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इंतजार हुसैन का प्रसिद्ध उपन्यास बस्ती: यह हवाई हमले का सायरन है; बाहर मत निकलो, बैठे रहो

 इंताजर हुसैन के चर्चित उपन्यास 'बस्ती' का हिंदी अनुवाद राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है.

इंताजर हुसैन के चर्चित उपन्यास 'बस्ती' का हिंदी अनुवाद राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है.

उर्दू के मशहूर उपन्यासकार, कहानीकार और आलोचक इंतिज़ार हुसैन की आज जयंती है. इंतजार हुसैन का जन्म 7 दिसंबर, 1923 को बुलं ...अधिक पढ़ें

इंतजार हुसैन उर्दू लेखक थे. उन्होंने लघु कथाएं लिखीं, कविताएं रचीं और डॉन तथा डेली एक्सप्रेस जैसे अखबारों में कॉलम लिखे. उन्हें पाकिस्तान सहित कई देशों ने प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया. साहित्य अकादमी ने उन्हें प्रेमचंद फेलोशिप से भी सम्मानित किया था. इंताजर हुसैन का सबसे चर्चित उपन्यास है ‘बस्ती’. इसका कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. हिंदी में यह उपन्यास राजकमल प्रकाशन से छपकर आया है. ‘बस्ती’ उपन्यास की कहानी 1971 के युद्ध की पृष्ठभूमि पर लिखी गई है. कहानी का नायक देश की आजादी के समय हुए कत्लेआम का चश्मदीद रह चुका है. इस समय वह भारत छोड़कर पाकिस्तान में बस चुका है. प्रस्तुत है इस उपन्यास का एक अंश-

मोटरें, टैक्सियां, रिक्शे, तांगे—सब सवारियां इतनी जल्दी में थीं कि एक-दूसरे पर चढ़ी जा रही थीं. उसे सड़क पार करना कठिन नजर आ रहा था. सवारियों को देखा. अचानक एक कार, जिसकी पुश्त पर ‘क्रश इंडिया’ लिखा हुआ था, सवारियों से भरी, सामान से लदी फर्राटे के साथ उसके बराबर से गुजरी चली गई. कार की पुश्त पर लिखा हुआ नारा ज़रा देर के लिए उसकी नजरों के सामने आया और फिर उड़ती गर्द में धुंधला गया. कार बहुत तेजी में थी कि सड़क से उतरकर कच्चे में आई और गर्द उड़ाती उड़ी चली गई.

उसने गुजरते ट्रैफिक का अब विस्तार से जायजा लिया. कारें और टैक्सियां अपनी चमक-दमक खो बैठी थीं. उनके ढांचों पर मिट्टी लिपी हुई थी. हर कार, हर टैक्सी सवारियों से भरी हुई, सामान से लदी हुई. तांगों में सामान और सवारियां एक-दूसरे में गडमड थीं. या अल्लाह! ये लोग कहां जा रहे हैं? अपनी इस हैरानी का जिक्र उसने शीराज़ पहुंचकर इरफान से किया.

“यार! आज हमारी सड़क पर बहुत ट्रैफिक था. सड़क पार करना मुश्किल हो गया. लोग आख़िर कहां जा रहे हैं?”
“तुमने सिर्फ सड़क का ट्रैफिक देखा है. मैं अभी स्टेशन का नक्शा देख के आ रहा हूं.”
“वह नक्शा भी बता दो.”
“मत पूछो. प्लेटफार्म पर इतना मुसाफ़िर है कि वहां सांस लेना मुश्किल है और गाड़ी कोई नहीं आ रही. बस, कयामत का समां है.”
“और यहां शीराज़ खाली पड़ा है,” उसने इर्द-गिर्द नजर डालते हुए कहा. आज शीराज़ बिलकुल ही खाली था. वह और इरफान—बस दो जने एक मेज के गिर्द बैठे थे.

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“यार, आज वह अपना दोस्त सफेद बालों वाला भी नहीं आया.”
अचानक दरवाजा खुला और अफजाल दाखिल हुआ. इर्द-गिर्द नजर डाली. “खाली?”
“खाली.” उसने बुझे लहजे में जवाब दिया.
“चूहे कहां चले गए?”
“तुम्हारी बांसुरी का इन्तजार कर-करके इतने फ्रस्टेट हुए कि खुद ही समुंदर की तरफ चले गए.” इरफान ने व्यंग्यपूर्ण लहजे में जवाब दिया.

