Home /News /literature /

ramdarash mishra birthday pratinidhi kahaniyan ramdarash mishra by om nishchal

रेणु और प्रेमचन्द के बाद की पीढ़ी के ग्रामीण रचनाकार हैं रामदरश मिश्र- ओम निश्चल

रामदरश मिश्र की रचनात्मक दुनिया में सैकड़ों कहानियां व दर्जनों उपन्यास शामिल हैं.

रामदरश मिश्र की रचनात्मक दुनिया में सैकड़ों कहानियां व दर्जनों उपन्यास शामिल हैं.

रामदरश मिश्र हिंदी साहित्य संसार के बहुआयामी रचनाकार हैं. उन्होंने गद्य और पद्य की लगभग सभी विधाओं में साहित्य सृजन किया है. मिश्रजी का जन्म 15 अगस्त, 1924 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ था.

हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. रामदरश मिश्र का आज जन्मदिन है. वे आयु के 99वें वर्ष में प्रवेश कर गए हैं. पिछले दिनों मिश्रजी को वर्ष 2021 के सरस्वती सम्मान से सम्मानित किया गया था. केके बिरला फाउंडेशन ने मिश्रजी के काव्य संग्रह ‘मैं तो यहां हूं’ के लिए यह सम्मान प्रदान गया. उम्र के इस पड़ाव पर भी मिश्र जी के व्यक्तित्व का तेज और वाणी का ओज किसी भी नौजवान को मात दे रहा था.

राजकमल प्रकाशन (Rajkamal Prakashan) से रामदरश मिश्र की कहानियों का संग्रह ‘प्रतिनिधि कहानियां: रामदरश मिश्र’ (Pratinidhi Kahaniyan Ramdarash Mishra) प्रकाशित हुआ है. उल्लेखनीय बात यह है कि यह पुस्तक रामदरश मिश्र जी के जन्मदिवस से ठीक एक दिन पूर्व 14 अगस्त को प्रकाशित हुआ है. इस संग्रह की भूमिका वरिष्ठ गीतकार और आलोचक डॉ. ओम निश्चल (Om Nishchal) ने लिखी है. ओम निश्चल ने पुस्तक की भूमिका में रामदरश जी के व्यक्तित्व और लेखन की गहरी पड़ताल की है. पुस्तक की यह भूमिका मिश्रजी की कहानियों की समीक्षा भी है. इसमें ओम निश्चिल ने रामदरश मिश्र जी की रचनाओं पर साहित्य के तमाम आयामों से प्रकाश डाला है. आइए, जानते हैं रामदरश मिश्र जी के रचनाकर्म के बारे में ओम निश्चल की कलम से-

हिंदी साहित्य का यह सौभाग्य है कि उसकी महफिल में रामदरश मिश्र जैसे वयोवृद्ध एवं श्रेष्ठ साहित्यकार मौजूद हैं जो न केवल अपनी सतत सर्जना के साथ रचना में सक्रिय हैं बल्कि सभा समारोहों में भी आते-जाते हैं. साहित्य के पैनोरमा में रामदरश मिश्र की उपस्थिति वरेण्य है. कितना आह्लादकारी है कि 1917 की बोल्शेविक क्रान्ति के सात साल बाद पैदा यह अनूठा कवि-कथाकार पिछली सदी की तमाम बड़ी घटनाओं का साक्षी रहा है और इस सदी के इन दो दशकों में भूमंडलोत्तर दुनिया के तमाम परिवर्तनों को देखा-जाना है.

रामदरश मिश्र के लेखक व्यक्तित्व पर विचार करते हुए साहित्य के तमाम प्रतिमान हमारे सामने मुखर हो उठते हैं. उनका व्यक्तित्व, कवित्व, किस्सागोई, गजलगोई, गद्य-सामर्थ्य, संस्मरण, ललित निबन्ध, यात्रा वृत्तांत और उनके गीत—सब मिलकर एक ऐसे लेखक की छवि निर्मित करते हैं जिसके भीतर सदियों का संताप, आह्लाद, उत्सवता, रोज बनती दुनिया के अनुभव और साहित्यिक मूल्यों को स्थापित करने वाले प्रगतिशील तत्त्व विद्यमान हैं.

