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Gulzar Birthday: मुझे कहानियां कहना बहुत पसंद है लेकिन पहला प्रेम शायरी ही है- गुलज़ार

ग़ुलज़ार नाम से प्रसिद्ध सम्पूर्ण सिंह कालरा हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध गीतकार हैं.

ग़ुलज़ार नाम से प्रसिद्ध सम्पूर्ण सिंह कालरा हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध गीतकार हैं.

    Gulzar Birthday Special: राधाकृष्ण प्रकाशन (Radhakrishna Prakashan) से प्रकाशित किताब ‘बोसकीयाना’ (Boskiyana) गीतकार गुलज़ार (Gulzar) की ज़िन्दगी और लेखन पर आधारित है. गुलज़ार के घर का नाम ‘बोसकीयाना’ है. इस किताब में गुलज़ार साहब (Gulzar Saab) के घर का माहौल, उनके रहन-सहन, उनकी पसंद-नापसंद और उनके नजरिये पर आधारित है. यह किताब बातों का लम्बा सिलसिला है. प्रस्तुत हैं इस किताब के चुनिंदा अंश-

    कुछ देर हम मौन रहते हैं. चाय आ गई है. उसकी भाप जैसे कोई मौसम बना रही है. सब जानते हैं, वे गिलास में चाय पीना तब से चलाए हुए हैं, जब से चाय अच्छी लगी थी. उन्हें चाय की थड़ी से कॉफी शॉप तक किसी ने बदलते नहीं पाया. न मक़सद बदला, न नेचर!

    आपकी मेज़ पर इतनी किताबें हैं कि कोई-कोई जगह बचती है. मेघना जी के मुताबिक किताबों के क़िले में बैठे हुए जैसे आप महफ़ूज महसूस करते हैं. आप एक साथ कई किताबें पढ़ते हैं. फेडरर की ‘ओपन’ से लेकर नसीरुद्दीन शाह की आत्मकथा तक. नोबेल विजेता कथाकारों से लेकर पटना-अयोध्या तक के लेखकों-कवियों तक. मराठी और बंगाली कविता का तर्ज़ुमा चल रहा है. फ़रहाना जी उर्दू स्क्रिप्ट की देवनागरी कंपोज़ कर पन्ने ला रही हैं. ये तो बड़ी लिटरेरी जन्नत सी लगती है –

    ये फ़िल्में जो हैं, वे मेरा कभी मक़सद नहीं रही थीं. मैं अपने लिखने-पढऩे में मस्त था. जब मैं एक मोटर गैरेज़ में काम कर रहा था… तब बिमलदा ने कुछ देखा होगा मेरे भीतर – या तो अकल या मेहनत! उन्होंने कहा, मैं जानता हूं कि तुम्हें फ़िल्मों के लिए लिखना पसंद नहीं है पर आओ और डायरेक्टर्स मीटिंग में मेरे साथ बैठो. तुम्हें अच्छा लगेगा. तुम्हारा जैसा जी चाहे, वैसा करो, पर उस मोटर गैरेज में वापस मत जाना. वो तुम्हारी जगह नहीं है. मेरी ज़िंदगी का वो सबसे इमोशनल पल था. उससे पहले मुझसे किसी ने इस तरह नहीं कहा था. पिता की तरह थे वो. मैं रो पड़ा. उन्होंने हाथ खींच कर उठा लिया मुझे, ज़िंदगी का रंग ही बदल गया.

    इस तरह मैं फ़िल्मों में आ गया. पर किताबें मुझसे नहीं छूटी, साथ चलती रहीं.

    ….. तो फ़िल्में आपके भीतर के लेखक का एक्सटेंशन बनाती चली गईं….?

    फ़िल्म कमीशन की जाती है, आपको उसमें कन्सेप्ट के मुताबिक उतरना पड़ता है – स्क्रिप्ट और कैरेक्टर आते हैं. कई किस्म की बंदिशें होती हैं. शायरी मेरा वादा है, यह बड़ा कैनवास है – यहां मेरा अपना राज है.

