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जन्म के समय जावेद अख़्तर कान में उनके पिता ने पढ़ा कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र, जानें पूरा किस्सा

जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी, 1945 को ग्वालियर में हुआ था.

जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी, 1945 को ग्वालियर में हुआ था.

Javed Akhtar Birth Day: शायर और लेखक जावेद अख्तर का जितना योगदान फिल्मों में रहा है, साहित्य में उससे कम नहीं है. उनके ...अधिक पढ़ें

“सेना के एक अफसर के पूरे परिवार की हत्या कर दी जाती है. उसे कोर्ट मार्शल की सजा पा चुके दो जूनियर अफसर याद आते हैं. ये दोनों अफसर बदमाश हैं लेकिन बहादुर भी हैं. सेना का रिटायर अफसर अपने परिवार की हत्या का बदला लेने के अपने मिशन का जिम्मा इन्हीं दोनों को सौंपने का फैसला ले लेता है.”

दरअसल, यही आइडिया था जिस पर सलीम–जावेद की जोड़ी एक हिट फिल्म बनावाना चाहते थे. यही जावेद हैं जिन्हें जावेद अख्तर के नाम जाना-पहचाना जाता है. अनुपमा चोपड़ा की किताब ‘शोले- दि मेकिंग ऑफ ए क्लासिक’ में इसके बारे में बहुत विस्तार लिखा है. इसमें लिखा गया है कि सलीम-जावेद की जोड़ी ने चार लाइन की इस कहानी को मनमोहन देसाई, बलदेव पुष्करना, प्रकाश मेहरा और प्रेम सिंह को सुनाया. किसी ने तब्बजो नहीं दी. फिर वे जेपी सिप्पी के पास गए उन्होंने कहानी सुनी. रमेश सिप्पी उस वक्त 27 साल के थे और कहानी सुनाए जाने के समय अपने पिता के साथ थे.

किताब के मुताबिक पिता–पुत्र को कहानी कुछ इस कदर जंची की उन्होंने इसके लिए इन लेखकों को एक लाख रुपये की रकम दे दी. 1972 में एक लाख रुपये बड़ी रकम मानी जाती थी. कहानी तैयार हुई और फिल्म ‘शोले’ बन कर 1975 में आई. इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ ही दिए. तीन साल में फिल्म बन कर तैयार हुई थी. किताब में दर्ज है कि उस दौर में फिल्म के कुल 900 प्रिंट तैयार हुए थे. आज भी हिंदी सिनेमा देखने वालों से पूछा जाए तो बहुत ही कम दर्शक ऐसे मिलेंगे जिन्होंने ‘शोले’ फिल्म न देखी हो.

बीस से ज्यादा हिट और कुल 23 फिल्में साथ-साथ लिखने वाली सलीम-जावेद की जोड़ी बाद में टूट गई. उसके बाद भी जावेद अख्तर का फिल्मों के लिए लिखना जारी रहा. लेकिन साहित्य के क्षेत्र में उनकी पहचान और गहरी हुई. उनकी कई किताबें आईं और उन्हें सराहा भी गया.

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आज जावेद अख्तर का जन्मदिन है. जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी, 1945 को ग्वालियर में हुआ था. जावेद की माता सफिया अख़्तर भी अपने समय की मशहूर लेखिका रही हैं. बताते हैं कि सफिया अख्तर को ख़त लिखने का बहुत शौक था. जावेद अख्तर को बचपन में वह जादू कहकर पुकारती थीं. जावेद अख्तर का बचपन का नाम जादू था. इसके पीछे भी एक कहानी है- बताया जाता है जब जावेद अख्तर का जन्म हुआ तो उनके पिता अपने दोस्तों में चर्चा कर रहे थे कि बच्चे का नाम क्या रखा जाए. इस पर उनके किसी मित्र ने कहा कि आपने शादी के वक्त एक नज़्म लिखा थी और उसमें जादू शब्द का जिक्र किया गया था. बस वहीं से उनका नाम जादू हो गया. किसी को क्या पता था कि जिस नवजात का नाम जादू रखा गया है बड़ा होकर शब्दों का इतना महान जादूगर बन जाएगा. स्कूल में दाखिले के वक्त उनका नाम जादू से बदलकर जावेद किया गया.

कई बार बाप–दादा के गुणों को लेकर उसी क्षेत्र में नाम करने वाले के लिए कहा जाता है कि अमुक बात उसके खून में ही है तो जावेद अख्तर इसकी एक जोरदार मिसाल हैं. जावेद के पिता जां निशार अख्तर बेहद उम्दा शायर माने जाते हैं. प्रगतिशील लेखकों में उनका नाम बहुत ऊंचा है. ये उनका कमिटमेंट ही था कि उन्होंने नवजात जावेद के कान में कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो पढ़ दिया या रिवायती तौर पर कहा जाए तो कान में फूंक दिया था. इसकी कहानी कुछ ऐसे है कि नवजात बच्चे के कान में मुसलमान लोग अल्लाह का नाम या अजान फूंकते हैं. लेकिन जां निशार ने ये किया था. इस बाद का जिक्र खुद जावेद अख्तर ने एक इंटरव्यू में किया था.

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शायर के तौर पर जां निशार अख्तर को पसंद करने वालों का एक बड़ा वर्ग है जो उनकी शायरी को बहुत पसंद करता है. वैसे तो उनके बहुत सारे गीत फिल्मों में लिए गए हैं लेकिन उन्होंने गरीबों मजलूमों के लिए भी बहुत कुछ लिखा है –
“सारी दुनिया में गरीबों का लहू बहता है
हर ज़मीं मुझको मेरे खून से तर लगती है”

जावेद अख्तर के दादा की बात की जाए तो उनका नाम मुज़्तन ख़ैराबादी है. वे भी बहुत नामचीन शायर थे. कई जगह ये जिक्र है कि उन्हीं की एक रचना को बहादुर शाह जफर के नाम से बहुत प्रचारित किया जाता है. –
किसी की आंख का नूर हूं न किसी के दिल का क़रार हूं
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-गुब़ार हूं.
दरअसल, ये खैराबादी साहब की रचना है.

यही नहीं जावेद अख्तर के मामा मजाज़ को भी उर्दू साहित्य में बहुत ऊंचा मयार हांसिल है. उनका पूरा नाम असरारूल हक़ मजाज़ है लेकिन साहित्य जगत में मजाज़ के नाम से मशहूर हैं. और उससे ज्यादा उनके शेर लोगों की जुबान पर रहते हैं जैसे –
तेरे माथे पे ये आंचल, बहुत ही खूब है लेकिन,
तू इस आंचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।

Tags: Hindi Literature, Hindi Writer, Javed akhtar, Literature

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