गोरखपुर उत्तर प्रदेश में 15 अगस्त, 1924 को जन्मे रामदरश मिश्र का कृतित्व लगभग सौ से ज्यादा कृतियों में विन्यस्त है. रामदरश मिश्र को देखकर लगता है, हम गांधी के देश के किसी बड़े लेखक से मिल रहे हैं जिसका खुद का जीवन गांधीवादी है, समाजवादी और प्रगतिशील मूल्यों का हामी है. सरलता उनके व्यक्तित्व की कुंजी है. उनकी खिली-खुली मुस्कराहट उनके भीतर के जीवन्त रचनाकार का पर्याय सी लगती है. उन्हें देखकर लगता है कि लेखक को कैसा होना चाहिए. यह प्रशंसाओं के अतिरेक और स्फीति का युग है. जो चाहे कह दो. पर आज भी कुछ लेखक कवि ऐसे हैं जिनमें एक तीर्थतुल्य आकर्षण है. रामदरश जी ऐसे ही लेखकों में आते हैं. रचनात्मक सक्रियता इस उम्र में भी इतनी कि अभी तीन-चार साल में ही पत्नी पर एक उपन्यास, बेटे हेमंत पर एक उपन्यास, दो-दो कविता-संग्रह, एक गजल-संग्रह, कुछ संस्मरणात्मक कृतियां व निबन्ध—और जब जाएं सिरहाने रखा राइटिंग पैड देखें तो गजलें लिखी जाती हुई मिलेंगी. कोई कविता मिलेगी. कोई संस्मरण धारावाहिक चल रहा होगा. कोई कहानी करघे पर बुनी जा रही होगी।. यह है उनकी सक्रियता.

यह भी पढ़ें- वरिष्ठ कवि रामदरश मिश्र को सरस्वती सम्मान, काव्य संग्रह ‘मैं तो यहां हूं’ के लिए हुए सम्मानित

रामदरश मिश्र की रचनात्मक दुनिया में सैकड़ों कहानियां व दर्जनों उपन्यास शामिल हैं. 1950 के आसपास कहानियों में आए रामदरश मिश्र ने किस्सागोई की वही लीक अपनाई जो प्रेमचन्द ने बनाई, शिवप्रसाद सिंह, रेणु व विवेकी राय जैसे कथाकारों ने बनाई. उनके लिए कहानी का अर्थ, नई कहानी और कहानी के अन्य आन्दोलन नहीं, वह पठनीयता थी, जिसके बिना कहानी प्रयोग का एक टूल तो बन सकती है पर मानवीय संवेदना को कहीं छूती नहीं. जिस तरह साठोत्तर कविता को ‘अकविता’ जैसे अराजक आन्दोलन कविता की पठनीयता से दूर ले गए उसी तरह नई कहानी या समान्तर कहानी आदि आन्दोलनों के कथाकार कहानी में एक खास तरह का प्रायोजित संसार रचने पर आमादा रहे. लिहाजा जड़ीभूत मूल्यों को कहानी में नए ढंग से परोसने की कवायद हुई. रामदरश जी किसी वैचारिकता के प्रभाव में आए बिना समाज के सुख-दु:ख से वाबस्ता कहानियां रचते रहे.

‘एक रात’, ‘और बेला मर गई’, ‘पड़ोसन’, ‘मृत्यु’, ‘कहाँ जाओगे’, ‘मुक्ति’, ‘एक औरत एक जिन्दगी’, ‘प्रतीक्षा’, ‘आखिरी चिट्ठी’, ‘अकेला मकान’, ‘डर’, ‘वह औरत’, ‘धंधा’, ‘खोया हुआ दिन’, ‘नौकरी’, ‘रोटी’, ‘हद से हद’, ‘सर्पदंश’, ‘इज्जत’, ‘फिर कब आएँगे’ जैसी उनकी तमाम कहानियां हैं जिनमें भिन्न-भिन्न विषयवस्तु पर घर, गांव, समाज, परिवार, रिश्तों, दहेज उत्पीड़न, ऊंच-नीच, ईर्ष्या द्वेष, स्त्री होने की नियति और अनमेल विवाह आदि विसंगतियों को उन्होंने वाणी दी है.

