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मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'कफ़न'

मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'कफ़न'

प्रेमचंद साहित्य के विद्वान शोधकर्ता डॉ. कमल किशोर गोयनका कहते हैं कि कहानी 'कफ़न' मृत्यु नहीं, जीवन की कहानी है.

प्रेमचंद साहित्य के विद्वान शोधकर्ता डॉ. कमल किशोर गोयनका कहते हैं कि कहानी 'कफ़न' मृत्यु नहीं, जीवन की कहानी है.

मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'कफ़न' बहुत ही मार्मिक और बहुस्तरीय कहानी है. 'कफ़न' सबसे अधिक चर्चित, विवादास्पद और लोकप्रिय कहानी भी है.

    मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) की कहानी 'कफ़न' (Kafan) बहुत ही मार्मिक और बहुस्तरीय कहानी है. 'कफ़न' कहानी सबसे अधिक चर्चित, विवादास्पद और लोकप्रिय कहानी भी है. इसमें गरीबी, बेबसी, संवेदना, अमानवीयता, निकम्मापन, आडंबर और सामाजिक आर्थिक संरचना का बहुत सुंदर चित्रण है. प्रेमचंद साहित्य के विद्वान शोधकर्ता डॉ. कमल किशोर गोयनका (Kamal Kishor Goyanka) कहते हैं कि कहानी 'कफ़न' मृत्यु नहीं, जीवन की कहानी है. इस कहानी का प्रकाशन दिसंबर, 1935 में हुआ था.

    कफ़न
    झोपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए हैं और अन्दर बेटे की जवान बीबी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी. रह-रहकर उसके मुंह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे. जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गांव अन्धकार में लय हो गया था.
    घीसू ने कहा—मालूम होता है, बचेगी नहीं. सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ.
    माधव चिढ़कर बोला—मरना ही तो है जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूं?
    ‘तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफाई!’
    ‘तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पांव पटकना नहीं देखा जाता.’

    घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता. माधव इतना काम-चोर था कि आध घंटे काम करता तो घंटे भर चिलम पीता. इसलिए उन्हें कहीं मज़दूरी नहीं मिलती थी. घर में मुट्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने की क़सम थी. जब दो-चार फाके हो जाते तो घीसू पेड़ पर चढ़कर लकड़ियां तोड़ लाता और माधव बाज़ार से बेच लाता और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते.

    गांव में काम की कमी न थी. किसानों का गांव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे. मगर इन दोनों को उसी वक़्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी सन्तोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता. अगर दोनों साधु होते, तो उन्हें सन्तोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिलकुल जरूरत न होती. यह तो इनकी प्रकृति थी.

    विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई सम्पत्ति नहीं. फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढांके हुए जिए जाते थे. संसार की चिन्ताओं से मुक्त क़र्ज़ से लदे हुए. गालियां भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई गम नहीं. दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ क़र्ज़ दे देते थे. मटर, आलू की फ़सल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भानकर खा लेते या दस-पांच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते.

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    घीसू ने इसी आकाश-वृत्ति से साठ साल की उम्र काट दी और माधव भी सपूत बेटे की तरह बाप ही के पद-चिह्नों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और भी उजागर कर रहा था.

    इस वक़्त भी दोनों अलाव के सामने बैठकर आलू भून रहे थे, जो कि किसी खेत से खोद लाए थे. घीसू की स्त्री का तो बहुत दिन हुए, देहान्त हो गया था. माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था. जब से यह औरत आई थी, उसने इस खानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बे-गैरतों का दोजख भरती रहती थी. जब से वह आई, यह दोनों और भी आरामतलब हो गए थे. बल्कि कुछ अकड़ने भी लगे थे. कोई कार्य करने को बुलाता, तो निर्ब्याज भाव से दुगुनी मज़दूरी माँगते. वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों इसी इन्तज़ार में थे कि वह मर जाए, तो आराम से सोएं.

    घीसू ने आलू निकालकर छीलते हुए कहा—जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या? यहां तो ओझा भी एक रुपया मांगता है!
    माधव को भय था, कि वह कोठरी में गया, तो घीसू आलुओं का बड़ा भाग साफ़ कर देगा. बोला—मुझे वहां जाते डर लगता है.
    ‘डर किस बात का है, मैं तो यहां हूं ही.’
    ‘तो तुम्हीं जाकर देखो न?’
    ‘मेरी औरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नहीं; और फिर मुझसे लजाएगी कि नहीं? जिसका कभी मुंह नहीं देखा, आज उसका उघड़ा हुआ बदन देखूं! उसे तन की सुध भी तो न होगी? मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पांव भी न पटक सकेगी!’
    ‘मैं सोचता हूं कोई बाल-बच्चा हुआ, तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में!’
    ‘सब कुछ आ जाएगा. भगवान दें तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वे ही कल बुलाकर रुपए देंगे. मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था; मगर भगवान् ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया.’

    जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी और किसानों के मुक़ाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज़्यादा सम्पन्न थे, वहां इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी. हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं ज़्यादा विचारवान था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाज़ों की कुत्सित मंडली में जा मिला था. हां, उसमें यह शक्ति न थी कि बैठकबाज़ों के नियम और नीति का पालन करता. इसलिए जहां उसकी मंडली के और लोग गांव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गांव उंगली उठाता था. फिर भी उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फ़ायदा तो नहीं उठाते!

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    दोनों आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे. कल से कुछ नहीं खाया था. इतना सब्र न था कि ठंडा हो जाने दें. कई बार दोनों की जबानें जल गईं. छिल जाने पर आलू का बाहरी हिस्सा जबान, हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुंह में रखने से ज़्यादा खैरियत इसी में थी कि वह अन्दर पहुंच जाए. वहां उसे ठंडा करने के लिए काफ़ी सामान थे. इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते. हालांकि इस कोशिश में उनकी आंखों से आंसू निकल आते.

    घीसू को उस वक़्त ठाकुर की बरात याद आई, जिसमें बीस साल पहले वह गया था. उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक बात थी, और आज भी उसकी याद ताज़ी थी, बोला—वह भोज नहीं भूलता. तब से फिर उस तरह का खाना और भरपेट नहीं मिला. लड़की वालों ने सबको भर पेट पूड़ियां खिलाई थीं, सबको! छोटे-बड़े सबने पूड़ियां खाईं और असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊं कि उस भोज में क्या स्वाद मिला, कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज़ चाहो, मांगो, जितना चाहो, खाओ. लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पिया गया. मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गर्म-गर्म, गोल-गोल सुवासित कचौड़ियां डाल देते हैं. मना करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल पर हाथ रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिए जाते हैं. और जब सबने मुंह धो लिया, तो पान-इलायची भी मिली. मगर मुझे पान लेने की कहां सुध थी? खड़ा हुआ न जाता था. चटपट जाकर अपने कम्बल पर लेट गया. ऐसा दिल-दरियाव था वह ठाकुर!

    माधव ने इन पदार्थों का मन-ही-मन मज़ा लेते हुए कहा—अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता.
    ‘अब कोई क्या खिलाएगा? वह ज़माना दूसरा था. अब तो सबको किफायत सूझती है. सादी-ब्याह में मत ख़र्च करो, क्रिया-कर्म में मत ख़र्च करो. पूछो, गरीबों का माल बटोर-बटोरकर कहां रखोगे? बटोरने में तो कमी नहीं है. हां, ख़र्च में किफायत सूझती है!’
    ‘तुमने एक बीस पूरियां खाई होंगी?’
    ‘बीस से ज़्यादा खाई थीं!’
    ‘मैं पचास खा जाता!’
    ‘पचास से कम मैंने न खाई होंगी. अच्छा पका था. तू तो मेरा आधा भी नहीं है.’

    आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियां ओढ़कर पांव पेट में डाले सो रहे. जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेंडुलिया मारे पड़े हों. और बुधिया अभी तक कराह रही थी.
    -
    सबेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठंडी हो गई थी. उसके मुंह पर मक्खियां भिनक रही थीं. पथराई हुई आंखें ऊपर टंगी हुई थीं. सारी देह धूल से लथपथ हो रही थी. उसके पेट में बच्चा मर गया था.
    माधव भागा हुआ घीसू के पास आया. फिर दोनों ज़ोर-ज़ोर से हाय-हाय करने और छाती पीटने लगे. पड़ोस वालों ने यह रोना-धोना सुना, तो दौड़े हुए आए और पुरानी मर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे.
    मगर ज़्यादा रोने-पीटने का अवसर न था. कफ़न की और लकड़ी की फ़िक्र करनी थी. घर में तो पैसा इस तरह ग़ायब था, जैसे चील के घोंसले में मांस?

    बाप-बेटे रोते हुए गांव के ज़मींदार के पास गए. वह इन दोनों की सूरत से नफ़रत करते थे. कई बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे. चोरी करने के लिए, वादे पर काम पर न आने के लिए. पूछा—क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है? अब तो तू कहीं दिखलाई भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गांव में रहना नहीं चाहता.

