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23 मार्च पर विशेष : रेयरेस्ट ऑफ द रेयर कवि अवतार सिंह संधू 'पाश'

विद्रोही कवि पाश की हत्या खालिस्तानी आतंकवादियों ने 23 मार्च 1988 को कर दी थी.

विद्रोही कवि पाश की हत्या खालिस्तानी आतंकवादियों ने 23 मार्च 1988 को कर दी थी.

Death Anniversary: पाश का जन्म 1950 में हुआ था. पाश के जन्म के 19 साल पहले आजादी के दीवाने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु फांसी पर चढ़ा दिए गए थे और जब लोहिया का निधन हुआ तब पाश 17 साल के रहे होंगे. पाश की कविताओं में उनके तेवर, संदेश और विचारों को महसूस करते हुए यह सोचना सुखद लगता है कि पाश अपने तेवर में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के काफी करीब हैं और उनके विचारों में लोहिया के अंश हैं.

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Death Anniversary Special: आज 23 मार्च है. आज ही के दिन 1988 में आतंकवादियों ने अवतार सिंह संधू ‘पाश’ की हत्या कर दी थी. संभवतः पाश भारत के एकमात्र कवि रहे हैं, जिनकी हत्या आतंकवादियों ने की है. स्पेन के लोककवि फेडेरिको गार्शिया लोर्का भी मारे गए थे. कहा जाता है कि लोर्का की कविता ‘एक बुलफाइटर की मौत पर शोकगीत’ का टेप जब जनरल फ्रैंको ने सुना तो उन्होंने कहा कि यह आवाज बंद होनी चाहिए. पाश के लिए लोग कहते हैं कि पंजाब को भी एक लोर्का मिला था. पाश की कविताएं खालिस्तान समर्थक आतंकवादियों के आकाओं को सुहाती नहीं थीं. उन्हें दिखता था कि पाश की आवाज में जो बुलंदी है, वह उनके मिशन के रास्ते में बड़ा बाधक है. और यही वजह रही कि आतंकवादियों ने उस बुलंद आवाज को हमेशा-हमेशा के लिए खामोश कर देना चाहा. लेकिन पाश को मारने के बाद उनकी आवाज और दबंग हो गई. पंजाबी भाषा तक सीमित उनकी आवाज पसरकर हिंदी साहित्य का अहम हिस्सा बन गई. आज ही के दिन 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी. आज ही के दिन 1910 में उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जनपद में समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया का जन्म हुआ था और 12 अक्टूबर 1967 में उनका निधन हुआ था.

पाश का जन्म 1950 में हुआ था. पाश के जन्म के 19 साल पहले आजादी के दीवाने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु फांसी पर चढ़ा दिए गए थे और जब लोहिया का निधन हुआ तब पाश 17 साल के रहे होंगे. पाश की कविताओं में उनके तेवर, संदेश और विचारों को महसूस करते हुए यह सोचना सुखद लगता है कि पाश अपने तेवर में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के काफी करीब हैं और उनके विचारों में लोहिया के अंश हैं.

पाश के दौर को समझने के लिए उनके समकालीन कवि सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ की कविताएं भी याद की जानी चाहिए. वैसे, धूमिल का निधन 1975 में हो चुका था यानी पाश की हत्या से लगभग 13 साल पहले धूमिल दुनिया छोड़ चुके थे. धूमिल का जन्म 1936 में हुआ था. यानी, उन्होंने पाश से 1 साल ज्यादा जिया. 38 की उम्र में पाश मार दिए गए जबकि 39 की उम्र में धूमिल का निधन हुआ. इन दोनों परंपराभंजक कवियों की कविताओं में विषय साम्य तो है, लेकिन उनके कहने में बड़ा अंतर है.

वह दौर प्रतीकों में लोहे का दौर था. चाहे वह लोहा हथकड़ियों का हो या गोली का – देश की आजादी के बाद विकास की नाकामी से उपजी मोहभंग की पीड़ा सबके मन में थी. कवि इस मोहभंग से उबरना चाहते थे. वे चाहते थे कि देश के विकास के जो सपने देखे गए, आजादी के बाद वे साकार हों. कल-कारखानों (बुनियाद में लोहा) का विकास हो, रोजगार और शिक्षा के अवसर मिलें. चिकित्सा व्यवस्था बेहतर हो. पर जब जनता की उम्मीदों पर शासन खरा नहीं उतर पा रहा था तो लोग तैयार थे सरकार की इस नाकामी से लोहा लेने को. तो कुल मिलाकर 19वीं सदी के सातवें दशक में क्रांतिकारी कवियों ने नाकाम सरकार को लोहे के चने चबवा दिए. ये कवि महज कवि नहीं थे, सही अर्थों में क्रांतिकारी थे, जो हर बात के लिए राजी थे कि चाहे हाथों में हथकड़ियां डालो या सीने में उतार दो लोहा, लेकिन हमें हमारे सपनों के साथ जीने दो, हमारे सपने साकार करो. शायद यही वजह है कि धूमिल और पाश दोनों की कविताओं में ‘लोहा’ दिखता है.