रामदरश मिश्र की कहानियों का संसार विपुल है. गांव से उनका नाता सघन है इसलिए प्राय: उनकी कहानियां भी गांव के यथार्थ से जुड़ी हैं. वे स्त्री की व्यथा उकेरते हैं तो लगता है स्त्री मन के अद्भुत चितेरे हों, गांव के चरित्रों को तो अपनी कहानियों में जस का तस उद्घाटित कर देते हैं जिसमें हर पात्र की जटिलता, कुटिलता, निर्ममता और सहजता व्यक्त हो उठती है.

‘सीमा’ कहानी की विकलांग लड़की सीमा पड़ोस की हिकारत भरी दृष्टि सहती है तो दुर्भिक्ष वेला में मां के क्रियाकर्म के बाद लौटते हुए चाची में मां की दुर्लभ छवि निहारकर लेखक तोष से भर उठता है.

‘एक औरत: एक जिन्दगी’ की भवानी हो या ‘हद से हद तक’ की ठुकराई औरत, दोनों का दुख एक-सा है. ‘वसंत का एक दिन’ की फुलवा और जयराम का प्रेम किस तरह जातीय घृणा में जमींदोज होता है, किस तरह फुआ की जिन्दगी से हंसी छिन जाती है, किस तरह प्रभा की आखिरी चिट्ठी रुला देती है—अपने दर्द को कविताओं और चित्रों में उकेरती हुई वह किस तरह इस दुनिया से विदा होती है वह जैसे एक करुण क्रन्दन छोड़ जाती है कहानी में.

एक कथाकार के रूप में रामदरश मिश्र का मन करुणा और सहानुभूति से भीगा हुआ लगता है. उनकी कहानियां प्रेमचन्द के बाद के गांव समाज का आईना हैं. वे निचले तबके के लोगों के उजले चरित्रों और ऊंचे तबके के लोगों के निम्नतर चरित्र के ढके-मुदे पतन की गाथा भी कहती हैं. वे यह जतलाती हैं कि आधुनिकता और भूमंडलीकरण ने भले ही बहुत कुछ बदला है, पर अभी मनुष्य का चरित्र नहीं बदला. ऊंच-नीच की खाइयां समाप्त नहीं हुई हैं. ये कहानियां बार-बार पढ़ी जाती हुई भी हर बार अपने कथ्य में नई लगती हैं.

यह भी पढ़ें- Book Review: ‘शू डॉग’ किसी शुरुआत का सही वक्त क्या होता है- आज और अभी

रामदरश मिश्र के कहानी लेखन की शुरुआत यों तो साठ के पूर्व ही हो चुकी थी किन्तु इस दुनिया में उनकी व्यवस्थित पैठ 60 के बाद बननी शुरू हुई. हमारे यहां कहानी में प्रेमचन्द एक विभाजक रेखा के रूप में सामने आते हैं. अपनी पठनीयता और बहुवस्तुस्पर्शी किस्सागोई के जरिये पठनीयता का जो स्तर उन्होंने प्राप्त किया वह बहुत कम कथाकारों को हासिल हो सका.

रामदरश मिश्र का कथा क्षेत्र बहुधा ग्रामीण अन्तर्वस्तु से जुड़ा है तथापि प्रेमचन्द की ही तरह कहानी में पच्चीकारी की जगह पठनीयता और सहजता को उन्होंने अपना मानक बनाया. ग्रामीण परिवेश की उस दौर की कहानियों में जो नाम अग्रणी हस्ताक्षर की तरह थे उनमें प्रेमचन्द की परम्परा में ही रेणु, मार्कण्डेय, शिवप्रसाद सिंह और अमरकांत जैसे कथाकार आते हैं.

