• Home
  • »
  • News
  • »
  • literature
  • »
  • इस रचना से प्रसिद्ध हुए आचार्य चतुरसेन, राम की जगह रावण को बनाया मुख्य पात्र

इस रचना से प्रसिद्ध हुए आचार्य चतुरसेन, राम की जगह रावण को बनाया मुख्य पात्र

'वयं रक्षाम:' की कथावस्तु रामकथा पर आधारित है किंतु इस उपन्यास के मुख्य पात्र राम ना होकर रावण है.

'वयं रक्षाम:' की कथावस्तु रामकथा पर आधारित है किंतु इस उपन्यास के मुख्य पात्र राम ना होकर रावण है.

आचार्य चतुरसेन शास्त्री (Chatursen Shastri) का बचपन का नाम चतुर्भुज था और उनका जन्म 26 अगस्त 1891 को उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर (Bulandshahr) जिले के चांदोख गांव में हुआ था.

  • Share this:

Chatursen Shastri Birthday: हिन्दी भाषा के एक महान उपन्यासकार आचार्य चतुरसेन शास्त्री का आज जन्मदिन है. शास्त्रीजी का अधिकतर लेखन ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है. इनकी प्रमुख कृतियां ‘गोली’, ‘सोमनाथ’, ‘वयं रक्षामः’ और ‘वैशाली की नगरवधू’ हैं.

चतुरसेन शास्त्री (Chatursen Shastri) का बचपन का नाम चतुर्भुज था और उनका जन्म 26 अगस्त 1891 को उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर (Bulandshahr) जिले के चांदोख गांव में हुआ था. उनके पिता का नाम केवलराम ठाकुर तथा माता का नाम नन्हीं देवी था. उनकी प्राथमिक शिक्षा बुलन्दशहर जिले के ही कस्बे सिकन्दराबाद में हुई थी.

वाणी प्रकाशन ग्रुप (Vani Prakashan) ने उनकी कालजयी कृति ‘वयं रक्षाम:’ (Vayam Rakshamah) का प्रकाशन किया है. ‘वयं रक्षाम:’ की कथावस्तु रामकथा पर आधारित है किंतु इस उपन्यास के मुख्य पात्र राम ना होकर रावण है. इसमें रावण के चरित्र के अन्य पक्ष को रेखांकित करते हुए उसको राम से श्रेष्ठ बताया गया है.

चतुरसेन शास्त्री की इस कृति के अनुसार, रावण (Rawan) ने दक्षिण को उत्तर से जोड़ने के लिए नई संस्कृति का प्रचार किया, जिसे उसने रक्ष-संस्कृति का नाम दिया. रावण जब भगवान शिव की शरण में गया, तो उसने इसे कुछ इस तरह से बताया, ‘हम रक्षा करते हैं. यही हमारी रक्षसंस्कृति है.’

Gulzar Birthday: मुझे कहानियां कहना बहुत पसंद है लेकिन पहला प्रेम शायरी ही है- गुलज़ार

कहा जाता है कि ‘वयं रक्षामः’ से आचार्य चतुरसेन घर-घर में प्रसिद्ध हो गए थे. प्रस्तुत है ‘वयं रक्षाम:’ (Vayam Rakshamah) उपन्यास का एक अंश-

दण्डकारण्य (Dandakaranya)
रणशास्त्र और नीतिशास्त्र का महापण्डित रावण जब दण्डकारण्य और नैमिषारण्य में अपने सबल सैनिक-सन्निवेश स्थापित कर चुका और समूचे भरतखण्ड और आर्यावर्त एवं देवभूमि में अपने राक्षसों के जाल फैला चुका, तो वह अपने नाना सुमाली को लंका का प्रबन्ध सौंप एकाकी ही अपना परशु हाथ में ले चुपचाप छद्म-वेश धारण कर भरतखण्ड में प्रविष्ट हुआ.

प्रथम उसने दण्डकारण्य में घूमना आरम्भ किया. इस महावन का नाम महाकान्तार भी था. यह अति दुर्गम वन था. इसका प्राकृत सौन्दर्य भी अपूर्व था. वन में बड़े-बड़े पर्वत-शृंग, झरने, झील और नदी-नाले थे. दक्षिणारण्य में अभी तक दण्डकारण्य ही ऐसा स्थान था, जहां बहुत विरल बस्ती थी तथा जहां राक्षसों का प्राबल्य था. यहीं रावण की बहिन सूर्पनखा खर-दूषण तथा चौदह सहस्र राक्षस सुभटों के साथ रहती थी. इसके अतिरिक्त यहां कुछ और भी विकट राक्षस थे, जिनमें एक प्रबल पराक्रमी तुम्बुरु गन्धर्व था, जिसे कुबेर ने क्रुद्ध होकर लंका से निकाल दिया था और अब वह यहां दण्डकारण्य में विराध नाम धारण कर विकट राक्षस की भांति रहता था. वह बड़ा धूर्त, नरभक्षी, साहसी तथा दुराचारी राक्षस था.

मनुष्यनुमा बिच्छू-सांपों ने बहुत काटा, पर ‘जहर मोहरा’ मुझे शुरू में ही मिल गया- हरिशंकर परसाई

रावण और सूर्पनखा की आन में वह निर्भय विचरण करता हुआ, ऋषियों को तंग करता तथा अवसर पाकर उन्हें मार भी डालता था. ऐसे ही और भी अनेक राक्षस थे. इसके अतिरिक्त इस वन में बाघ, सिंह, शूकर, भैंसा, गैंडा आदि हिंस्र जन्तुओं की कमी न थी. फिर भी यहां कुछ ऋषिगण अपने आर्य उपनिवेश स्थापित किए हुए थे, जिनमें प्रमुख शरभंग और सुतीक्ष्ण ऋषि थे.

