विष्णु प्रभाकर: सन्त स्वभाव का वैरागी मन

विष्णु प्रभाकर पर महात्मा गांधी के दर्शन और सिद्धांतों का बहुत गहरा असर पड़ा था.

नारी का शोषण, मनुष्य की पशु प्रवृत्ति और सामाजिक विडम्बनाओं की पृष्ठ भूमि को केन्द्र बिन्दु रखकर विष्णु प्रभाकर ने 'धरती अब भी घूम रही है' की रचना की थी.

  • Share this:
    अवधेश श्रीवास्तव

    Vishnu Prabhakar: एक मित्र से साहित्य पर चर्चा करते हुए अचानक ही विष्णु प्रभाकर जी का जिक्र हो उठा. प्रभाकर जी का नाम आते ही आंखों के सामने वे बातें और मुलाकातें तैरने लगीं जो मेरी और उनके बीच हुई थीं. पत्रकारिता और लेखन काल के दौरान तमाम लोगों से बातें हुईं, मुलाकातें हुईं. लेकिन सरलता, सोम्यता को ओढ़े प्रभाकर जी सही मायनों में गांधीवादी थे. विष्णु प्रभाकर पर महात्मा गांधी के दर्शन और सिद्धांतों का बहुत गहरा असर पड़ा था. उन्होंने न केवल गांधी जी के विचारों का अनुसरण किया बल्कि गांधी की तरह जीवन जीया भी. उन्होंने अपनी वसीयत में अपने संपूर्ण अंगदान करने की इच्छा व्यक्त की थी. उनकी इच्छा के मुताबिक, मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया, बल्कि उनके पार्थिव शरीर को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को सौंप दिया गया.

    नारी का शोषण, मनुष्य की पशु प्रवृत्ति और सामाजिक विडम्बनाओं की पृष्ठ भूमि को केन्द्र बिन्दु रखकर विष्णु प्रभाकर ने 'धरती अब भी घूम रही है' की रचना की थी. विष्णु प्रभाकर के आदर्श पक्ष की उपज ही यह कहानी है. शरत् की अमिट छाप लिए प्रभाकर जी की नारी और शरत् की नारी में देश और काल का ही अन्तर हो सकता है, जिसमें कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ.

    संयम और शिष्टाचार की लक्ष्मण रेखा में कैद यह कहानी अपने-आप में सम्पूर्ण कहानी होते हुए भी विष्णु प्रभाकर की ही यह कहानी है जो नारी त्रासदी के उलझे ताने-बाने को सुलझाना चाहती है. इसीलिए वह अनचाहे-अनजाने में नारी की संवेदना से कैसे विमुक्त हो सकते हैं.

    प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह की प्रतिक्रिया थी कि कहानी में भावुकता आरोपित है और कहानी पर लिखा 'डेमेजिंग आर्टिकिल' एक अपराध दृष्टि है. तब यह और ज्यादा संगीन हुआ जब विष्णु प्रभाकर ने बिना विचलित हुए इस प्रकरण के उत्तर में समय-समय पर नामवर जी की बात को ही और वजनी किया कि उनका आरोप है कि कहानी में भावुकता आरोपित है.'

    लेखक होने के नाते जवाबदेही से जो पलायन विष्णु जी ने किया है वह उनकी सबसे बड़ी विशेषता और कमजोरी है. पर इस सत्य से भी विमुख नहीं हुआ जा सकता है कि विवादास्पद रचनाकार की साहित्यिक गरिमा विवाद के अनुपातिक वृद्धि में ही घटती जाती है. आगामी पीढ़ी उनके विवादों को ही याद रख पाती है, साहित्य को नहीं.

    विष्णु प्रभाकर की अन्तर्दृष्टि में विवाद रहित रहने की यह भी वजह हो सकती है. आवारा शरत् से सन्त स्वभाव का वैरागी मन विष्णु प्रभाकर का साम्य चरित्र अन्तराल में एक और परिपक्व व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब बना है.

