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‘एसिड फेंककर, डायन-बिसाही कहकर मारी जा रही औरतें... देह नहीं प्रतिरोध की बात ही सच्चा स्त्री विमर्श है’

‘एसिड फेंककर, डायन-बिसाही कहकर मारी जा रही औरतें... देह नहीं प्रतिरोध की बात ही सच्चा स्त्री विमर्श है’

झारखंड में आज भी डायन-बिसाही के नाम पर महिलाओं पर अत्याचार हो रहा है, जिसे कथा साहित्य विषयवस्तु बना रहा है.

झारखंड में आज भी डायन-बिसाही के नाम पर महिलाओं पर अत्याचार हो रहा है, जिसे कथा साहित्य विषयवस्तु बना रहा है.

स्त्री विमर्श के नाम पर पुरुष को नकारने के फैशन और साहित्य में स्त्री देह को खोलने की मानसिकता का सख्त विरोध करने वाली यह वरिष्ठ कथाकार औरत के हालात के खिलाफ़ प्रतिरोध की आवाज़ उठाने की हामी है. स्त्री विमर्श की अहम लेखक के साथ ‘नारीमन’ के मुद्दों की पड़ताल करता एक साक्षात्कार.

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  • News18Hindi
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साहित्य संवाद : ‘देह मुक्ति इस संदर्भ में उचित है कि स्त्री का अपनी देह, अपनी कोख पर अधिकार हो; ज़रूरत से ज़्यादा खुलापन किसी तरह प्रेरित नहीं करता; स्त्री शोषण, प्रतिरोध, उपलब्धियां, प्रेरणादायी कथाओं को सामने लाना चाहिए और समस्याओं के समाधान के साहित्य को भी.’ कुछ इस तरह की दृष्टि रखने वाली लेखक हैं अनिता रश्मि. कथा एवं उपन्यास के हिन्दी साहित्य परिदृश्य में झारखंड से विश्वस्ति बन रही यह लेखनी अपनी विचारभूमि में आंचलिक जड़ों, प्रकृति साहचर्य और जीवन के प्रश्नों के प्रति जागरूक दिखायी देती है. डायमंड बुक्स प्रकाशन द्वारा ‘भारत कथा माला’ के अंतर्गत ‘21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां’ शीर्षक से विभिन्न राज्यों के कथा साहित्य का प्रकाशन शृंखला के रूप में किया गया है. इस कड़ी में झारखंड की कहानियों का संकलन भी आया. स्त्री विमर्श से जुड़े संदर्भों पर इस संकलन की संपादक अनिता रश्मि से भवेश दिलशाद ने संवाद किया. अनेक मुद्दे, बिंदु, प्रश्न और संभावनाएं सामने आयीं. इस बातचीत के अंश के तौर पर भवेश दिलशाद के प्रश्न और अनिता रश्मि के उत्तर.

1. हिन्दी कथा साहित्य में ‘स्त्री विमर्श’ पर आपका विचार?

हिन्दी के कथा साहित्य में जगह-जगह समय-समय पर सच्चा स्त्री विमर्श आता रहा है. स्त्रियों के दैहिक, मानसिक शोषण, खेतों-खलिहानों, फैक्ट्रियों में अनथक परिश्रम के साथ ही सफलताओं, सपनों और सर्वोच्च मंज़िलों को पाने की ज़िदों को संजोने वाला साहित्य सच्चा स्त्री विमर्श है. अभी स्त्री विमर्श का एक बड़ा अंश कथा साहित्य में प्रभावी ढंग से आना शेष है. झारखंड की बात की जाए, तो यहां जंगलों से लेकर शहर तक की श्रमिक चेतना, घरेलू हिंसा, दैहिक व मानसिक परदों में समाज की प्रताड़ना, सामान्य व बड़े घर की महिलाओं पर एसिड अटैक के बरक्स अंधविश्वास व कुरीतियों में मारी जा रही औरतों पर खुलकर लिखा जाना बाक़ी है.

2. इस परिदृश्य में स्त्री विमर्श में देह मुक्ति से लेकर प्रतिरोध तक के सोपान आपके यहां क्या अर्थ रखते हैं?

दैहिक मुक्ति या खुलेपन के अश्लील स्त्री विमर्श से असहमति है. देखिए, दुल्हन जब एक झीने, पारदर्शी दुपट्टे में आती है, तो भीतर तक एक उत्सुकता और सुंदरता का कोलाज रच जाती है. उसी स्त्री देह को पूरी तरह उघाड़कर रख देने वाला साहित्य, मेरी निगाह में रुचिकर नहीं. मेरा मानना है कि स्त्रियों के शौर्य, पराक्रम, संघर्ष, प्रतिरोध के साथ ही उनकी प्रतिभाओं को स्त्री विमर्श का हिस्सा बनाना चाहिए. कैसे झारखंड के श्रमिक वर्ग से निकलकर बच्चियां खेल जगत में विश्व स्तर पर कीर्ति पा रही हैं या कैसे यहां की औरतों का पसीना छला जा रहा है… ये कहानियां सच्चा स्त्री विमर्श रचेंगी.