    घीसू ने ज़मीन पर सिर रखकर आंखों में आंसू भरे हुए कहा—सरकार! बड़ी विपत्ति में हूं. माधव की घरवाली रात को गुज़र गई. रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे. दवा-दारू जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा वह हमें दगा दे गई. अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रहा मालिक! तबाह हो गए. घर उजड़ गया. आपका गुलाम हूं, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगाएगा. हमारे हाथ में तो जो कुछ था, वह सब तो दवा-दारू में उठ गया. सरकार ही की दया होगी, तो उसकी मिट्टी उठेगी. आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊं.

    ज़मींदार साहब दयालु थे. मगर घीसू पर दया करना काले कम्बल पर रंग चढ़ाना था. जी में तो आया, कह दें, चल, दूर हो यहां से. यों तो बुलाने से भी नहीं आता, आज जब ग़रज़ पड़ी तो आकर ख़ुशामद कर रहा है. हरामखोर कहीं का, बदमाश! लेकिन यह क्रोध या दंड देने का अवसर न था. जी में कुढ़ते हुए दो रुपए निकालकर फेंक दिए. मगर सांत्वना का एक शब्द भी मुंह से न निकला. उसकी तरफ़ ताका तक नहीं. जैसे सिर का बोझ उतारा हो.

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    जब ज़मींदार साहब ने दो रुपए दिए, तो गांव के बनिए-महाजनों को इनकार का साहस कैसे होता? घीसू ज़मींदार के नाम का ढिंढोरा भी पीटना जानता था. किसी ने दो आने दिए, किसी ने चारे आने. एक घंटे में घीसू के पास पांच रुपए की अच्छी रक़म जमा हो गई. कहीं से अनाज मिल गया, कहीं से लकड़ी. और दोपहर को घीसू और माधव बाज़ार से कफ़न लाने चले. इधर लोग बांस-वांस काटने लगे.
    गांव की नर्मदिल स्त्रियां आ-आकर लाश देखती थीं और उसकी बेकसी पर दो बूंद आंसू गिराकर चली जाती थीं.
    -
    बाज़ार में पहुंचकर घीसू बोला—लकड़ी तो उसे जलाने-भर को मिल गई है, क्यों माधव!
    माधव बोला—हां, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिए.
    ‘तो चलो, कोई हलका-सा कफ़न ले लें.’
    ‘हां, और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी. रात को कफ़न कौन देखता है?’
    ‘कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढांकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए.’
    ‘कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है.’
    ‘और क्या रखा रहता है? यही पांच रुपए पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते.’

    दोनों एक-दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे. बाज़ार में इधर-उधर घूमते रहे. कभी इस बजाज की दुकान पर गए, कभी उसकी दुकान पर! तरह-तरह के कपड़े, रेशमी और सूती देखे, मगर कुछ जंचा नहीं. यहां तक कि शाम हो गई. तब दोनों न जाने किस दैवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुंचे. और जैसे किसी पूर्व निश्चित व्यवस्था से अन्दर चले गए. वहां ज़रा देर तक दोनों असमंजस में खड़े रहे. फिर घीसू ने गद्दी के सामने जाकर कहा—साहूजी, एक बोतल हमें भी देना.
    उसके बाद कुछ चिखौना आया, तली हुई मछली आई और दोनों बरामदे में बैठकर शान्तिपूर्वक पीने लगे. कई कुज्जियां ताबड़तोड़ पीने के बाद दोनों सरूर में आ गए.

    घीसू बोला—कफ़न लगाने से क्या मिलता? आख़िर जल ही तो जाता. कुछ बहू के साथ तो न जाता.
    माधव आसमान की तरफ़ देखकर बोला, मानों देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो—दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बांभनों को हज़ारों रुपए क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!
    ‘बड़े आदमियों के पास धन है, फूंके. हमारे पास फूंकने को क्या है?’
    ‘लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहां है?’
    घीसू हंसा—अबे, कह देंगे कि रुपए कमर से खिसक गए. बहुत ढूंढ़ा, मिले नहीं. लोगों को विश्वास न आएगा, लेकिन फिर वही रुपए देंगे.
    माधव भी हंसा—इस अनपेक्षित सौभाग्य पर. बोला—बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो ख़ूब खिला-पिलाकर!