कवियों की तरह ही कथाकारों के अपने सरोकार होते हैं. हम कहानी में ग्रामीण और शहरी कहानी का जिक्र पाते हैं. अनेक आन्दोलन कहानी के गुजरे, कहानी, नई कहानी, समान्तर कहानी, सचेतन कहानी आदि. किन्तु कहानी वहीं रही, या तो अपने शिल्प और भाषायी चाकचिक्य में रची या गंवई और कस्बाई यथार्थ के बोध से भरी. हालांकि शिल्प और भाषायी चाकचिक्य वाली कहानियों के किरदारों और अन्तर्वस्तु में भी मनुष्य का एक ऐसा चित्त धड़कता है जो बाहरी अलंग के कथाकारों द्वारा पकड़ पाना सम्भव नहीं है. किन्तु जहां बात रामदरश जी की कहानियों की है, यह कहना अत्युक्ति नहीं कि वे गांव में पले-बढ़े, उसकी स्मृतियों के साथ चलते रहे पर शहर और महानगर में भी रिहाइश होने के कारण नगरीय यथार्थ से भी जुड़े रहे. अत: रामदरश जी के यहां गांव की कहानियां भी हैं और शहरी प्रसंगों की भी. पर हर स्थिति में उनका कथाकार गरीबों, मजलूमों, बूढ़ों, स्त्रियों, दलित पात्रों के साथ खड़ा मिलता है.

यों तो रामदरश जी अपने जीवनकाल में अनेक कहानियां लिखी हैं—समाज के जीवन यथार्थ से रूबरू कराने वाली. पर कुछ कहानियों पर बातचीत से उनकी कहानियों का केन्द्रीय वैशिष्ट्य उजागर हो उठता है. पहले गांव के जीवन यथार्थ को लेते हैं. ‘एक औरत एक जिन्दगी’ कहानी नरेश की बहू पर केन्द्रित है. एक गुंडा और असभ्य परिवार की बहू है वह. जब तक परिवार की गुंडागर्दी चली, लोगों को जीने न दिया. पर अचानक उसके बेटे और ससुर की मृत्यु के बाद वह विधवा अपने बच्चों के साथ कर्मठता के साथ अपनी खेती-बारी संभाल लेती है. गांव गए बाबा यह देखकर आश्वस्त होते हैं. गांव वालों की फब्तियां एक तरफ, स्त्री की अपनी जिद एक तरफ. कथाकार स्त्री के पक्ष में जैसे खड़ा हुआ उसका समर्थन करता हो. स्त्री के पक्ष में वे अपने कई उपन्यासों और कहानियों में खड़े होते हैं. ‘एक थकी हुई सुबह’ की स्त्री भी कर्मठता की मिसाल बनती है तो ‘डर’, ‘अकेली वह’, ‘अपने लिए’, ‘वह औरत’ और ‘धंधा’ आदि कहानियों में भी स्त्री, पुरुष व्यवस्था से जूझती दिखाई देती है.

‘जमीन’, ‘दक्षिणा’ और ‘सर्पदंश’ ग्रामीण यथार्थ की कहानियां हैं. ‘दक्षिणा’ पंडितों और महापात्रों के फैलाए कर्मकांड और अन्धविश्वास से लड़ने वाली कहानी है. पंडित और महापात्र इस बात पर अड़े हैं कि मृतक की आत्मा के मोक्ष के लिए जजमान गाय दान कर दे पर जजमान माधो के जीवनयापन का सहारा एकमात्र गाय ही है जिस पर महापात्र की निगाह है. वह अन्त तक गाय नहीं देता और साहस के साथ महापात्र को चलता कर देता है. कथाकार ने यहां न केवल अन्धविश्वास, कर्मकांड, पुरोहिती प्रलोभन को नकारा है बल्कि माधो जैसे पात्र में यह दुस्साहस भी भरा है कि वह अपने से बड़ों का भी गलत और अस्वीकार्य मुद्दे पर दृढ़ता से विरोध कर सके. इस कहानी का एक जीवन्त संवाद देखें—“रहने दो पंडित, अपना पूजा-पाठ. मेरे बाबू अपने बेटे और पोते के मुंह से दूध छीनकर खुद नहीं पीना चाहेंगे. जाओ, पंडित जी अपने घर जाओ, मेरे बाबू की आत्मा को भटकने दो. और सुनो, आत्मा भटकती है पापियों की, मेरे बाबू पापी नहीं थे.”

