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माशूक, मोहब्बत, मिलन, बेवफाई..., क्या नहीं है 'दास्तान-ए-इश्क' में, 1000 शेरों भरा प्रेम का दस्तावेज

संजीव सराफ की पुस्तक 'हजार दास्तान-ए-इश्क' हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू भाषा में प्रकाशित की गई है.

संजीव सराफ की पुस्तक 'हजार दास्तान-ए-इश्क' हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू भाषा में प्रकाशित की गई है.

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Book Review: उर्दू भाषा और साहित्य को देवनागरी में प्रस्तुत करके इसे तमाम हिन्दुस्तानियों तक पहुंचाने वाले ‘रेख़्ता फाउंडेशन’ के प्रमुख संजीव सराफ़ का संकलन हज़ार दास्तान-ए-इश्क अब हिंदी में उपलब्ध है. यह किताब पहले ‘लॉन्ग लॉन्गिंग लॉस’ (Long Longing Loss) नाम से अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी. अब इसका हिंदी तर्जुमा बाजार में है.

शेर-शायरी और ग़ज़लों से मोहब्बत करने वाले लोगों के लिए यह पुस्तक एक नायाब तोहफा है. सही मायनों में इस किताब में आपको इनके नाम के मुताबिक इश्क की हजार दास्तान पढ़ने को मिलेंगी. शेरो-शायरी की दुनिया में संजीव सराफ़ का यह एकदम अनूठा प्रयोग है.

मोहब्बत शुरू होने से लेकर परवान चढ़ने तक इसके हज़ारों रूप समाने आते हैं. मोहब्बत के इन तमाम रूपों पर हमारे शायरों ने अपने-अपने समय में अपनी-अपनी तरह से पेश किया है. मोहब्बत के इन रूपों पर किताब की भूमिका में संजीव लिखते हैं- “मैं भी मोहब्बत की आग का ईंधन रहा हूं. मोहब्बत से जुड़े सारे हालात- चाहत, शादी, अलगाव और बेगानगी, मुझ पर भी गुजरे हैं, जिन्होंने मुझे खूब तोड़ा-फोड़ा है और इसीलिए मेरी तबीअत इश्किया शायरी के जज्बात और संवेदनात्मक कोमलता के अनुरूप हो गए है.”

यहां ध्यान देने वाली बात है कि संजीव साफ-साफ लिखते हैं- “मेरी तबीअत इश्किया शायरी के जज्बात और संवेदनात्मक कोमलता के अनुरूप हो गए है.” यानी जो इश्क-मोहब्बत की आग में तपा वह और अधिक संवेदनशील और कोमल हो गया. यही इश्क का असर है.

प्रवासी साहित्य के माध्यम से पूरी दुनिया हिंदी बोल रही है, हम घर बैठे दुनिया घूम रहे हैं- राहुल देव

किताब में संजीव सराफ़ ने इश्क की शायरी के कलेक्शन के साथ-साथ शे’र क्या होता है इसके बारे में तफ्सील से बताया है.

अब मोहब्बत के रंग-रूप
किताब का पहले चैप्टर है ‘मोहब्बत’. इसमें मोहब्बत से जुड़ तमाम पहलू जैसे- मोहब्बत छुपाई नहीं जा सकती, मोहब्बत आसान नहीं है, मोहब्बत कहां पाई जाती है, पहचानी कैसे जाए, मोहब्बत की यातनाएं, बदनामी और सबसे अहम टांग अड़ाने वालों को शामिल किया गया है.

“मोहब्बत क्या है” इस पर हमारे शायर क्या कहते हैं, बड़े ही खूबसूरत अंदाज में दिया गया है. मीर तक़ी मीर मोहब्बत को काफिरों का मजहब बताते हैं-

सख़्त काफ़िर था जिन ने पहले मीर
मजहब-ए-इश्क इख्तियार किया।

मिर्ज़ा ग़ालिब मोहब्बत को काल्पनिक बताते हैं-

बुलबुल के कारोबार पे है ख़न्द हा-ए-गुल
कहते हैं जिस को इश्क ख़लल है दिमाग का।

अब जब मोहब्बत हो गई है तो कितना भी जतन कर लो, छुपा नहीं सकते. कहते हैं न- इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपते.

