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जयंती विशेष: प्रेमचंद की परंपरा के अग्रणी लेखक रहे हैं भीष्म साहनी

भीष्‍म साहनी रचनाकारों की उस पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं जिन्‍होंने स्‍वतंत्रता संग्राम देखा है, देश का विभाजन का दंश झेला है.

भीष्‍म साहनी रचनाकारों की उस पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं जिन्‍होंने स्‍वतंत्रता संग्राम देखा है, देश का विभाजन का दंश झेला है.

भीष्म साहनी देश के विभाजन के पूर्व अवैतनिक शिक्षक थे और अध्यापन के साथ-साथ व्यापार भी करते थे. विभाजन के बाद भारत आकर स ...अधिक पढ़ें

Bhishm Sahni Birth Anniversary: हिंदी साहित्य के भीष्म माने जाने वाले प्रसिद्ध कहानीकार, उपन्यासकार और नाटककार भीष्म साहनी की आज जयंती है. प्रगतिशील परंपरा के सशक्त कथाकार के रूप में उनकी विशिष्ट पहचान है. भीष्म साहनी हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी के छोटे भाई थे.

भीष्म साहनी की रचनाओं में सामाजिक विसंगतियों, भ्रष्टाचार और गिरते हुए मानव मूल्यों को प्रस्तुत किया गया है. वे सामाजिक यथार्थ से जुड़े हुए रचनाकार थे. निम्न और मध्यवर्ग को आधार बनाकर उन्होंने कहानी, उपन्यास और नाटक लिखे. वे अभिनेता और सामाजित कार्यकर्ता भी थे. भीष्म साहनी वामपंथी विचारधारा से जुड़े थे. लेकिन उनके लेखन में उनकी विचारधारा की छाप दिखाई नहीं देती है. इसी वजह से भीष्म साहनी को हिन्दी साहित्य में प्रेमचंद की परंपरा का अग्रणी लेखक माना जाता है. उनके लेखन की भाषा सरल है और सीधे पाठकों से संवाद करते दिखाई देते हैं.

भीष्म साहनी का जन्मदिन और शिक्षा
प्रारंभिक जीवन की बात करें तो भीष्म साहनी की जन्म 8 अगस्त, 1915 को पाकिस्तान के रावलपिंडी में हुआ था. ‘मेरे भाई बलराज’ पुस्तक में भीष्म साहनी अपने जन्म के बारे में एक बड़ा ही दिलचस्प किस्सा लिखते हैं- ‘मैं 1915 में (रावलपिंडी, पंजाब) पैदा हुआ. लेकिन किस तारीख़ और किस महीने में, इस बाबत पिताजी (हरबंस लाल साहनी) और अम्मा (लक्ष्मी देवी) के बीच ही एक-राय न बन पाई. अम्मा बताती थीं कि मैं अपने भाई से पूरे एक बरस और 11 महीने बाद पैदा हुआ. हालांकि, पिताजी ने स्कूल में दाखिले के वक़्त मेरी पैदाइश की तारीख़ 8 अगस्त, 1915 लिखवा दी. तब से वही तय पाई गई.’

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इसी में वे आगे लिखते हैं, ‘पिताजी एक डायरी रखते थे. उसमें हर किसी की पैदाइश, शादी आदि की तारीखें और लोगों को दिए कर्ज़े का हिसाब-किताब लिखा करते थे. दिलचस्प ये रहा कि उस डायरी में मेरी पैदाइश की कोई तारीख़ ही दर्ज़ न थी. इस बात पर भाई अक्सर मुझे छेड़ते रहते. कहते- तू मेरा भाई ही नहीं है. पिताजी तुझे कहीं कूड़े के ढेर से उठाकर लाए हैं. सबूत के तौर पर कहते- देख, मैं कैसा गोरा-चिट्‌टा हूं और तू सांवला-सा.’

भीष्म साहनी ने 1937 में अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोतर की डिग्री हासिल की. 1958 में पंजाब विश्वविद्यालय से पी. एच. डी. की उपाधि प्राप्त की. उन्होंने अपने करियर की शुरूआत समाचार पत्रों में लेखन के साथ की. भारत-पाक विभाजन के बाद वे भारत आ गए और समाचार पत्रों में कॉलम आदि लिखने लगे. भीष्म साहनी कई भाषाओं का ज्ञान था. उनकी मातृभाषा पंजाबी थी. पढ़ाई अंग्रेजी और उर्दू में की. लेखन हिंदी में किया और अनुवाद रूसी भाषा से किया.

भीष्म साहनी ने अंबाला और अमृतसर में अध्यापन किया. इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन कॉलेज में साहित्य के प्रोफेसर बन गए. इसके बाद आपने 1957 से 63 तक मास्को में विदेशी भाषा प्रकाशन विभाग में अनुवादक के रूप में अपनी सेवाएं दीं. अनुवादक के तौर पर उन्होंने दो दर्जन से अधिक रूसी पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद किया.

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उनकी पहली कहानी ‘अबला’ स्कूल की पत्रिका में प्रकाशित हुई थी. दूसरी कहानी ‘हंस’ पत्रिका में आई. इस तरह उनके लेखन की यात्रा शुरू हुई.

