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कला के पारस का स्पर्श पा लेने वाले का 'कलाकार' के अतिरिक्त कोई नाम नहीं- महादेवी वर्मा

कला के पारस का स्पर्श पा लेने वाले का 'कलाकार' के अतिरिक्त कोई नाम नहीं- महादेवी वर्मा

भारत में 'महिला कवि सम्मेलन' शुरू करने का श्रेय महादेवी वर्मा को ही जाता है.

भारत में 'महिला कवि सम्मेलन' शुरू करने का श्रेय महादेवी वर्मा को ही जाता है.

पद्म भूषण, ज्ञानपीठ और पद्म विभूषण (Padma Vibhushan) से सम्मानित महादेवी वर्मा ने साहित्य सेवा के साथ-साथ समाज सुधार के लिए भी कई महत्वपूर्ण कार्य किए.

  • News18Hindi
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    Mahadevi Verma: हिंदी साहित्य जगत में आधुनिक मीरा (Adhunik Meera) कही जाने वाली वरिष्ठ साहित्यकार महादेवी वर्मा की आज पुण्यतिथि है. महादेवी वर्मा को महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने ‘हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती’ भी कहा है. वे हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के प्रमुख स्तंभों जयशंकर प्रसाद (Jaishankar Prasad), सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (Suryakant Tripathi Nirala) और सुमित्रानंदन पंत (Sumitra Nandan Pant) के साथ महत्वपूर्ण स्तंभ मानी जाती हैं. सुमित्रानन्दन पन्त और निराला जी महादेवी वर्मा से जीवन पर्यन्त राखी बंधवाते रहे. निराला जी से उनकी अत्यधिक निकटता थी.

    हिंदी साहित्य (Hindi Sahitya) को नया अर्थ देने वाली महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च, 1907 में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में हुआ था. बताते हैं कि उनके परिवार में लगभग सात पीढ़ियों के बाद पहली बार पुत्री का जन्म हुआ था. उनके बाबा बाबू बांके विहारी पुत्री को देखकर खुशी से झूम उठे और घर की देवी—महादेवी मानते हुए उनका नाम महादेवी रखा. महादेवी के पिता गोविंद प्रसाद वर्मा भागलपुर के एक कॉलेज में प्राध्यापक थे और माता का नाम हेमरानी देवी था.

    पद्म भूषण, ज्ञानपीठ और पद्म विभूषण (Padma Vibhushan) से सम्मानित महादेवी वर्मा ने साहित्य सेवा के साथ-साथ समाज सुधार के लिए भी कई महत्वपूर्ण कार्य किए. साहित्य के माध्यम से महादेवी ने स्त्री सशक्तीकरण और स्त्री शिक्षा जैसे अहम मुद्दों को प्रोत्साहित किया तो समाज में चेतना जगाकर सामाजिक दायित्व निभाया.

    महादेवी वर्मा के कार्यजीवन की शुरूआत एक अध्यापिका के रूप में हुई और अन्तिम समय तक वे ‘प्रयाग महिला विद्यापीठ’ (Prayag Mahila Vidyapith) की प्रधानाचार्या बनी रहीं. उनका बाल-विवाह हुआ परन्तु उन्होंने अविवाहित की भांति जीवन-यापन किया.

    महादेवी वर्मा साहित्य और संगीत में निपुण होने के साथ-साथ कुशल चित्रकार और सृजनात्मक अनुवादक भी थीं. वे पशु-पक्षी प्रेमी थीं.

    महादेवी वर्मा महज सात वर्ष की अवस्था से ही कविता लिखने लगी थीं. 1925 में जब उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की, वे एक सफल कवयित्री के रूप में स्थापित हो चुकी थीं. पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताओं का प्रकाशन होने लगा था. कॉलेज में सुभद्रा कुमारी चौहान (Subhadra Kumari Chauhan) के साथ उनकी घनिष्ठ मित्रता हो गई. 1932 में जब उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एमए किया तब तक उनके दो कविता संग्रह ‘नीहार’ और ‘रश्मि’ प्रकाशित हो चुके थे.

    महादेवी जी ने एक संन्यासिनी के रूप में अपना जीवन व्यतीत किया. उन्होंने हमेशा श्वेत वस्त्र पहना, तख्त पर सोईं और कभी शीशा नहीं देखा.

    महादेवी वर्मा लिखती हैं- ‘कला के पारस का स्पर्श पा लेने वाले का ‘कलाकार’ के अतिरिक्त कोई नाम नहीं, साधक के अतिरिक्त कोई वर्ग नहीं, सत्य के अतिरिक्त कोई पूंजी नहीं, भाव-सौंदर्य के अतिरिक्त कोई व्यापार नहीं और कल्याण के अतिरिक्त कोई लाभ नहीं.’

    महादेवी वर्मा के लेखन (Mahadevi Verma Ki Rachnaye) की बात करें तो उनका कार्यक्षेत्र लेखन, सम्पादन और अध्यापन का रहा. उन्होंने इलाहाबाद में ‘प्रयाग महिला विद्यापीठ’ के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया. उस समय में महिलाओं की शिक्षा के क्षेत्र में यह एक क्रांतिकारी कदम था. ‘प्रयाग महिला विद्यापीठ’ की वे प्रधानाचार्य और कुलपति भी रहीं.

    महादेवी वर्मा ने 1923 में महिलाओं की प्रमुख पत्रिका ‘चाँद’ का कार्यभार संभाला. 1936 तक उनके काव्य संग्रह ‘नीहार’, ‘रश्मि’, ‘नीरजा’ और ‘सांध्यगीत’ प्रकाशित हो चुके थे. इन चारों काव्य संग्रहों को उनकी कलाकृतियों के साथ 1939 में ‘यामा’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया.

    उनकी अन्य रचनाओं में ‘मेरा परिवार’, ‘स्मृति की रेखाएं’, ‘पथ के साथी’, ‘शृंखला की कड़ियां’ और ‘अतीत के चलचित्र’ प्रमुख हैं.

    1955 में महादेवी वर्मा ने इलाहाबाद (Allahabad) में ‘साहित्यकार संसद’ नाम से एक संस्था की स्थापना की और पंडित इलाचंद्र जोशी के सहयोग से संस्था के मुखपत्र ‘साहित्यकार’ (Sahityakar) के संपादन का कार्य किया.

    भारत में ‘महिला कवि सम्मेलन’ (Kavi Sammelan) शुरू करने का श्रेय महादेवी वर्मा को ही जाता है. उनके प्रयास से पहला अखिल भारतवर्षीय कवि सम्मेलन 15 अप्रैल, 1933 को सुभद्रा कुमारी चौहान की अध्यक्षता में ‘प्रयाग महिला विद्यापीठ’ में सम्पन्न हुआ.

    1936 में नैनीताल से 25 किलोमीटर दूर रामगढ़ कसबे के उमागढ़ नामक गांव में महादेवी वर्मा ने एक बंगला बनवाया था, जिसका नाम उन्होंने मीरा मन्दिर (Meera Mandir) रखा था. इस मीरा मंदिर के माध्यम से उन्होंने गांव की शिक्षा और विकास के लिए काम किया. अब मीरा मंदिर महादेवी साहित्य संग्रहालय (Poetess Mahadevi Verma Literary Museum) के नाम से जाना जाता है.

    उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय इलाहाबाद में बिताया. 11 सितम्बर, 1987 को इलाहाबाद में रात 9.30 बजे उनका देहांत हो गया.

    Tags: Books

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