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सर्वेश्वर दयाल सक्सेना: 'जब-जब सिर उठाया, अपनी चौखट से टकराया'

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कलम से हिंदी साहित्य की कोई भी विधा अछूती नहीं रही.

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कलम से हिंदी साहित्य की कोई भी विधा अछूती नहीं रही.

'खूंटियों पर टंगे लोग' कविता संग्रह के लिए सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया.

  • News18Hindi
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    Sarveshwar Dayal Saxena: सितम्बर का महीना बेजोड़ कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को याद करने का महीना है. लेकिन उनको कोई याद नहीं करता. इसी महीने 15 तारीख को वे पैदा हुए थे और 24 सितम्बर को उन्होंने अंतिम सांस ली.

    मनोहर श्याम जोशी (Manohar Shyam Joshi) कहते थे कि हर लिहाज से वह अपने दौर का सबसे बड़ा कवि था. लेकिन उसको उचित मुकाम नहीं मिला. उसमें गहरी काव्यात्मकता भी थे, ठोस वैचारिकता और जिस तरह के छंदों के लिए रघुवीर सहाय (Raghuvir Sahay) को जाना गया उस तरह के छंदों का सबसे बेहतरीन इस्तेमाल सर्वेश्वर ने अपनी कविताओं में किया.

    एक बार मनोहर श्याम जोशी ने मेरे सामने नामवर सिंह से पूछा कि आपने सर्वेश्वर की कविताओं की उपेक्षा क्यों की? नामवर जी (Namvar Singh) ने टालने के अंदाज में कहा- सर्वेश्वर लड़ता बहुत था.

    आज उनकी यह कविता याद आई-

    जब-जब सिर उठाया
    अपनी चौखट से टकराया।
    मस्तक पर लगी चोट,
    मन में उठी कचोट,
    अपनी ही भूल पर मैं,
    बार-बार पछताया।
    जब-जब सिर उठाया
    अपनी चौखट से टकराया।

    दरवाजे घट गए या
    मैं ही बड़ा हो गया,
    दर्द के क्षणों में कुछ
    समझ नहीं पाया।
    जब-जब सिर उठाया
    अपनी चौखट से टकराया।

    ‘शीश झुका आओ’ बोला
    बाहर का आसमान,
    ‘शीश झुका आओ’ बोली
    भीतर की दीवारें,
    दोनों ने ही मुझे
    छोटा करना चाहा,
    बुरा किया मैंने जो
    यह घर बनाया।
    जब-जब सिर उठाया
    अपनी चौखट से टकराया।

    (प्रभात रंजन की फेसबुक बॉल से)

    अंत में

    अब मैं कुछ कहना नहीं चाहता,
    सुनना चाहता हूं
    एक समर्थ सच्ची आवाज़
    यदि कहीं हो।

    अन्यथा
    इससे पूर्व कि
    मेरा हर कथन
    हर मंथन
    हर अभिव्यक्ति
    शून्य से टकराकर फिर वापस लौट आए,
    उस अनंत मौन में समा जाना चाहता हूं
    जो मृत्यु है।

    ‘वह बिना कहे मर गया’
    यह अधिक गौरवशाली है
    यह कहे जाने से —
    ‘कि वह मरने के पहले
    कुछ कह रहा था
    जिसे किसी ने सुना नहीं।’

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