• Home
  • »
  • News
  • »
  • literature
  • »
  • वयं रक्षामः- अफ्रीका का प्राचीन नाम 'शिवदान' है, मिस्र भी कभी 'शिवदेश ओसिस आफ शिव' था

वयं रक्षामः- अफ्रीका का प्राचीन नाम 'शिवदान' है, मिस्र भी कभी 'शिवदेश ओसिस आफ शिव' था

आचार्य चतुरसेन शास्त्री का अधिकतर लेखन ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है.

आचार्य चतुरसेन शास्त्री का अधिकतर लेखन ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है.

आचार्य चतुरसेन शास्त्री की वयं रक्षाम: प्रागैतिहासिक अतीत की कृति है. इसके कथानक के मूलाधार राक्षसराज रावण (Rawan) तथा महापुरुष राम (Ram) हैं.

  • Share this:

Chatursen Shastri Birthday: हिन्दी भाषा के एक महान उपन्यासकार आचार्य चतुरसेन शास्त्री का आज जन्मदिन है. शास्त्रीजी का अधिकतर लेखन ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है. इनकी प्रमुख कृतियां ‘गोली’, ‘सोमनाथ’, ‘वयं रक्षामः’ और ‘वैशाली की नगरवधू’ हैं.

उन्होंने आयुर्वेद सम्बन्धी लगभग एक दर्जन ग्रंथ लिखे. उन्होंने आरोग्य शास्त्र, स्त्रियों की चिकित्सा, आहार और जीवन, मातृकला और अविवाहित युवक-युवतियों के लिए भी उपयोगी पुस्तके लिखीं. इनके अलावा आचार्यजी ने प्रौढ़ शिक्षा, स्वास्थ्य, धर्म, इतिहास, संस्कृति और नैतिक शिक्षा पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं.

चतुरसेन शास्त्री (Chatursen Shastri) का बचपन का नाम चतुर्भुज था और उनका जन्म 26 अगस्त 1891 को उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर (Bulandshahr) जिले के चांदोख गांव में हुआ था. उनकी प्राथमिक शिक्षा बुलन्दशहर जिले के ही कस्बे सिकन्दराबाद में हुई थी. इसके बाद उन्होंने राजस्थान के जयपुर के संस्कृत कॉलेज में दाखिला लिया. यहां से 1915 में उन्होंने आयुर्वेद और शास्त्री में आयुर्वेद की उपाधि संस्कृत में प्राप्त की. उन्होंने आयुर्वेद विद्यापीठ से आयुर्वेदाचार्य की उपाधि भी प्राप्त की.

राजकमल प्रकाशन ग्रुप (Rajkamal Prakashan) ने उनकी कालजयी कृति ‘वयं रक्षाम:‘ (Vayam Rakshamah) का प्रकाशन किया है. वयं रक्षाम: प्रागैतिहासिक अतीत की कृति है. इसके कथानक के मूलाधार राक्षसराज रावण (Rawan) तथा महापुरुष राम (Ram) हैं.

इस रचना से प्रसिद्ध हुए आचार्य चतुरसेन, राम की जगह रावण को बनाया मुख्य पात्र

अपनी इस कृति के बारे में आचार्य चतुरसेन शास्त्री लिखते हैं, ‘इस उपन्यास में प्राग्वेदकालीन नर, नाग, देव, दैत्य-दानव, आर्य, अनार्य आदि विविध नृवंशों के जीवन के वे विस्मृत-पुरातन रेखाचित्र हैं, जिन्हें धर्म के रंगीन शीशे में देखकर सारे संसार ने अन्तरिक्ष का देवता मान लिया था. मैं इस उपन्यास में उन्हें नर-रूप में आपके समक्ष उपस्थित करने का साहस कर रहा हूं. आज तक कभी मनुष्य की वाणी से न सुनी गयी बातें, मैं आपको सुनाने पर आमादा हूं. उपन्यास में मेरे अपने जीवन-भर के अध्ययन का सार है.’
‘वयं रक्षाम:’ के एक भाग रुद्र में उन्होंने भगवान शिव की वंशावली के बारे में वर्णन किया है. शिव की वंशावली को उन्होंने तत्कालीन समुदाय के रूप में पेश किया है. इतना ही नहीं उन्होंने पृथ्वी के अधिकांश हिस्से में हमारे पौराणिक पात्रों के आधिपत्य होने का उल्लेख किया है. प्रस्तुत है ‘वयं रक्षाम:’ (Vayam Rakshamah) उपन्यास का एक अंश ‘रुद्र‘.

रुद्र (Rudra)

यम की पत्नी वसु से आठ वसु उत्पन्न हुए, जिनमें सबसे ज्येष्ठ धर थे. धर के पुत्र रुद्र थे. रुद्र के ग्यारह कुल चले. इन ग्यारह कुलों के प्रवर्तक थे-1- अज एकपाद, 2- अहिर्बध्न्य, 3- विरूपाक्ष, 4- त्वष्टा, 5- वीरभद्र, 6- भैरव, 7- हरमहेश्वर (शिव), 8- त्र्यम्बक, 9- सावित्र (कपाली), 10- शम्भू और 11- शर्व (पिनाकी).

