दास्तान-ए-हिमालय: पहाड़ों को जानने और महसूस करने का अहम दस्तावेज

शेखर पाठक ने अपनी यात्राओं और लेखों के माध्यम से हिमालय, हिमालय का जीवन, हिमालय के लोग, हिमायल की समृद्धि और समस्याओं को बेहद मानवीय तरीके से प्रस्तुत किया है.

शेखर पाठक ने हर दशक में आयोजित अस्कोट-आराकोट अभियानों (1974-2014) में हिस्सेदारी के साथ भारतीय हिमालय के सभी प्रान्तों- नेपाल, भूटान तथा तिब्बत के अन्तर्वर्ती क्षेत्रों की दर्जनों अध्ययन यात्राएं की हैं.

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    'दास्तान-ए-हिमालय' (Dastan-E-Himalaya) के रूप में शेखर पाठक (Shekhar Pathak) ने उन लोगों के लिए एक ऐसा दस्तावेज प्रस्तुत किया है, जो सही मायनों में हिमालय को जानना और उसे महसूस करना चाहते हैं. हिमालय के बनने लेकर अब तक की यात्रा को जानने के लिए 'दास्तान-ए-हिमालय' में वे तमाम घटनाएं हैं, संस्कृति हैं, इतिहास है, संदर्भ हैं, वहां व्याप्त प्राकृतिक संपदा का ब्यौरा है जो किसी छात्र या नीति-निर्माता के लिए जरूरी होता है.

    शेखर पाठक ने कई दशकों के दौरान अपनी यात्राओं और लेखों के माध्यम से हिमालय, हिमालय का जीवन, हिमालय के लोग, हिमायल की समृद्धि और समस्याओं को बेहद मानवीय तरीके से प्रस्तुत किया है. रज़ा पुस्तक माला के तहत 'दास्तान-ए-हिमालय' को दो भागों में वाणी प्रकाशन (Vani Prakashan) ने प्रकाशित किया है.

    हिमालय (Himalaya) की खूबसूरती जहां सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करती है, तो यहां ऊंचाइयां ऋषि-मुनियों को शांति की खोज के लिए खींच लाती हैं. हमारे कवि-लेखकों को भी हिमालय नए-नए शब्द गढ़ने की प्रेरणा देता है.

    शेखर पाठक लिखते हैं, 'हिमालय महाकवि कालिदास का दो सागरों को जोड़ने वाला 'देवतात्मा' और पृथ्वी का मानदण्ड या अल्लामा इकबाल का 'फसीले-किश्वरे-हिन्दोस्तां' या जयशंकर प्रसाद का 'हिमाद्री तुंग श्रृंग' दरअसल, एक जीवित शरीर की रीढ़ है, जो सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदान से उत्तर को तरह-तरह के पर्वत रूपों में उठता चला जाता है.

    हिमालय कवि-चिंतक रबीन्द्रनाथ ठाकुर को भी प्रेरणा देता रहा. उन्होंने हिमालय के विविध क्षेत्रों की यात्राएं कीं. हिमालय में अपनी अनेक बेहतरीन कविताएं और कहानियां लिखीं.'

    लेखक कई जगहों पर हिमालय के आकूत दोहन पर भी चिंतित नजर आते हैं, 'इस पृथ्वी का सर्वोच्च और अत्यन्त पवित्र माना जाने वाला हिमालय पर्वत हमारी राजनीतिक अर्थव्यवस्था तथा विकास के अधूरे मॉडल द्वारा अपह्रत कर लिया गया है.'

    आप भी पढ़ें 'दास्तान-ए-हिमालय' भाग-एक के कुछ अंश-

    महान, ऊंचा, पुराण कथाओं और आज के भूराजनीतिक यथार्थ में दबदबे वाला हिमालय युवा और कमजोर पहाड़ है. इसके भीतर की बात अब भूगर्भवेत्ता जानने लगे हैं. हिमालय के धीरे-धीरे उठते चले जाने की प्रक्रिया आज भी जारी है और भारतीय प्लेट लगातार तिब्बती (यूरेशियाई) प्लेट को धक्का मार रही है. इससे न केवल हिमालय ऊपर उठ रहा है बल्कि अनेक बार इससे भूकम्प और भू-स्खलन भी जन्म लेते हैं.