इस पर हमीद जालंधरी साहब ने क्या खूब लिखा है-

सीने में राज-ए-इश्क छुपाया न जाएगा
ये आग वो है जिस को दबाया न जाएगा।

आरजू अखनवी मोहब्बत को खुश्बू बताते हुए लिखते हैं- ‘खिलना कहीं छुपा भी है चाहत के फूल का, ली घर में सांस और गली तक महक गई.

ये बात तो सोलह आने सच है कि मोहब्बत का सफर आसान तो कतई नहीं है. जिगर मुरादाबादी का इस पर शेर मोहब्बत करने वालों की जुबान पर रहता है-

ये इश्क नहीं आसां इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।

शायरों के अलावा किताब में हिंदी और अंग्रेजी में मोहब्बत या इससे जुड़े अहसासों को लेकर जो कविता या लाइनें कही गई हैं उनका भी उल्लेख किया गया है. जैसे- जूल्स रेनार्ड ने मोहब्बत के बारे में कहा है- मोहब्बत एक रेत घड़ी की तरह है जिसमें दिल के भरने के साथ-साथ दिमाग खाली होता जाता है. नरेश कुमार शाद इश्क को दिल की रौशनी कहते हैं- “अक्ल से सिर्फ जेहन रौशन था, इश्क ने दिल में रौशनी की है.”

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यहां ख़लील जिब्रान का यह कोट भी प्रमुखता से लिया गया है- मोहब्बत के बिना जिंदगी एक पेड़ की तरह है जिस पर कोई फूल नहीं लगता, कोई फल नहीं आता.

बुत या सनम
किताब का अगला चैप्टर है इश्क के प्रतीक. यहां संजीव सराफ़ लिखते हैं- बुत या सनम (मूर्ति) उर्दू इश्किया शायरी में एक अहम किरदार है जिसका इस्तेमाल माशूक के लिए होता है. इस्लाम में बुत-परस्ती को हराम माना गया है, लेकिन शायरों ने माशूक को बुत की तरह पूजकर इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है.

शाह नसीर कहते हैं कि इश्क का मजहब से कोई मतलब नहीं है- काबे से गरज़ उसको न बुत खाने से मत्लब, आशिक जो तिरा है न इधर का न उधर का.

जोशिश अजीमाबादी ने इस पर क्या खूब लिखा है- “भूल जाता हूं मैं ख़ुदाई को, उस से जब राम-राम होती है.

ज्यों-ज्यों किताब के पन्ने पलटते जाते हैं, मानो मोहब्बत का ख़जाना खुलता-सा चला जाता है. यहां संजीव सराफ़ की रिसर्च की दाद देनी होगी जिन्होंने शायरी के अथाह सागर से एक-एक शे’र को बहुत ही नफ़ासत से चुना और फिर उसे तराश कर बड़े ही करीने से किताब की शक्ल में पेश किया है. जिन शायरों, लेखकों को लोग भूल चुके हैं, इस किताब में टहलते हुए वे अचानक सामने आते हैं तो पाठक अचंभे में आ ही जाता है. कह सकते हैं कि भूले-बिसरे शायरों और उनके कलामों को याद करने की बड़ी ही खूबसूरत कोशिश है.

खास बात ये है कि लेखक ने कठिन शब्दों का अर्थ भी हर शेर के साथ में दिया है और किसी शायर या किसी रचना से जुड़ी रोचक जानकारी को भी दिया है. जैसे- पंडित दया शंकर नसीम लखनवी के शेर का जिक्र किताब में किया गया है-

लाए उस बुत को इल्तिजा कर के
क्रुफ्र टुटा ख़ुदा-ख़ुदा करके

(इल्तिजा- अनुरोध, कुफ्र- अधर्म)
इस शेर का मतलब समझाते हुए लिखा गया है- इस शेर में शायर कहता है कि उसने ख़ुदा से मिन्नतें कीं ताकि उसे उसका सनम मिल जाए और इस तरह फिर से शायर मुसलमान बन गया. यानी अब वह एक ही वक्त में काफिर भी है और मुसलमान भी. इस तरह कई रोचक किस्से किताब में आपको जगह-जगह मिलेंगे.