रुद्र (Rudra) के चार स्थान प्रसिद्ध हैं. प्रथम मूल स्थान मूजवान पर्वत हेमकूट (हिन्दू कुश- Hindu Kush) का प्रत्यन्त पर्वत, जो पश्चिम कोहसुलेमान से बहुत उत्तर सफेद कोह (श्वेत गिरि-धवल) से भी उत्तर में है. यहां ही सोम होता था. इसी के पूर्व की ओर क्रौंचगिरि (Kronch Giri) है, जिसे अब ‘कराकुरम’ कहते हैं. इसी का विदारण कुमार कार्तिकेय ने किया था. उमावन शरवन इसी स्थान के आसपास है. यहां के आगे की वायु बहुत प्रचण्ड है. इसी से रुद्र को तूफानों का देवता कहा है. इस प्रदेश में मूजवन, महावृष, वाह्लीक तथा मारुत् जातियां रहती थीं, जो आर्य न थीं. परन्तु मारुत् लोग देवराट् इन्द्र के सहायक हुए. दूसरा भद्रवट, कैलास के पूर्व की ओर, लौहित्यगिरि के ऊपर है. उसके नीचे ब्रह्मपुत्र नदी बहती है. तीसरा कैलास हिमाचल प्रदेश का मानसरोवर के निकट का स्थान.

जन्मदिन विशेष: गांव, चोपाल, खेत, पनघट की भाषा है कवि चंद्रसिंह बिरकाली की रचनाएं

र्पिशया के एक प्रान्त में ‘शंकरा’ जाति अब भी निवास करती है. पुराणों में रुद्र को मरुतों का पूर्वज माना गया है. रुद्र को वृषभ के समान शक्तिमान् तथा दुर्धर्ष तेजवाला बताया गया है. यह जरारहित, स्थिर-यौवन तथा सर्वाधिपति माना गया है. ऋग्वेद से यह भी पता लगता है कि उसके होंठ सुन्दर थे, रंग बादामी था, वह सिर पर बड़े-बड़े बाल रखता था, शरीर उसका सूर्य के समान देदीप्यमान था, वह प्रचण्ड धनुर्धारी योद्धा था.

असीरिया के प्रीजिया देश में ‘सेवा’ या ‘सेवाजिय:’ नाम के देवता की उपासना होती है. वहां तथा मिस्र में भी ‘सेवा’ देवता के साथ सर्प का सम्बन्ध जोड़ा गया है. अमेरिका के पेरु प्रदेश में सिवु देवता पूजा जाता है. यह सब शिव की ही पूजा है. पैलेस्टाइन देवों का ‘पाल’ नामक धाम था, जो दैत्यों ने छीन लिया था, उसी के उद्धार के लिए शिव ने त्रैपुर युद्ध किया था. डेड-सी मृत्यु सागर ही वह स्थान है जहां त्रैपुर के मृत वीरों का जल-प्रवाह किया गया था.

Vayam Rakshamah

Image- Rajkamal Prakashan

मसीह से पूर्व 2189 में मिस्र (Egypt) के महिदेव कपोत थे, जो मिश्राइज्म के नेता भी थे. इन्हें वहां के फरोहा ने देश-निकाला दिया था. तब शिश्तान के राजा शिवि ने उन्हें आश्रय दिया था. इस प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना को पुराणों की इस विख्यात आख्यायिका से मिलाइए कि शिवि ने कबूतर के बदले अपना मांस दिया. कपोत जाति को कबूतर बना दिया गया. यह शिवि राजा भी रुद्रों के वंश में थे. शेष रुद्रों का विस्तार सारी सुर और असुर-भूमि में हुआ और वे सभी सुरों और असुरों में समान भाव से पूजित हुए.

अफ्रीका (Africa) का प्राचीन नाम शिवदान है. पीछे जब राम ने रावण को विजय किया तथा अपने पुत्रों को राज्य दिया, तब अफ्रीका महाद्वीप कुश को मिला; तभी से वह कुशद्वीप प्रसिद्ध हुआ. अफ्रीका का मध्य देश जिसे सूडान कहते हैं, शिवदान का ही बिगड़ा हुआ रूप है. यहां भूमध्य सागर के अंचल में यवनसागर है, जिसके तट पर वह प्रसिद्ध पुरी त्रिपुरी थी, जो स्वर्णनिर्मित तथा तीन खण्डों में विभक्त थी. इसे ही शिव ने भस्म करके जलमग्न किया था. आज भी उस स्थान पर त्रिपोली नगर और प्रान्त है, जिसमें ‘शिव’ नामक नगर भी है.

