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कुंवर नारायण- 'लड़ाई आज भी जारी है, लोग आज भी लड़ मर रहे हैं, ईश्वर साथी है'

नई कविता आन्दोलन में कुंवर नारायण अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के प्रमुख कवियों में रहे हैं.

नई कविता आन्दोलन में कुंवर नारायण अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के प्रमुख कवियों में रहे हैं.

कुंवर नारायण के शुरुआती वर्ष अयोध्या और फैजाबाद में बीते. बाद में वे लखनऊ (Lucknow) चल गए वहां करीब पांच दशकों तक लेखन कार्य से जुड़े रहे. उन्होंने अपना अधिकांश लेखन कार्य लखनऊ में हीं पूरा किया.

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    Poet Kunwar Narayan: कुंवर नारायण का कविता संग्रह ‘सब इतना असमाप्त’ राजकमल प्रकाशन (Rajkamal Prakashan) से छपकर आया है. इस संग्रह के लिए अधिकांश कविताओं का चयन उन्होंने करवा लिया था.

    कुंवर नारायण ने कुछ गीत और गज़ल भी लिखी हैं जिन्हें इस संग्रह में शामिल किया गया. कुंवर जी कभी भी अपने लेखन को प्रकाशित कराने की उत्सुकता में नहीं रहे हैं. इसलिए कई बार उनकी लिखी हुई सामग्री फाइलों में रह जाती थी.

    19 सितंबर, 1927 को अयोध्या, फैजाबाद (Ayodhya) में पैदान हुए कुंवर नारायण हिन्दी साहित्य (Hindi Sahitya) एक सशक्त हस्ताक्षर थे. नई कविता आन्दोलन में कुंवर नारायण अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के प्रमुख कवियों में रहे हैं. उन्होंने हिंदी की तमाम विधाओं- कविता, कहानी, आलोचना, निबंध, डायरी, सिनेमा और कला पर लिखा है. दुनिया की कई भाषाओं में उनकी रचनाएं अनूदित हुई हैं.

    हिंदी साहित्य की सेवा के लिए कुंवर नारायण को साहित्य अकादमी (Sahitya Akademi Award), कबीर सम्मान, पद्म भूषण (Padma Bhushan), साहित्य का सर्वोच्च सम्मान वरिष्ठ फेलोशिप और ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया.

    वरिष्ठ साहित्यकार ओम निश्चल (Om Nishchal) कुंवर नारायण के बारे में लिखते हैं- कुंवर नारायण के शुरुआती वर्ष अयोध्या और फैजाबाद में बीते. बाद में वे लखनऊ (Lucknow) चल गए वहां करीब पांच दशकों तक लेखन कार्य से जुड़े रहे. उन्होंने अपना अधिकांश लेखन कार्य लखनऊ में हीं पूरा किया. लखनऊ के बाद वे दिल्ली आकर बस गए.

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    कुंवर नारायण के काव्य की शुरुआत 1956 में ‘चक्रव्यूह’ से हुई. यह उनका पहला काव्य संग्रह था. अंतिम काव्य संग्रह ‘सब इतना असमाप्त’ (Sab Itna Asamapt) 2018 में प्रकाशित हुआ. प्रस्तुत हैं ‘सब इतना असमाप्त’ से कुछ रचनाएं-

    पत्थर के प्राण

    पहली चोट पड़ते ही
    पत्थर से ध्वनित हुआ आह

    इससे जाना कि पत्थरों में भी
    होते हैं प्राण।

    कहां बसते हैं ये प्राण
    यह जानने के लिए

    चोटें पहुंचाता रहा
    सधे हुए हाथों से मूर्तिकार…

    पूरी मूर्ति को एक शिला से
    काट कर बाहर निकाल लिया

    तब जाना शिला के ह्रदय को
    जहां एक घाव बचा रह गया था।

    मूर्तिकार देख रहा था अपने
    लहूलुहान हाथों को…

    सर्वेश्वर दयाल सक्सेना: ‘जब-जब सिर उठाया, अपनी चौखट से टकराया’

    ज़रा देर से इस दुनिया में

    मैं ज़रा देर से इस दुनिया में पहुंचा

    तब तक पूरी दुनिया
    सभ्य हो चुकी थी

    सारे जंगल काटे जा चुके थे
    जानवर मारे जा चुके थे
    वर्षा थम चुकी थी
    और तप रही थी पृथ्वी
    आग के गोले की तरह…

    चारों तरफ लोहे और कंक्रीट के
    बड़े बड़े घने जंगल उग आए थे
    जिनमें दिखायी दे रहे थे
    आदमी का ही शिकार करते कुछ आदमी
    अत्यन्त विकसित तरीक़ों से…

    मैं ज़रा देर से पहुंचा इस दुनिया में पहुंचा

    ईश्वर साक्षी है

    जन्म लेते ही हमने शपथ ली थी
    ईश्वर को साक्षी बनाकर
    कि हम लड़ेंगे नहीं-

    क्यों कि हम
    पिता-पुत्र हैं
    भाई-भाई हैं
    नाते-रिश्तेदार हैं
    दोस्त और प्रियजन हैं।

    फिर हमने शपथ ली
    लड़ाई के मैदान में
    ईश्वर को साक्षी बनाकर-

    कि हम में से कोई पीछे नहीं हटेगा
    क्यों कि यहां कोई किसी का सगा नहीं
    सब एक दूसरे के दुश्मन हैं
    सब की अपनी-अपनी लड़ाई है।

    लड़ाई आज भी जारी है
    लोग आज भी लड़ मर रहे हैं

    ईश्वर साक्षी है।

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