Home /News /literature /

Adam Gondvi Birthday: हर दौर में सत्ता और सिस्टम को चुनौती देती रहेंगी अदम गोंडवी की रचनाएं

Adam Gondvi Birthday: हर दौर में सत्ता और सिस्टम को चुनौती देती रहेंगी अदम गोंडवी की रचनाएं

अदम गोंडवी का जन्म 22 अक्टूबर, 1947 को उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के अट्टा परसपुर में हुआ था.

अदम गोंडवी का जन्म 22 अक्टूबर, 1947 को उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के अट्टा परसपुर में हुआ था.

Adam Gondvi आम आदमी के कवि अदम गोंडवी का आज जन्मदिन है. वे रचनाकार से ज्यादा क्रांतिकारी के तौर पर याद रखे जाएंगे. यथार्थ के एक ऐसे रचनाकार जो सीधे प्रहार करते हैं. जिसे काव्य-शास्त्र की मान्यताओं-वर्जनाओं की कोई चिंता नहीं है. ‘हरखुआ की छोकरी’ उन्हें ‘सरजूपार की मोनालिशा’ लगती है तो फागुन की धूप बिल्कुल नशीली नहीं लगती. ताउम्र धोती-कुर्ता और अंगोछे में दिखने वाले अदम साहेब की रचनाओं की यही खासियत उनके पढ़ने वालों को पसंद भी आती हैं.

अधिक पढ़ें ...

मय और परिवेश के प्रति जो जितना जागरूक है, वो उतना ही आधुनिक भी है. यही आधुनिकता प्रासंगिक होने की पहली शर्त भी है. इस लिहाज से अदम गोंडवी (Adam Gondvi) बहुत ही प्रासंगिक और आधुनिक रचनाकार के तौर पर हमेशा याद रहेंगे. यही वजह है कि उनकी कुछ रचनाओं ने तो नारों की शक्ल अख्तियार कर ली. बात चाहे प्लेट में भुने काजुओं की हो या फिर फाइलों में झूठे आंकडों की. अदम की रचना सीधे नश्तर सी लगती हैं –

काजू भुने पलेट में, ह्विस्की गिलास में,
उतरा है रामराज विधायक निवास में
या फिर
तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम बहुत गुलाबी है,
मगर ये आंकड़े झूठे ये दावा किताबी है.

पगडंडियों का रचनाकार
लखनऊ और फैजाबाद से लगे गोंडा के रामनाथ सिंह यानी अदम गोंडवी का परिचय बहुत सारे नेताओं से रहा. सभी जानते पहचानते थे. जो उन्हें नहीं भी जानते थे उन्होंने भी राजनीति के चौबारे की सीढ़ियां चढ़ने के लिए अदम साहेब की रचानाओं का इस्तेमाल नारों की तरह किया था. लेकिन उन्हें कोई पद्म सम्मान नहीं मिला. सम्मान मिला तो धरती से लोगों से. अदम भी शायद ये समझते रहे इसी वजह से उन्होंने गांव की पगडंडियां पकड़ी और फटा पुराना पहनने वाले को अपना विषय बनाया.

“… फटे कपड़ों से तन ढांपे जहां कोई गुजरता हो, समझ लेना वो पगडंडी अदम के गांव जाती है.”

दरअसल, अदम ने दिल्ली की चमक दमक और लखनऊ की दबंगई देखी थी. देखा था कि कैसे चौबीस घंटों की उलझन में आम आदमी टूट जाता है, कैसे व्यवस्था अमरबेल की तरह लिपट कर उसका खून चूस लेती है. ये सब देख कर ‘सत्यमेव जयते’ से जैसे उनका यकीन हिल सा गया और उन्होंने लिख दिया –

“खुदी सुकरात की हो या रूदाद गांधी की सदाकत जिंदगी के मोरचे पर हार जाती है… ”

लोगों ने गैरहाजिरी में भी सुना अदम को

गांव की पगडंडियों ने भी अदम को खूब समझा और दुलारा भी. मुझे याद आता है, एक साहित्यानुरागी महात्मा अंगदजी महाराज ने इलाहाबाद के माघ मेले में अदम साहेब की किताब के पुनरप्रकाशन के बाद उसके विमोचन का कार्यक्रम रखा. साथ में महाराज जी ने मुनव्वर राणा को भी कार्यक्रम में बुला रखा था. मुनव्वर साहेब दूर दक्षिण के किसी शहर से आने वाले थे. लिहाजा देर हो गई. फिर भी मेले में धर्म-कर्म कर कल्पवास करने आए श्रोताओं की भीड़ डटी रही. ये वो लोग थे जो मेले में अलग-अलग महात्माओं के शिविर में जा कर प्रवचन सुनते हैं या रामलीला वगैरह देखते हैं.

