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gaya prasad shukla snehi famous poet wrote jo bhara nahi hai bhavo se hindi kavita

मैथिलीशरण गुप्त की नहीं बल्की पंडित गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' की है ये प्रसिद्ध रचना

पं. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' को 'साहित्य-सितारेंदु', 'साहित्य-वारिधि', 'साहित्य-वाचस्पति' आदि उपाधियों से विभूषित किया गया था.

पं. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' को 'साहित्य-सितारेंदु', 'साहित्य-वारिधि', 'साहित्य-वाचस्पति' आदि उपाधियों से विभूषित किया गया था.

पंडित गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' की प्रथम कृति 'प्रेम्पच्चिसी' का प्रकाशन सन 1905 के आस-पास हुआ था. इसमें श्रृंगार रस के ब्रजभाषा में लिखे पच्चीस छंदों का संकलन किया गया था. प्रेमव्यंजना को उन्होंने ब्रजभाषा काव्य में सर्वप्रमुख स्थान दिया है.

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Famous Hindi Poet: स्कूल-कॉलेज या फिर देशभक्ति के कार्यक्रमों में ”जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं, वह हृदय नहीं है पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं” गीत बड़े ही उत्साह और उल्लास से गया जाता है. ज्यादातर आयोजनों में इन पक्तियों के लेखक राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त बताए जाते हैं. लेकिन ये सही नहीं है. इन पंक्तियों के लेखक मैथिलीशरण गुप्त नहीं बल्कि, गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ हैं.

गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के द्विवेदी युगीन साहित्यकार रहे हैं. उन्होंने अलग-अलग उपनामों से अलग-अलग रस की कविताओं की रचना की. ‘सनेही’ उपनाम से कोमल भावनाओं की कविताएं, ‘त्रिशूल’ उपनाम से राष्ट्रीय कविताएं तथा ‘तरंगी’ और ‘अलमस्त’ उपनाम से हास्य-व्यंग्य की कविताएं लिखीं. हालांकि, देशभक्ति और जन-जागरण वाली कविताएं अधिक चर्चित रहीं.

पंडित गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ का जन्म श्रावण शुक्ल त्रयोदशी, संवत 1940 में उन्नाव जिले के हड़हा गांव में हुआ था. जन्म की तारीख को लेकर भेद है. कुछ विद्वान 16 अगस्त, 1883 बताते हैं तो कुछ 21 अगस्त. सनेही जी के पिता पंडित अक्सेरीलाल शुक्ल देशभक्त थे.

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गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ ने भी बचपन में ही उर्दू और फारसी का अध्ययन किया था. मिडिल पास करके 1899 में ही वे अध्यापन कार्य में लग गये थे. सन 1902 में नार्मल का प्रशिक्षण प्राप्त करने वे लखनऊ गये और नॉर्मल पास करके फिर से अध्यापन कार्य में लग गए. लखनऊ में उनकी प्रतिभा का और भी विकास हुआ. यहां वे ब्रजभाषा, खड़ीबोली और उर्दू के कवियों के संपर्क में आए. उनकी संगत में सनेही जी ने रचनाकर्म शुरू कर दिया था. वे तीनों भाषाओं में काव्यरचना करते थे परन्तु वे प्रमुखतः ब्रजभाषा के ही कवि थे.

गांधीजी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर सनेह जी ने 1921 में स्कूल से त्यागपत्र दे दिया और पूरी तरह से साहित्य सृजन में रम गए. वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन कार्य से जुड़ गए. उनकी पहली कविता ‘रसिक मित्र’ में प्रकाशित हुई. इसके बाद उनकी रचनाएं ‘रसिक रहस्य’, ‘साहित्य सरोवर’ और ‘रसिक मित्र’ जैसी पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होने लगीं. सन् 1913 में गणेश शंकर विद्यार्थी के आग्रह पर साप्ताहिक ‘प्रताप’ में भी वे कविताएं लिखने लगे. ‘प्रताप’ में छपी उनकी ‘कृषक क्रंदन’ शीर्षक रचना ने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का ध्यान उनकी ओर आकृष्ट किया. सन् 1914 से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के कहने से प्रयाग से निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘सरस्वती’ में भी वे लिखने लगे. द्विवेदी जी ने उन्हें खड़ीबोली में काव्यरचना के लिए प्रेरित किया. खड़ीबोली में उन्होंने खूब लेखन किया, लेकिन ब्रजभाषा में वे आजीवन लिखते रहें.

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चार उपनामों से लेखन
पंडित गयाप्रसाद शुक्ल अलग-अलग विषय पर लेखन अलग-अलग उपनामों से करते थे. सनेही भी उनका उपनाम था. इसके अलावा के त्रिशूल, तरंगी और अलमस्त नाम से भी काव्य रचनाएं करते थे. हास्य और व्यंग्य के लिए वे ‘अलमस्त’ या ‘तरंगी’ के नाम से लिखते थे. ‘त्रिशूल’ उपनाम से वे राष्ट्रीय कविताएं लिखते थे. राष्ट्र प्रेम की उनकी रचनाएं नौजवानों में जोश पैदा करती थीं. उनकी रचनाओं का असर इस कदर था कि अंग्रेजी हुकूमत ‘त्रिशूल’ नाम के कवि की खोज में लग गए.