    नदी का बचपन
    हिमालय की बर्फ़, चट्टान, और धरातल या ढाल के स्वरूप पर उसकी वनस्पतियों की रंगत निर्भर है और यही सब तालाबों तथा नदियों के मिज़ाज को बनाते और बताते हैं. टैथिस हिमालय में जब नदियां ग्लेशियरों से जन्म लेती हैं तो विश्वास नहीं होता है कि वे जन्मजात आत्मनिर्भर प्राकृतिक प्रणालियां हैं. यह क्षेत्र उन्हें आक्रामक नहीं बनने देता. यह हिमालयी नदी का बचपन है. यहीं सुन सकते हैं हम किसी नदी की किलकिलाहट या कि उसका तुतलाना.

    जैसे ही भूगर्भविदों का ‘सेण्ट्रल क्रिस्टलाइन’ क्षेत्र आता है तो चट्टानों तथा शिलाओं की चुनौती के कारण नदियां एकाएक युवा हो जाती हैं. ग़ुस्सैल तथा आक्रामक. पत्थर और पानी का यह रण हिमालय के आर-पार देखा जा सकता है. यह नदी की सबसे अधिक चुनौती भरी उम्र है. अनेक बार लुढ़कते पहाड़ नदी को रोकते हैं और उसे झील बना देना चाहते हैं, पर नदी झील होने से इनकार करती हुई या बन गयी झील को तोड़ते हुए आगे बढ़ जाती है.

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    नदी के इस ग़ुस्से को मनुष्य बाढ़ कहता है और पहाड़ द्वारा भूगर्भिक कारणों से टूटकर नदी को रोकने की कोशिश को भू-स्खलन. कुछ आगे नदियां व्यवस्थित होने लगती हैं और विभिन्न संगमों में अपनी सहायक नदियों से मिलती हैं और ऐसे स्थान अपने किनारों में रच जाती हैं, जहाँ मनुष्य बस सके और खेती कर सके. इन्हीं जगहों पर हिमालय की बसावटें विकसित हुईं. उत्तराखण्ड में तो इनको कहीं ‘सेरा’ और कहीं ‘बगड़’ कहते हैं.

    मैदानों में दरअसल, हम एक बूढ़ी नदी को देखते हैं, पस्त और पहाड़ों में स्थित अपने मायके की स्मृति में दुबलाई हुई. ऊपर से मनुष्य उसमें औद्योगिक और नगरीय कचरा डालता है. नहरें भी निकाल लेता है.

    यमुनोत्री में खनखनाती नदी को ताजमहल के पिछवाड़े देखकर विश्वास ही नहीं होता कि यह वही कालिन्दी है जिसका बचपन बर्फ़ तथा गर्म पानी के स्रोतों के बीच बीता है और पश्चिमी तिब्बत में स्थित राकसताल के एक कोने से जन्मी सतलुज जब हिमाचल-पंजाब में मनुष्य द्वारा बांध दी जाती है तो लगता है कि मनुष्य नदियों को भी दास बनाना चाहता है. गुरला मान्धाता पर्वत के पश्चिमी स्कन्द से निकली करनाली (जो महाकाली से मिलकर घाघरा बन जाती है और अयोध्या में सरयू कहलाती है), जिसने ताकलाकोट में उन्नीसवीं सदी में डोगरा सेनापति जोराबर सिंह की जीत तथा फिर हार और बीसवीं सदी में लाल सेना द्वारा किया गया मठों का ध्वंस देखा था, ही हमारे एकदम क़रीब के समय में अयोध्या में मस्जिद को टूटते हुए देख रही थी.

    दो ऐसी नदियां भी हैं, जो पुत्र मानी जाती हैं. भारतीय नदियों में ब्रह्मा के पुत्र के अलावा रंगित को पुरुष प्रवाह (नद) कहा जाता है. ब्रह्मपुत्र, जो मानसरोवर तथा कैलास पर्वत के बहुत क़रीब स्थित मायुम ला के पूर्व से जन्म लेती है और जिसका 11-10 हज़ार फीट की ऊंचाई पर बहता हुआ तिब्बती प्रवाह हालांकि असम में आकर नियन्त्रित होता है, पर जिसे अभी भी बांधा नहीं जा सका है. मनुष्य को ब्रह्मपुत्र के ऊपर पुल बनाने में ही हज़ारों साल लग गये. रंगित पश्चिम सिक्किम से जन्म लेकर तीस्ता में विलीन हो जाती है और तीस्ता स्वयं ब्रह्मपुत्र में.

