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पुस्तक अंश: कुर्रतुल ऐन हैदर की आत्मकथा 'कारे जहाँ दराज़ है'

कुर्रतुल ऐन हैदर का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास 'आग का दरिया' 1959 में प्रकाशित हुआ.

कुर्रतुल ऐन हैदर का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास 'आग का दरिया' 1959 में प्रकाशित हुआ.

कुर्रतुल ऐन हैदर (Qurratulain Hyder) ने बहुत कम आयु में लिखना शुरू किया था. 'बी चुहिया' उनकी पहली प्रकाशित कहानी थी. उन्होंने कहानी, कविता, उपन्यास, अनुवाद, रिपोर्ताज़ लिखे. वे उर्दू में लिखती और अंग्रेजी में पत्रकारिता करती थीं.

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Qurratul Ain Haider: कुर्रतुल ऐन हैदर का जन्म उत्तर प्रदेश के शहर अलीगढ़ (Aligarh) में हुआ था. उनके पिता ‘सज्जाद हैदर यलदरम’ उर्दू के जाने-माने लेखक थे. उनकी मां ‘नजर’ बिन्ते-बाकिर भी उर्दू की लेखिका थीं.

कुर्रतुल ऐन हैदर स्वतंत्र लेखक व पत्रकार के रूप में वह बीबीसी लन्दन (BBC London) से जुड़ीं. वह दि टेलीग्राफ (The Telegraph) की रिपोर्टर व इम्प्रिंट पत्रिका (Imprint Magazine) की प्रबन्ध सम्पादक भी रहीं. वे इलेस्ट्रेड वीकली (The Illustrated Weekly) की सम्पादकीय टीम में भी रहीं.

कुर्रतुल (Qurratulain Hyder) ने बहुत कम आयु में लिखना शुरू किया था. ‘बी चुहिया’ उनकी पहली प्रकाशित कहानी थी. उन्होंने कहानी, कविता, उपन्यास, अनुवाद, रिपोर्ताज़ लिखे. वे उर्दू में लिखती और अंग्रेजी में पत्रकारिता करती थीं.

कुर्रतुल ऐन हैदर का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास ‘आग का दरिया’ 1959 में प्रकाशित हुआ. इसे आज़ादी के बाद लिखा जाने वाला सबसे बड़ा उपन्यास माना गया. इस उपन्यास के बारे में निदा फ़ाज़ली (Nida Fazli) ने कहा- मोहम्मद अली जिन्ना ने हिन्दुस्तान के साढ़े चार हज़ार सालों की तारीख़ (इतिहास) में से मुसलमानों के 1200 सालों की तारीख़ को अलग करके पाकिस्तान बनाया था. क़ुर्रतुल ऐन हैदर ने नॉवल ‘आग़ का दरिया’ (Aag Ka Darya) लिख कर उन अलग किए गए 1200 सालों को हिन्दुस्तान में जोड़ कर हिन्दुस्तान को फिर से एक कर दिया. दरअसल, इस उपन्यास में कुर्रतुल ने ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से लेकर 1947 तक की भारतीय समाज की सांस्कृतिक और दार्शनिक बुनियादों को समकालीन परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित किया था.

कुर्रतुल ऐन हैदर (Qurratul Ain Hyder) के बारे में वरिष्ठ साहित्यार गोपी चंद नारंग (Gopi Chand Narang) लिखते हैं, ‘क़ुर्रतुलऐन हैदर, ऐसा कहां से लाऊं कि तुझ सा कहें जिसे. बीसवीं सदी में प्रेमचन्द की विरासत के बाद कोई कथाकार ऐसा नहीं हुआ जैसी क़ुर्रतुलऐन हैदर. वह सही मायनों में एक जादूगर थीं. बहुत छोटी उम्र में उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था. फिर बँटवारे के बाद मजबूरी में उन्हें कराची जाना पड़ा, लेकिन जल्द ही वह लन्दन चली गयीं, जहाँ बी.बी.सी. में काम करती रहीं.

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वापस आने पर उन्होंने ‘आग का दरिया’ जैसा बहुमूल्य उपन्यास लिखा, जिसने उर्दू उपन्यास की दुनिया ही को बदल डाला.

उनकी कहानियों के संग्रह ‘पतझड़ की आवाज़’ पर साहित्य अकादेमी ने उन्हें अपना साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिया और बाद में फैलोशिप भी प्रदान की गयी. ‘आख़िर-ए शब के हमसफ़र’ पर उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ. वह ‘पद्मश्री’ और ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत थीं. उनकी कृतियों में ‘कारे जहाँ दराज़ है’ एक ख़ास तरह की किताब है जो जितना ही उनके ख़ानदान और पुरखों की गाथा है उतना ही वह एक अद्भुत उपन्यास है. गोया यह चारों खण्ड फ़ैक्ट और फ़िक्शन का अजीबोग़रीब मेल है. ऐसी कोई पुस्तक उर्दू में नहीं लिखी गयी. उनकी लेखनी में बला की शिद्दत और शक्ति थी. उनके कथा-साहित्य में भारत की रंगारंग तहज़ीब का दिल धड़कता हुआ नज़र आता है.’

वाणी प्रकाशन समूह (Vani Publication) ने उनकी आत्मकथा ‘कारे जहाँ दराज़ है’ (Kaare Jahan Daraaz Hai) प्रकाशित की है. इसका हिंदी में तर्जुमा किया है इरफान अहमद ने. यह आत्मकथा उपन्यास चार खंडों में है. इस आत्मकथा का एक अंश आप भी पढ़ें-

चोरों का क्लब
चचा ज़फ़र उमर मरहूम क्या-क्या उपन्यास लिख गये. ‘बहराम की गिरफ्तारी’, ‘नीली छतरी’, ‘लाल कठोर’, ‘चोरों का क्लब’. ख़ुद अलीगढ़ के आसपास देहाती चोरों की एक मंडली क़ायम थी, जिसके सदस्य घुप अंधेरी रातों में यूनिवर्सिटी पहुंचकर कूम्बल (सेंध) लगाते थे.