    आधी बोतल से ज़्यादा उड़ गई. घीसू ने दो सेर पूड़ियां मंगाईं. चटनी, अचार, कलेजियां. शराबख़ाने के सामने ही दुकान थी. माधव लपककर दो पत्तलों में सारे सामान ले आया. पूरा डेढ़ रुपया ख़र्च हो गया. सिर्फ थोड़े से पैसे बच रहे. दोनों इस वक़्त इस शान में बैठे पूड़ियां खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो. न जवाबदेही का ख़ौफ़ था, न बदनामी की फ़िक्र. इन सब भावनाओं को उन्होंने बहुत पहले ही जीत लिया था.

    घीसू दार्शनिक भाव से बोला—हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न न होगा?
    माधव ने श्रद्धा से सिर झुकाकर तसदीक़ की—जरूर-से-जरूर होगा. भगवान्, तुम अंतर्यामी हो. उसे बैकुंठ ले जाना. हम दोनों हृदय से आशीर्वाद दे रहे हैं. आज जो भोजन मिला वह कभी उम्र-भर न मिला था.
    एक क्षण के बाद माधव के मन में एक शंका जागी. बोला—क्यों दादा, हम लोग भी एक-न-एक दिन वहां जाएंगे ही?
    घीसू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया. वह परलोक की बातें सोचकर इस आनन्द में बाधा न डालना चाहता था.
    ‘जो वहां हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नहीं दिया तो क्या कहोगे?’
    ‘कहेंगे तुम्हारा सिर!’
    ‘पूछेगी तो जरूर!’
    ‘तू कैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूं? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा!’
    माधव को विश्वास न आया. बोला—कौन देगा? रुपए तो तुमने चट कर दिए. वह तो मुझसे पूछेगी. उसकी मांग में तो सिंदुर मैंने डाला था.
    ‘कौन देगा, बताते क्यों नहीं?’
    ‘वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया. हां, अबकी रुपए हमारे हाथ न आएंगे.’

    ज्यों-ज्यों अंधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज़ होती थी, मधुशाला की रौनक भी बढ़ती जाती थी. कोई गाता था, कोई डींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपटा जाता था. कोई अपने दोस्त के मुंह में कुल्हड़ लगाए देता था.
    वहां के वातावरण में सरूर था, हवा में नशा. कितने तो यहां आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे. शराब से ज़्यादा यहां की हवा उन पर नशा करती थी. जीवन की बाधाएं यहां खींच लाती थीं और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं या मरते हैं. या न जीते हैं, न मरते हैं.

    premchand ki kahani

    और यह दोनों बाप-बेटे अब भी मजे ले-लेकर चुसकियां ले रहे थे. सबकी निगाहें इनकी ओर जमी हुई थीं. दोनों कितने भाग्य के बली हैं! पूरी बोतल बीच में है.

    भरपेट खाकर माधव ने बची हुई पूड़ियों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खड़ा इनकी ओर भूखी आंखों से देख रहा था. और देने के गौरव, आनन्द और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया.

    घीसू ने कहा—ले जा, ख़ूब खा और आशीर्वाद दे! जिसकी कमाई है, वह तो मर गई. मगर तेरा आशीर्वाद उसे जरूर पहुंचेगा. रोएं-रोएं से आशीर्वाद दो, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं!

    माधव ने फिर आसमान की तरफ़ देखकर कहा—वह बैकुंठ में जाएगी दादा, बैकुंठ की रानी बनेगी.
    घीसू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला—हां, बेटा बैकुंठ में जाएगी. किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं. मरते-मरते हमारी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गई. वह न बैकुंठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएंगे, जो गरीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मन्दिरों में जल चढ़ाते हैं?

    श्रद्धालुता का यह रंग तुरन्त ही बदल गया. अस्थिरता नशे की खासियत है. दु:ख और निराशा का दौरा हुआ.
    माधव बोला—मगर दादा, बेचारी ने ज़िन्दगी में बड़ा दु:ख भोगा. कितना दु:ख झेलकर मरी!
    वह आंखों पर हाथ रखकर रोने लगा. चीख़ें मार-मारकर.
    घीसू ने समझाया—क्यों रोता है बेटा, ख़ुश हो कि वह माया-जाल से मुक्त हो गई, जंजाल से छूट गई. बड़ी भाग्यवान थी, जो इतनी जल्द माया-मोह के बन्धन तोड़ दिए.

    और दोनों खड़े होकर गाने लगे—
    ‘ठगिनी क्यों नैना झमकावे! ठगिनी.’
    पियक्कड़ों की आंखें इनकी ओर लगी हुई थीं और यह दोनों अपने दिल में मस्त गाए जाते थे. फिर दोनों नाचने लगे. उछले भी, कूदे भी. गिरे भी, मटके भी. भाव भी बताए, अभिनय भी किए. और आख़िर नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़े.

    (साभार- राजकमल प्रकाशन)

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