    गंगा का तन्त्र इन सबमें सबसे बड़ा है और कई हिन्दुस्तानियों को आज भी विश्वास नहीं होता कि कालिदास के उज्जैन से जन्म ले रही शिप्रा अन्ततः यमुना के मार्फ़त गंगा में ही पहुंचती है, तो तिब्बत के पानी का बड़ा हिस्सा भी करनाली, कोसी तथा अरुण आदि के मार्फ़त इसमें आता है. यही रिश्ता पदमा या मेघना का हिमालय और हिमालय पार से है.

    मां तो हर नदी है
    गंगा के साथ जुड़ी मिथक गाथा उसे मां बना देती है हालांकि मां तो हर नदी है. मां से कम तो कोई नदी हो ही नहीं सकती, और मां के साथ ज़्यादती करने में मनुष्य माहिर है. गंगा माता के साथ हमने क्या है जो नहीं किया है? ग़नीमत है कि यह अब भी बहती है! हमारी चेतना इतनी तंग हो गयी है कि हम गोमुख से उत्तरकाशी तक ही पवित्रता ढूंढ पा रहे हैं.

    हर शिखर के कई चेहरे
    हिमालय के हर शिखर के कई चेहरे हैं, जिनके साथ पसरे ग्लेशियरों से तमाम नदियां जन्म लेती हैं. फिर नीचे उतरती हैं, मैदानों में पसरती हैं और सागर में विलीन हो जाती हैं. अंतत: मॉनसून, मेघ और बर्फ बनकर वे नदियां अपने बचपन में लौट आती हैं

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    हिमालय की विभिन्न समाज-संस्कृतियों ने अलग-अलग समय में जन्मे और अलग-अलग स्रोतों से आए मिथकों और धर्मों को आत्मसात् करने के प्रयास किया और अपने अलग लोक धर्म भी विकसित किए.

    हिमालय की तमाम लघु समाज-संस्कृतियां हैं, जो एक-दूसरे से अपरिचित होकर भी एक-दूसरे से अन्त: संबंधित हैं. इसी में उनके उत्सव, मेले, गीत, नृत्य संगीत उपकरण, सामाजिक प्रथाएं हैं. कहीं बहुपतित्व का प्रचलन है तो कहीं बहुपत्नित्व का. कहीं विधवा विवाह प्रचलित है तो कहीं यह असम्भव है.

    हिमालय के सौन्दर्य को सिर्फ मनुष्य ही महसूस कर सकता है. वे जीव-जन्तु जो यहां रहते हैं, वे इसकी वनस्पतियों का स्वाद जानते हैं. जो पक्षी इसके आर-पार उड़ान भरते हैं, वे इसकी ऊंचाई का अहसास रखते हैं. जो मछलियां इसकी जल प्रणालियों में मौजूद हैं, वे जानती हैं कि कौन से खनिज से उनका वास्ता पड़ रहा है. पर यहां के सौन्दर्य को महसूस करने की क्षमता सिर्फ मनुष्य को मिली है.

    हालांकि, यह मनुष्य ही है जो कई बार अपनी इस क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर पाता. तब वह मनुष्य नहीं रह पाता और अपने ही पहाड़ को रौंदने लगता है.

    अखरता है दोहराव
    दास्तान-ए-हिमालय को पढ़ते हुए एक बात बार-बार आपके सामने से होकर गुजरती है, वह है दोहराव. आपको कई विवरण बार-बार पढ़ने को मिलेंगे. हालांकि इस बारे में लेखक ने आभार में लिखा भी है, 'सभी आलेख पुराने रूप में ही हैं. कहीं-कहीं पर विभिन्न लेखों के दोहराव कम किए गए हैं, फिर भी अनेक जगह दोहराव लग सकता है.'

    पुस्तक- दास्तान-ए-हिमालय भाग-1
    लेखक- शेखर पाठक
    प्रकाशक- वाणी प्रकाशन
    मूल्य- 595 रुपये

    Shekhar Pathak

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