अफजाल ने घूरकर इरफान को देखा. कुरसी घसीटकर बैठते हुए बोला, “बदनुमा आदमी! चाय मंगा.”
“अब्दुल!” इरफान ने आवाज दी.
अब्दुल जैसे ऑर्डर का ही इन्तजार कर रहा था, फौरन लपककर आया,
“हां जी!”
“चाय.”

अफजाल सोचते हुए बोला, “यार, परिंदे बहुत परेशान हैं. मैं अभी-अभी रावी की तरफ से आ रहा हूं. जब जहाज आते हैं तो आसपास के बागों से परिंदे हवास खोकर उड़ते हैं, बेमानी तौर पर आसमान में चक्कर काटते हैं और गरीब फिर पेड़ों में छुप जाते हैं.” रुका, बड़बड़ाया, “इस नगर के परिंदे परेशान हैं.”
“और तुम?” इरफान ने उसे घूरकर देखा.
“मैं भी परेशान हूं.”
“तुम्हें पता नहीं कि जो परेशान हैं, वे शहर छोड़कर जा रहे हैं.”

अफजाल सोच में पड़ गया. फिर कहने लगा, “एक मुसाफिर ने किसी जंगल से गुजरते-गुजरते देखा कि एक चन्दन के पेड़ में आग लगी हुई है. शाखों पे बैठे हुए परिंदे उड़ चुके हैं, मगर एक राजहंस शाख पे जमा बैठा है. मुसाफिर ने पूछा कि ऐ राजहंस! क्या तू देख नहीं रहा कि चन्दन में आग लगी हुई है? फिर तू यहां से उड़ता क्यों नहीं? क्या तुझे अपनी जान प्यारी नहीं? हंस बोला कि ऐ मुसाफिर! मैंने इस चन्दन की छांव में बहुत सुख पाया है. क्या यह अच्छा लगता है कि अब जब कि वह दुख में है, मैं इसे छोड़के चला जाऊं?”

अफजाल चुप हो गया. फिर बोला, “जानते हो, वह कौन था? शाक्य मुनि ने जातक कथा सुनाई. भिक्षुओं को देखा और कहा कि हे भिक्षुओ! जानते हो वह राजहंस कौन था? वह राजहंस मैं था.”

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“अच्छा!” इरफान व्यंग्य-भरे लहजे में बोला, “मैं भी तुमसे इसी तरह के ऐलान की उम्मीद कर रहा था.”
अफजाल इरफान का मुंह तकने लगा. फिर बोला, “तू ठीक कहता है, बिलकुल ठीक. वह राजहंस मैं था.”
वह उठ खड़ा हुआ. दरवाजे तक गया, मगर कुछ सोचकर फिर पलटा. इरफान के करीब आया, बोला, “बुद्ध भी सच्चा था, मैं भी सच्चा हूं. असल में पिछले जनम में हम दोनों एक थे.”

अफजाल पलटकर जाने लगा था कि अब्दुल चाय लेकर आ गया. इरफान बोला, “चाय आ गई है.”
अफजाल ने इरफान को दया की नजर से देखा. “इरफान, तू अच्छा आदमी है.”
अफजाल बैठ गया. इरफान ने चाय बनाई. अफजाल चाय पीते-पीते बोला, “यार, जो कुछ हुआ अच्छा हुआ.”
“क्या अच्छा हुआ?”

यही कि बदनुमा लोग शहर छोड़ रहे हैं. शीराज़ आज कितना पाकीजा नजर आ रहा है!” रुका, और बोला, “यार, मैंने बहुत सोचा. आखिर इस नतीजे पे पहुंचा कि वे लोग जो समझदार हैं, इस मुल्क को बचा सकते हैं.”
“वे कहां हैं?” इरफान ने अपने खास व्यंग्यपूर्ण लहजे में पूछा.
“कहां हैं? काके, तुझे वो नजर नहीं आते. मैं और तुम दोनों. यार, तीन बहुत होते हैं.” फिर जेब से नोटबुक निकाली, कलम खोली, नोटबुक खोलकर कुछ लिखते हुए बोला, “इरफान! मैंने तुझे माफ कर दिया. समझदार लोगों की फेहरिस्त में तेरा नाम शामिल कर लिया है.”