‘जमीन’ समाज में गढ़े गए झूठे नारों का पर्दाफाश करने वाली कहानी है. विद्यार्थी मोहन को बचपन की वे बातें याद आती हैं जो समाजवाद की अगवानी में कही जाती थीं कि यह जमीन सबकी है. पानी सबका है. ईश्वर ने सबको एक-सा बनाया है. पर होता समाज में हमेशा इस नारे के उलट है. जरा-सी भूख मिटाने के लिए कोई बच्चा किसी के खेत की छीमी तोड़ भर ले कि उसे खेत का मालिक पीटने लगता है. वह आकर अपने पिता से बातें बताता है कि आज मंत्री जी स्कूल में आए थे यही बात कह रहे थे कि जमीन सबकी है… बाप जानता है इन झूठे आश्वासनों को. कहता है, “बचवा छोड़ इन बातों को, ये बातें तो मैं तब से सुन रहा हूं जब मैं सुराजी था और झंडा लेकर गांव-गांव घूमा करता था. इन मंत्री के साथ मैंने भी जेल काटी है बचवा. वे मंत्री हो गए हैं और मैं…”

सर्पदंश’ भी गांव के माहौल की कहानी है. गांव के गोकुल को खेत में एक दिन एक सांप काट लेता है. वह शायद भादों की अंधेरी रात में पड़ोस के पंडित के खेत से भुट्टे तोड़ने के लिए गया हुआ था कि सांप के काटने से बेहोश सा हो गया. उसे डॉक्टर के पास न ले जाकर भवानी बाबा झाड़-फूंककर उन्हें ठीक करते हैं. हालांकि कुछ ठीक होते ही प्रधान का लड़का उन्हें घर बुला ले जाता है जहां उस पर भुट्टे की चोरी का आरोप लगाकर लांछित किया जाता है तथा पिटाई से वह दम तोड़ देता है. एक दारुण अन्त के साथ कहानी खत्म होती है पर है यह ‘बुभुक्षित: किं न करोति पापम्’ की कहानी है. भूखे आदमी की कहीं भी सुनवाई नहीं है.

‘एक वह’ कहानी का ताऊ जो बात-बात पर रामचरितमानस की चौपाइयां दुहराता है, परिवार से परित्यक्त है और शहर के किसी कोने में चने-मुरमुरे की जरा-जीर्ण दुकान खोलकर पेट पालता है कि एक दिन बुखार से मरा हुआ पाया जाता है. उसके आसपास गरीबी हटाओ के पोस्टर चिपके उसका मुंह चिढ़ा रहे होते हैं. रामदरश मिश्र ने इस बूढ़े का ऐसा शब्दचित्र खींचा है कि इस देश में चलाए गए गरीबी हटाओ के पोस्टर के खोखलेपन की पोल खुल जाती है.

यह भी पढ़ें- यात्राएं हमें महसूस करा देती हैं कि एक दुनिया के भीतर कई दुनिया हैं- अनुराधा बेनीवाल

‘नेताजी की चादर’ शिक्षा संस्थानों के अतिथिगृहों की बदहाली की कहानी है और नेताओं के पतन की भी. ‘सड़क’ कहानी भी दिलचस्प कहानी है. एक अध्यापक का एक छात्र आगे चलकर विधायक बन जाता है और मास्टर के बुरे दिन आ जाते हैं. फिर बेटे के कहने पर जीविका के लिए विवश होकर मास्टर जी रोड पर चाय की दुकान लगा लेते हैं कि एक दिन उधर से गुजरते विधायक जी आ धमकते हैं और चाय ऑर्डर करते हैं. लेकिन घटिया चाय पाकर उसे बिना पिये लेकिन पैसा देकर चलते बनते हैं किन्तु खुद्दार पंडित जी वह रुपया फेंक देते हैं. मजबूरी योग्य व्यक्ति को भी आखिर नियति जीवन के किस मोड़ पर लाकर पटक देती है यह कहानी उसका एक उदाहरण है.