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किताब के एक चैप्टर है ‘दिल’. लेखक ने दिल की बहुत ही खूब परिभाषा दी है. दिल क्या है में वे लिखते हैं- मोहब्बत को उगने के लिए एक उपाजऊ जमीन की जरूरत होती है और दिल इसके लिए वो जमीन उपलब्ध कराता है. ये दिल है जो उत्साह और खुशी महसूस करता हैल और टूटा और छला हुआ भी.

यहां मोहम्मद रफ़ीअ सौदा का बड़ा ही शानदार शेर दिया हुआ है-
आदम का जिस्म जब कि अनासिर से मिल बना
कुछ आग बच रही थी सो आशिक का दिल बना
(अनासिर- तत्व)

लाला मौजी राम मौजी दिल को एक आईना बताते हुए लिखते हैं- “दिल के आइने में है तस्वीर-ए-यार, जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ली.

दिल के बाद प्रेमिका
सामने प्रेमिका हो तो दिल मोहब्बत के लिए धड़केगा ही. प्रेमिका चैप्टर में उसका नख से शिख तक वर्णन किया गया है. जैसे- माशूक की जवानी, उसकी चाल-ढाल, माशूका का बदन, उसकी मुस्कुराहट, माशूका के गाल, जुल्फ, चाल, सादगी, नज़ाकत और लज्जा.

अकबर इलाहाबादी के एक शेर का यहां जिक्र किया गया है- “इलाही कैसी कैसी सूरतें तू ने बनाई हैं, कि हर सूरत कलेजे से लगा लेने के काबिल है.

अकबर इलाहाबादी जहां हर सूरज को कलेजे से लगाने की बात करते हैं तो जफ़र इकबाल अपने शब्दों में सावधान करते हैं-
उसके आते ही निगाहों को झुका लो वर्ना
देख लोगे तो लिपटने को भी जी चाहेगा।

खुद को यहीं रोकना होगा…नहीं तो किताब का हर शेर जिक्र करने लायक है. यूं कहें कि भले ही किसी भोली सूरत को देखकर आपको मोहब्बत न हुई हो, लेकिन इतना जरूर है कि किताब के पन्नों समाए हर शेर से आपको मोहब्बत जरूर हो जाएगी. और जब मोहब्बत होगी तो उसका अंजाम भी कुछ इस तरह का होगा-

भला आदमी था प नादान निकला
सुना है किसी से मोहब्बत करे है
– कलीम आजिज

किताब को समझने के लिए इसका पढ़ना जरूरी है. क्योंकि इसमें जो लिखा गया है और जो दर्ज किया गया है, उसे किसी भी हद तक जाकर बयान नहीं किया जा सकता है. बस क़तील शिफ़ाई के एक शेर के साथ आपको छोड़ चलते हैं-
चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी
वगरना हम ज़माने को समझाने कहां जाते।

संजीव सराफ की पुस्तक उर्दू के महान शायरों की चुनिंदा रचनाओं का एक शानदार संग्रह है.

संजीव सराफ़
यहां संजीव सराफ़ के बारे में जिक्र करना जरूरी है. रेख्ता फाउंडेशन तो हर पढ़ने-पढ़ाने वालों की जुवान पर है ही, संजीव सराफ उसी रेख्ता फाउंडेशन के कर्ता-धर्ता हैं. संजीव एक बड़े उद्योगपति हैं, पूंजी निवेशक और सामाजिक उद्यमी हैं. दुनियाभर में मशहूर बहुराष्ट्रीय कंपनी पॉलीप्लेक्स कॉरपोरेशन की नींव संजीव सराफ ने ही रखी है. उन्होंने सिंधिया स्कूल और फिर आईआईटी खड़गपुर से तालीम हासिल की है. उद्योग जगत की दुनिया में एक मुकाम स्थापित करने वाले संजीव की साहित्य खासकर उर्दू साहित्य में भी खासी रुचि है. उर्दू को देवनागरी में प्रस्तुत करके उर्दू भाषा और साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने और लोकप्रिय बनाने में वह अहम भूमिका निभा रहे हैं. उन्हें उर्दू शायरी से गहरा भावनात्मक लगाव है और इसके लिए उन्होंने उर्दू भी सीखी है.

पुस्तक- हज़ार दास्तान-ए-इश्क
संकलन- संजीव सराफ
प्रकाशक- रेख्ता बुक्स
मूल्य- 399 रुपये

Tags: Books, Hindi Literature, Hindi poetry, Literature, Poet

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