फिर बड़बड़ाया, “मेरी नोटबुक में समझदार लोगों की फेहरिस्त दिनों-दिन छोटी होती चली जा रही है.”

अचानक सायरन बजने लगा. उसके साथ ही सीटियां तेज-तेज बजने लगीं. अफजाल उठ खड़ा हुआ, “मुझे चलना चाहिए.”
“यह हवाई हमले का सायरन है. बाहर मत निकलो, बैठे रहो.”
“जाकिर! तू बहुत डरा हुआ है.” रुका, फिर बोला, “काका, मत डर. आज दाता से मेरी बात हो गई है. मैंने कहा कि दाता, मैं तेरे शहर को अपनी पनाह में ले लूं? कहा कि ले ले. सो यह शहर अब मेरी पनाह में है. इसे कुछ नहीं होगा.” यह कहते-कहते वह उठा और बाहर निकल गया.

बस इसी तरह रात और दिन में अन्तर किए बिना, थोड़ी-थोड़ी देर बाद सायरन बोलता, सायरन के साथ सीटियां बजतीं. ट्रैफिक के सिपाही और सिविल डिफेस के रजाकार हर सड़क पर सीटियां बजाकर और इशारे करके हिदायतें देते नजर आते. सड़क-सड़क सवारियों की रफ़्तार अचानक तेज हो जाती, फिर धीमी पड़ती चली जाती कि वे सड़क से उतरकर पेड़ों के साए में ठिकाने बनाती चली जातीं. धीरे-धीरे सड़कें खाली हो जातीं और सिर्फ ट्रैफिक के सिपाही और रजाकार सीटियां मुंह में दबाए जहां-तहां खड़े दिखाई देते. एक किनारे से दूसरे किनारे तक सड़क खाली. किनारे-किनारे खड़ी हुई मोटरों, रिक्शाओं, टैक्सियों और स्कूटरों की लम्बी कतार. ट्रैफिक का सारा शोर, शहर की सारी आवाजें बन्द. चारों तरफ ठहराव और खामोशी. तेजी से गुजरती हुई कोई जीप इस ठहराव और खामोशी को तोड़ने की कोशिश करती, मगर वह दम-के-दम में ओझल हो जाती. इसके बाद खामोशी और उमड़ आती, ठहराव और गहरा हो जाता. और वह कभी किसी सड़क के किनारे पेड़ के सहारे बैठकर, कभी पेड़ों के पीछे किसी खाई में अजनबी राहगीरों के बीच पसरकर, कभी शीराज़ के किसी कोने में दुबककर कान खड़े करता. इस अन्देशे के साथ कि अभी एक अजीब शोर उठेगा और फिज़ा का ठहराव बिखर जाएगा. मगर न कोई शोर सुनाई देता, न कोई बड़ा धमाका, न कोई ऊंची आवाज. बस, दूर से आती एक मद्धम घूं-घूं. इसके बाद फिर एकदम खामोशी.

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और फिर सायरन बोलता कि अब उसके बोलने के साथ छुपे हुए लोग कोनों-खूदरों से निकलते और रिक्शाएं, स्कूटर, मोटरें, टैक्सियां एक दम से पूरे शोर के साथ चल पड़तीं. अभी फिज़ा पुरशोर है और ट्रैफिक रवां-दवां है और अभी फिर सायरन बोलने लगा. फिर वही सीटियां, फिर वही छुपते हुए लोग और थमी हुई सवारियां और फैलती हुई खामोशी. दिन में कितनी बार यह अमल दोहराया जाता. मगर शाम होने पर सायरन दूसरे रंग से बजता कि उसके साथ सवारियों की रफ़्तार में और पैदल चलने वालों की चाल में अचानक एक गति पैदा हो जाती. रुकने की बजाय हर सवारी बेतहाशा दौड़ रही है और हर पैदल चलने वाला भागम-भाग चला जा रहा है. मगर धीरे-धीरे शोर दूर होता चला जाता. खामोशी शाम के धुंधलके के साथ फैलती चली जाती और रात के फैलते साए के साथ मिलकर पूरे शहर पर छा जाती. इस खामोशी से फायदा उठाकर कुत्ते रात शुरू होते ही भौंकना शुरू कर देते. बस फिर लगता कि रात बहुत गुज़र चुकी है. इतनी जल्दी इतनी रात हो गई. मगर इसके बाद रात पड़ जाती और गुजरने का नाम न लेती.