दाम्पत्य की दरार के बाद अंजना से उसका पति तलाक तो ले लेता है पर बहुत दिनों बाद राह चलते ट्रेन में जब उसी पूर्व पति, उसकी पत्नी और उसके बच्चे से औचक मुलाकात होती है तो अंजना और उसके पूर्व पति आपस में संकोच और असमंजस में घिर जाते हैं. दो लोग जब तलाक लेते हैं तो बच्चों पर क्या बीतती है, इसकी भी एक मिसाल है कहानी ‘एक भटकी हुई मुलाकात’, जिसे उन्होंने बड़ी खूबसूरती से बुना है. इसका ब्योरा जैसे बेहद नाटकीय अन्विति से बुना गया है. बच्चा जब टुकुर-टुकुर अंजना की ओर देखता है तो जैसे मां का कलेजा उसमें अपने विलग हुए बच्चे की छाया पाकर हिल उठता है. अन्त में जाते हुए उस बच्चे की असली मां उसके लिए एक पैकेट छोड़ जाती है. बहुत ही कचोट से भर देने वाली कहानी है यह.

Ramdarash Mishra News, Ramdarash Mishra Poems, Ramdarash Mishra Kavita, Ramdarash Mishra Books, Pratinidhi Kahaniyan Ramdarash Mishra, Om Nishchal News, Om Nishchal Author, Rajkamal Prakashan, रामदरश मिश्र न्यूज, रामदरश मिश्र की कविताएं, रामदरश मिश्र की कहानियां, प्रतिनिधि कहानियां रामदरश मिश्र, ओम निश्चिल, गीतकार ओम निश्चल, राजकमल प्रकाशन, रामदरश मिश्र जन्मदिन, हिंदी साहित्य, लिटरेचर न्यूज, पत्रकार श्रीराम शर्मा, Hindi Sahitya News, Literature News,

ये कहानियां हों या इसके अलावा भी रामदरश जी की कुछ अन्य कहानियां—यथा, ‘विदूषक’, ‘बबुआ’, ‘चिट्ठियों के बीच’, ‘मां, सन्नाटा और बजता हुआ रेडियो’, ‘लाल हथेलियां’, ‘निर्णयों के बीच अनिर्णय’, ‘उत्सव’, ‘पराया शहर’, ‘मुर्दा मैदान’, ‘अतीत का विषद’, ‘आखिरी चिट्ठी’, ‘टूटे हुए रास्ते’, ‘सवाल के सामने’, ‘डर’, ‘शेष यात्रा’, ‘रहमत मियां’, ‘कलाकार’ और ‘आज का दिन भी’ आदि. इनसे गुजरते हुए पाता हूं कि वे मूल्यों को जीने वाले कथाकार हैं. खेत भले किसी प्रधान का है पर भूख के कारण यदि खेत से कुछ तोड़ लिया तो यह कोई बड़ा पाप नहीं है. एक दौर में ‘गरीबी हटाओ’ के पोस्टर दीवारों पर लगे होते थे और दूसरी तरफ एक बूढ़ा मरने के लिए अभिशप्त है. ‘एक वह’ और ‘मुर्दा मैदान’ दोनों में ऐसी दारुण मृत्यु से लगता है कि गरीबी का मखौल उड़ाते नारों के बलबूते ही यह लोकतंत्र बना है. पर इस लोकतंत्र में बिचौलियों की चांदी रही. यही वह दौर था कि धूमिल इस तत्त्व के बारे में पूछ रहे थे, “यह तीसरा आदमी कौन है, मेरे देश की संसद मौन है.”

