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भाषा भी बहती हवा-सी है, यह जितनी स्वछंद होगी उतनी ही महकेगी- स्वानन्द किरकिरे

स्वानंद किरकिरे ने कई फिल्मों में यादगार गीत दिए हैं.

स्वानंद किरकिरे ने कई फिल्मों में यादगार गीत दिए हैं.

हिन्दी के प्रसार में रंगमंच व चलचित्र की भूमिका पर वरिष्ठ गीतकार स्वानंद किरकिरे (Swanand Kirkire) से लंबी बातचीत की गई.

  • News18Hindi
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    हिंदी अकादमी, दिल्ली (Hindi Academy Delhi) द्वारा हिन्दी पखवाड़े (Hindi Diwas 2021) के अंतर्गत आज विशेष साक्षात्कार कार्यक्रम का आयोजन किया गया. हिन्दी के प्रसार में रंगमंच व चलचित्र की भूमिका पर वरिष्ठ गीतकार स्वानंद किरकिरे (Swanand Kirkire) से लंबी बातचीत की गई. साक्षात्कार वर्चुअल माध्यम से किया गया.

    हिंदी अकादमी, दिल्ली के सचिव डॉ. जीतराम भट्ट (Dr Jitram Bhatt) ने स्वानंद किरकिरे की फिल्मों में उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि किरकिरे जी ने सुप्रसिद्ध गीत ‘ओ री चिरैया नन्ही सी चिड़िया’ गीत के माध्यम से छायावादी स्तर से ऐसी बात कह दी है कि जो पूरे समाज के लिए बहुत बड़ा संदेश है. इस गीत के माध्यम से उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या पर मार्मिक संदेश दिया है.

    स्वानंद किरकिरे ने अपने गीतों (Swanand Kirkire Songs) के माध्यम से फिल्मी गीतों और आम लोगों के बीच संबंधों में जो खालीपन आया हुआ था उसे भरने का काम किया है. स्वानंद किरकिरे ने थ्री इडियट्स का बहती हवा सा है वो, मुन्नाभाई एमएमबीएस का बंदे में था दम और परिणीता जैसी फिल्मों में यादगार गीत दिए हैं.

    हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी फिल्मों के योगदान के सवाल पर स्वानंद किरकिरे ने कहा कि हिंदी वह भाषा (Hindi Bhasha) है जो पूरे समाज को जोड़ती है. आम जन की भाषा जिसमें सभी लोग बातचीत करते हैं, जो जगह-जगह पर बदलती है जिसकी शैलियां थोड़ी परिवर्तित होती है. वही भाषा हिंदी सिनेमा अपनाता है.

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    उन्होंने कहा कि हिंदी भाषा बहती हवा की तरह है. इसके किसी सीमा में बांध कर नहीं रखा जा सकता. यह जहां-जहां होकर गुजरती है, वहां की सौंधी महक हिंदी भाषा में समाकर और ज्यादा पल्लवित होती है.

    गीतकार किरकिरे ने कहा, एक समय हिंदी टेलीविजन अंग्रेजी का था. फिर 1992 में वैश्वीकरण हुआ तो सभी को एहसास हुआ कि हिंदुस्तान की भाषा का उपयोग ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए तो उसके बाद हिंदी में समाचार आए, विज्ञापन बने. पर इसकी शुरुआत बहुत पहले हिंदी सिनेमा से ही की गई थी.

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    हिंदी सिनेमा समाज को ही प्रतिबिंबित करता है. आसान रूप की ओर ले जाता है. दुनिया में जो भी जीवंत भाषा होगी उसको सतत प्रवाहशील होना और बदलाव जरूरी है तभी वह सुंदर और पल्लवित होगी. जो रुक जाएगी उसका जनमानस से संबंध टूट जाता है. हिंदी सिनेमा और रंगमंच इसी बदली हुई गतिशील भाषा को अपनाता है. हमें हिन्दी के सारे स्वरूपों को गुनना और पहचानना चाहिए.

    उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा भी था जब संगणक आया था तो उस पर केवल अंग्रेजी में ही लिखा जा सकता था. परन्तु जैसे-जैसे तकनीक का विकास हुआ तो हिंदी का फोन्ट भी बनकर आ गया और अब संचार माध्यमों में हिन्दी का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है.

    हिंदी अकादमी, दिल्ली के उप-सचिव ऋषि कुमार शर्मा (Rishi Kumar Sharma) ने अपने धन्यवाद ज्ञापन में कहा बेशक अंग्रेजी का बोलबाला कितना ही हो हिंदी लगातार आगे बड़ रही है और बढ़ती रहेगी.

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