हर पल के शायर साहिर लुधियानवी का खोया हुआ प्यार

साहिर लुधियानवी जब कालेज के विद्यार्थी थे अमृता प्रीतम से उनका प्रेम हुआ. कॉलेज़ के दिनों में वे अपने शेरों के लिए मशहूर हो गए थे और अमृता इनकी प्रशंसक थीं.

साहिर लुधियानवी (Sahir Ludhianvi) के मुहब्बत की कहानी उनके कॉलेज के पहले साल से ही शुरू हो गयी थी. उनकी पहली मुहब्बत कांग्रेस के एक नेता की बेटी थी.

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    साहिर लुधियानवी (Sahir Ludhianvi) के मुहब्बत की कहानी उनके कॉलेज के पहले साल से ही शुरू हो गयी थी. उनकी पहली मुहब्बत कांग्रेस के एक नेता की बेटी थी जो बेशक बहुत ख़ूबसूरत नहीं थी लेकिन इसके बाद भी उसने साहिर के लिए अपनी मुहब्बत को कभी नहीं छुपाया. हालांकि वह लड़की हिन्दू मज़हब की थी लेकिन साहिर की तरह ही देशप्रेम की भावनाओं से ओतप्रोत थी. साहिर भी अपने लिए उसके जज़्बातों को शिद्दत से महसूस करते थे और उसकी बहुत इज़्ज़त भी करते थे, लेकिन उन्होंने शायद उस लड़की से सच्ची और बेशुमार मुहब्बत नहीं की थी. उसकी शख़्सियत में साहिर को सबसे पसन्द उसकी 'काली और गहरी आँखें' थीं जो उसे दूसरी लड़कियों से अलग करती थीं. उस लड़की के बारे में साहिर ने अपने जज़्बात का इज़हार इस शे’र में किया है:

    सामने इक मकान की छत पर मुन्तज़िर कोई लड़की है
    मुझको उससे नहीं तआ’ल्लुक़ कुछ फिर भी सीने में आग सी भडक़ी है

    बहरहाल दोनों के बीच रिश्ते बहुत दिनों तक क़ायम नहीं हो सके. बदक़िस्मती से लड़की बीमार पड़ गयी और जल्दी ही उसकी मौत हो गयी. इस हादसे से साहिर को गहरा धक्का पहुंचा. वे उसकी मौत की ख़बर सुन कर श्मशान घाट भी गये जहां उन्होंने अपनी मुहब्बत को धीरे-धीरे आग की लपटों में खाक़ होते हुए देखा. अपनी पहली मुहब्बत को उन्होंने एक नज़्म में कुछ इस तरह से याद किया है:

    अब मेरी आरज़ुओं की जन्नत ये राख़ है
    सरमाया-ए-हसूल-ए मोहब्बत की राख़ है
    ये मेरी शायरी की कहानी की राख़ है
    ये राख़ एक पाक जवानी की राख़ है
    ये राख़ मेरे दिल की तमन्ना की राख़ है
    ज़ौक़-ए तलब की जुर्रत-ए तनहा की राख़ है
    इस राख़ में फ़लक के सितारों का नूर है
    इस राख़ में ज़मीन की मासूम हूर है
    शोले फिर एक बार इसी राख़ से उठ
    और ख़तम कर दे मेरे मसाइब का सिलसिला

    किसी तरह से अपने एक दोस्त के ज़रिये उस लड़की की एक फ्रेम लगी तस्वीर हासिल करने के बाद साहिर उसे देख-देख कर कई दिन तक रोते रहे. लेकिन जैसा कि इन मामलों में होता रहा है, वक़्त ने उनके ज़ख़्मों पर मरहम लगा दी और 'काली और गहरी आंखों' वाली वह लड़की जल्दी ही उनकी याददाश्त के बीहड़ में कहीं खो गयी.