उनकी एक रचना ‘स्वदेश’ तो आज भी जन-जन के कण्ठ पर है. अधिकांश लोगों को इस रचना का एक ही छंद याद है ‘जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं.’ यह पूरी रचना इस प्रकार है-

वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं॥

जो जीवित जोश जगा न सका,
उस जीवन में कुछ सार नहीं।
जो चल न सका संसार-संग,
उसका होता संसार नहीं॥

जिसने साहस को छोड़ दिया,
वह पहुंच सकेगा पार नहीं।
जिससे न जाति-उद्धार हुआ,
होगा उसका उद्धार नहीं॥

जो भरा नहीं है भावों से,
बहती जिसमें रस-धार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं॥

जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े,
पाया जिसमें दाना-पानी।
है माता-पिता बंधु जिसमें,
हम हैं जिसके राजा-रानी॥

जिसने कि खजाने खोले हैं,
नवरत्न दिए हैं लासानी।
जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं,
जिस पर है दुनिया दीवानी॥

उस पर है नहीं पसीजा जो,
क्या है वह भू का भार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं॥

निश्चित है निस्संशय निश्चित,
है जान एक दिन जाने को।
है काल-दीप जलता हरदम,
जल जाना है परवानों को॥

है लज्जा की यह बात शत्रु—
आये आंखें दिखलाने को।
धिक्कार मर्दुमी को ऐसी,
लानत मर्दाने बाने को॥

सब कुछ है अपने हाथों में,
क्या तोप नहीं तलवार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं॥

गयाप्रसाद शुक्ल सनेही ने गोरखपुर से निकलने वाले मासिक पत्र ‘कवि’ का लगातार 10 वर्षों तक संपादन किया. इसके बाद वे 1928 में अपना निजी प्रेस खोलकर काव्य संबंधी मासिक पत्र ‘सुकवि’ का प्रकाशन आरंभ किया. यह पत्रिका 22 वर्षों तक प्रकाशित हुई.

सनेही जी की रचनाएं आजादी के मतवालों में जोश भरने का काम करती थीं-

बीतीं दासता में पड़े सदियां, न मुक्ति मिली
पीर मन की ये मन ही मन पिराती है

देवकी-सी भारत मही है हो रही अधीर
बार-बार वीर ब्रजचन्द को बुलाती है

चालीस करोड़ पुत्र करते हैं पाहि-पाहि
त्राहि-त्राहि-त्राहि ध्वनि गगन गुंजाती है

जाने कौन पाप है पुरातन उदय हुआ
परतन्त्रता की गांठ खुलने न पाती है।

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उनकी प्रमुख रचनाओं में प्रेम पचीसी (1905) , गप्पाष्टक, कुसुमांजलि (1915), कृषक-क्रन्दन (1916), त्रिशूल तरंग (1919), राष्ट्रीय मंत्र (1921) शामिल हैं. उनके द्वारा सम्पादित पुस्तिकाओं में संजीवनी (1921), राष्ट्रीय वीणा (1922); कलामे-त्रिशूल (1930), करुणा कादंबिनी (1958) शामिल हैं. हालांकि इनमें से अधिकांश पत्र-पत्रिकाएं अब उपलब्ध नहीं हैं. पंडित गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ का निधन 20 मई, 1972 को कानपुर के एक अस्पताल में हुआ था.

किसानों की दुर्दशा का उन्होंने बहुत ही मार्मिक वर्णन किया है-

मानापमान का नहीं ध्यान, बकते हैं उनको बदज़ुबान,
कारिन्दे कलि के कूचवान, दौड़ाते, देते दुख महान,
चुप रहते, सहते हैं किसान।
नजराने देते पेट काट, कारिन्दे लेते लहू चाट,
दरबार बीच कह चुके लाट, पर ठोंक-ठोंक अपना लिलाट,
रोते दुखड़ा अब भी किसान।
कितने ही बेढब सूदखोर, लेते हैं हड्डी तक चिंचोर,
है मन्त्रसिद्ध मानो अघोर, निर्दय, निर्गुण, निर्मम, कठोर,
है जिनके हाथों में किसान।
जब तक कट मरकर हो न ढेर, कच्चा-पक्का खा रहे सेर,
आ गया दिनों का वही फेर, बंट गया न इसमें लगी देर,
अब खाएं किसे कहिए किसान।
कुछ मांग ले गए भांड़, भांट कुछ शहना लहना हो निपाट,
कुछ ज़िलेदार ने लिया डाट, हैं बन्द दयानिधि के कपाट,
किसके आगे रोएं किसान।
है निपट निरक्षर बाल-भाव, चुप रहने का है बड़ा चाव,
पद-पद पर टकरा रही नाव, है कर्णधार ही का अभाव,
आशावश जीते हैं किसान।
अब गोधन की वहां कहां भीर, दो डांगर हैं जर्जर शरीर,
घण्टों में पहुंचे खेत तीर, पद-पद पर होती कठिन पीर,
हैं बरद यही भिक्षुक किसान।
फिर भी सह-सहकर घोर ताप, दिन रात परिश्रम कर अमाप,
देते सब कुछ, देते न शाप, मुंह बांधे रहते हाय आप,
दुखियारे हैं प्यारे किसान।
जितने हैं व्योहर ज़मींदार, उनके पेटों का नहीं पार,
भस्माग्नि रोग का है प्रचार, जो कुछ पाएं, जाएं डकार,
उनके चर्वण से हैं किसान।
इनकी सुध लेगा कौन हाय, ये ख़ुद भी तो हैं मौन हाय,
हों कहां राधिकारौन हाय? क्यों बन्द किए हैं श्रोन हाय?
गोपाल ! गुड़ गए हैं किसान।
उद्धार भरत-भू का विचार, जो फैलाते हैं सद्विचार,
उनसे मेरी इतनी पुकार, पहिले कृषकों को करें पार,
अब बीच धार में हैं किसान।

Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature, Poem

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