    यह भी पढ़ें- राजेश जोशी की कविता 'बच्चे काम पर जा रहे हैं'

    प्रभाकर जी से पहली मुलाकात सन् 1976 में कानपुर की मोतीझील में हुई थी. उनके साथ तब उनकी पत्नी यानी सुशीला भाभी थीं. युवा कथाकारों के बीच प्रेमचन्दोत्तर पीढ़ी के विष्णु प्रभाकर के सहज आत्मीयता पूर्ण विचार आज भी अभिभूत करते रहते हैं. उसके बाद एक सिलसिला बना पत्रों के आदान-प्रदान तथा दिल्ली आकर व्यक्तिगत मुलाकात का.

    लंबे समय तक सृजनशील लेखन में सक्रिय रहे विष्णु प्रभाकर की चर्चा में सुशीला भाभी का जिक्र न करना अपराध होगा. वे विष्णु प्रभाकर की प्रेरणा थीं, पर सन्त तुलसीदास के विपरीत विष्णु प्रभाकर के जीवन के हर पल के साक्ष्य के रूप में. विष्णु प्रभाकर के व्यक्तित्व के विपरीत एक सहज आत्मीयता बिखेरती बहिर्मुखी महिला थीं.

    'आवारा मसीहा' लिखने के पूर्व तक एक भयाक्रान्त आर्थिक दौर से कभी न विचलित होने वाली सुशीला भाभी सभी आगन्तुकों की स्वागतकर्ता बनीं. मेरी पहली दिल्ली यात्रा में वे मेरी गाइड भी बनीं. कनॉट प्लेस में रीगल टाकीज के पास बनी रेलिंग पर कुल्फी खाते उन्होंने अहसास नहीं होने दिया कि यह मेरी पहली मुलाकात है और वे हमउम्र नहीं हैं.

    जब यह बात शाम को विष्णु प्रभाकर को मैंने बताई तो उन्होंने एक और बात कही कि उनके इस खुलेपन के कारण एक मित्र के मन में कभी कोई खोट आ गया था. जिसका ज़िक्र सुशीला भाभी ने विष्णु प्रभाकर से किया था. पर दुनिया में सभी लोग एक से नहीं होते. ऐसी अवधारणा को मन में लिए सुशीला भाभी जीवनपर्यन्त सभी के साथ आत्मीयता बिखेरती रहीं.

    विष्णु प्रभाकर के निवास पर जाते समय कुन्डेवालान की गली 'मीर' की यह बात याद दिलाती है कि कौन जाय दिल्ली की गलियां छोड़कर. आधुनिक दिल्ली के वैभव से दूर प्राचीनता की स्वाभाविक रंगत लिए हुए कुन्डेवालान विष्णु प्रभाकर की तरह ही था. उनका घर किसी साधारण रेलगाड़ी के कम्पार्टमेंट की तरह था तथा उनका रहना देश के साधारण यात्री की तरह जहां ड्राइंगरूम और बेडरूम के बीच कोई सीमा रेखा नहीं थी.

    उनका उपन्यास 'कोई तो' घर से ही शुरू हुआ. जब छोटी बेटी के विवाह की बात चली तो युवक ने कहा कि वह सिविल मैरिज करना चाहता है. विवाह हेतु जब न्यायालय बेटी को लेकर गए तो नए मूल्यों के प्रति पारम्परिक सड़ांध में जीने वाले समाज के व्यंग्यबाण मिले. और 'कोई तो' रचना फलीभूत हुई. उपन्यास ने प्रश्न छोड़ा कौन देगा नए मूल्य कोई तो देगा ही.

    यह भी पढ़ें- प्रेमचंद को समझने का प्रमाणिक सूत्र है पत्नी शिवरानी देवी की किताब 'प्रेमचंद घर में'

    उस समय 'आवारा मसीहा' की पांच पाण्डुलिपियां किसी संग्रहालय की वस्तु की तरह रखी हुई थीं. छठवीं संशोधित पाण्डुलिपि प्रेस को सौंपी गई थी. 'आवारा मसीहा' पर सतत श्रम प्रेरणा की वस्तु विषय ही नहीं है, बल्कि सुदूर बंगाल की भूमि के साहित्यिक अभिरूचि के लोगों के लिए चुनौती भी है क्योंकि वे आभार स्वरूप शरत पर इतनी सार्थक कृति नहीं दे सके.