फिर अचानक सायरन बोल पड़ता. फिर वही सीटियां. इसके साथ ही कुत्ते एक नई तेज़ी के साथ भौंकना शुरू कर देते. लगता कि सारे शहर के कुत्ते एकदम से झुरझुरी लेकर उठ खड़े हुए हैं. सीटियों और कुत्तों के भौंकने का शोर उसके दिल और दिमाग पर छाता चला जाता. बिस्तर में लेटे-लेटे उसे लगता कि सारी फिज़ा उस भद्दे शोर से भर गई है. करीब पलंग पर लेटे हुए अब्बाजान आहिस्ता से उठकर बैठ जाते और मुंह-ही-मुंह में कुछ पढ़ना शुरू कर देते. फिर अम्मी करवट लेतीं और उठकर बैठ जातीं.
“जाकिर बेटे! जाग रहे हो?”
“जी अम्मी.” और वह उठकर बैठ जाता.

और इसके बाद अम्मी दुआ के लिए दोनों हाथ उठातीं, “या इलाही! खैर.” अब्बाजान मुंह-ही-मुंह में अरबी में कुछ पढ़ते. कभी नादे-अली, कभी आयतुल-कुरसी. अम्मी ऊंची-काॉंपती आवाज में दुआ मांगतीं. जब से जंग शुरू हुई है अम्मी की इच्छा के अनुसार हम एक ही कमरे में सोते हैं. रात के अंधेरे में अपने-अपने पलंग पर बैठे हुए तीन साए. अब्बाजान आयतों का पाठ कर रहे हैं. अम्मी दुआ मांग रही हैं और मैं खतरे की इतनी रातें गुजारने के बाद भी अपने जहन को ऐसे वक़्त में मसरूफ रखने के लिए कोई सूरत नहीं सोच सका हूं.

सन्नाटे में कान कुछ सुनने की कोशिश कर रहे हैं. खामोशी की तहों से उभरती हुई एक आवाज, घूं-घूं-घूं. दिन में यह आवाज कितनी मद्धम होती है, मगर इस वक़्त यह आवाज कितनी तेज और कितनी भयानक है! अचानक कहीं दूर से धमाके की आवाज आई.
“ज़ाकिर!”
“जी!”
“बेटा! यह तो बम की-सी आवाज है.”
“जी.”
“कहां गिरा है?”

बम कहां गिरा है? शहर के मुख्तलिफ कूचे मेरे तसव्वुर में उभरते हैं. मैं अन्दाजा लगाने की कोशिश करता हूं कि धमाके की आवाज किस तरफ से आई थी और उस तरफ कौन-कौन-से मोहल्ले पड़ते हैं? अब्बाजान उसी लगन के साथ आयत का पाठ करने में मगन हैं और मेरा जहन शहर के मुख्तलिफ कूचों में भटक रहा है.

शामनगर में अचानक ठिठक जाता हूं और शामनगर का वह मकान जिसमें हमने पाकिस्तान आकर पड़ाव डाला था, मेरे तसव्वुर में उभर आता है. क्या यह बम वहां गिरा है? नहीं, उसे वहां नहीं गिरना चाहिए. मेरा उस मकान से कोई जज़्बाती लगाव नहीं है. बस, वहां से निकलते ही वह मकान मेरे दिलोदिमाग पर कोई नक़्श छोड़े बगैर याद से उतर गया था. मगर इस वक़्त अचानक वह मकान मेरे तसव्वुर में उभर आया है. वह कमरा मेरी आंखों में फिर रहा है, जिसमें मैंने पाकिस्तान आकर पहली रात बसर की थी. नहीं, बम उस इलाके में नहीं गिरना चाहिए. उस घर को महफूज रहना चाहिए, उस पूरे घर को और उस कमरे को कि वह पाकिस्तान में मेरी पहली रात के आंसुओं का गवाह है.

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