नज़्र सज्जाद हैदर के यहां अलीगढ़ के आठ वर्ष के ठहरने में सात बार चोरी हुई लेकिन अजीब तबीयत पाई थी, रात को ड्रेसिंग रूम का बाहरी दरवाज़ा अक्सर चारों पट खुला रहता था ताकि ताज़ा हवा अंदर आती रहे. उसी ड्रेसिंग रूम में संदूक़ रखे रहते थे. बारबार चोरियों के बावजूद, उन्हें किसी सुरक्षित कमरे में शिफ़्ट न किया गया.

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आख़िरी चोरी में सारे कपड़े निकल गये; केवल रात को पहनने के कपड़े (नाइट सूट) बचे, जो पहने हुए थीं. सुबह को पहनने के लिए मिसेज़ बट ने अपने कपड़े भेजे. ख़ाली सूटकेस कोठी के पीछे खेत में इधर-उधर पड़े मिले.

फिर एक ग्रेजुएट चोर आया.
अमावस की एक ठंडी रात थी, फूंस वाले बंगले पर अजीब तरह का सन्नाटा छाया हुआ था. सारे घर में अंधेरा पड़ा थाः केवल ऑफ़िस रूम में रौशनी हो रही थी. थोड़ी-थोड़ी देर बाद खटखट की आवाज़ आ जाती थी.

साढ़े बारह बजे का समय रहा होगा, जब दोनों नौजवान परिसर में आ धमके. बरामदे में पहुंचकर साइकिलें दीवार से टिकाईं. पायजामे के पांयचे से क्लिप निकालते हुए एक नौजवान ने कहा, ‘बड़े अब्बा यह आधी रात को क्या खड़पड़ कर रहे हैं.’

‘भाईजान शायद कोई ताला खोलने की कोशिश कर रहे हैं. दूसरे नौजवान अल्लन मियां ने आहिस्तगी से जवाब दिया. चुपके से खिसक लो, देख लिया तो देर से लौटने पर फिर डांट पड़ेगी.’

‘अमां, मुशायरे ही में तो गये थे, पहले नौजवान सैयद सईदुद्दीन हैदर ने खुसर-फुसर की.
अचानक अल्लन मियां एक छलांग लगाकर, ऑफ़िस रूम की ओर लपके. दरवाज़ा अंदर से बंद था. बाहर जाकर खिड़की में झांका, अंदर एक व्यक्ति मफ़लर में सिर मुंह लपेटे लोहे की अलमारी का ताला तोड़ने की कोशिश में बुरी तरह लगा हुआ है. अल्लन मियां ने या अली कहकर मुक्के से खिड़की तोड़ी और गड़ाप से अन्दर. चोर से हाथापाई शुरू. यूनिवर्सिटी का दुबला-पतला सा छात्र बौखला गया, इतने सईद हैदर भी अंदर कूद आए. दोनों ने मिलकर चोर को रस्सी से बांधा.

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सईद मियां ने तेज़ी से अंदर जाकर, बड़े अब्बा का दरवाज़ा ज़ोर से खटखटाया. ख़ामोशी से, घबराकर बड़ी अम्मा के कमरे में झांका. वह और छब्बूजी, दोनों गहरी नींद में थे. बड़ी अम्मा के साथ वाला कमरा मिस कैथलीन चिव का था. बड़ी बी रात को इंजील मुक़द्दस का पाठ करके सोती थीं. वह उस वक़्त खुली हुई बड़ी मोटी बाइबल पर सुर डाले सुना रही थीं. सईद मियां ने हड़बड़ा कर बारी-बारी सबको झंझोड़ा.

बहुत घबराये से बाहर भागे, साइकिल पर बैठकर डॉक्टर को बुलाने के लिए हवा हो गये. इस बीच अल्लन मियां सर्वेंट क्वार्टर्स से नौकरों को जगा लाए; पुलिस बुलवाई.

किसी अनजान व्यक्ति ने, किसी तरकीब से शाम को पेंट्री में पहुंचकर, पानी के उस जग में ख़्वाब आवर सफ़ूफ़ (नींद लाने वाली दवा का चूर्ण) मिला दिया था, जो मक़सूद बैरा खाने की मेज़ पर ले जाने वाला था. उसे यह भी पता था कि घर के नौजवान लड़के सरेशाम ही यूनियन के मुशायरे में जा चुके हैं. डॉक्टर ने कहा, ‘अगर यह सफ़ूफ़ ज़रा ज़्यादा मात्रा में पड़ गया होता तो कोई भी क़यामत से पहले न जागता.’

उस लोहे की अलमारी में एम.ए. की वार्षिक परीक्षाओं के पर्चे ताले में बन्द रखे हुए थे.

दूसरे दिन इतवार था, यथानुसार यलदरम के पसंदीदा नौजवान ख़्वाजा गुलामुस्सैयदैन, ख़्वाजा मनज़ूर हुसैन और जलील अहमद क़िदवाई सुबह से आ गये. इस बड़ी घटना पर विचार प्रकट करने के बजाय, इतवार के नियमानुसार उन नौजवानों में से एक से कहा, ‘आइये जनाब अब कागज़ क़लम लेकर बैठ जाइये और जैसी कि आदत थी, टहल-टहल कर एक किताब देखते गये और तुरन्त अनुवाद लिखवाना शुरू किया. जलालुद्दीन ख़्वारज़्म शाह 1925 ई. में प्रकाशित हुआ.

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