    फिर लिखने के अपने सुख-दुख हैं. ऩज्म हो या अफसाना आह भी है, चीख भी, दुहाई भी. मगर हां, ये इंसानी दर्दों का इलाज नहीं है. वह सिर्फ इंसानी दर्दों को ममिया के रख देते हैं ताकि आने वाली सदियों के लिए सनद रहे.

    जन्मदिन विशेष: कहानियां ऐसी गोल नहीं होतीं कि हर तरफ़ से एक सी नज़र आएं- गुलज़ार

    कहानियां हैं कि गढ़ी नहीं जातीं, वो घटती रहती हैं. कुछ साफ़ नज़र आ जाता है. कुछ ओझल होती हैं, ऊपरी सतह जरा छील दो तो बिल-बिलाकर ऊपर आ जाती हैं.

    जब साहित्य जीवन से रिश्ता बनाने लगता है तो आप उसे अपनी ज़िंदगी से ट्रांस्क्राइब करना शुरू करते हैं. ये ट्रांस्क्रिप्शन हर उस जगह होता है, जहां आपके क्रियेशन को राह मिलती है.

    कुछ अफ़साने यूं हुए कि फोड़ों की तरह निकले. वह हालात, माहौल और सोसाइटी के दिए हुए थे. कभी ऩज्म कहके खून थूक लिया और कभी अफ़साना लिखकर जख्म पर पट्टी बांध ली.

    लफ़्जों से आग नहीं बुझती, नज्मों से जख्म नहीं भरते। मगर –

    इक ऩज्म का मिसरा कसते हुए
    अल्फ़ाज़ के जंगल में घुसकर
    मख़्सूस कोई मा’नी जब तोड़के लाता हूं
    हाथों पे ख़राशें पड़ती हैं
    और उंगलियां छिल जाती हैं मगर
    वो लफ़्ज़ ज़ुबां पे रखते ही
    मुंह में इक रस घुल जाता है.

    कोई दिन, कोई घड़ी याद है कि तय हुआ के चलो अब लिख कर ही रहेंगे.

    कोई एक पक्का क्षण याद नहीं आता. ऐसा कोई फिल्मी स्टाइल वाला एक पॉइन्ट होता भी नहीं कि लीजिए ये हुआ और पूरी पिक्चर अचानक बदल गई. एक ग्रेजुएल प्रोसेस होता है जो चलता रहता है. बचपन से हम सब लोग अपने आस-पास हो रही चीज़ों को रिकॉर्ड करते रहते हैं. एक ढकी हुई हांडी-जिसमें पानी है और चूल्हे पर रखी है. एक वक़्त आता है जब पानी उबलने लगता है, भाप उसके ढक्कन को हिलाने लगती है, हांडी के किनारों से ढक्कन टकराने लगता है. मैं उस ढक्कन की तरह हूं, मैं इतनी बुरी तरह बजा कि मुझे भाप को निकलने का रास्ता देना पड़ा.

    मैं उनकी ही लिखी एक चिट्ठी का अंश पढ़ता हूं जो उन पर तैयार हो रही किताब के एडीटर प्रशांत कुमार को लिखी गई थी –

    तारीख़ बहुत सही-सही तो नहीं मालूम, लेकिन छानबीन से इतना ज़रूर पता चला है कि जिला जहलम में एक शहर है -दीना – जो अब पाकिस्तान में है. वहां के सरदार मक्खन सिंह जी के यहां मैं पैदा हुआ. 18 अगस्त, सन् 1934 का दिन था. दिन था या रात – इसकी ख़बर नहीं. मेरी मां का नाम था सुजान कौर. सिर्फ नाम ही जानता हूं, उनकी सूरत से वाक़िफ़ नहीं. बड़ा होने के बाद बहुत ढूंढ़ा, कोई तस्वीर भी नहीं मिली. वह ख़याल कभी-कभी बहुत परेशान करता है, हालांकि परेशानी की कोई खास वजह भी नहीं. फिर भी जिसके गोश्त-पोश्त से पैदा हुआ हूं उसे देखा होता तो… अच्छा होता.

