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रवीन्द्र कालिया का गरूर तोड़ना चाहती थी, इसलिए कहानी लिखना शुरू किया- ममता कालिया

रवीन्द्र कालिया का गरूर तोड़ना चाहती थी, इसलिए कहानी लिखना शुरू किया- ममता कालिया

ममता कालिया कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध, कविता और पत्रकारिता अर्थात साहित्य की लगभग सभी विधाओं में हस्तक्षेप रखती हैं.

ममता कालिया कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध, कविता और पत्रकारिता अर्थात साहित्य की लगभग सभी विधाओं में हस्तक्षेप रखती हैं.

भुवनेश्वर में सम्पन्न हुए 'कलिंग साहित्य महोत्सव 2021' (Kalinga Literary Festival) में अपनी साहित्यिक यात्रा के बारे में ममता कालिया ने कहा कि उनकी पठन-पाठन की यात्रा बहुत ही शानदार रही है और इन यात्राओं को निरंतर गतिमान बनाए रखने के लिए उन्होंने समय-समय पर विधाओं को बदला है.

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    Hindi Sahitya News: साहित्य में कोई बाधा दौड़ या एथलेटिक्स जैसी कोई चीज नहीं है जिसमें यह देखा जाए कि कौन प्रथम आ रहा है. साहित्य में बहुत बड़ी लाइन होती है जिसमें सभी एकसाथ चलते हैं. ये बातें कहीं हिंदी की प्रख्यात लेखिका ममता कालिया ने.

    भुवनेश्वर में सम्पन्न हुए ‘कलिंग साहित्य महोत्सव 2021’ (Kalinga Literary Festival) में अपनी साहित्यिक यात्रा के बारे में ममता कालिया ने कहा कि उनकी पठन-पाठन की यात्रा बहुत ही शानदार रही है और इन यात्राओं को निरंतर गतिमान बनाए रखने के लिए उन्होंने समय-समय पर विधाओं को बदला है.

    सुपरिचित लेखिका नीलाक्षी सिंह (Neelakshi Singh) के सवालों पर ममता कहती हैं कि हमेशा सीधी चलने वाली ट्रेन भी पटरियां बदलती हैं, हम तो इनसान हैं. पहले वह कविताएं लिखती थीं, फिर कहानियां लिखीं, उपन्यास और संस्मरण भी लिखे. जरा से कौशल और अनुशासन के साथ वह तमाम विधाओं में लेखन कर रही हैं.

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    रवीन्द्र कालिया से मुलाकात
    चंडीगढ़ (Chandigarh) के एक साहित्य सम्मेलन में रवीन्द्र कालिया (Ravindra Kaliya) से मुलाकात होने से पहले ममता कालिया कवि थीं, लेकिन मुलाकात के बाद कहानियां लिखने लगीं. यह रवीन्द्र कालिया की संगत का असर था या अंदर की ख़लिश कहानीकार बनने की, इस सवाल पर ममता कहती हैं, ‘पहले कवि के रूप में ही मेरी पहचान थी, क्योंकि वह कविता का दौर था. अकविता अपने चरम पर थी. मैंने 21 कविताएं लिखी थीं, जो ‘प्रारम्भ’ नाम के संकलन में छपी थीं. कहानियां तो मैं शौकिया तौर पर लिखती थीं.’

    Mamta Kalia Interview

    ’30 जनवरी, 1965 को कहानी सवेरा नाम की गोष्ठी चंडीगढ़ में हुई थी. उसमें आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी (Hazari Prasad Dwivedi) ने मुझसे कहा कि मैं आज की कहानी पर पर्चा पढूं. आचार्य जी के कहने पर मैंने पर्चा लिखा और पढ़ा. मैं गद्य लिखती तो थी परन्तु उसके प्रति गंभीर नहीं थी.’

    रवीन्द्र कालिया की चुनौती
    पुराने दिनों को याद करते हुए वह कहती हैं, ‘चंडीगढ़ से वापसी के दौरान जब रवीन्द्र कालिया ने मुझसे कहा कि आप केवल कविता लिखती-पढ़ती हैं क्या. ‘कविता’ शब्द को उन्होंने ऐसी आलोचना किस्म की आवाज़ में कहा कि मुझे वह चुनौती जैसी लगी. मुझे लगा कि यह आदमी समझता है कि कहानी लिखना कोई बहुत बड़ा काम है. क्योंकि वह कहानी लेखक के रूप में स्थापित होते जा रहे थे. और उस समय रवीन्द्र कालिया की कहानी ‘नौ साल छोटी पत्नी’ काफी चर्चा में थी. यह उनकी दूसरी कहानी थी लेकिन प्रकाशित पहले हुई.’

