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अगर मुझसे मुलाक़ात करनी है तो मेरी किताबें पढ़ें और मुझे 'लास्ट पेज' में ढूंढ़ें- ख़्वाजा अहमद अब्बास

अगर मुझसे मुलाक़ात करनी है तो मेरी किताबें पढ़ें और मुझे 'लास्ट पेज' में ढूंढ़ें- ख़्वाजा अहमद अब्बास

फिल्म निर्माता, लेखक, नाटककार, कथाकार और पत्रकार ख्वाजा अहमद अब्बास की आज 7 जून को 107वीं जयंती है.

फिल्म निर्माता, लेखक, नाटककार, कथाकार और पत्रकार ख्वाजा अहमद अब्बास की आज 7 जून को 107वीं जयंती है.

ख़्वाजा अहमद का कॉलम 'लास्ट पेज' (Last Page) पत्रकारिता के इतिहास में सबसे ज्यादा समय तक प्रकाशित होने वाला क़ॉलम है.

प्रसिद्ध फिल्म निर्माता, पटकथा लेखक, उपन्यासकार, नाटककार, कथाकार और पत्रकार ख्वाजा अहमद अब्बास (Khwaja Ahmad Abbas) की आज 7 जून को 107वीं जयंती है. के. ए. अब्‍बास (K. A. Abbas) के नाम से मशहूर ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास को धरती के लाल (Dharti Ke Lal), सात हिंदुस्तानी (Saat Hindustani), परदेसी, शहर और सपना और दो बूंद पानी जैसी पुरस्कार विजेता फिल्मों के निर्देशन के लिए जाना जाता है.

ख़्वाजा अहमद अब्बास का जन्म 7 जून, 1914 को हरियाणा के पानीपत में हुआ था. उनके पिता का नाम ग़ुलाम-उस-सिबतैन और माता का नाम मसरूर ख़ातून था. उन के दादा 'ख़्वाजा ग़ुलाम अब्बास' 1857 के विद्रोह के शहीदों में से एक थे. कहा जाता है कि उनके दादा पानीपत के पहले क्रांतिकारी थे, जिन्हें अंग्रेजों ने तोप से बांध कर शहीद किया था.

ख़्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा 'हाली मुस्लिम हाई स्कूल' से ली. यह स्कूल उनके परदादा, उर्दू शायर ख़्वाजा अल्ताफ़ हुसैन हाली ने स्थापित किया गया था. बाद में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बी.ए. (1933) और एल.एल.बी (1935) की पढ़ाई पूरी की.

सबसे लंबा क़ॉलम
पढ़ाई पूरी करने के बाद ख़्वाजा अहमद ने 'बॉम्बे क्रॉनिकल' (The Bombay Chronicle) में संवाददाता और फ़िल्म समीक्षक के रूप में काम किए. यहां उनका कॉलम 'लास्ट पेज' (Last Page) काफी मशहूर हुआ था. यह क़ॉलम 1935 से शुरू होकर 1947 तक चला. बाद में उन्होंने ‘ब्लिट्ज’ (Blitz) ज्वाइन किया और यहां भी उनका यह क़ॉलम चलता रहा. 'लास्ट पेज' उर्दू में 'आज़ाद कलम' नाम से प्रकाशित होता था. 'लास्ट पेज' (Last Page) पत्रकारिता के इतिहास में सबसे ज्यादा समय तक प्रकाशित होने वाला क़ॉलम है. यह क़ॉलम 1987 तक प्रकाशित होता रहा.

इप्टा आंदोलन
भारतीय जन नाट्य संघ-इप्टा (Indian People's Theatre Association) को बढ़ाने में अब्बास का अहम हाथ था. उन्होंने इप्टा (IPTA) के लिए कई नाटक लिखे और नाटकों का निर्देशन भी किया. उनके नाटक 'यह अमृता है', 'बारह बजकर पांच मिनिट', 'जुबैदा' और 'चौदह गोलियां' उनके मशूहर नाटक रहे हैं.

अमिताभ बच्चन को दिया मौका
पत्रकारिता के दौरान ही ख़्वाजा अहमद अब्बास ने फिल्मों की ओर रुख किया. पहले वे फिल्मों की कहानी लिखा करते थे. 1945 में उन्होंने अपनी ही फिल्म बनाई 'धरती के लाल'. यह फिल्म बंगाल के अकाल पर बनी और कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराही गई थी.

वरिष्ठ पत्रकार रेहान फ़ज़ल (Rehan Fazal) अपने एक लेख 'अगर ना होते अमिताभ के मामू जान ख़्वाजा अहमद अब्बास' में लिखते हैं कि हिंदी फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) को ख़्वाजा अहमद अब्बास ने ही अपनी फिल्म 'सात हिंदुस्तानी' में मौका दिया था. अमिताभ बच्चन उन्हें मामू कहा करते थे.