यह भी पढ़ें- हिंदी अकादमी कवि सम्मेलन: ‘जब फिसलने की तमन्ना हो जवां उन दिनों में भी संभलना सीखिये’

जहां तक इस देश के ज्वलंत सवाल हैं, कथाकार उनसे मुंह नहीं मोड़ता. वह उन्हें अपनी कहानियों के केन्द्र में लाता है. विकलांगता की पीड़ा ‘सीमा’ में दिखती है तो दलित त्रासदी ‘सर्पदंश’ में, बूढ़ों की उपेक्षा नियति पर सवाल ‘एक वह’ कहानी उठाती है तो आजाद भारत में एक अध्यापक की दुरवस्था और नेताओं की तड़क-भड़क पर ‘सड़क’ कहानी बात करती है. गांवों में फैले अन्धविश्वास और कर्मकांड पर कथाकार ‘दक्षिणा’ में प्रहार करता है तो दुनिया के ढकोसलों को धता बताकर एक औरत (‘एक औरत एक जिन्दगी’) कर्मठता की राह पर चल पड़ती है. सुराजियों के साथ क्या सुलूक होता है, यह बात भी रामदरश जी की कहानियों में एक धीमी लौ की तरह चमकती है. इस तरह रामदरश जी की कहानियों का व्यास चौड़ा है, उनकी चिन्ताओं का छोर व्यापक है किन्तु जिस एक बात को उन्होंने आज तक तरजीह दी वह है कहानियों की पठनीयता.

एक बात और जोर देकर कहना चाहूंगा कि वे रेणु और प्रेमचन्द के बाद की पीढ़ी के ग्रामीण रचनाकार हैं सो वे ग्रामीण भारत की समस्याओं को नहीं भूलते, अपने इलाके का दर्द नहीं भूलते. वहां का सामन्ती आचरण, दरिद्रता, गरीबी, मान-अपमान, अहं पर जीता सवर्ण समुदाय, भूख के लिए विवश दलित और वंचित—सब उनकी निगाह में हैं. उनकी कहानियां इन सभी मुद्दों को उठाती हैं. इस तरह पठनीयता के उद्देश्य को उन्होंने कभी आंख से ओझल नहीं होने दिया तथा आज तक उसका निर्वाह करते आ रहे हैं. जिस लहजे में ‘राग दरबारी’ में श्रीलाल शुक्ल ने लिखा था, यहां से भारतीय देहात का महासागर शुरू होता है, वह महासागर रामदरश जी के कथा संसार में लहराता मिलता है और उनकी कहानियों के विश्वसनीय विवेचक सुपरिचित आलोचक वेदप्रकाश अमिताभ का यह कहना सही है कि वे आन्दोलनों की जलवायु से पैदा कहानीकार नहीं हैं, कितने आन्दोलन उनके सामने से गुजरे पर वे उस शोर-शराबे के बीच भी अनुभव, बोध और रूपबन्ध के स्तर पर वैविध्यपूर्ण कहानियां लिखते रहे और आज भी उसी त्वरा के साथ विभिन्न विधाओं को अपनी रचनात्मकता से समृद्ध कर रहे हैं. आशा है ये कहानियां पाठकों व कहानियों में रुचि रखने वाले समाज को भाएंगी जो कहानी में आज भी सबसे पहले किस्सागोई की तलाश करते हैं.

Ramdarash Mishra News, Ramdarash Mishra Poems, Ramdarash Mishra Kavita, Ramdarash Mishra Books, Pratinidhi Kahaniyan Ramdarash Mishra, Om Nishchal News, Om Nishchal Author, Rajkamal Prakashan, रामदरश मिश्र न्यूज, रामदरश मिश्र की कविताएं, रामदरश मिश्र की कहानियां, प्रतिनिधि कहानियां रामदरश मिश्र, ओम निश्चिल, गीतकार ओम निश्चल, राजकमल प्रकाशन, रामदरश मिश्र जन्मदिन, हिंदी साहित्य, लिटरेचर न्यूज, पत्रकार श्रीराम शर्मा,  Hindi Sahitya News, Literature News,

Tags: Hindi Literature, Hindi Writer, Literature

विज्ञापन

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज

अधिक पढ़ें

अगली ख़बर