Book Review: किन्नर जीवन की उलझती परतों को उजागर करती कहानी ‘लल्लन मिस’

शिव (Shiv) के इस महाद्वीप में आने से पूर्व यहां प्रसिद्ध पृथ्वीविजयी चाक्षुष उर और उनका पुत्र अंगिरा आ चुके थे तथा तमाम द्वीप पर अधिकार कर चुके थे. उरन, रियो-उर उन्हीं की स्मृति को ताजा करता है. अफ्रीका का दक्षिणांचल तो अंगिरा प्रदेश ही कहलाता है. अंकोला प्रदेश तथा अंग्रा-पैकृना उसी के बिगड़े हुए नाम हैं. चाक्षुष और शिव के बाद भी सूर्यवंशी सम्राटों ने पीछे इस प्रदेश को अधिकृत किया. मान्धाता-(मांडाटे), अम्बरीष-अम्ब्रे, मलिन्द, ताम्रकुण्ड-प्रदेश (टेम्बकटू), दमी प्रदेश आदि इसी बात के द्योतक हैं. इरिट्रया प्रदेश भी आदित्यों ने जय किया था. इरिट का अर्थ सूर्य है.

मत्स्यपुराण (Matsya Puran) में लिखा है कि ब्रह्मराक्षसों का स्थान नलिवी नदी के तीर पर है. यह संभवत: रावण के ऊपर ही व्यंग्य है. यदि आप अफ्रीका के नक्शे को ध्यान से देखेंगे तो आपको ज्ञात होगा कि अबीसीनिया के मध्य में एक तन नामक झील है, जिसके पूर्वी तट पर तीन पर्वत हैं. ये तीनों पर्वत मिले हुए हैं और तीन ओर से इस झील को घेरे हुए हैं. चौथी ओर नील नद है. यह त्रिकूट पर्वत है जिसका उल्लेख पुराण में है.

अम्बरीष मान्धाता (Mandhata) के पुत्र थे. मान्धाता सात द्वीपों के सार्वभौम सम्राट् थे. इनके पुत्र अम्बरीष ब्राह्मण हो गए थे. शिवदान द्वीप में ब्राह्मण या ऋषि को दमी कहते थे. अफ्रीका में दमी प्रदेश भी है और अम्बरीष की खाड़ी भी है. ये दोनों ही पिता-पुत्र निस्सन्देह इस द्वीप में आए तथा उन्होंने इसे अधिकृत किया था.

मिस्र का भी प्राचीन नाम शिवदेश ओसिस आफ शिव था. यहां के राजा पीछे महिदेव प्रीस्ट-किंग्स कहलाने लगे. ईजिप्ट नाम भी संभवत: जटा के नाम पर पड़ा हो. एक रुद्र का नाम कपर्दी था. कपर्द का अर्थ है जटा-जूटधारी. तृत्सु लोगों को भी ऋग्वेद में ‘कर्पिदय:’ कहा है. संभवत: कपर्दी उनका नेता हो और वे यहां के आदिवासी हों.

बेबीलोनिया अक्केडियन लोगों में भी जुड़ा बांधने की प्रथा थी, परन्तु सुमेरियनों में नहीं थी. संभव है, इसी आधार पर इसका नाम ईजिप्ट हुआ हो. हां, ईरान में एक प्रदेश जाटा भी है. संभव है वहां के लोगों का यहां से सम्पर्क रहा हो. मिस्र का नाम भी संस्कृत है और महिदेवों ने यह नाम रखा था.

मिस्र के ऊपरी भाग में एक स्थान डभीटा है. यहां कभी ‘दमित्र’ नगर बसा था, जो किसी विजेता आदित्य ने बसाया था. दमित्र, सूर्य या विष्णु का नाम है. त्रिपोली (त्रिपुर), जिसे शिव ने भस्म किया था, वह मिस्र के पच्छिम-उत्तर में प्रमुख नगर है.

सब जानते हैं कि त्रिपोली प्रदेश का एक भाग सिरटियन सागर में जलमग्न है. कुछ दिन पूर्व इस जलमग्न भाग की जांच-पड़ताल की गई थी. इसी के निकट कावस स्थान है, यह दैत्य याजक शुक्र के नाम पर है, क्योंकि शुक्र का नाम ‘काव्य’ भी है.

मिस्र देश भूमध्यसागर के तट पर है. इस सागर में आद्रसागर ऐड्रियाटिक सी है. इसी के नीचे यवनसागर है. आर्द्र इक्ष्वाकु के पुत्र थे और इनके पुत्र यवनाश्व थे. इन सूर्यवंशियों ने संभवत: अम्बरीष और मान्धाता से भी पूर्व इस द्वीप पर अधिकार किया होगा, जिनके नाम पर ये समुद्र हैं.

विचारणीय बात यह है कि मान्धाता और अम्बरीष के स्मृति-चिह्न प्रदेश के नीचे के भाग में हैं, जबकि ये दोनों समुद्र द्वीप के सिर पर ही हैं. अग्निद्वीप भी यहीं है. मुनि नदी तथा अशान्ति नदी अफ्रीका में हैं.

पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

हमें FacebookTwitter, Instagram और Telegram पर फॉलो करें.

विज्ञापन
विज्ञापन

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज