Kabir Jayanti: कबीर ग्रंथावली में पढ़ें कबीर के दोहे, जानें पाण्डुलिपी से पुस्तक तक का सफर

कबीर दास ने भाव व्यक्त करने के लिये उर्दू, फारसी, संस्कृत आदि सभी शब्दों का उपयोग किया है.

इस संग्रह में दिए हुए दोहों आदि की भाषा और कबीरदास जी के नाम पर बिकने वाले ग्रंथों में के पदों आदि की भाषा में आकाश-पाताल का अंतर है.

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    हिंदी के प्रकाण्ड विद्वान बाबू श्यामसुंदर दास (Shyamsundar Das) ने कबीर ग्रंथावली (Kabeer Granthawali) की पाण्डुलिपी को एक पुस्तक का रूप दिया है. लेखक ने हस्तलिखित प्रतियों या ग्रंथसाहब में जो पाठ मिलता है, वही ज्यों-का-त्यों प्रकाशित करने का काम किया है. कबीर जयंती के अवसर पर आप भी कबीर के दोहों पठन और चिंतन करें.

    कुसंगति कौ अंग
    निरमल बूँद अकास की, पड़ि गई भोमि बिकार।
    मूल विनंठा माँनबी, बिन संगति भठछार।।१।।
    मूरिष संग न कीजिए, लोहा जलि न तिराइ।
    कदली सीप भवंग मुषी, एक बूँद तिहुँ भाइ।।२।।
    हरिजन सेती रूसणाँ, संसारी सूँ हेत।
    ते नर कदे न नीपजै, ज्यूँ कालर का खेत।।३।।
    मारी मरूँ कुसंग की, केला काँठै बेरि।
    वो हालै वो चीरियो, साषित संग न बेरि।।४।।
    मेर नसाँणी मीच की, कुसंगति ही काल।
    कबीर कहै रे प्राँणिया, बाँणी ब्रह्म सँभाल।।५।।

    Kabir Ke Dohe

    जीवन मृतक कौ अंग
    जीवन मृतक ह्वै रहै, तजै जगत की आस।
    तब हरि सेवा आपण करै, मति दुख पावै दास।।१।।
    कबीर मन मृतक भया, दुरबल भया सरीर।
    तब पैडे लागा हरि फिरै, कहत कबीर कबीर।।२।।
    कबीर मरि मड़हट रह्या, तब कोइ न बूझै सार।
    हरि आदर आगै लिया, ज्यूँ गउ बछ की लार।।३।।
    घर जालौं घर उबरे, घर राखौं घर जाइ।
    एक अचंभा देखिया, मड़ा काल कौं खाइ।।४।।
    मरताँ मरताँ जग मुवा, औसर मुवा न कोइ।
    कबीर ऐसैं मरि मुवा, ज्यूँ बहुरि न मरना होइ।।५।।

    Sant Kabirdas

    काल कौ अंग
    झूठे सुख कौ सुख कहैं, मानत है मन मोद।
    खलक चवीणाँ काल का, कुछ मुख मैं कुछ गोद।।१।।
    आज काल्हिक निस हमैं, मारगि माल्हंता।
    काल सिचाणाँ नर चिड़ा, औझड़ औच्यंताँ।।२।।
    काल सिहाँणै यों खड़ा, जागि पियारो म्यंत।
    रामसनेही बाहिरा तूँ क्यूँ सोवै नच्यंत।।३।।
    सब जग सूता नींद भरि, संत न आवै नींद।
    काल खड़ा सिर उपरै, ज्यूँ तोरणि आया बींद।।४।।
    आज कहै हरि काल्हि भजौगा, काल्हि कहे फिरि काल्हि।
    आज ही काल्हि करंतडाँ, औसर जासि चालि।।५।।

    Kabir Jayanti

    निंद्या कौ अंग
    लोगे विचारा नींदई, जिन्ह न पाया ग्याँन।
    राँम नाँव राता रहै, तिनहुँ न भावै आँन।।१।।
    दोख पराये देखि करि, चल्या हसंत हसंत।
    अपने च्यँति न आवई, जिनकी आदि न अंत।।२।।
    निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटि बँधाइ।
    बिन साबण पाँणी बिना निरमल करै सुभाइ।।३।।
    न्यंदक दूरि न कीजिये, दीजै आदर माँन।
    निरमल तन मन सब करै, बकि बकि आँनिंह आँन।।४।।
    जे को नींदे साथ कूँ, संकटि आवै सोइ।
    नरक माँहि जाँमैं मरैं, मुकति न कबहूँ होइ।।५।।

    कबीर ग्रंथावली (Kabeer Granthawali)
    काशी नागरीप्रचारिणी सभा में रक्षित हस्तलिखित हिंदी पुस्तकों की जांच की गई थी और उनकी सूची बनाई गई थी. उस समय दो ऐसी पुस्तकों का पता चला जो बड़े महत्त्व की थीं, पर जिनके विषय में किसी को पहले कोई सूचना नहीं थी. इनमें से एक तो सूरसागर की हस्तलिखित प्रति थी और दूसरी कबीरदास जी के ग्रंथों की दो प्रतियां थीं.

    कबीरदास जी के ग्रंथों की इन दो प्रतियों में से एक तो संवत् 1561 की लिखी है और दूसरी संवत् 1881 की. दोनों प्रतियों के देखने पर यह प्रकट हुआ कि इस समय कबीरदास जी के नाम से जितने ग्रंथ प्रसिद्ध हैं उनका कदाचित् दशमांश भी इन दोनों प्रतियों में नहीं है. यद्यपि इन दोनों प्रतियों के लिपिकाल में 320 वर्ष का अंतर है, पर फिर भी दोनों में पाठ -भेद बहुत ही कम है.

    उस समय यह निश्चित किया गया कि इन दोनों हस्तलिखित प्रतियों के आधार पर कबीरदास जी के ग्रंथों का एक संग्रह प्रकाशित किया जाय. यह कार्य पहले पंडित अयोध्यासिंह जी उपाध्याय को सौंपा गया और उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार भी कर लिया. पर पीछे से समयाभाव के कारण वे यह न कर सके. तब यह मुझे सौंपा गया.

    जैसा कि ऊपर कहा है, इस संस्करण का मूल आधार संवत् 1561 की लिखी हस्तलिखित प्रति है. यह प्रति खेमचंद के पढ़ने के लिये मलूकदास ने काशी में लिखी थी. यह पता नहीं लगा कि ये खेमचंद और मलूकदास कौन थे. क्या ये मलूकदास जी कबीरदास जी के वही शिष्य तो नहीं थे जो जगन्नाथपुरी में जाकर बसे और जिनकी प्रसिद्ध खिचड़ी का वहां अब तक भोग लगता है तथा जिसके विषय में कबीरदास जी ने स्वयं कहा है ‘मेरा गुरु बनारसी चेला समुंदर तीर’.

    यदि ये वही मलूकदास हैं तो इस प्रति का महत्त्व बहुत अधिक है. यदि यह न भी हो, तो भी इस प्रति का मूल्य कम नहीं है. जैसा कि इस संस्करण की प्रस्तावना में सिद्ध किया गया है, कबीरदास जी का निधन संवत् 1575 में हुआ था. यह प्रति उनकी मृत्यु के 14 वर्ष पहले की लिखी हुई है. इसमें संदेह नहीं कि संवत् 1561 तक की कबीरदास जी की समस्त रचनाएं इसमें संगृहीत हैं.

    इस संबंध में ध्यान रखने योग्य एक और बात यह है कि इस संग्रह में दिए हुए दोहों आदि की भाषा और कबीरदास जी के नाम पर बिकने वाले ग्रंथों में के पदों आदि की भाषा में आकाश-पाताल का अंतर है. इस संग्रह के दोहों आदि की भाषा भाषाविज्ञान की दृष्टि से कबीरदास जी के समय के लिए बहुत उपयुक्त है और वह हिंदी के 16वीं तथा 17वीं शताब्दी के रूप के ठीक अनुरूप है और इसीलिए इन पदों और दोहों को कबीरदास जी रचित मानने में आपत्ति नहीं हो सकती.

    कबीरदास जी की भाषा में पंजाबीपन बहुत मिलता है. कबीरदास ने स्वयं कहा है कि मेरी बोली बनारसी है. इस अवस्था में पंजाबीपन कहां से आया? ग्रंथसाहब में कबीरदास जी की वाणी का जो संग्रह किया गया है, उसमें जो पंजाबीपन देख पड़ता है, उसका कारण तो स्पष्ट रूप से समझ में आ सकता है, पर मूल भाग में अथवा दोनों हस्तलिखित प्रतियों में जो पंजाबीपन देख पड़ता है, उसका कुछ कारण समझ में नहीं आता. या तो यह लिपिकर्त्ता की कृपा का फल है अथवा पंजाबी साधुओं की संगति का प्रभाव है. कहीं-कहीं तो स्पष्ट पंजाबी प्रयोग और मुहावरे आ गए हैं जिनको बदल देने से भाव तथा शैली में परिवर्तन हो जाता है. यह विषय विचारणीय है.

    श्यामसुंदर दास (Shyamsundar Das)
    डॉक्टर श्यामसुंदर दास (सन् 1875 – 1945 ई.) हिंदी के अनन्य साधक, विद्वान्, आलोचक और शिक्षाविद् थे. 1896 में “नागरीप्रचारिणी पत्रिका” निकलने पर उसके प्रथम संपादक नियुक्त हुए. हिंदी साहित्य में बाबू श्याम सुंदर दास का स्थान उनके हिंदीप्रचारक और हिंदी उन्नायक के रूप में. उन्होंने अनेक मौलिक ग्रंथों की रचना की. काशी नगरी-प्रचारिणी सभा की स्थापना में उनका प्रमुख हाथ था.

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