    शरत चन्द्र की जीवनी 'आवारा मसीहा' को लिखने से पहले उन्होंने शरत को जानने के लिए उन सभी जगहों की यात्राएं की जहां-जहां से उनका संबंध रहा. बांग्ला भाषा सीखी और तमाम अध्ययन किया. जब यह जीवनी छप कर आई तो इसने धूम मचा दी.

    ‘आवारा मसीहा' के साथ साहित्य मनीषियों के बीच कम भेदभाव नहीं बरता गया. साहित्य अकादमी पुरस्कार से वंचित रखा गया. इसमें एक प्रगतिशील आलोचक का भी कोप था. पर 'आवारा मसीहा' के स्थान पर जिस पुस्तक को पुरस्कृत किया गया था, वह इस बात पर बहस की मांग करने लगी है कि क्या वह उत्कृष्ट कृति है?

    लेखक गंगाप्रसाद विमल ने उस पुस्तक पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वह कथ्य की दृष्टि से अच्छी रचना है, पर शिल्प सशक्त नहीं है. यह एक संयोग ही था कि साहित्य अकादमी पुरस्कार से वंचित विष्णु प्रभाकर बाद में साहित्य अकादमी पुरस्कार देने वाली कमेटी में रहे.

    कनॉट प्लेस का कॉफी हाउस विष्णु प्रभाकर के लिए काबा और काशी की तरह रहा. शाम ढलते ही मोहन सिंह पैलेस की सीढ़ियां चढ़ते अक्सर विष्णु प्रभाकर जी मुलाकत हो जाया करती थी. मानों वैष्णव देवी की चढ़ाई चढ़कर किसी पवित्र स्थल पर पहुंच रहे हों. सच तो यह है कि कॉफी हाउस ही ऐसा स्थल था जहां वे उन्मुक्त होकर बात करते थे.

    विष्णु प्रभाकर पर मेरे लिए लिखना भी कम दुष्कर काम नहीं है. यह सोचता रहा कि कहीं भावों का सौन्दर्य शब्दों में बिखर न जाए. मैं अपना उनके प्रति रिश्ता भी नहीं खोज सका. जीवन की तमाम उठा-पटक और नौकरियां छोड़ने के बाद जब प्रकाशन खोलने की सनक चढ़ी तो विष्णु प्रभाकर वहां भी सहयोगी बने.

    विष्णु प्रभाकर का सम्पूर्ण परिवार मध्यवर्ग के सयुंक्त परिवार के चरित्र का अनुयायी है. बहुत लम्बे समय बाद कुटुम्बजनों के चूल्हे अलग हुए पर सभी एकसाथ रहते थे. इसका लाभ बताते हुए विष्णु प्रभाकर ने कहा था कि परिवार का साथ होने की ताकत के अहसास ने बिना नौकरी के जीवन निर्वाह करा दिया.

    विष्णु प्रभाकर जी इस बात को बड़े फख्र के साथ कहते थे कि उन्होंने कभी भी व्यावसायिक लेखन नहीं किया. जबकि आज सृजनात्मक लेखन छोड़कर टी.वी., रेडियो और पत्रकारिता की ओर लेखक यह कहकर भाग रहा है कि यह आज की मांग है और इस भौतिक युग में पैसों की खातिर मांग के हिसाब से लिखना पड़ता है. पर विष्णु जी के सीमित साधनों का जीवन इस युग में एक प्रकाश स्तम्भ है, जहां व्यावसायिकता के समर्थन में दिये सारे तर्क सूर्य को दीपक दिखाने के मानिन्द हैं.

    आवारा शरत और विष्णु प्रभाकर के वैरागी मन में कुछ ज्यादा अन्तर मुझे नज़र नहीं आता है. शाब्दिक अर्थों पर भले ही भाषा विज्ञानी बहस करते नजर आएं. हिन्दी साहित्य की कोई भी विधा उनसे अछूती नहीं रही. हिन्दी साहित्य उनसे गौरवान्वित हुआ है.

    Writer Avdhesh Srivastava

    पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.