धूमिल की कविता है ‘लोहे का स्वाद’. कहा जाता है कि यह उनकी अंतिम कविता थी. गौर करें –

शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज है या
मिट्टी में गिरे हुए खून
का रंग

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है.

पाश ने अपने पहले काव्य संग्रह का नाम रखा था – लौहकथा. इस नाम को सार्थक करनेवाली उनकी कविता है लोहा. कवि ने इस कविता में लोहे को इस कदर पेश किया है कि समाज के दोनों वर्ग सामने खड़े दिखते हैं. एक के पास लोहे की कार है तो दूसरे के पास लोहे की कुदाल. कुदाल लिए हुए हाथ आक्रोश से भरे हैं, जबकि कारवाले की आंखों में पैसे का मद है. इस वर्ग संघर्ष में पाश को जो अर्थपूर्ण अंतर दिखता है, वह यह है कि :

आप लोहे की चमक में चुंधियाकर
अपनी बेटी को बीवी समझ सकते हैं
(लेकिन) मैं लोहे की आंख से
दोस्तों के मुखौटे पहने दुश्मन
भी पहचान सकता हूं
क्योंकि मैंने लोहा खाया है
आप लोहे की बात करते हो.

धूमिल अपनी कविता में लोहे का ‘स्वाद’ तलाशते दिखते हैं, जबकि पाश बताते हैं कि उन्होंने लोहा ‘खाया’ है. इन दोनों कवियों की भाषा इतनी सहज और इतनी तरल है कि गुस्सा हो या प्यार – सीधे-सीधे पाठकों के दिल में उतर जाते हैं. पाश की रचनाओं से गुजरने के बाद यह पुख्ता तौर पर कहा जा सकता है कि उनकी जिंदगी में महज दो रंग थे – या तो वहां ब्लैक था या फिर वाइट, पाश के जीवन में कहीं कोई ग्रे शेड नहीं मिलता. जबकि धूमिल के लेखन में ग्रे शेड खूब आसानी से दिख जाएंगे, जहां वे समझौता करते हुए दिखते हैं.

पाश का जीवन सहज नहीं था. उनके जीवन में भटकाव था. उनके पिता फौज में थे. नतीजतन हमेशा घर से बाहर रहे. मां अशिक्षित थीं सो घर में पढ़ाई का कोई माहौल नहीं था. लिहाजा पाश कभी भी विधिवत और क्रमबद्ध तरीके से पढ़ाई नहीं कर सके. किसी तरह इंटर की परीक्षा पास कर ली. लेकिन जीवन की पाठशाला में पाश ने जो कुछ पढ़ा, वे विश्वविद्यालयों की खाक छानकर भी नहीं पढ़ पाते. विधिवत शिक्षा उन्हें उस तरह नहीं रच पाती, जिस तरह उनके भटकाव ने उन्हें जितना रचा. हो सकता है कि शिक्षा का असर उनपर यह होता कि वे कुलीन और शालीन कवि के रूप में उभरते, लेकिन वे वह खरा पाश नहीं बन पाते जो अपने खुरदरे व्यक्तित्व के कारण वे बन पाए. अपने इस खुरदरे व्यक्तित्व को पाश खूब पहचानते थे. अपनी एक कविता में वे लिखते हैं –

तुम्हें पता नहीं
मैं शायरी में किस तरह जाना जाता हूं
जैसे किसी उत्तेजित मुजरे में
कोई आवारा कुत्ता आ जाए
तुम्हें पता नहीं
मैं कविता के पास कैसे जाता हूं
कोई ग्रामीण यौवना घिस चुके फैशन का नया सूट पहने
जैसे चकराई हुई शहर की दुकानों पर चढ़ती है।

सुदामा पांडेय धूमिल ने अपनी लंबी कविता ‘पटकथा’ में तार-तार होते भारत की तस्वीर खींची है. उन्होंने बताया है कि इस तार-तार होने में भी हाथ हमारा ही है. क्योंकि अक्सर हमारे विरोध की भाषा चुक जा रही है. हम चुप होते जा रहे हैं. इतना ही नहीं, अपनी चुप्पी को हम अपनी बेबसी के रूप में पेश कर उसे सही और तार्किक बता रहे हैं. कुछ इस तरह –