    मेरी परवरिश ख़ुसूसन मेरे वालिद साहब ने की.

    मुझे कभी-कभी लगता है कि बचपन बड़ा ‘रिच’ था मेरा, जिसकी वजह से, मेरा ख़याल है, मैं शायर भी हो गया, या मुझे इतना कुछ कहने की अर्ज महसूस हुई – ‘रिच’ इस वजह से कि एक तो ‘ज्वाइंट फैमिली’ थी. पांच भाई, तीन बहनें, फादर की तीन शादियां …. (पहले एक का देहांत, फिर बच्चों का ख़याल रखने के लिए नई मां) तो जिस क़िस्म का माहौल आप सोच सकते हैं, वो सारा भी था.

    गुलज़ार की चुनिंदा कविताएं ‘बारिश आती है तो मेरे शहर को कुछ हो जाता है’

    हालात बहुत खुशगवार नहीं थे. तो वो कठिनाइयां जो बचपन की थीं वो ज़ाहिर है कि कुरेदती है ज़हन को. मुझे लगता है कि उन्होंने बड़ा अमीर कर दिया है. मुझे उसका बड़ा फ़ायदा हुआ और कहीं अगर बहुत सुखी बचपन होता तो शायद बड़ा ही निकम्मा आदमी होता.

    दिल्ली में परवरिश हुई. स्कूल वहीं से पास किया. प्राइमरी-म्युनिसिपल बोर्ड मिडिल स्कूल से और मैट्रिक – दिल्ली यूनाइटेड क्रिश्चियन स्कूल. कॉलेज बंटा-बंटा सा रहा – सेंट स्टीफेन कॉलेज, दिल्ली, खालसा कॉलेज बंबई, नेशनल कॉलेज, बंबई – आखिर इंटर फेल होकर छोड़ दिया. बातें ऐसे करता हूं, जैसे ग्रेजुएट हूं.

    आजकल तो आप पीएच.डी. और डी.-लिट. वाले हैं. आपको डॉक्टर ऑफ लिटरेचर अवार्ड हो गई और आप पर भी रिसर्च करके लोग डॉक्टर होने लगे हैं.

    पता नहीं ज़िंदगी की पाठशाला इतनी कामयाबी से पास हुई कि नहीं. ये जो यूनिवर्सिटियां दे देती हैं, तो बड़ा अलग-सा लगता है. मेहरबानी है, विद्वान लोगों की. ये भी सोसायटी की एक रवायत होती है.

    मैं कभी स्कूल में पढ़ा हुआ सबक याद नहीं कर पाया, इसकी वजह यह भी थी कि असल में नंबरों की मुझे कभी परवाह ही नहीं होती थी. बहरहाल, जल्द ही मुझे अहसास हो गया कि किताबों में जो पढ़ाया जा रहा है असल में उसका ताल्लुक़ सच की ज़िंदगी से है. और जब मैं यह समझ गया, वे सबक मेरे लिए छपे-लिखे लफ़्ज़ों से ऊपर हो गए.

    संपूरण सिंह के गुलजार साहब बनने की कहानी…जो खा रहे हैं गालिब के नाम की पेंशन

    मुझे ‘ईदगाह’ पढ़ने की याद आती है. मुंशी प्रेमचंद की कहानी थी. कहानी एक बच्चे की है जो दादी को हाथ से सिकती हुई रोटियां उठाते देखता है. चिमटा नहीं है, दादी हाथ से उठा रही है इसलिए अंगुलियां जल जाती हैं. ईद के दिन बच्चा दादी से ईदी में कुछ पैसे मांगता है. वह अपने पास रखे कुछ पैसों में से उसे देती है. वह और मांगता है. दादी सोचती है, मेले में कुछ झूले वगैरह झूलेगा, घूमेगा तो कुछ सिक्के और दे देती है, कि जाओ घूमो-खेलो मौज करो. शाम को जब वह घर लौटता है तो वह झूलों के बारे में पूछती है. वह हैरत में पड़ जाती है, जब वह कहता है, उसने कोई झूला नहीं झूला.