3. ‘भाषा में आदमी होने की तमीज़ कविता है’, क्या यहां आदमी के अर्थ विस्तार में ‘औरत’ शामिल है? क्या इसे इस तरह न कहें कि ‘भाषा में औरत होने की हिम्मत कविता है’! स्त्री को मनुष्य के तौर पर पहचान दिलाने के संघर्ष में क्या स्त्री विमर्श अलगाव का कारण अथवा बाधा बनता है?

स्त्री को मनुष्य और व्यक्ति के रूप में स्थापित करने का बीड़ा साहित्य को भी उठाना है. यह विमर्श अलगाव या बाधा नहीं बनता, लेकिन स्त्री के एक व्यक्ति होने की बात उठाना ज़रूरी है. स्त्री विमर्श को हम पूरी तरह दरकिनार नहीं कर सकते, लेकिन इसके नये रूप की अब आवश्यकता है. स्त्री के मानव अधिकार की परिकल्पना की. पहाड़ हों या जंगल, यहां शिक्षा और चिकित्सा के अभाव जैसी समस्याओं के हल क्या हैं; सीता, द्रौपदी जैसे पौराणिक पात्रों से लेकर आज तक भी स्त्री जिस शोषण और जिन प्रश्नों से जूझ रही है, साहित्य उन्हें विषयवस्तु बनाये, न कि दैहिक मुक्ति के नाम पर परिवारों और आपसी प्रेम के ढांचे को तोड़ने जैसे शिगूफ़े छेड़े.

4. कथाओं में यह विमर्श क्यों नहीं आ पा रहा? समस्याएं और चुनौतियां क्या हैं?

बहुत सी धाराएं एक साथ प्रवाहित हैं. कुछ लेखक ग्रामीण परिवेश से जुड़कर समझ रखते हैं. झारखंड जैसे राज्यों में मानव तस्करी, पलायन, ‘डायन-बिसाही’ आदि अंधविश्वासों के नाम पर प्रताड़ना के साथ ही विधवा या अकेली स्त्री की संपत्ति और अधिकारों को हड़पने, अंदरूनी सामाजिक व्यवस्थाओं में मैला खिलाने जैसे अमानवीय दंड विधान होने जैसे विषय बिखरे पड़े हैं. फिर भी, पुरज़ोर ढंग से नहीं आ पा रहे हैं क्योंकि कई लेखक महानगरीय हैं और उन्हें स्थितियों का वास्तविक अनुभव या ज्ञान नहीं है.

5. इसका अर्थ क्या यह है कि इस पोस्ट माॅडर्न संचार युग में लेखक इन कोनों तक नहीं पहुंच पा रहा?

कुछ लेखक तो पहुंचे हैं और प्रतिबद्ध होकर लिख भी रहे हैं, लेकिन विमर्श तब बनता है जब इन विषयों पर सशक्त लेखन सतत हो. जो नहीं पहुंच पा रहे हैं, उन्हें शुभकामनाएं कि उद्वेलित हों.

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सर्व भाषा ट्रस्ट, दिल्ली के रामकृष्ण त्यागी स्मृति कथा सम्मान और प्रथम स्पेनिन सम्मान से नवाज़ी जा चुकी अनिता रश्मि ने इसी साल प्रकाशित ‘नारीमन’ केंद्रित कथा संकलन का संपादन किया है.

6. अंचल विशेष के संदर्भ में स्त्री साहित्य को हम कैसे समझें? क्या राष्ट्रीय स्त्री विमर्श अलग है, आंचलिक अलग?

लेखन को इस तरह की श्रेणी में नहीं बांटा जा सकता. कोई कथा आंचलिक विषयवस्तु के कारण ही आंचलिक साहित्य नहीं. यदि उसमें बोली विशेष की प्रचुरता हो, तो अलग बात है. आप अंचल के लेखन से भी मुख्यधारा में शामिल हो सकते हैं. मैं यह भी कहना चाहती हूं रेणु जी जैसा भाग्य सबका नहीं होता. दूसरे, हमारे प्रदेश के साहित्यकार शुरू से ही रचनाकर्म में तो श्रेष्ठ रहे परंतु प्रचार-प्रसार के प्रति सजग नहीं. अब स्थितियां बदल रही हैं और झारखंड समेत कई अंचलों के लेखक और कथाएं मुख्यधारा के साहित्य में आ रही हैं.