‘नए घर में अम्मा’ के बहाने हिंदी साहित्य में विधवा स्त्रियों के जीवन पर चर्चा

मुनव्वर साहेब तकरीबन आधी रात को पहुंचे. इस दौरान अस्वस्थ से चल रहे अदम साहेब खुद ही सो गए. फिर भी उनके चाहने वाले अंगद जी महाराज की आवाज में अदम साहेब की रचनाएं सुनते रहे.

बाबा नागार्जुन पसंद थे अदम को

दरअसल, अदम साहेब लोक के कवि थे. उस परंपरा के रचनाकार थे जो लोक को छूता है. या कहा जाए बाबा नागार्जुन की परंपरा है. जहां विद्रोह है, जहां कागजी हरी पत्तियों फूलों से सजाए बगैर सच की परछाईं ज्यों की त्यों इबारत में उकेर दी जाती है. अदम साहेब को बाबा बहुत पसंद भी थे. उनकी तारीफ में उन्होंने एक रचना भी की –

ख़ास इतना है कि सर-आँखों पे है उसका वजूद
मुफ़लिसों की झोंपड़ी तक आम है नागार्जुन
इस यकीं के साथ कि इस बार हारेगा यजीद
कर्बला में युद्ध का पैगाम है नागार्जुन

मजलूमों की आवाज
अदम साहेब को जानने वाले जानते हैं कि उनका नाम रामनाथ सिंह था. मतलब वे उस समुदाय के परिवार में जन्मे थे जिस पर अत्याचार के आरोप वे खुद ही लगाते रहे. उनकी रचना ‘मैं चमारों की गली में ले चलूंगा आपको’, अपने आप में बेहद अनूठी है. इस दलित परिवारों की व्यथा कथा से लेकर पुलिस के अत्याचार और जमींदारनुमा दबंग जातियों के लोगों के अनाचार की पूरी कथा है. इसमें अदम साहेब का सौंदर्यबोध भी सामने आता है.उन्हें सावलें या काले रंग की गांव की युवती किस कदर सुंदर लगती है कि उसे सीधे वो मोनालिसा कह देते हैं –

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा.

कितने आजाद थे अदम
ये भी एक संयोग है कि अदम साहेब 15 अगस्त को देश आजाद होने के बाद 22 अक्टूबर को पैदा हुए. और वे आजाद थे भी. इस हद तक आजाद कि उन्हें देश की हालत देखते हुए इस आजादी पर ही शक होने लगा-

सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है,
दिल पे रखके हाथ कहिए देश क्या आजाद है.

दौर की तरक्की को वे बाखूबी समझ रहे थे, लेकिन आदमियत की गिरती स्थिति पर वे लगातार चिंतित रहते थे. बैठकबाजी का खूब शौक था लेकिन आदमियत और शख्शियत उन्हें बुलंद चाहिए होती थी.

चाँद है ज़ेरे क़दम. सूरज खिलौना हो गया
हाँ, मगर इस दौर में क़िरदार बौना हो गया

तंगहाली में रहा जीवन
ये भी एक कारण था कि उनके बहुत से ऐसे दोस्त नहीं बन सके जो मुशायरों या कवि सम्मेलनों में उनकी मदद करते. एक बड़ी दिक्कत ये थी कि मुशायरों में वीर रस की कविता पाकिस्तान के खिलाफ तो लोग सुनना पसंद करते हैं, लेकिन सारी व्यवस्था पर करारा हमला करा कर व्यवस्था से भिंडना शायद कम ही लोगों को अच्छा लगता हो. इस कारण भी अदम साहेब को कवि सम्मेलनों में वहीं बुलाया जाता जहां आयोजक बहुत सच बहुत आजाद हों. इस वजह से अदम साहेब का जीवन आर्थिक तौर पर बहुत तकलीफ में रहा.

घर में ठन्डे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है
बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है”

“ज़ुल्फ़-अंगडाई-तबस्सुम-चाँद-आईना-गुलाब
भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इनका शबाब”

भविष्य देखने समझ वाली नजर
कुछ प्रशंसक और मित्र जरूर बहुत ही सम्मान के साथ अदम साहब की मदद करते रहे. उसी से उनका काम चलता रहा. हालांकि बाद में स्वास्थ्य खराब होने के कारण 18 दिसंबर, 2011 को गरीबों मजलूमों की बात करने वाला अद्भुत कवि और शायर इस दुनिया से विदा हो गया, लेकिन धोती-रंगीन मोटा कुर्ता और अंगोछा डाले अदम साहेब की तस्वीर हर उस आदमी के जेहन में हमेशा कायम रहेगी जिसने उन्हें एक बार भी देखा हो. उनके चाहने वाले भी चाहते हैं कि अदम की ये लाइनें गलत हो जाएं लेकिन हालते हाजरा देख कर लगता है कि गांव के इस रचनाकार को कोई इल्म था जिससे वो दूर तक की हकीकत देख लेते थे-

पार कर पाएगी ये कहना मुकम्मल भूल है,
इस अहद की सभ्यता नफ़रत के रेगिस्तान को।

Tags: Hindi Literature

विज्ञापन

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज

अधिक पढ़ें

अगली ख़बर