    दादी कहती है, तब तूने पैसों का क्या किया?

    वह निकाल कर चिमटा देता है, कि अब रोटी बनाते वक़्त तुम्हें कभी हाथ नहीं जलाने पड़ेंगे.

    इस कहानी से मैं खुद को रिलेट कर सकता था क्योंकि हम भी अपनी मां को गर्म तंदूर से रोटियां लगाते-निकालते देखते थे, हर बार उनकी उंगलियों पर दाग़ पड़ जाते. तो जो कहानी बच्चों को एक्स्प्लेनेशन और निबंध लिखने के लिए थी, वह मेरे लिए लफ़्ज़ों से ऊपर चली आई. मैं उससे जुड़ जाता था. धीरे-धीरे मैं बड़े शायरों की किताबें पढ़ने लगा. मेरे बड़े भाई की एक टेक्स्ट बुक थी ‘बल-ए-जब्रील’ अल्लामा इक़बाल की लिखी हुई, मैंने ली और उन्हें लौटाई नहीं. बहुत बाद में, उन्हें मैंने इस बारे में बताया, उन्हें यह इम्प्रेशन था कि शायद उनसे कहीं खो गई. इस तरह शुरू से लिटरेचर और किताबें मेरा पैशन बन गईं थीं.

    लिखने के प्रति मेरा यह रुझान, शायरी की शक्ल में निकलकर आया. मुझे कहानियां कहना भी बहुत पसंद है लेकिन पहला प्रेम शायरी ही है. कह नहीं सकता कि क्यों ? ये ऐसा ही है जैसे आप कहें कि यह ख़ास ड्रेस आप क्यों पहनते हैं – इसका कोई जवाब नहीं है.

    ऐसा लगता है कि आपकी शायरी में, आपकी फ़िल्मों में आपके फिल्मी गीतों में – वाकये अलग-अलग हों ट्रीटमेंट जुदा हो, तब भी तार एक होता है. आप फ़िल्म बनाते वक़्त कैसे आदमी होते हैं?

    आप वही होते हैं जो आपकी शख़्सीयत होती है. हर आदमी, एक ही प्रोफेशन में हो तब भी दूसरे आदमी से कुछ अलग होता है, क्योंकि वो अपनी तरह से होता है. बैंक में कई क्लर्क हों, स्कूल में कई टीचर, पढ़ाते हैं, नोट गिनते हैं – पर रिएक्ट कुछ अपनी तरह से करते हैं. ये उनकी पहचान होती है – उनसे अलग नहीं की जा सकती.

    हालात बाहरी हो सकते हैं, शख़्सीयत अंदरूनी ही होती है. जो भी चुनता है आपके अंदर का इंसान चुनता है, अपने रंग भी वही चुनता है. जो ख़याल आपके जेहन में हैं, वही आप चुनते हैं. बाहरी हालात आपके अंदर शामिल होते हैं, यदि सिर्फ बाहरी होते तो आप कभी के छटक चुके होते. असर अंदरूनी हुए तो शख़्सीयत का हिस्सा हो गए.