7. तो, झारखंड का कथा साहित्य अन्य प्रदेशों की कथाओं से किस तरह भिन्न और किस स्तर पर समान है?

सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर भिन्नताएं आती हैं. परंतु भाव, विचार और प्रतिरोध के स्तर पर एकरूपता भी. विविधता भी – एकता भी. फ़िलहाल मैं अन्य राज्यों पर केंद्रित इन कथा संकलनों को पढ़ रही हूं. उसके बाद तथ्य और स्पष्ट होंगे.

8. आपके द्वारा संपादित ‘श्रेष्ठ नारीमन की 21 कहानियां’ पुस्तक झारखंड की स्त्रियों से जुड़ा क्या महत्वपूर्ण दस्तावेज़ प्रस्तुत करती है? आपकी संपादकीय दृष्टि क्या रही?

संपादन पर बात करूं, तो मैंने इसमें स्त्री ही नहीं पुरुष भी, शहरी ही नहीं ग्राम्य पृष्ठभूमि के लेखकों को भी समाहित किया. भाषा, वर्ग, समुदाय एवं अंचलों के हिसाब से लेखकों की एक रेंज इस संकलन में है. विषयों और कहानियों के अंतर्मन के स्तर पर भी विविधता को नज़र में रखा. कुछ कहानियां ऐसी भी हैं, जो क्षेत्र विशेष नहीं बल्कि समूचे स्त्री मन का प्रतिनिधित्व करती हैं. विविधता को इसलिए भी आधार बनाया क्योंकि झारखंड में ऐसा नहीं है यहां केवल आदिवासी समाज ही है, सदान भी सदियों से हैं. विविधरंगी सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश है.

झारखंड के लेखकों का मन रहा है कि यहां की सभ्यता, संस्कृति और इतिहास के गौरव को स्थापित किया जा सके. ‘1857 के सिपाही विद्रोह’ से सदियों पहले ही यहां क्रांतियां हुईं. संथाल-हूल जैसे संघर्षों के इतिहास गवाही देते हैं. इन रणबांकुरों की कहानियां तो कही गईं, लेकिन वीरबालाओं की कहानियां कही जाने की ज़रूरत बनी हुई है. फूलो-झानो के साथ ही उरांव वीरांगनाओं का योगदान भुलाया नहीं जाना चाहिए. इस तरह से झारखंड के साहित्य से हो यह रहा है कि अब शासन स्तर पर भी कई पहलुओं पर ग़ौर किया जाने लगा है.

9. स्त्री विमर्श में झारखंड के कथा साहित्य से कौन से प्रश्न या तत्व जुड़ पाते हैं?

झारखंड के कथा साहित्य ने शुरू से ही स्त्री विमर्श को समृद्ध किया है. राधाकृष्ण रहे हों या योगेंद्रनाथ सिन्हा, रोज़ केरकेट्टा, रणेंद्र, पंकज मित्र जैसे अनेक लेखक कई कोणों से स्त्रियों की समस्याओं, संघर्षों एवं सफलताओं को रेखांकित करते रहे हैं. मेरा विचार है कि यहां का कथा साहित्य झारखंड की लोक चेतना, श्रमिक वर्ग की स्त्रियों के जीवन चित्र, स्त्रियों के बलिदान के साथ ही उनकी मासूमियत को भी लक्ष्य करता है.

10 अंततः जिज्ञासा यह है कि उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत की कई प्रेम कथाएं लोक में हैं जो बेहद प्रचलित भी रही हैं. झारखंड के लोक या परंपरा में हीर-रांझा या ढोला-मारू के समकक्ष कोई प्रेम कथा क्या स्त्री जीवन या मन का रूपायन नहीं करती? है तो कहां?

यह एक ज़रूरी बात है और इस पहलू को हमारी किताब में भी आना चाहिए था. मुझे अफ़सोस है कि इस संकलन में हम ऐसे कथानक शामिल नहीं कर सके. यहां दशम जलप्रपात है, वहां लोककथा के माध्यम से प्रेम कहानी मिलती है, ‘छैला सांदू और नवरी का प्रेम’. इस प्रेम कहानी से जुड़कर यहां के लोक में प्रतिवर्ष ‘एक न एक बलि’ से जुड़ा अंधविश्वास भी फैलाया गया. ऐसी और भी लोककथाएं हैं. मैंने अपनी अन्य कथाओं में लोककथाओं को गूंथा है. बेशक, हम ऐसे कथानकों को भी आगामी ग्रंथों या संकलनों में लेकर आएंगे.

Tags: Hindi Literature, Interview

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