सुतीक्ष्ण ऋषि का उपनिवेश मन्दाकिनी नदी के तट पर एक मनोरम स्थल पर था. यह उपनिवेश बहिष्कृत आर्यों का सबसे बड़ा आश्रमस्थल था. यह उपनिवेश अत्यन्त रमणीय था. यहां सुगन्धित पुष्पों और फलों के लताद्रुम बहुत थे. शीतल स्वच्छ जल के जलाशय थे.

दण्डकारण्य के भीतर ही एक उपनिवेश माण्डकर्ण का भी था. माण्डकर्ण राजसी प्रकृति के ऋषि थे. अतः इनके उपनिवेश में सुन्दरी अप्सराएं नृत्यगान करतीं और ऋषि उनके साथ स्वच्छन्द विहार करते थे, परन्तु इस दुर्गम अंचल में सबसे अधिक महिमावान अगस्त्य का उपनिवेश था. महर्षि अगस्त्य बड़े प्रतापी ऋषि थे. अगस्त्य के आश्रम के पास ही उनके भाई का भी उपनिवेश था. वहां के सभी जन उनकी अगस्त्य के समान ही प्रतिष्ठा करते थे.

यों तो ये सभी ऋषि राक्षसों से लड़ते-झगड़ते रहते थे, पर अगस्त्य ने वीरतापूर्वक अनेक राक्षसों का वध कर डाला था, जिनमें वातापि और इल्वल प्रमुख थे. इससे अगस्त्य का आतंक राक्षसों पर भी था.

जन्मदिन विशेष: गांव, चोपाल, खेत, पनघट की भाषा है कवि चंद्रसिंह बिरकाली की रचनाएं

आजकल जहां नासिक है उसी के इधर-उधर पंचवटी के निकट ही अगस्त्य का उपनिवेश था. पंचवटी में ही विनता के पुत्र श्येनवंशी गरुड़ के भाई अरुण के पुत्र जटायु का उपनिवेश भी था, जो गोदावरी के तट पर एक मनोरम स्थान पर था. यह स्थान प्राकृतिक सान्दर्य से ओत-प्रोत था. वहां अनेक पर्वतीय गुफ़ाएं थीं. इन गुफ़ाओं में अनेक ताल, साल, खजूर, कटहल, आम, अशोक, तिलक, केवड़ा, चम्पा, चन्दन, कदम्ब, लकुच, धर्व, अश्वकर्ण, खैर, शमी, पलास और बकुल के सघन वन थे. वहां हंसों, सारसों और जल-कुक्कुटों का कलरव परिपूर्ण रहता था.

रावण ने भी अपनी बहिन सूर्पनखा के नेतृत्व में दण्डकारण्य में एक उपनिवेश स्थापित किया था, यद्यपि वास्तव में वह था सैनिक-सन्निवेश. ये राक्षस केवल अपनी संस्कृति का प्रचार बलात् करते और वहां के लोगों को राक्षस बनाने की चेष्टा करते थे. रावण की आज्ञा युद्ध करने की न थी. इसी कारण यद्यपि यहां खर-दूषण चौदह हज़ार राक्षसों के साथ रहते थे, परन्तु वे लोग लड़ते-भिड़ते न थे। केवल ऋषियों के यज्ञों में आकर बलि-मांस बलात् डालते, उन्हें पकड़ ले जाते, उनकी बलि देते तथा नरमांस खाते थे.

रावण दण्डकारण्य की सुषमा पर मोहित हो गया. इस समय शरद् ऋत बीत गयी थी और हेमन्त आ गयी थी. परम रमणीय गोदावरी के निर्मल जल में रावण स्वच्छन्द विहार करता और वहां की स्वस्थ वायु में स्फूर्तिलाभ करता था. इस समय वहां वन-उपवनों की शोभा भी निराली हो रही थी.

सूर्य दक्षिणायन थे. यह काल हिमालय की ओर बढ़ने योग्य न था. वहां की वायु समशीतोष्ण थी. हेमन्त में रात्रि अधिक अन्धकारयुक्त हो जाती है. रात्रि का समय भी दिन से बढ़ गया था. चन्द्रमा का सौभाग्य भगवान् भास्कर ने हरण कर लिया था. कोहरे तथा पाले के कारण पूर्णिमा की रात्रि भी मलिन-धूमिल-सी प्रतीत होती थी. वन-प्रदेश की शस्य-श्यामला भूमि सूर्य के उदय होते ही सुहावनी प्रतीत होने लगती थी. इस समय सूर्य आकाश पर चढ़ जाने पर भी चन्द्रमा के समान प्रिय लगता था.

मध्याह्न का सूर्य भी प्राणियों को प्रिय होता था. जल इतना शीतल हो गया था कि गजराज प्यास लगने पर जब अपनी सूंड़ जल में डुबाते थे, तब तुरन्त ही बाहर निकाल लेते थे. जल के पक्षी जल के समीप बैठे हुए भी उसमें चोंच डालने का साहस नहीं कर सकते थे. शीत के कारण वन में फल-मूल की कमी हो गयी थी. नदियां कोहरे के कारण ढकी-सी दीख पड़ती थीं. सरोवर में कमल-वन श्रीहत हो गये थे.

रावण इन सब प्राकृत दृश्यों का आनन्द लेता तथा छद्म वेश में ऋषियों के उपनिवेशों में आता-जाता, मतलब की बातों की खोज-ख़बर लेता रहता था. इसी प्रकार उसने दण्डकारण्य में रहते हुए आर्यावर्त और भरतखण्ड के राज्यों का बहुत-सा ज्ञान सम्पादन कर लिया था.

पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

हमें FacebookTwitter, Instagram और Telegram पर फॉलो करें.

विज्ञापन
विज्ञापन

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज