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लेखिकाओं के बारे में कई मिथक तोड़े हैं मैथिली कथाकार 'लिली रे' ने

लेखिकाओं के बारे में कई मिथक तोड़े हैं मैथिली कथाकार 'लिली रे' ने

2004 में मैथिली में प्रबोध साहित्य सम्मान की शुरुआत की गई. पहला सम्मान मैथिली की समर्थ लेखक लिली रे को दिया गया.

2004 में मैथिली में प्रबोध साहित्य सम्मान की शुरुआत की गई. पहला सम्मान मैथिली की समर्थ लेखक लिली रे को दिया गया.

28 जनवरी, 1945 में एक और अत्यंत शिक्षित परिवार में लिली रे का ब्याह हुआ डॉ. हरेन्द्र नारायण राय से. नियति ने शायद लिख रखा था कि लिली रे उनके साथ-साथ जगह-जगह घूमते हुए अपने लेखन को ऐसा वैश्विक स्वरूप देंगी, जिससे केवल मैथिली को ही नहीं, विश्व साहित्य को लिली रे के रूप में एक नायाब मोती मिलेगा.

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    – विभा रानी
    स्त्रियां को कमतर रूप से आंकने की हमारी रीति-नीति रही है. आमतौर पर माना जाता है कि महिलाओं में राजनीतिक चेतना कहां! उन्हें राजनीति से क्या मतलब! ज़्यादा से ज़्यादा वोट गिराने चली जाएंगी, वह भी घर के लोगों के निदेशानुसार. राजनीति में गईं भी तो पुरुष आधिपत्य के तले ही तो बनी रहेंगी. अपने फैसले लेने के अधिकार से बढ़कर कूवत कहां!

    यह भी मान लिया जाता है कि महिलाओं में सामाजिक चेतना का अभाव है. बल्कि उन्हें यह समझाया जाता है कि समाज में जो घट रहा है, उससे उनको क्या मतलब! वे तो बस भात उसीनें, घर भर की सेवा करें, बाल-बच्चों को खिलाएं- पिलाएं! घर के लिए सदा समर्पित रहें. बाहर आग पड़े, पत्थर गिरे- उनसे उनका क्या सरोकार!

    मान लिया जाता है कि खूब अच्छी पढ़ी-लिखी महिलाएं ही लिखने-पढ़ने का काम कर सकती हैं. यह भी माना जाता है कि महिलाओं में वैश्विक सोच कहां! वे तो बस घर और नौकरों की कथाएं लिख सकती हैं. महिलाएं और बोल्ड विषय! छि: जी! लिखेंगी तो थकूच दी जाएंगी. यह सोच उस मैथिल समाज की भी रही है, जिस समाज में शस्त्र-शास्त्र और गृह-कार्य के ज्ञान से सुसज्जित सीता हो गई हैं. जिस समाज में भारती मिश्र जैसी विदुषी हुईं, जिन्होंने सेक्स जैसे विषय पर आदिगुरु शंकराचार्य से शास्त्रार्थ किया. जिस समाज में मैत्रेयी, गार्गी, भामती जैसी महिलाएं हो गई हैं. उस समाज की आज की आश्चर्यजनक जड़ता उनकी ही इस बात का खंडन करती हैं कि हमारे मैथिल समाज को अपने अतीत पर गर्व है.

    लिली रे आश्चर्यजनक तरीके से इन सभी मिथकों को तोड़ती हैं, वह भी आज के जड़ मैथिल समाज में. मैथिली में लिखकर. बेहद पढे-लिखे, सम्भ्रांत परिवार में जन्मी लिली रे! जिस 26 जनवरी, 1933 को वे जन्मी, कौन जानता था कि आगे चलकर वह 26 जनवरी देश का एक ऐतिहासिक दिन हो जाएगा! पिता पंडित भीमनाथ मिश्र अपने समय के आईपीएस. फिर भी, लिली रे की शिक्षा तो हुई, लेकिन घर से ही.

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    28 जनवरी, 1945 में एक और अत्यंत शिक्षित परिवार में लिली रे का ब्याह हुआ डॉ. हरेन्द्र नारायण राय से. नियति ने शायद लिख रखा था कि लिली रे उनके साथ-साथ जगह-जगह घूमते हुए अपने लेखन को ऐसा वैश्विक स्वरूप देंगी, जिससे केवल मैथिली को ही नहीं, विश्व साहित्य को लिली रे के रूप में एक नायाब मोती मिलेगा.

    डॉ. उषाकिरण खान लिखती है- ‘लेखक खुद को तैयार करता है उपन्यास लिखने के लिए. यह किसी भी गम्भीर लेखक के साथ होता है. लिली रे ने भी बहुत सारी कथाएं लिखकर अपनी कलम की धार तीक्ष्ण की, उपन्यास लिखने के लिए.’

    लिली रे ने एकसाथ कई मिथकों को तोड़ा है. बेहद बोल्ड विषय पर कथा लिखते हुए नक्सल आंदोलन जैसे गंभीर विषय पर लिखकर ना केवल इस पूर्वाग्रह को तोड़ा कि महिलाएं राजनीतिक या ऐसे आंदोलनकारी विषयों पर नहीं लिख सकतीं, बल्कि इस आंदोलन की तह में जाकर इसकी गूढ बातों को बाहर निकाला. सम्भवत: इसका कारण यह भी रहा हो कि उनका अपना एक बेटा इस आंदोलन का हिस्सा था. इसलिए उन्होंने नक्सल आंदोलन के तमाम पहलुओं को एक मां के रूप में देखने, अनुभव करने और उन अनुभवों को महसूस करते हुए उन्हें सहेजने के लिए एक लेखक के रूप में उन्हें लिपिबद्ध करने का काम किया.

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    लिली रे का नक्सल आधारित उपन्यास है ‘पटाक्षेप’, जो मैथिली में 1979 और संचयन 2015 में तथा इसका मेरे द्वारा अनूदित हिन्दी रूप 2002 में ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ द्वारा प्रकाशित हुआ.

    इस किताब पर अपनी राय रखते हुए डॉ. कैलाश कुमार मिश्र लिखते हैं- ‘लिली रे कुछ पन्नों तक एक मां के रूप में अपने परिवेश, परिवार, समाज और सरोकार के संग रहती हैं. लेकिन धीरे-धीरे रवीन्द्र रे जैसे आते गए. लगा, जैसे रवीन्द्र रे अपनी मां को डिक्टेशन देते गए और लिली रे लिखती गईं. लोग परिवर्तन पसंद करते हैं, प्रजातंत्र का अर्थ समझना चाहते हैं, लेकिन परिवर्तन एकाएक संभव नहीं. सबसे बड़ी बात यह कि सुविधाभोगी लोगों के पढ़े-लिखे बच्चे जब संसार की तुलना भारत से करते हैं तो उन्हें यह अनुभव होता है कि यहां व्यवस्था में परिवर्तन नहीं, क्रांति की दरकार है.’

    ‘पटाक्षेप’ पढ़ने से पहले मैंने नक्सल आंदोलन पर जिस किसी महिला लेखक को पढ़ा, वे हैं महाश्वेता देवी और उनका उपन्यास ‘हज़ार चौरासी की मां’. ‘हज़ार चौरासी की मां’ को पढ़ते समय एक मां के रूप में एक आंदोलनकारी की मां की मनोदशा और उसके माध्यम से पूरे आंदोलन के वर्णन से मेरा मन बहुत प्रभावित हुआ, आज भी है, लेकिन मुझे ‘पटाक्षेप’ अधिक प्रभावी लगा, क्योंकि जिस नक्सल आंदोलन की मूल बातों को हम जानना चाहते हैं, उसका सीधा वर्णन ‘पटाक्षेप’ में मिलता है. कह सकते हैं कि आंदोलन की बेसिक जानकारी, भाषा, जीवन, चरित्र, रहन-सहन आदि.

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    पूरा उपन्यास इस आंदोलन में शामिल तीन युवाओं के संघर्ष और उनके द्वारा देखी जा रही दिन-रात की परिस्थितियों का आकलन है. पढ़े-लिखे विचारवान और आंखों में परिवर्तन का सपना लिए इन युवकों का भ्रम वहां टूटता है, जब जिस समाजवाद और साम्यवाद की वे कल्पना कर आंदोलन से जुडे थे, वे लोग ही पावर हाथ में आने पर पूंजीपतियों जैसा बर्ताव करने लगते हैं.

    ‘पटाक्षेप’ से आगे की कहानी के रूप में लिली रे के अगले उपन्यास ‘प्रवास चयन’ और उसकी परवर्ती कहानी के रूप में ‘लक्ष्य बिंदु’ को माना जा सकता है.

    ‘प्रवास चयन’ दो ऐसे युवकों की कहानी है, जो अपने उत्साह में नक्सल आंदोलन से जुड़े. एक- बाबर अली, ईमानदार और वफादार होने के बावजूद मारा गया. दूसरा बाप्पी- घर लौट आया. आंदोलन से निकलने के बाद बाप्पी अवसाद से ग्रस्त होता है. लेकिन उसे खुद नहीं पता होता कि वह कितनों के मशालों की रोशनी बन चुका है. बाप्पी जब अपनी बहन पुटी का हाथ पकड़कर कहता है- ‘पुटी! तुम मेरी तरह कभी भी मत बनना. कभी भी मेरी राह नहीं पकड़ोगी, यह वचन दो.’

    पुटी कहती है- ‘नहीं. मैं चाहकर भी आपकी तरह नहीं बन सकती हूं. लेकिन आपने जो कहा है, उसे भी कभी व्यर्थ नहीं मान सकूंगी. मेरे और मेरे जैसे अनेकों के विवेक में आपलोगों ने दस्तक दी है.’

    यह दस्तक इंसान को इंसान बनाए रखती है, क्योंकि देश ने आजादी के साथ-साथ समाजवाद का सपना देखा था. परंतु पूंजीवाद और समाजवाद, दोनों में शुरू से छत्तीस का आंकड़े रहा है. शोषण, गरीबी, अत्याचार- ये कुछ ऐसे तत्व हैं, जो मानवीयता को सोखकर उसपर अपनी समृद्धि की कालीन बिछाते हैं. इसमें वे भी शामिल हो जाते हैं, जो खुद इस मजलूमी के शिकार होकर बाद में पूंजी की ओर बढ़ गए. मतलब शोषित ही बाद में शोषक बनकर अपने से कमतरों का शोषण करने लगे. इससे सच्चे कार्यकर्ताओं के भीतर रोष पनपा और आंदोलन से उनका मोहभंग हुआ.

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    देश में नक्सल आंदोलन और बांग्लादेश की आजादी का युद्ध लगभग एकसाथ चल रहा था. बांग्लादेश की आजादी को समर्थन और नक्सल आंदोलन का दमन उस समय के प्रमुख स्वर थे. ऐसे में आंदोलन अपने मूल स्वरूप से खिसकता गया. कैडरों के लिए असुविधा भीषण असुविधा में बदलती गई. गरीबी की पराकाष्ठा थी. उस समय के पन्नों को देखेंगे तो आपको पता चलेगा.

    लिली रे का पूरा व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक है. उनके भांजे श्रीरमण झा कहते हैं- ‘यह सत्य है कि उस समय में मैथिल परिवारों में, विशेषत: स्त्रियां सामाजिक मान्यताओं के कारण अत्यधिक दबाव मे जीती थीं. अभी भी स्थिति बहुत नहीं बदली है. मगर, लिली मामी इससे ठीक उलटा थीं. उस समय मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब मैंने उन्हें शर्ट- पैंट, जिसे उन दिनों स्लैक्स कहा जाता था, में उन्हें देखा. घुड़सवारी करनेवाली लिली मामी. जैसे सिनेमा के पर्दे से उतरकर मेरे सामने खडी हो गईं. मैंने सुना था कि बेगम अख्तर घुड़सवारी करती थीं. यहां मैंने अपनी लिली मामी को देखा. अपनी मिथिला में भी ऐसी स्त्री! मैं गर्व से भर उठा. शायद मैंने अपने लिहाज़ से इसकी कोई उम्मीद नहीं की थी. हालांकि मुझे कहा गया था कि ‘शी इज अ लिटल ‘डिफरेंट’! फिर भी!’