यद्यपि यह सही है कि मैं
कोई ठंडा आदमी नहीं हूं
मुझमें भी आग है
मगर वह
भभक कर बाहर नहीं आती
क्योंकि उसके चारों तरफ चक्कर काटता
एक पूंजीवादी दिमाग है
जो परिवर्तन तो चाहता है
आहिस्ता-आहिस्ता
कुछ इस तरह कि चीजों की शालीनता बनी रहे
कुछ इस तरह कि कांख भी ढंकी रहे
और विरोध में उठे हुए हाथ की
मुट्ठी भी तनी रहे
और यही वजह है कि बात
फैलने की हद तक आते-आते रुक जाती है
क्योंकि हर बार
चंद टुच्ची सुविधाओं के लालच के सामने
अभियोग की भाषा चुक जाती है…

पर पाश की कविताएं बीच का रास्ता नहीं जानतीं, न बताती हैं. वे तो प्रेरित करती हैं विद्रोह करने के लिए, सच को सच की तरह देखने के लिए, उससे आंखें मूंद कर समझौता करने के लिए नहीं –

…हाथ अगर हों तो
जोड़ने के लिए ही नहीं होते
न दुश्मन के सामने खड़े करने के लिए ही होते हैं
यह गर्दनें मरोड़ने के लिए भी होते हैं
हाथ अगर हों तो
‘हीर’ के हाथों से ‘चूरी’ पकड़ने के लिए ही नहीं होते
‘सैदे’ की बारात रोकने के लिए भी होते हैं
‘कैदो’ की कमर तोड़ने के लिए भी होते हैं
हाथ श्रम करने के लिए ही नहीं होते
लुटेरे हाथों को तोड़ने के लिए भी होते हैं.

पाश को पढ़ते हुए लगता है कि वे ‘खतरनाक’ कवि थे. उनके पास चमकती हुई एक ऐसी भाषा और ऐसे बिंब थे, जिनसे आम आदमी सहज ही जुड़ जाता है. यही वजह है कि पाश की कविताएं पाठकों के भीतर, कहीं गहरे भीतर तक धंस जाती हैं. और जब विद्रोह की कविताएं दिलो-दिमाग में रच-बस जाएं, धंस जाएं तो कहने की जरूरत नहीं कि पाठक भी विद्रोही हो जाता है –

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
लोभ और गद्दारी की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाये पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढ़ना बुरा तो है
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
पर सबसे खतरनाक नहीं होता।
सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का, सब कुछ सहन कर लेना
घर से निकलना काम पर और काम से घर लौट जाना
सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना…

वैसे तो पाश की राजनीतिक गतिविधियां काफी तेज रही हैं. विभिन्न पार्टियों से जुड़कर आमजन के लिए लड़ना उनका धर्म रहा है. पर उनकी मुख्य पहचान किसी राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में नहीं बनी, बल्कि एक क्रांतिकारी और जुझारू कवि के रूप में बनी. पार्टियों के बदलते स्टैंड और वहां पैठी अवसरवादिता पाश को कचोटती थी। यह पाश की खीज ही थी जो हमारे समय में पूरे चरम पर दिखती है –

यह शर्मनाक हादसा हमारे साथ ही होना था
कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्द ने
बन जाना था सिंहासन की खड़ाऊं
मार्क्स का सिंह जैसा सिर
दिल्ली के भूलभुलैयों में मिमियाता फिरता
हमें ही देखना था
मेरे यारो, यह कुफ्र हमारे समयों में होना था…

पाश की कविताओं से गुजरते हुए एक खास बात यह लगती है कि उनकी कविता की बगल से गुजरना पाठकों के लिए मुश्किल है. इन कविताओं की बुनावट ऐसी है, भाव ऐसे हैं कि पाठक बाध्य होकर इनके बीच से गुजरते हैं और जहां कविता खत्म होती है, वहां आशा की एक नई रोशनी के साथ पाठक खड़े होते हैं. यानी, तमाम खिलाफ हवाओं के बीच भी कवि का भरोसा इतना मुखर है, उसका यकीन इतना गहरा है कि वह पाठक को युयुत्सु तो बनाता ही है, उसकी जिजीविषा को बल भी देता है.

