Kabir Das Jayanti 2021: समय के साथ कबीर की प्रासंगिकता बढ़ी ही है

कबीर निरपेक्ष भाव से सत्य कहते हैं. वह यह विचार नहीं लाते कि उनके सत्य का किसे लाभ मिलेगा या किसे हानि.

कबीर की जो बात उन्हें सबसे ख़ास बनाती है वो ये कि विषय कोई भी हो, वे बिना किसी लाग-लपेट के खरे-खरे ढंग से अपनी बात रखते हैं.

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    पीयूष द्विवेदी
    हिंदी साहित्य की हजार वर्षों की परम्परा में सूरदास के अतिरिक्त कबीर और निराला ही ऐसे कवि नजर आते हैं, जो बिना कोई महाकाव्य लिखे भी महाकवि की प्रतिष्ठा रखते हैं. इनमें भी प्रासंगिकता की दृष्टि से विचार करने पर कबीर कहीं आगे नजर आते हैं.

    कबीर के जन्म और मृत्यु को लेकर अब भी एकदम निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने संवत 1456 में कबीर का जन्म और संवत 1575 में 120 साल की अवस्था में मृत्यु माना है. इस हिसाब से कबीर को गुजरे करीब साढ़े चार सौ वर्ष बीत चुके हैं. लेकिन कबीर की लोकप्रियता और प्रासंगिकता पर काल के इस बहाव का कोई प्रभाव दृष्टिगत नहीं होता बल्कि समय के साथ उनकी प्रासंगिकता बढ़ी ही है.

    कबीर की जन्म कथाएं
    कबीर के जन्म के संबंध में अनेक कथाएं मिलती हैं जिनमें से एक है कि स्वामी रामानंद ने अपने एक शिष्य की विधवा कन्या को भूलवश पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया, जिससे कबीर का जन्म हुआ. तब लोकलाज के मारे वह बालक को बाहर फेंक आई जहां से उन्हें नीरू नाम का जुलाहा अपने घर ले आया और उसी के घर कबीर की परवरिश हुई.

    कहते हैं कि बड़े होने पर कबीर रामानंद के शिष्य बने, तो वहीं मुसलामानों का मत है कि कबीर ने मुसलमान फ़क़ीर सूफी शेख तकी से दीक्षा ली थी. इन परस्पर विरोधी बातों के बीच सत्य यही है कि कबीर वैष्णवों के संसर्ग में भी रहे, सूफी संतों की संगती उन्होंने की और रहस्यवादी सिद्धों से भी कोई परहेज नहीं किया. लेकिन कबीर का जो व्यक्तित्व बना है, वो इन सभी सम्प्रदायों, मतों और पंथों की बातों से प्रभावित होते हुए भी स्वतंत्र और मौलिक है.

    बाह्य आडम्बरों पर चोट
    यूं तो कबीर की वर्तमान प्रासंगिकता के अनेक बिंदु हो सकते हैं. फिर चाहें बाह्य आडम्बरों पर उनकी चोट हो या जाति-धर्म का विरोध अथवा धर्म-मज़हब के नाम पर होने वाले भेदभाव का प्रतिवाद, कबीर की रचनाओं में मौजूद ऐसे अनेक विषय उनकी समकालीन प्रासंगिकता को बढ़ाते हैं. लेकिन कबीर की जो बात उन्हें सबसे ख़ास बनाती है वो ये कि विषय कोई भी हो, वे बिना किसी लाग-लपेट के खरे-खरे ढंग से अपनी बात रखते हैं.

    धार्मिक पाखंडों और बाह्य आडम्बरों की आलोचना करते समय वे यह नहीं देखते कि हिन्दू की बात हो रही या मुसलमान की, वे निरपेक्ष भाव से गलत को गलत कह जाते हैं. वे एक तरफ यदि ‘पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़’ कहके हिन्दुओं की मूर्तिपूजा पर तंज़ करते हैं, तो दूसरी ओर ‘काकर पाथर जोड़ के मस्जिद लिया बनाय, वा चढ़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय’ कहके इस्लाम के पाखण्ड पर कटाक्ष करने से भी नहीं चूकते.

    एकता लाने के लिए रचनाएं
    कबीर का दौर मुसलामानों के शासन का दौर था, लेकिन तब भी मुसलमानों की हिंसकता पर वे निर्भीक ढंग से चोट करते हुए कहते हैं, ‘दिन को रोजा रहत है, राति हनत है गाय, यहां खून वै वंदगी, क्यों कर खुशी खोदाय.’

    हिन्दू-मुसलमान दोनों को समझाते हुए वे कहते हैं, ‘हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना। आपस में दोउ लड़ी लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना.’ दरअसल कबीर के समय में जो समाज उनके सामने था, वो अनेक तरह बंटा हुआ था जिसमें एकता लाने के लिए वे इस तरह की रचनाएं गाते थे.

    निरपेक्ष भाव से सत्य
    कुल मिलाकर कहने का आशय यह है कि कबीर अपनी रचनाओं में चयनित विरोध और आलोचना की परिपाटी का अनुकरण नहीं करते. वे निरपेक्ष भाव से सत्य कहते हैं और यह विचार नहीं लाते कि उनके इस सत्य का किसे लाभ मिलेगा और किसे हानि होगी. वे नसीहत भी हिन्दू-मुसलमान दोनों को देते हैं.

    वास्तव में, सत्य कहने का आदर्श ढंग यही है. लेकिन यह दुखद है कि कबीर की साखियां गाने वाले इस देश में आज में चयनित विरोध और आलोचना की एक परिपाटी ही चल पड़ी है.

    कबीर अशिक्षित थे, लेकिन निरपेक्ष भाव से सत्य कहने के ढंग ने उनकी बौद्धिक चेतना को आज के कथित बुद्धिजीवियों से कहीं ऊपर प्रतिष्ठित कर दिया है. यदि वे मुसलामानों के शासन से घबराकर उनकी आलोचना से पीछे हट जाते और केवल हिन्दुओं की आलोचना करते तो क्या उनकी रचनाओं में अभी जैसी बात आ पाती और क्या उन्हें आज जैसी प्रतिष्ठा ही प्राप्त होती ? यक़ीनन नहीं. लेकिन कबीर ने चयनित विरोध का मार्ग नहीं चुना और उनके निरपेक्ष चिंतन से जो भी उन्हें सही-गलत लगा उन्होंने निर्भीक भाव से कहा, यही कारण है कि आज शताब्दियां गुजरने के बाद भी वे कालजयी बने हुए हैं.

    Piyush Dwivedi

    (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

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