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रामधारी सिंह दिनकर ने ‘रश्मिरथी’ में ज्वलन्त सामाजिक प्रश्नों को उठाया- मैत्रेयी पुष्पा

रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा रचित 'रश्मिरथी' प्रसिद्ध खण्डकाव्य है. यह 1952 में प्रकाशित हुआ था.

रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा रचित 'रश्मिरथी' प्रसिद्ध खण्डकाव्य है. यह 1952 में प्रकाशित हुआ था.

मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं कि दिनकर का 'रश्मिरथी' समाज में व्याप्त जातिप्रथा पर करारी चोट है. दिनकर ने ‘रश्मिरथी’ में ज्वलन्त सामाजिक प्रश्नों को उठाया है.

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Ramdhari Singh Dinkar Birthday: रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का आज जन्मदिन है. हिन्दी के एक प्रमुख लेखक, कवि व निबन्धकार दिनकर आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं.

दिनकर की कविताओं में एक ओर ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है.उनकी ‘कुरुक्षेत्र’ (Kurukshetra) और ‘उर्वशी’ (Urvashi) नामक कृतियों अभिव्यक्ति की ये प्रवृत्तियों हमें चरम उत्कर्ष पर देखने को मिलती हैं.

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की इन कृतियों में अलावा ‘रश्मिरथी’ (Rashmirathi) भी बहुत चर्चित कृति रही है.

वाणी प्रकाशन समूह (Vani Prakashan) द्वारा ‘दिनकर जयंति’ (Ramdhari Singh Dinkar) पर उनकी रचनाओं पर आयोजित चर्चा में वरिष्ठ साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा (Maitreyi Pushpa) ने कहा कि दिनकर की कविताएं हमें बार-बार आकर्षित करती हैं.

मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं कि दिनकर का ‘रश्मिरथी’ समाज में व्याप्त जातिप्रथा पर करारी चोट है. दिनकर ने ‘रश्मिरथी’ में ज्वलन्त सामाजिक प्रश्नों को उठाया है. उन्होंने जाति के स्थान पर मानवीय गुणों की पहचान की वकालत की है. यहां कवि लिखते हैं-

जाति-जाति रटते, जिनकी पूंजी केवल पाषण्ड।
मैं क्या जानूँ जाति? जाति हैं ये मेरे भुजदण्ड।।

‘रश्मिरथी’ के माध्यम से दिनकर ने एक ऐसे समाज की परिकल्पना की है जिसमें व्यक्ति की पहचान उनकी जाति या धर्म से ना होकर उसके गुणों से हो-

मैं उनका आदर्श, किन्तु जो तनिक न घबरायेंगे ।
निज चरित्रा-बल से समाज में पद विशिष्ट पायेंगे।।

मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं कि ‘रश्मिरथी’ में कर्ण की चर्चा तो सब करते हैं, लेकिन दिनकर इस रचना में कुंति के चरित्र का भी बड़ा सुंदर वर्णन किया है, इस पर चर्चा कम होती है. रश्मिरथी में दिनकर ने कुंति क्या कहती हैं, क्या सोचती है, उनकी समस्या, उनकी वेदना-पीड़ा को भी बहुत ही मार्मिक तरीके से प्रस्तुत किया है.

सच्चिदानंद जोशी और चंद्र प्रकाश द्विवेदी ‘दीनदयाल उपाध्याय पुरस्कार’ से सम्मानित

कुंति के माध्यम से मैत्रेयी पुष्पा सवाल उठाती हैं कि समाज में कुंति एक शापित चरित्र हैं. क्या किसी स्त्री को संतान तभी पैदा करनी चाहिए या उसकी संतान को तभी मान्यता मिलती है जब वह किसी की पत्नी हो. जब कर्ण पैदा हुआ था तब कुंति के पास ना तो कोई धर्म था ना नियम. क्योंकि कर्ण के समय कुंति का विवाह नहीं हुआ था.

कुंति समाज में और खुद उसके परिवार में ही उसके भाइयों द्वारा कर्ण के तिरस्कार पर बार-बार विचिलित हो उठती है. कुंति की इस वेदना को दिनकर ने बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है.

