पुस्तक समीक्षा: कुछ कहने का वक्त हो ग़र तो चुप रहना अय्यारी है!

सुरेन्द्र मोहन की कविताओं में समाज के दुख तक़लीफों के साथ-साथ एक बेहतर दुनिया की सोच भी दिखाई पड़ती है.

जनता दल (सेक्यूलर) के वरिष्ठ नेता सुरेन्द्र मोहन की ग़ज़लों और कविताओं का संग्रह-'चुप रहना अय्यारी है' संभावना प्रकाशन से छप कर आया है.

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    सुधांशु गुप्त

    जब आप राजनीति में रहते हुए कविताएं या ग़ज़लें लिखते हैं और साफ नियत से लिखते हैं तो पता चलता है कि आपकी समाज, राजनीति, समानता और लोकतंत्र के प्रति कितनी गहरी आस्था है. और यह आस्था कोई ढोंग नहीं है. संयोग से पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी, पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह कविता लिखने के शौकीन रहे. वाजपेयी की कविताओं में जहां आपको राष्ट्रवाद की विभिन्न छवियां दिखाई देंगी, वहीं विश्वनाथ प्रताप सिंह की कविताएं समाज में समानता और बराबरी की बात करती हैं. विश्वनाथ प्रताप सिंह की कविताओं में काव्यात्मकता और ईमानदारी कहीं अधिक दिखाई पड़ती है. देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कविताएं लिखते हैं.

    हाल ही में जनता दल (सेक्यूलर) के वरिष्ठ नेता सुरेन्द्र मोहन (Surendra Mohan) की ग़ज़लों और कविताओं का संग्रह-'चुप रहना अय्यारी है' (chup rahna ayyari hai), पढ़ने का अवसर मिला. इस किताब का संपादन नोमान शौक़ और गिरधर राठी ने किया.

    राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहने के बावजूद सुरेन्द्र मोहन की सादगी और राजनीतिक प्रतिबद्धता उनके सरोकारों को प्रदर्शित करती है. वह 19 महीने (1975-77) में नज़रबंद रहे. वह ऐसे विरले नेता थे जिन्होंने समता, धर्मनिरपेक्षता, विकेंद्रीकरण, सामाजिक न्याय, नागरिक अधिकार, मानवाधिकार, स्त्री अधिकारों के लिए जीवन भर संघर्ष किया. उन्होंने एक महत्वपूर्ण विचार के रूप में अहम मुद्दों, समस्याओं और चुनौतियों पर भी गंभीर लेखन किया.

    राजनीति में रहते हुए ही कोई राजनीति की विसंगतियों को करीब से देख सकता है. वह इन विसंगतियों पर तभी अच्छी ग़ज़लें और कविताएं लिख सकता है, जब उसने राजनीति को अपनी निजी जीवन के लक्ष्यों को पूरा करने का माध्यम ना बनाया हो.

    सुरेन्द्र मोहन 1978 से 1984 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे. लेकिन राजनीति में सक्रियता के दौरान ही उन्हें यह समझ आ गया था कि राजनीति में चुप रहने का कोई अर्थ नहीं है. तभी उन्होंने कहाः

    कुछ कहने का वक्त हो ग़र तो चुप रहना अय्यारी(धूर्तता) है
    अपनी अना (स्वाभिमान) से धोखा है और हक़ से भी गद्दारी है.

    उनकी कविताओं में समाज के दुख तक़लीफों के साथ-साथ एक बेहतर दुनिया की सोच भी दिखाई पड़ती है. वह आने वाली संभावित बाढ़ से भी चिंतित दिखाई पड़ते हैं और आत्ममुग्ध नेता किस तरह समाचार पत्रों में खुद को देखते हैं, देखना चाहते हैं, इसकी पीड़ा भी दिखाई देती है.

    एक ग़ज़ल में वह कहते हैः
    नदी बनी है बाढ़ गांव के सिर पर नाचेगी,
    बस्ती उससे बसती थी, अब वो उसमें ही डूबेगी,
    हत्या, दमन लूट का जालिम रस्ता अपनाकर,
    सत्ता कब तक जनता पर शासन कर पाएगी.

    सुरेन्द्र मोहन अपनी कविताओं और ग़ज़लों में एक तरफ राजनीतिक विकृतियों का विरोध अपनी नैतिक, सात्विक लेकिन मजबूत राजनीतिक कार्रवाइयों से तो करते ही थे, इसके साथ वह श्रेष्ठ मूल्यों की स्थापना भी अपनी काव्यधारा में करते दिखाई देते हैं. वह अपनी कविता में भी आदिवासियों और हाशिये पर जीवन जी रहे लोगों की भी पैरवा करते दिखाई पड़ते हैं. एक कविता में वह कहते हैं-

    अपने भूल गए हैं
    भूल गए कि जंगल ज़मीन पर
    आदिवासियों को हमने ही कानूनी अधिकार दिया.
    उन सीधे-सादे भोले लोगों को
    जो वे बहकाने में लगे हैं
    उन्हें विस्थापन, बेरोजगारी, भुखमरी
    का डर दिखा रहे हैं.

    वह बराबर अपनी कविताओं और ग़ज़लों में एक बेहतर दुनिया की कल्पना करते हैं. वह ग़म की रात को भी महसूस करते हैं और इस रात के ग़ुज़र जाने की उन्हें उम्मीद है. एक ग़ज़ल में वह कहते हैं-

    यारो गाओ गज़ल की ग़म की रात गुज़र जाए
    अश्कों का यह रेला पल भर को तो ठहर जाए.
    तुमने पूछा क्या ग़म है तो एक अभी कह दें
    ऐसी गहमा गहमी है कुछ कहा नहीं जाए.

    सुरेन्द्र मोहन के पास कहन की वि. और यह रेंज उन्होंने राजनीति को करीब से देखकर हासिल की है. बकौल गिरधर राठी, उनके काव्य संसार की रेंज काफी बड़ी है. निहायत निजी-पारिवारिक प्रीति और दुख की दो तीन रचनाओं समेत उनकी चिंता इस विराट देश के दलित, दमित, शोषित जन की, मजदूर किसान की, युवा पढ़ियों की है जो प्रायः छंदोबद्ध रचनाओं में दिखाई देती है.

    'चुप रहना अय्यारी है' पढ़कर आप जान सकते हैं कि चुप रहना कितना बड़ा अपराध है. इन कविताओं और ग़ज़लों को पढ़कर आप वाजपेयी और सिंह की कविताओं के भी भेद को भी समझ सकेंगे.

    किताबः चुप रहना अय्यारी है-सुरेन्द्र मोहन
    संपादनः नोमान शौक़ और गिरधर राठी
    प्रकाशकः संभावना प्रकाशन
    मूल्यः 150 रुपये

    Sudhanshu Gupt

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