त विविध विषयों को दृष्टि में रखकर लिखते थे.

इस रचना से प्रसिद्ध हुए आचार्य चतुरसेन, राम की जगह रावण को बनाया मुख्य पात्र

आचार्य चतुरसेन के लगभग पचास वर्ष के लेखकीय जीवन में सृजित उनकी प्रकाशित रचनाओं की संख्या 186 है. उनको प्रसिद्धि उनके उपन्यासों से ही मिली. उनके उपन्यास रोचक और दिल को छूने वाले होते हैं. उनके उपन्यासों में ग्रामीण, नगरीय, राजसी जीवनशैली की झलक देखने को मिलती है. समाज और मनुष्य के कल्याणार्थ लिखा गया उनका साहित्य सभी के लिए उपयोगी रहा है.

सन् 1981 में आचार्य चतुरसेन का पहला उपन्यास ‘हृदय की परख’ प्रकाशित हुआ. इसके बाद उन्होंने 1921 में सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन को लेकर गांधीजी पर केन्द्रित आलोचनात्मक पुस्तक लिखीं, जो काफी चर्चित रही.

चतुरसेन शास्त्री ने ‘यादों की परछाई’ अपनी आत्मकथा में ‘राम’ को ईश्वर रूप में न बताकर मानव रूप में बताया. वयम रक्षाम: में भी उन्होंने राम के स्थान पर रावण को मुख्य पात्र के रूप में प्रस्तुत किया है.

उनकी कालजयी कृति ‘वयं रक्षाम:‘ (Vayam Rakshamah) प्रागैतिहासिक अतीत की कृति है. इसके कथानक के मूलाधार राक्षसराज रावण (Rawan) तथा महापुरुष राम (Ram) हैं.

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अपनी इस कृति के बारे में आचार्य चतुरसेन शास्त्री लिखते हैं, ‘इस उपन्यास में प्राग्वेदकालीन नर, नाग, देव, दैत्य-दानव, आर्य, अनार्य आदि विविध नृवंशों के जीवन के वे विस्मृत-पुरातन रेखाचित्र हैं, जिन्हें धर्म के रंगीन शीशे में देखकर सारे संसार ने अन्तरिक्ष का देवता मान लिया था. मैं इस उपन्यास में उन्हें नर-रूप में आपके समक्ष उपस्थित करने का साहस कर रहा हूं. आज तक कभी मनुष्य की वाणी से न सुनी गयी बातें, मैं आपको सुनाने पर आमादा हूं. उपन्यास में मेरे अपने जीवन-भर के अध्ययन का सार है.’

‘वयं रक्षाम:’ के एक भाग रुद्र में उन्होंने भगवान शिव की वंशावली के बारे में वर्णन किया है. शिव की वंशावली को उन्होंने तत्कालीन समुदाय के रूप में पेश किया है. इतना ही नहीं उन्होंने पृथ्वी के अधिकांश हिस्से में हमारे पौराणिक पात्रों के आधिपत्य होने का उल्लेख किया है.

‘वयं रक्षाम:’ में आचार्य चतुरसेन आर्य संस्कृति पर कुछ इस तरह प्रकाश डालते हैं- उन दिनों तक भारत के उत्तराखण्ड में ही आर्यों के सूर्य-मण्डल और चन्द्र मण्डल नामक दो राजसमूह थे. दोनों मण्डलों को मिलाकर आर्यावर्त कहा जाता था. उन दिनों आर्यों में यह नियम प्रचलित था कि सामाजिक श्रंखला भंग करने वालों को समाज-बहिष्कृत कर दिया जाता था. दण्डनीय जनों को जाति-बहिष्कार के अतिरिक्त प्रायश्चित जेल और जुर्माने के दण्ड दिये जाते थे.

वैशाली की नगरवधू‘ (Vaishali Ki Nagarvadhu) की भूमिका में आचार्य चतुरसेन ने लिखा है कि उन्‍होंने इस उपन्यास की रचना के लिए दस वर्ष तक आर्य, बौद्ध, जैन और हिन्‍दुओं के साहित्‍य का सांस्‍कृतिक अध्‍ययन किया.

इस उपन्‍यास में दो जगहों का बुनियादी महत्‍व है- वैशाली और मगध. मगध आर्य जाति का प्रतीक है, साम्राज्‍य (वादी) है. उसमें राजतंत्र है. राजा की इच्‍छा ही वहां कानून है. उसमें प्रायः अधिकारों की बात की जाती है. दूसरी तरफ वैशाली है जो मिश्रित जातियों का प्रतिनिधित्‍व करती है. उसमें गणतंत्र है, चुनी हुई राज्‍य-परिषद् का मत उसके लिए कानून है. उसमें अक्‍सर कर्त्‍तव्‍यों की बात की जाती है.

आचार्य चतुरसेन बचपन से ही आर्य समाज से प्रभावित थे. उन्होंने दिल्ली, शाहदरा की अनाज मंडी का घर दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड को दान कर दिया था, जिसमें आजकल विशाल लाइब्रेरी है. 2 फरवरी, 1960 को आचार्य चतुरसेन शास्त्री को इस दुनिया से हमेशा के लिए अलविदा कह दिया.

आचार्य चतुरसेन की मुख्य कृतियां (Chatursen Shastri ki kahaniyan)
चतुरसेन शास्त्री ने वैशाली की नगरवधू, सोमनाथ, वयं रक्षामः, गोली, सोना और ख़ून (तीन खंड), रक्त की प्यास, हृदय की प्यास, अमर अभिलाषा, नरमेध, अपराजिता, धर्मपुत्र और देवांगना उपन्यास लिखे.

आचार्य चतुरसेन की कहानियों की बात करें तो इनमें अक्षत, रजकण, वीर बालक, मेघनाद, सीताराम, सिंहगढ़ विजय, वीरगाथा, फंदा, लम्बग्रीव, दुखवा मैं कासों कहूँ सजनी, क़ैदी, आदर्श बालक, सोया हुआ शहर, कहानी ख़त्म हो गयी, धरती और आसमान और मेरी प्रिय कहानियां शामिल हैं.

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