Vani Prakashan

मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं कि एक रचनाकार का गुण होता है कि वह परकाया में प्रवेश करके उसके सुख-दुख को महसूस कर सके. यहां दिनकर कुंति का दुख व्यक्त करते हुए एक स्त्री बन जाते हैं और कुंति के माध्यम से स्त्री ह्रदय की वेदना को बड़े मनोभाव से प्रस्तुत करते हैं.

और जब कर्ण की बात आती है तो दिनकर एक पुरुष होकर सोचते हैं.

जननी है वही, तजूं किसको?
“हे कृष्ण ! ज़रा यह भी सुनिए,

सच है की झूठ मन में गुनिये
धूलों में मैं था पडा हुआ,

किसका सनेह पा बड़ा हुआ?
किसने मुझको सम्मान दिया,

नृपता दे महिमावान किया?
“अपना विकास अवरुद्ध देख,

सारे समाज को क्रुद्ध देख
भीतर जब टूट चुका था मन,

मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं, ‘कुंति कैसे कहे कि वह कर्ण की मां है, लेकिन जब ममता जागती है तो वह उस सच को भी खोल देती है जो वर्षों से ह्रदय में दबाए बैठी थी. कोई भी स्त्री रक्तपात, युद्ध नहीं चाहती है. लेकिन जब कुंति के सामने खुद उसके बेटे आपस में एक-दूसरे के रक्त के प्यासे नजर आते हैं तो वह तमाम रहस्यों से पर्दा उठाने पर मजबूर हो जाती है. बड़े कुल में रहने के बड़े दंड होते हैं जो कुंति ने भोगे हैं.’

रश्मिरथी में कर्ण ने कुंति की ममता पर भी सवाल उठाए हैं-

जिस माँ ने मेरा किया जनन
वह नहीं नारि कुल्पाली थी,

सर्पिणी परम विकराली थी
“पत्थर समान उसका हिय था,

सुत से समाज बढ़ कर प्रिय था
गोदी में आग लगा कर के,

मेरा कुल-वंश छिपा कर के
दुश्मन का उसने काम किया,

माताओं को बदनाम किया
“माँ का पय भी न पीया मैंने,

उलटे अभिशाप लिया मैंने
वह तो यशस्विनी बनी रही,

सबकी भौ मुझ पर तनी रही
कन्या वह रही अपरिणीता,

जो कुछ बीता, मुझ पर बीता
“मैं जाती गोत्र से दीन, हीन,

राजाओं के सम्मुख मलीन,
जब रोज अनादर पाता था,

कह ‘शूद्र’ पुकारा जाता था
पत्थर की छाती फटी नही,

कुन्ती तब भी तो कटी नहीं
“मैं सूत-वंश में पलता था,

अपमान अनल में जलता था,
सब देख रही थी दृश्य पृथा,

माँ की ममता पर हुई वृथा
छिप कर भी तो सुधि ले न सकी

छाया अंचल की दे न सकी
“पा पाँच तनय फूली फूली,

दिन-रात बड़े सुख में भूली
कुन्ती गौरव में चूर रही,

मुझ पतित पुत्र से दूर रही
क्या हुआ की अब अकुलाती है?

साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं, ‘स्त्री सामाजिक मान्यताओं के चलते डरती भी बहुत है लेकिन डर के आगे साहस भी करती है. जब डर बहुत ज्यादा हावी होता है तो उसमें निर्भीकता भी आ जाती है.’

कुंति और कर्ण के द्वंद को दिनकर जी ने बहुत अच्छी तरह से समझा भी है और उसे प्रस्तुत भी किया है.

Ramdhari Singh Dinkar

रश्मिरथी
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित रश्मिरथी प्रसिद्ध खण्डकाव्य है. यह 1952 में प्रकाशित हुआ था. इसमें 7 सर्ग हैं. इसमें कर्ण के चरित्र के सभी पक्षों का सजीव चित्रण किया गया है. रश्मिरथी में दिनकर ने सारे सामाजिक और पारिवारिक सम्बन्धों को नये सिरे से जांचा है. चाहे गुरु-शिष्य सम्बन्धों के बहाने हो, चाहे अविवाहित मातृत्व और विवाहित मातृत्व के बहाने हो, चाहे धर्म के बहाने हो, चाहे छल-प्रपंच के बहाने.

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