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सौ वर्ष की आयु में भी मैथिली भाषा और साहित्य सेवा में सक्रिय हैं पंडित गोविंद झा

सौ वर्ष की आयु में भी मैथिली भाषा और साहित्य सेवा में सक्रिय हैं पंडित गोविंद झा

मैथिली साहित्य के युग पुरुष पंडित गोविन्द झा 100 साल में भी सोशल मीडिया पर सक्रीय हैं.

मैथिली साहित्य के युग पुरुष पंडित गोविन्द झा 100 साल में भी सोशल मीडिया पर सक्रीय हैं.

पंडित गोविन्द झा मैथिली भाषा (Maithili language) के विख्यात साहित्यकार हैं. इनके द्वारा रचित एक कहानी–संग्रह 'सामाक पौती' के लिये उन्हें सन् 1993 में 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया. पंडित गोविंद झा के 100 वर्ष के जीवनकाल में 75 वर्षों से अधिक का लेखन काल रहा है. 1978-1985 तक बिहार सरकार के मैथिली अकादमी पटना के उपनिदेशक भी रहे और यहीं से सेवानिवृत्ति भी ली.

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    – डॉ. के. एम. ठाकुर

    Maithili Sahitya News: मैथिली और संस्कृत के वरेण्य विद्वान पंडित गोविंद झा मिथिला के विद्वानों में शिखर पुरुष हैं. इन्होंने अपने जीवन के 100वें वर्ष में प्रवेश किया है. इस उम्र में भी वे साहित्यिक सांस्कृतिक लेखन में रचनारत रहते हैं.

    पंडित गोविंद झा का जन्म 10 अगस्त, 1922 को बिहार के मिथिला में मधुबनी जिला के इसहपुर (सरिसब-पाही) नामक एक संभ्रांत तथा विद्वानों से भरे-पूरे गांव में हुआ. इनका पैतृक परिवार संस्कृत वांग्मय में संपूर्ण रूप से रचा बसा परिवार था.

    पंडित गोविंद झा के पिता महा वैयाकरण पंडित दीनबंधु झा स्वयं संस्कृत और मैथिली के पारगामी विद्वान माने जाते थे. उनके पैतृक परिसर का मिथिला के शिक्षा एवं साहित्य-संस्कृति में उल्लेखनीय योगदान था.

    गोविंद झा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव में ही पूर्ण किया. इसके बाद आपने व्याकरणाचार्य, साहित्यरत्न, साहित्याचार्य, वेदाचार्य आदि परीक्षा पास किया. इसी दौरान इन्होंने हिंदी, अंग्रेजी, प्राकृत, बांग्ला, उर्दू, असमिया नेपाली आदि भाषाओं का भी विधिवत अध्ययन किया.

    अध्ययन के साथ-साथ आपने परिवार के भरण-पोषण हेतु आजीविका भी शुरू की. इसकी शुरूआत आपने 1950 में न्यूज़ पेपर्स एंड पब्लिकेशन, पटना के साथ शब्दकोश-सहायक के रूप में की. 1951-1978 तक आपने बिहार सरकार के राजभाषा पदाधिकारी के रूप अपनी सेवाएं दीं. 1978-1985 तक बिहार सरकार के मैथिली अकादमी पटना के उपनिदेशक भी रहे और यहीं से सेवानिवृत्ति भी ली. सेवानिवृत्ति के उपरांत भी इन्होंने वर्ष 1988 तक सुलभ इंटरनेशनल पटना दिल्ली के लिए पुस्तक आरक्षक के पद को सुशोभित किया.

    Govind Jha Books

    पंडित गोविंद झा के 100 वर्ष के जीवनकाल में 75 वर्षों से अधिक का लेखन काल रहा. आपने 3 उपन्यास, 3 कथा-संग्रह, 7 नाटक, एक कविता संग्रह, 6 आलोचनात्मक निबंध संग्रह, दो जीवनी-विनिबंध, 13 भाषा-ग्रंथ, 4 कोष-ग्रंथ, 8 संपादित-ग्रंथ, 8 अनुवाद सहित बिब्लियोग्रैफी (Bibliography) ऑफ इंडियन लिटरेचर (मैथिली प्रभाग) और इनसाइक्लोपीडिया ऑफ इंडियन लिटरेचर के निर्माण में भी अपना योगदान दिया. इस प्रकार इन्होंने अब तक कुल 56 पुस्तकों की रचना की है.

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    पाणिनि के व्याकरण की व्याख्या करते हुए गोविंद झा ने एक तरफ संस्कृत के भाषा-विज्ञान और भाषिक विकास के प्राचीन अर्वाचीन अविष्कारों को सम्मिलित किया वहीं पाश्चात्य भाषा विज्ञान को भी आदर सहित अपनी व्याख्या में स्थान दिया.

    अपने साहित्य लेखन में गोविंद झा ने कथा, कविता, नाटक आदि रचना में समकालीन मिथिला के सामाजिक-सांस्कृतिक शैक्षणिक कुरीतियों-पाखंडों को बड़ी ही निर्ममता के साथ उजागर किया. उपन्यास लेखन में मिथिला के इतिहास-प्रसिद्ध नायकों को स्थान दिया. इतिहास लेखन के इस शैली में इन्होंने सदैव अनुसंधानपरक एवं विज्ञान सम्मत लेखन को प्रश्रय दिया.

    शब्दकोश निर्माण के क्रम में इन्होंने मैथिली सहित हिंदी, अंग्रेजी, बांग्ला, नेपाली, अवहट्ट, प्राकृत आदि भाषाओं के लिए भी प्रशंसनीय कार्य किए. संपादन के क्रम में इन्होंने मिथिला के कर्मकांड, धर्मशास्त्र इतिहास, साहित्य, काव्य आदि प्रभागों में अपनी बौद्धिक क्षमता एवं परिपक्वता दिखाई.

    विद्यापति के विभिन्न आयाम को इन्होंने अपने अन्वेषण और संपादन में पुनर्मूल्यांकन किया. आपने विद्यापति के मैथिली गीतों का संकलन-संपादन पुनर्मूल्यांकन आदि कार्य भी किया है. इसमें मिथिला के विद्यापतिकालीन समाज का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया गया है.

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    पंडित गोविंद झा के साहित्य-रंगमंच के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पुरस्कार सम्मान प्राप्त हुए हैं. इसमें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1993), साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार (1993), कामिल बुल्के पुरस्कार (1988), ग्रियर्सन पुरस्कार (2001), प्रबोध साहित्य सम्मान (2005), चेतना समिति सम्मान (1989), ज्योतिरीश्वर रंग-शीर्ष सम्मान, विश्वंभर साहित्य सम्मान (2019) आदि प्रमुख हैं.

    भारतीय लेखकों में शतायु लेखक जो आज भी लेखनरत हैं इनका अभाव है. ऐसे में मैथिली भाषा में पंडित गोविंद झा अपने शतायु वर्ष में भी लेखनरत हैं, निरंतर सृजनरत हैं. इसी वर्ष इनकी 57 वीं किताब ‘भाषाक गाछ तर’ प्रकाशित हुई हैं. पंडितजी जैसे बहुमुखी-बहुभाषी-बहुआयामी और बहुविधावादी रचनाकार का अपने शतायु वर्ष में भी रचनाशील रहना मैथिली और मिथिला के भाषा-साहित्य के लिए निश्चय ही गर्व का विषय है.

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    Tags: Hindi Literature

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