यह समय था नई कहानियां के आंदोलन का. एक नई विचारधारा और परंपरा को लेकर नई कहानियां लिखी जा रही थीं. इन नई कहानियों को पाठकों तक पहुंचाने के लिए आपने 1965 से 1967 तक ‘नई कहानियां’ नामक पात्रिका का सम्पादन किया. इन तमाम कार्यों के साथ-साथ भीष्ण साहनी भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से भी जुड़े रहे. वे प्रगतिशील लेखक संघ और अफ्रो-एशियायी लेखक संघ (एफ्रो एशियन राइटर्स असोसिएशन) से भी जुड़े रहे. प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव रहे. 1993 से 97 तक आप साहित्य अकादमी के कार्यकारी समीति के सदस्य रहे.

भीष्म साहनी की रचनाएं
भीष्म साहनी की साहित्य सृजन यात्री बहुत लंबी है. आपने उपन्यास, नाटक, कहानी, बाल कहानी, आत्मकथा, समीक्षा आदि लिखे हैं. भीष्म साहनी ने आजादी का आंदोलन देखा और भारत-पाक विभाजन की त्रासदी के साक्षी रहे. आपके लेखन में विभाजन की त्रासदी का असर स्पष्ट देखने को मिलता है.

झरोखे (1967), कड़ियां (1970), तमस (1973), बसंती (1980), मय्यादास की माड़ी (1988), कुंती (1993) और नीलु नीलिमा नीलोफर (2000) जैसे चर्चित उपन्यास लिखे. ‘तमस’ उनकी कालजयी कृति साबित हुई. यह उपन्यास भारत-पाक विभाजन की त्रासदी पर लिखा गया है. पांच दिन की घटना के आधार पर उन्होंने एक पूरी सदी की तस्वीर प्रस्तुत की है. विभाजन के दौरान खुद भोगी हुई त्रासदी का वर्णन है इस उपन्यास में. ‘तमस’ पर प्रसिद्ध निर्देशक गोविंद निहलानी ने दूरदर्शन के लिए एक धारावाहिक भी बनाया. इस धारावाहिक में खुद भीष्म साहनी ने भी अभिनय किया था.

भीष्म साहनी ने अपर्णा सेन के निर्देशन में बनी फिल्म ‘मिस्टर एंड मिसेज अय्यर’ (2002) में भी अभिनय किया था. ‘मोहन जोशी हाजिर हो’ में भी उनकी शानदार भूमिका है.

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‘बसंती’ उपन्यास देशभक्ति से प्रेरित है. इसमें अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार का बड़ा ही मार्मिक वर्णन है.

भीष्म साहनी ने अनेक कहानियों की रचना की. इन कहानियों को लेकर उनके कई कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं. इनमें भाग्य रेखा (1953), पहला पाठ (1957), भटकती राख (1966), पटरियां (1973), वांड्चु (1978), शोभा यात्रा (1981), निशाचर (1983), पाली (1989) और डायन (1998) शामिल हैं. डायन कहानी इनका अंतिम कहानी संग्रह है.

मृत्यु के वर्ष 2003 में भी भीष्म साहनी जी की लिखित आत्मकथा प्रकाशित हुई थी. आत्मकथा में ‘आज के अतीत’ (2003) और ‘बलराज माय ब्रदर’ प्रकाशित हुई. बाल कथा ‘गुलाल’ भी काफी चर्चित रही है.

भीष्म साहनी के नाटक
भीष्म साहनी को बचपन से ही अभिनय में रुचि थी. उनके नाटक भी बहुत चर्चित रहे हैं. हानूश (1977), कबीरा खड़ा बाजार में (1981), माधवी (1985), मुआवजे (1993) और रंग दे बसंती चोला (1998) के मंचन में आज भी दर्शकों का अच्छी भीड़ देखने को मिलती है.

‘हानूश’ नाटक चेकोस्वाकिया की लोककथा पर आधारित है. इस नाटक में चेकोस्वाकिया के प्राग शहर में ताला बनाने वाले व्यक्ति द्वारा घड़ी बनाने और फिर घड़ी बनाने के बाद उसके जीवन में आई त्रासदी का वर्णन है. कई वर्षों की निरंतर मेहनत के बाद हानूश जब घड़ी बनाता है तो वहां का बादशाह ताला बनाने वाले पुरस्कृत करने के साथ-साथ उसकी आंखें भी निकलवा देता है ताकि वह फिर से एक और घड़ी ना बना दे.

इस नाटक की विशेषता यह थी कि यह प्रकाशित होने से पहले मंचित होने लगा और बहुत ही चर्चित रहा. इस नाटक को आपातकाल से भी जोड़ा गया.

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‘कबीरा खड़ा बाजार में’ नाटक में कबीर के मस्तमौला जीवन और तत्कालीन परिवेश का चित्रण है. ‘माधवी’ नाटक पौराणिक कथा पर आधारित है. यह नाटक स्त्री यंत्रणा और उसके शोषण को लेकर लिखा गया है. माधवी चंद्र वंश में जन्में राजा ययाति की पुत्री है. ययाति अपनी पुत्री माधवी को चिरकौमार्य रहने का वरदान देते हैं. लेकिन यह वरदान ही उसके लिए अभिशाप बन जाता है.

‘मुआवजे’ नाटक में समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर किया गया है.

साहित्य सृजन और सामाजिक योगदान के लिए भीष्म साहनी को 1975 में तमस के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार, 1975 में पंजाब सरकार का साहित्य शिरोमणि लेखक पुरस्कार, 1983 में सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, 1998 में भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण सम्मान सहित कई सम्मानों से पुरस्कृत किया गया. 11 जुलाई, 2003 को हिन्दुस्तान के इस बड़े साहित्यकार ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

Tags: Hindi Literature, Hindi Writer, Literature

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