ख़्वाजा अहमद अब्बास ने अमिताभ बच्चने के साथ पहली मुलाकात का पूरा विवरण अपनी आत्मकथा, 'आई एम नॉट एन आईलैंड' में लिखा है-
"बैठिए. आपका नाम?"
"अमिताभ"(बच्चन नहीं)
"पढ़ाई?"
"दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए."
"आपने पहले कभी फ़िल्मों में काम किया है?"
"अभी तक किसी ने मुझे अपनी फ़िल्म में नहीं लिया."
"क्या वजह हो सकती है ?"
"उन सबने कहा कि मैं उनकी हीरोइनों के लिए कुछ ज़्यादा ही लंबा हूं."
"हमारे साथ ये दिक्कत नहीं है, क्योंकि हमारी फ़िल्म में कोई हीरोइन है ही नहीं. और अगर होती भी, तब भी मैं तुम्हें अपनी फ़िल्म में ले लेता."
"क्या मुझे आप अपनी फ़िल्म में ले रहे हैं? और वो भी बिना किसी टेस्ट के?"
"वो कई चीज़ों पर निर्भर करता है. पहले मैं तुम्हें कहानी सुनाऊंगा. फिर तुम्हारा रोल बताऊंगा. अगर तुम्हें ये पसंद आएगा, तब मैं तुम्हें बताउंगा कि मैं तुम्हें कितने पैसे दे सकूंगा."
इसके बाद अब्बास ने कहा कि पूरी फ़िल्म के लिए उसे सिर्फ़ पांच हज़ार रुपए मिलेंगे. वो थोड़ा झिझका, इसलिए अब्बास ने उससे पूछा, "क्या तुम इससे ज़्यादा कमा रहे हो?"
उसने जवाब दिया, "जी हां. मुझे कलकत्ता की एक फ़र्म में सोलह सौ रुपए मिल रहे थे. मैं वहां से इस्तीफ़ा दे कर यहां आया हूं."

ख़्वाजा अहमद अब्बास ने ग्रेट शोमैन राजकपूर के लिए सबसे ज्यादा फिल्में लिखीं. इनमें आवारा, श्री 420, जागते रहो, मेरा नाम जोकर और बॉबी शामिल हैं.

उन्होंने ‘नया संसार’ नाम से अपनी फ़िल्म कंपनी खोली और इसके बैनर तले चाय के बागानों में काम करने वाले श्रमिकों की दुर्दशा पर 'राही' (1953), अनहोनी (1952), शहर और सपना (1963), दो बूंद पानी (1971) जैसी फिल्में बनीं.

निर्देशक वी. शांताराम की चर्चित फिल्म 'डॉ. कोटनिस की अमर कहानी' अब्बास के अंग्रेजी उपन्यास 'एंड वन डिड नॉट कम बैक' पर आधारित थी. उन्होंने हिना (1991) की भी स्टोरी लिखी थी.

अब्बास ने 70 से भी ज्यादा किताबें लिखीं. उनका उपन्यास 'इंकलाब' दो खंडों में प्रकाशित हुआ. यह मजहबी हिंसा पर आधारित उपन्यास है.

अब्बास की वसीयत
ख़्वाजा अहमद अब्बास सही मायनों में एक सच्चे वतनपरस्त और सेक्युलर इंसान थे. उनकी मृत्यु मुंबई में 1 जून, 1987 को हुई थी. मृत्यु से पहले उन्होंने एक वसीयत भी लिखी थी.

अपनी वसीयत में उन्होंने लिखा था,'मेरा जनाजा यारों के कंधों पर जुहू बीच स्थित गांधी के स्मारक तक ले जाएं, लेजिम बैंड के साथ.अगर कोई खिराज-ए-अकीदत पेश करना चाहे और तकरीर करे तो उनमें सरदार जाफ़री जैसा धर्मनिरपेक्ष मुसलमान हो, पारसी करंजिया हों या कोई रौशनख्याल पादरी हो वगैरह.'

उन्होंने लिखा, 'जब मैं मर जाऊंगा तब भी मैं आपके बीच में रहूंगा. अगर मुझसे मुलाक़ात करनी है तो मेरी किताबें पढ़ें और मुझे मेरे 'आखिरी पन्नों', 'लास्ट पेज' में ढ़ूढ़ें, मेरी फिल्मों में खोजें. मैं और मेरी आत्मा इनमें है. इनके माध्यम से मैं आपके बीच, आपके पास रहूंगा, आप मुझे इनमें पाएंगे.'

Tags: Books, Film

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