    तो ऐसी लिली रे से आम रचनाओं की अपेक्षा तो की ही नहीं जा सकती. अपने उपन्यास ‘उपसंहार’ में वे प्रेम पर लिखती हैं. बोल्ड रचना के रूप में ‘रंगीन परदा’ लिखती हैं, क्योंकि प्रेम हमेशा से हमारे यहां एक वर्जित विषय रहा है. परंतु यह प्रेम और प्रेम के भाव में अंतर है. पुरुष का पहला, दूसरा, तीसरा कोई भी प्रेम स्वाभाविक मान लिया जाता है, उसे न केवल माफ कर दिया जाता है, बल्कि माफ करके सबकुछ आसानी से भुला दिया जाता है. लेकिन, स्त्री का प्रेम सजा के तौर पर उसे दिया जाता है. उसे इस सजा से कभी छुटकारा नहीं मिलता.

    लिली रे के इस उपन्यास ‘उपसंहार’ की नायिका अपर्णा प्रेम के एक पल के आवेश में आजन्म लांछन, अपमान और बहिष्कार झेलती है- वह भी अपने पिता द्वारा. उसे आजन्म अपने आपको भूलकर रहने का आदेश दिया जाता है. पढ़ने में कुशाग्र और डॉक्टर बनने की चाह रखनेवाली अपर्णा के सपने को रौंदकर उसे ‘जैसा लड़का मिले, ब्याहो और गंगा नहाओ’ के तहत एक तरीके से गंगा में ही विसर्जित कर दिया जाता है. लेकिन, स्त्रियां काठ होती हैं और उस काठ में से ही फूल खिलाने में सक्षम. अपर्णा भी अपने जीवन को वहां से निकालकर दूसरों के कल्याण के रास्ते में ले जाती है- स्त्रियां की अपनी स्वाभाविक क्रियाशीलता, रचनाशीलता और स्वभाव के तहत.

    अपर्णा के चरित्र के माध्यम से लिली रे ने समाज की सुंदर व्यवस्था को खोलकर उघार दिया है. लिली रे ने जितने सहज रूप से इस कथा को विस्तार दिया है, जो कई- कई अपर्णा पाठकों के सामने खडी कर देती हैं. हम सभी अपने चारों ओर न जाने कितनी अपर्णा जैसी युवतियों को देखते हैं और उसकी ओर से कन्नी कटाकर आगे बढ़ जाते हैं और साथ ही, विनय बाबू और अयोध्या बाबू जैसों को प्रणाम करना अपना पुनीत कर्तव्य समझने लगते हैं. यही है अपनी सामाजिक व्यवस्था.’

    लिली रे के दो लघु उपन्यास हैं ‘विशाखन’ व ‘अबूझ’. ‘विशाखन’ व ‘अबूझ’ दो विभिन्न धरातल और परिवेश की दो अलग- अलग कथाएं हैं. ‘विशाखन’ में मध्यमवर्गीय परिवार की मौलिक संपन्नता भी सुखरहित हो जाती है. सुख न मिलने की आस में व्यक्ति किस तरह निर्लिप्त, कभी-कभी क्रोधी और ईर्ष्यालु हो जाता है. ‘विशाखन’ इसका अनुपम उदाहरण है. सास- बहू, पति- पत्नी, सास- ससुर व दामाद के आपसी रिश्तों से होते होते यह उपन्यास एक ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ की तरह हो जाता है, जो ज़मीन से जुड़ा तो है, जिसमें जीवन के आने की, फिर से पल्लवित, पुष्पित होने की संभावना तो है, लेकिन उसके लिए मन:स्थितियों की माटी नहीं हैं.

    ‘अबूझ’ प्रवासी मजदूरों के जीवन की विभिन्न घटनाओं से लबरेज होते हुए स्त्री त्रासदी, उसकी इच्छाओं, आकांक्षाओं की धीमी आंच पर सुलगनेवाली कथा है.

    आमतौर पर हम पुरुष देह की आवश्यकताओं पर तो बात करते हैं, उसे उचित भी ठहराते हैं. लेकिन स्त्री देह की जरूरत पर बात करना और उसे उचित ठहराना लिली रे जैसी साहसी लेखक ही कर सकती हैं, जिन्होंने अपनी पहली रचना ‘रंगीन पर्दा’ लिखकर आज के जड़ मैथिल समाज में वैसा ही भूचाल ला दिया था, जैसा इस्मत चुगताई ने ‘लिहाफ’ लिखकर.

    मजदूर जीवन की त्रासदी पर ही लिली रे का एक और उपन्यास है- ‘जिजीविषा. मजदूर यूनियन, राजनीति, मजदूर की स्थिति- इन सभी का बहुत महीन चित्रण इसमें मिलता है.

    लिली रे सघन कथाकार हैं. एक भी शब्द वे अतिरिक्त नहीं लिखती हैं। तीन, चार, पांच शब्दों के उनके वाक्य होते हैं, परंतु पंद्रह शब्दों में पचास वाक्य और छप्पन परिस्थितियां छुपी रहती हैं. पाठक का काम होता है, उन्हें डी-कोड करना और उसके माध्यम से उस समय के पूरे समाज को जानना और समझना.

    अपने निजी जीवन में लिली रे ने बहुत भ्रमण किया है. वे जगह-जगह रहीं, लेकिन, केवल रही ही नहीं, बल्कि जहां- जहां रहीं, वहां वहां के भौगोलिक लोकेल और चरित्रों को अपनी रचनाओं की पृष्ठभूमि बनाया. छोटे- छोटे वाक्य, बिहारी के दोहे की तरह ‘देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर’ हैं. इन छोटे- छोटे वाक्यों में जीवन के बड़े- बड़े दर्शन हैं, जो पाठकों को कहीं ठहरने को मजबूर कर देते हैं तो कहीं सम्मोहित होकर उसमें खो जाने को- चाहे नक्सल की पृष्ठभूमि हो या एक आम छोटी सी लड़की के प्रेम करने की एक तथाकथित भूल से उपजे जीवन की विडंबना!

    लिली रे अपने भाव और भाषा से एक शांत धीमी बहती नदी में चलते हुए एक छोटी सी नाव की तरह बहती हैं. महिला होने के बावजूद नारीवाद के लबादे से एकदम दूर और अत्यंत मानवीय हैं.

    लिली रे का अनुभव संसार बहुत व्यापक है. इसमें मैथिली है, मिथिला है, लेकिन इसके साथ-साथ वे जिस-जिस भौगोलिक इलाके में रही हैं, उनके मानस पटल की कहानियां वे लिखती रही हैं. आमतौर पर माना जाता है कि मैथिली में मिथिला की कथा रहे, बाहरी लोगों की कथाएं लिखी जाएं तो उनकी भाषा या हिंदी का प्रयोग हो. लिली रे इन सारे छद्मों को तोडती हैं.अपनी कथा ‘बिल टेलर की डयरी’ में वे बिल टेलर की डायरी में लिखे वाक्य को अंग्रेजी में न लिखकर मैथिली में ही लिखती हैं- ‘हम ठक (ठग) छी.’ इसलिए उनकी रचनाएं मिथिला की भौगोलिक परिधि से निकलकर पूरे देश की हो जाती हैं और इसके भाव, शिल्प, कथ्य व अंत विश्व क्लासिक की तरह.

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    लिली रे की रचनाओं की इन्हीं विशेषताओं ने मुझे इनके साहित्य को मैथिली की परिधि से बाहर निकालकर हिन्दी के पटल पर लाने का संकल्प दिया. लेकिन, लिली जी ने अपने साहित्य के अनुवाद की अनुमति मुझे वैसे ही तुरंत-फुरन्त में नहीं दे दी. शुरू में मैंने उनकी कुछ कहानियों के अनुवाद किए, जो अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं में छपे.