    कोई एक या दो साल बाद साहिर को दूसरी बार मुहब्बत हुई. इस बार उनकी महबूबा एक सिख लड़की थी जो कॉलेज के अहाते में बने कॉलेज हॉस्टल में रहती थी. साहिर के दोस्तों की मानें तो वह बेहद ख़ूबसूरत और ज़हीन लड़की थी जिसके नैन-नक़्श बेहद तीखे थे. वह ऐसी दिखती थी गोया कोई चलती-फिरती मूरत हो. चूंकि वह एक सिख लड़की थी सो ज़ाहिर-सी बात थी उसके मां-बाप अपनी बेटी को एक मुसलमान लड़के से शादी करने की इजाज़त हरगिज़ नहीं देते.

    Har Pal Ka Shayar Sahir

    साहिर से मुहब्बत होने के पहले जो लड़की बहुत ख़ुशमिज़ाज रहा करती थी, अब वह उदास रहने लगी थी क्योंकि उसकी बदनामी के चर्चे कॉलेज में हर किसी की ज़बान पर थे. साहिर ने एक नज़्म 'किसी को उदास देख कर' में अपने इस अहसास को ज़ाहिर करने की कोशिश की जिसकी कुछेक पंक्तियां यहां पेश हैं:

    मेरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूंगा
    मगर ख़ुदा के लिए तुम असीरे-ग़म न रहो
    हुआ ही क्या जो ज़माने ने तुमको छीन लिया
    यहां पे कौन हुआ है किसी का सोचो तो
    तुझे क़सम है मिरी दुख-भरी जवानी की
    मैं ख़ुश हूं मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दो

    मैं अपनी रूह की हर एक ख़ुशी मिटा लूंगा
    मगर तुम्हारी मसर्रत मिटा सकता नहीं
    मैं ख़ुद को मौत के हाथों में सौंप सकता हूं
    मगर ये बार-ए-मसाइब उठा सकता नहीं
    तुम्हारे ग़म के सिवा और भी ग़म हैं मुझे
    नजात जिनसे मैं इक लहजा पा नहीं सकता.

    चूंकि साहिर ने अपने रिश्तों के बारे में अपनी नज़्मों के बाहर कभी कुछ भी नहीं कहा लिहाजा इस बारे में ज़्यादा जानने के लिए हमें साहिर के कुछ दोस्तों की मदद की दरकार पड़ती है. इन ब्योरों के मुताबिक़ जब कॉलेज में गर्मी की छुट्टियां हो गयीं तब एक दिन साहिर ने उस लड़की को हॉस्टल के अपने कमरे में मिलने के इरादे से बुलाया. यह बात किसी तरह खुल गयी और कॉलेज के प्रिंसिपल को इसकी भनक लग गयी. पढाई के घण्टों के सिवा कॉलेज के लड़के और लड़कियों के बीच किसी तरह के मेलजोल पर सख़्त बन्दिश थी. यह हॉस्टल के क़ायदे-क़ानून का सरासर उल्लंघन था, इसलिए प्रिंसिपल ने दोनों को फौरन तलब किया और उन्हें कॉलेज खुलने पर दोबारा अपनी सूरत नहीं दिखाने का हुक्म सुनाया.

    कुछ लोगों का कहना है कि प्रिंसिपल साहिर और उसकी प्रेमिका से नाराज़ तो थे लेकिन उन्होंने दोनों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की. बहरहाल, ख़ुद अपनी मर्ज़ी से या फिर अपने घर वालों के दबाव में आकर लड़की ने कॉलेज छोड़ने का फ़ैसला कर लिया. इस घटना से साहिर इतने मायूस हो गये कि उस लड़की से मिलने के इरादे से वे उसके गांव तक चले गये. लेकिन लड़की ने उनसे मिलने से साफ़ मना कर दिया और अपनी तरफ़ से साहिर के साथ रिश्तों को पूरी तरह ख़त्म कर लिया.

    पुस्तक- हर पल का शायर साहिर
    लेखक- सुरिन्दर देओल
    प्रस्तावना- गोपी चंद नारंग
    प्रकाशक- वाणी प्रकाशन
    कीमत- 339 रुपये

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