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    ममता कालिया (Mamta Kalia) कहती हैं कि इस पूरी बातचीत में मुझे उनके अंदर के गरूर दिखाई दिया. और वह गरूर यह था कि वह मोहन राकेश के विद्यार्थी थे. कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव वाले ग्रुप से उनकी अच्छी दोस्ती थी. इसलिए वह यह मानकर चलते थे कि ज़माना तो कहानी का है, ये कवि है तो क्या है.

    ममता कहती हैं, ‘मैं इस गरूर को तोड़ना चाहती थी. इसलिए मैंने गंभीरता से कहानी लिखना शुरू किया. मुझे लगा कि इन्हें कहानी लिखकर दिखाते हैं कि इसमें (कहानी लिखने में) ऐसी कौन सी बात है.’

    Mamta Kalia

    रवीन्द्र बहुत ही लोकतांत्रिक थे
    प्रेम कहानी, लड़कियाँ, एक पत्नी के नोट्स और दुक्खम्‌ – सुक्खम्‌ जैसी चर्चित कृतियां रचने वाली ममता कालिया कहानीकार बनने की यात्रा को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं, ‘हम अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों में एक अकड़ होती है कि हमने विश्व साहित्य पढ़ रखा है और ये (रवीन्द्र कालिया) हिंदी कहानी को ऐसे पेश कर रहे हैं जो कोई नायाब, दुर्लभ और अप्राप्त चीज हो. इसलिए मैंने कहानी को एक चुनौती के रूप में लिखना शुरू किया, जो धीरे-धीरे मेरी आदत बन गई. और कहानी लिखना मुझे अच्छा लगने लगा. कहानी की दुनिया मुझे अपनी ओर खींचने लगी.’

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    रवीन्द्र कालिया ने अपने संस्मरण में लिखा है कि ममता मुझसे ज्यादा लोकप्रिय थीं. उस समय लोकप्रियता के पैमाने डाक से आने वाली चिट्ठी और पुस्तक प्रकाशन से मिलने वाली रॉयल्टी से तय होते थे.

    पति-पत्नी के बीच कहानी लेखन को लेकर स्पर्धा के सवाल पर ममता कहती हैं कि रवीन्द्र बहुत ही लोकतांत्रिक थे. हमारे घर में लोकतंत्र अराजकता की हद तक था. हम विवाह के विरुद्ध भी लिखते रहे और परिवार के विरुद्ध भी. लेकिन ये बातें हमारे दिल-दिमाग तो दूर कपड़ों तक को छू कर नहीं गई. क्योंकि हम औसत परिवार के बारे में लिख रहे थे. हम औसत स्त्री और पुरुषों के बारे में लिख रहे थे. हम ये मानकर चलते थे कि हमें बिल्कुल अलग किस्म का परिवार बनाना है.

    ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैंने कुछ लिखा तो उस पर रवीन्द्र ने कहा कि तुमने ऐसा क्यों लिखा. रवि ज्यादातर निम्न मध्यवर्ग, सर्वहारा वर्ग पर लिखते थे. उनका समस्त लेखन वंचितों के बारे में है. हमारे बीच में ईगो नाम की चीज नहीं थी. हम दोनों अच्छे खिलाड़ी थे.

    60 के दशक में लेखन खासकर महिला लेखन के प्रस्थान बिन्दु के सवाल पर वह बताती हैं- मुझसे भी 10 साल पहले से मन्नू भंडारी (Mannu Bhandari) लिख रही थीं. उस समय नई कहानी का जोर था. जब हम विद्यार्थी थे तब मन्नू जी कहानियां खोज-खोज कर पढ़ते थे. उस समय नई कहानी के त्रयी माने जाते थे मोहन राकेश (Mohan Rakesh), कमलेश्वर (Kamleshwar) और राजेन्द्र यादव (Rajendra Yadav). इन तीनों के बीच में कहीं पर भी मन्नू भंडारी का जिक्र नहीं आता था. जबकि मन्नू भंडारी इन तीनों से कहीं ज्यादा लोकप्रिय थीं और इनसे ज्यादा स्थापित थीं. उनकी कहानी लोगों को याद रह जाती थीं. मन्नूजी की कहानियां बहुत जल्दी कोर्स में लगने लगी थीं.