    इन कहानियों के अनुवाद देखकर उन्हें खुशी हुई. उन्हें लगा कि उन पर भी काम करने वाला कोई है. मैंने उनसे अनुरोध किया कि यदि आप उचित समझती हैं तो आप मुझे अपनी सभी कृतियों के अनुवाद के अधिकार मुझे दे दें. मेरे लिए यह सुविधाजनक होगा. उन्होंने सहर्ष मेरी बात स्वीकार की और लौटती डाक से अपनी तमाम कृतियों के अनुवाद के अधिकार मुझे दे दिए.

    यह वह समय था, जब मैथिली संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल नहीं हुई थी. मुझे बताया गया था कि भारतीय ज्ञानपीठ केवल अष्टम अनुसूची में सम्मिलित भाषाओं की किताबों को अनूदित करवाता व छापता है. मैंने मैथिली के अनुवाद को लेकर भारतीय ज्ञानपीठ में अप्रोच किया था, क्योंकि मैं चाहती थी कि मैथिली का विपुल साहित्य भारतीय ज्ञानपीठ के माध्यम से भी हिन्दी के पाठकों तक पहुंचे. उस समय स्वर्गीय पदमधर त्रिपाठी वहां थे. वे मैथिली को बहुत पसंद करते थे, हालांकि उनकी मातृभाषा मैथिली नहीं थी. उन्होंने मैथिली साहित्य के भारतीय ज्ञानपीठ में भी प्रकाशन की आवश्यकता को समझा और इस तरह से मैथिली का पहला उपन्यास भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुआ- 1997 में प्रभास कुमार चौधरी का ‘राजा पोखरे में कितनी मछलियाँ’. उसके बाद 2002 में लिली रे का उपन्यास ‘पटाक्षेप.’

    अधिकार मिल जाने के बाद लिली रे की रचनाओं के अनुवाद मैं करती रही. ‘पटाक्षेप’ के बाद उनकी तेरह कहानियों के संकलन का पहला अनुवाद 2002 में ही वाणी प्रकाशन द्वारा आया ‘बिल टेलर की डायरी’ के नाम से. वाणी प्रकाशन से ही 2014 में लिली रे का दूसरा कहानी संग्रह आया ‘संबंध’ शीर्षक से, जिसमें दस कहानियां थीं. इस बीच रेमधाव पब्लिकेशन्स से उपन्यास ‘जिजीविषा’ का हिन्दी अनुवाद छपा. मैं लिली जी को सभी रचनाओं के छपने की खबर देती रही. प्रकाशक उन्हें किताबें भेजते रहे.

    2004 में मैथिली में प्रबोध साहित्य सम्मान की शुरुआत की गई. पहला सम्मान मैथिली की समर्थ लेखक लिली रे को दिया गया. मुझे मैथिली के नामचीन आलोचक मोहन भारद्वाज जी ने बाद में बताया कि लिली रे के नाम के चयन में आपके द्वारा अनूदित किताबों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही, क्योंकि लिली रे लिखती और छपती रहीं लगातार पत्र- पत्रिकाओं में, लेकिन किताबों के रूप में उनकी रचनाएं बहुत कम थीं.

    सीधी, सरल, सहज भाषा और भाव के साथ वर्णित रचनाओं के कितने गहरे मायने हो सकते हैं, यह जानने और समझने के लिए लिली रे को पढ़ा जाना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है. मेरे द्वारा मैथिली से हिन्दी में अनूदित उनकी छह किताबें ‘पटाक्षेप’ (भारतीय ज्ञानपीठ), ‘जिजीविषा’ (रेमाधव पब्लिकेशन्स), ‘बिल टेलर की डायरी’, ‘संबंध’ (वाणी प्रकाशन) ‘विशाखन व अबूझ’ तथा ‘प्रवास चयन व उपसंहार’ आ चुकी हैं. मेरी कोशिश है कि लिली रे के संपूर्ण मैथिली साहित्य को मैं हिन्दी में लेकर शीघ्रातिशीघ्र लेकर आऊं.

    Author Vibha Rani

    Tags: Hindi Literature

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