मैं किसी सफेदपोश कुर्सी का बेटा नहीं
बल्कि इस अभागे देश की भावी को गढ़ते
धूल में लथपथ हजारों चेहरों में से एक हूं
मेरे माथे पर बहती पसीने की धारों से
मेरे देश की कोई भी नदी बेहद छोटी है.
किसी भी धर्म का कोई ग्रंथ
मेरे जख्मी होठों की चुप से अधिक पवित्र नहीं है.
तू जिस झंडे को एड़ियां जोड़कर देता है सलामी
हम लुटे हुओं के दर्द का इतिहास
उसके तीन रंगों से ज्यादा गाढ़ा है
और हमारी रूह का हर एक जख्म
उसके बीच वाले चक्र से बहुत बड़ा है
मेरे दोस्त, मैं मसला पड़ा भी
तेरे कीलों वाले बूटों तले
माउंट एवरेस्ट से बहुत ऊंचा हूं
मेरे बारे में गलत बताया तेरे कायर अफसरों ने
कि मैं इस राज्य का सबसे खतरनाक महादुश्मन हूं
अभी तो मैंने दुश्मनी की शुरुआत भी नहीं की
अभी तो हार जाता हूं मैं
घर की मुश्किलों के आगे
अभी मैं कर्म के गड्ढे
कलम से आट लेता हूं
अभी मैं कर्मियों और किसानों के बीच
छटपटाती कड़ी हूं
अभी तो मेरा दाहिना हाथ तू भी
मुझसे बेगाना फिरता है.
अभी मैंने उस्तरे नाइयों के
खंजरों में बदलने हैं
अभी राजों की करंडियों पर
मैंने लिखनी है वार चंडी की.

पाश विद्रोही कवि थे. उनका यह विद्रोह गांधी परिवार और खास तौर पर इंदिरा गांधी के खिलाफ खुलकर सामने आया है. स्वर्ण मंदिर परिसर में चले ऑपरेशन ब्लूस्टार की वजह से उन्होंने इंदिरा गांधी का खूब विरोध किया था. नवंबर ’84 के सिख विरोधी दंगों से सात्विक क्रोध में भर कर पाश ने ‘बेदखली के लिए विनयपत्र’ जैसी रचना भी की. इस कविता में मारे गये निर्दोष सिखों के प्रति गहरी सहानुभूति थी, तो दूसरी तरफ सत्ता की गलत नीतियों के प्रति विद्रोह भी –

मैंने उम्रभर उसके खिलाफ सोचा और लिखा है
अगर उसके अफसोस में पूरा देश ही शामिल है
तो इस देश से मेरा नाम खारिज कर दें …
… इसका जो भी नाम है – गुंडों की सल्तनत का
मैं इसका नागरिक होने पर थूकता हूं
मैं उस पायलट की चालाक आंखों में
चुभता हुआ भारत हूं
हां, मैं भारत हूं चुभता हुआ उसकी आंखों में
अगर उसका अपना कोई खानदानी भारत है
तो मेरा नाम उसमें से अभी खारिज कर दो.

तो सवाल उठता है कि आखिर पाश के लिए भारत क्या है? कैसा देश है? और अपने भारत के प्रति पाश क्या विचार रखते हैं? उस भारत के प्रति पाश के भीतर कैसा सम्मान है? पाश के ही शब्दों में –

भारत
मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहां कहीं भी इस्तेमाल होता है
बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं…

पर पाश इस भारत को किसी सामंत पुत्र का भारत नहीं मानते. वह मानते हैं कि भारत वंचक पुत्रों का देश है. और भारत को अपने लिए सम्मान मानने वाले पाश कहते हैं –

इस शब्द के अर्थ
किसी दुष्यंत से संबंधित नहीं
वरन खेतों में दायर है
जहां अनाज उगता है
जहां सेंध लगती है…

पाश ने ताउम्र अपने सपनों की हिफाजत की. सपनों को जिंदा रखने के लिए जंग किया. पर सवाल यह भी है कि पाश का सपना क्या था? जाहिर है पाश का सपना था गैरबराबरी से मुक्त समाज. एक ऐसा समाज जहां न कोई राजा हो न कोई प्रजा. जिस समाज में लोगों को आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक बराबरी का अधिकार मिले. शिक्षा और स्वास्थ्य की बुनियादी जरूरतें जो समाज पूरी कर सके, ऐसा समाज रचना चाहते थे पाश. इसीलिए तो वे लिखते हैं –

हम लड़ेंगे साथी
उदास मौसम से
हम लड़ेंगे साथी
गुलाम इच्छाओं से
हम चुनेंगे साथी
जिंदगी के सपने…

सच है कि पाश जैसा कवि दुनिया में रेयरेस्ट ऑफ द रेयर होता है और ऐसा कवि कभी मर नहीं सकता. वह तो अपनी मौत को भी लताड़ चुका होता है, उससे पार पा चुका होता है.

Tags: Bhagat Singh, Death anniversary special, Hindi Literature, Hindi poetry, Literature

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