    यह बात तय है कि आप कहीं भी अधूरे नहीं उतर सकते. आप हर जगह पूरे होते हैं. आपकी जो शख़्सीयत है, वह अपनी प्रकृति के साथ हर जगह अनिवार्य रूप से होगी. यहां तक कि जो खाना आप खाते हैं, या जो दाल आप नहीं खाते हैं – वह भी आपके मिज़ाज, आपकी पसंद, आपके स्वाद को बताता है. आपका काम आपको हर वक़्त उजागर करता रहता है. आप चीज़ें छुपा नहीं सकते. मेरे लिखे में, मेरी फ़िल्मों में, मैं तो होऊंगा ही. सबके साथ यही है. बस यह है कि एक्स्ट्रोवर्ट तत्काल बोल कर ज़ाहिर हो जाते हैं, इन्ट्रोवर्ट थोड़ा वक़्त लेकर खुलते हैं.

    अर्से पहले ‘माधुरी’ के ‘सात सुरों के मेले’ में किसी समीक्षक ने लिखा था – ज़िंदगी की तलाश में गुलज़ार ने कई दिए जलाए. कुछ जलते हैं, जलते रहेंगे, लेकिन एकाध दिया उसकी अपनी पूरी कोशिश के बाद भी सिर्फ यों गंदुमी उजाला कर रहा है जैसे कि किसी पेड़ का फेड आउट शॉट हो. अपने अंदर निरंतर लौ उठाते उस चिराग़ को ईमानदार आशिक फेंक भी नहीं सकता.

    यह सब संजोते हुए, ज़िंदगी की लौ में किसी भी क्रिएशन की पहली शक्ल कैसे बनती है?

    फ़िल्म हो तो भी, कुछ और लिखा या क्रिएट किया जा रहा हो तो भी, लम्हे को पूरी शिद्दत के साथ अपने भीतर धारण करना होता है. कोई सब्जेक्ट मुझे छू लेता है. कोई चरित्र आकर्षित करता है. उसके रेशे अलग-अलग रंगों में चमकते हैं. किसी भी घटना या लम्हे की परतों में मैं अपनी संभावनाएं खोजता हूं. उलझे हुए सूत्र सुलझाने की कोशिश चलती है. एक तस्वीर उभरकर आने लगती है. फिर मौका पाते ही प्रकट हो जाती है.

    वे डायरी का एक पन्ना पढ़ते हैं – ‘इमेजेज़’

    मैं भी उस हाल में बैठा था
    जहां परदे पर इक फ़िल्म के किरदार
    ज़िंदा जावेद नज़र आते थे
    उनकी हर बात बड़ी, सोच बड़ी, कर्म बड़े
    उनका हर एक अमल
    एक तम्सील थी सब देखने वालों के लिए
    मैं अदाकार था उसमें
    तुम अदाकारा थीं
    अपने महबूब का जब हाथ पकड़कर
    तुमने
    ज़िंदगी एक नज़र में भर के
    उसके सीने पे बस इस आंसू से
    लिखकर दे दी
    कितने सच्चे थे वो किरदार
    जो परदे पर थे
    कितने फ़र्जी थे वो दो, हाल में बैठे साए.

    …वो फ़.र्जी साये कौनसे थे, वो सच्चे किरदार कौनसे थे. खिड़की से रोशनी की एक किरन गिरती है, फिर एक और किरन गिरती है. तकनीक के बड़े-बड़े काले-काले डब्बों में न जाने कितने लोग चलते-फिरते साये बनाते हैं जिसे अमूमन हम फ़िल्म मेकिंग कहा करते हैं. असल में डब्बों में कुछ नहीं होता. होता है उसमें जो रोशनी की किरन गुजारने के तरीके तय करता है. इस तरह जब किरनें गुज़र जाती हैं, कुछ साये हाथ में आते हैं. यह फ़िल्म होती है, सिनेमा होता है. अंधेरे हॉल में ज़िंदगी का कोई जीता-जागता लम्हा होता है. मगर आखिर ये एक तकनीक ही तो है . इस तकनीक को अपने हुनर से अपनी तरह बना लेना होता है.

    पुस्तक: बोसकीयाना
    प्रकाशक: राधाकृष्ण प्रकाशन
    लेखक: गुलज़ार

    Tags: Books, Gulzar

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