    मन्नू भंडारी इतनी लोकप्रिय थीं कि राजेन्द्र यादव ने अपनी आत्मकथा (Rajendra Yadav Autobiography) में लिखा है- मन्नूजी का लेखिका होना ही हमारी शादी का निर्णायक बिंदु था.

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    किस्सा साढ़े चार यार
    और जिस समय मैंने लिखना शुरू किया, उस समय मैं दिल्ली आ चुकी थी. 1963 में हिंदू कॉलेज में लेकचचर बन गई थी. फिर हम इलहाबाद पहुंच गए. उस समय इलहाबाद में जो लोग यर्थावाद कहानी के दिग्गज माने जाते थे. उनमें दूधनाथ सिंह, ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह, विजय मोहन सिंह, रवीन्द्र कालिया जैसे बड़े नाम थे. इनमें विजय मोहन सिंह आलोचक और कहानीकार, दोनों थे. इसलिए उन्हें आधा कहानीकार माना जाता था. उन दिनों ‘किस्सा साढ़े चार यार’ काफी चर्चित हुआ था. इस किस्से में मेरा कहीं जिक्र नहीं था, जबकि मैं भी कहानी लिख रही थी. और मेरी कहानियां सबसे ज्यादा प्रकाशित भी होती थीं. लेकिन मैंने तो इस पर ना कभी गौर किया ना ही कोई शिकायत. क्योंकि लोकप्रियता का भी अपना एक सुख होता है. और जो लोकप्रिय व्यक्ति होता है वह कभी इसकी चिंता नहीं करता कि इतिहास में उसका नाम जा रहा है या नहीं.

    लेखन में विभन्न शहरों का वातावरण
    ममता कालिया के लेखन में देश के विभन्न शहरों का वातावरण साफ-साफ दिखाई देता है. इस सवाल के जवाब में वह कहती हैं कि बचपन से लेकर रचनाकर्म में स्थापित होने तक हर तीन-चार साल में शहर बदल जाता था. रवीन्द्र की फितरत यह होती थी कि शाम को काम से थककर आए और कहते थे कि मैं तो नौकरी छोड़ आया हूं. वे जहां से सबसे अच्छे संबंध होते थे, वहां से भी झगड़ा करके बैठ जाते थे. गैर सहयोगवादी दृष्टिकोण रवीन्द्र के अंदर था. और मैंने भी कभी उनसे इस बात के लिए चिंता प्रकट नहीं की कि वो आखिर नौकरी क्यों छोड़ रहे हैं. वह इसलिए एक तो मैं कमाती थी. इसलिए मैं सोचती थी कि मैं क्यों उनके मजबूर करूं कि चंद रुपयों के लिए वह कहीं ना कहीं मातहत बनकर रहें. रवीन्द्र दाम्पत्य जीवन में भी कभी मातहत नहीं बने. वे आज़ादी ख्याली पुरुष थे और उनकी आजादी को मैं कभी डिस्टर्व नहीं करना चाहती थी.

    इसलिए हमारे शहर बदले, पते बदले, बार-बार जीवन के स्तर बदले. घर में दो-दो फ्रीलॉनर्स थे. और हिंदी में लेखन से कोई घर नहीं चला सकता. इसलिए घर चलाने के लिए हमने बार-बार नौकरियां बदलीं और शहर बदले.

    जीवन में एकांत और स्मृतियां होना जरूरी
    ममता बताती हैं कि रवीन्द्र जी के जाने के बाद उनके जीवन में अनेक बदलाव आए हैं. 2016 के बाद जीवन में एकाकीपन आ गया है. यहीं से उन्होंने संस्मरण लिखने शुरू किए हैं. क्योंकि संस्मरण लिखने के लिए जीवन में एकांत और स्मृतियां होना जरूरी है.

    Tags: Hindi Literature, Literature

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